06/04/2026
नील गगन की ओट में जब अमावस्या की काली छाया ब्रह्मांड को अपने अंक में भर लेती है, तब श्मशान के सन्नाटे और बहती हुई अंतःसलिला के तट पर "सीर-हली" का विधान जाग्रत होता है। यह केवल एक क्रिया नहीं, बल्कि महाशक्ति तारा के उस स्वरूप की आराधना है जहाँ वे 'तारिणी' बनकर साधक को भवसागर से पार उतारती हैं, किंतु इस मार्ग की देहली पर पग रखना साक्षात मृत्यु के आलिंगन जैसा है। तंत्र के गुप्त गलियारों में ऐसी मान्यता है कि जब साधक अपने रक्त की शुद्धि और मन की एकाग्रता के साथ माँ तारा के नील विग्रह का ध्यान करता है, तब उसके भीतर से एक सूक्ष्म 'सीर' अर्थात दिव्य हल रेखा निकलती है जो इस लोक और परलोक के मध्य की अदृश्य दीवार को चीर देती है। इस साधना के माध्यम से जब प्रेतात्माओं और उच्च लोकों की सत्ताओं का आह्वान होता है, तो वे भगवती तारा की आज्ञा से बँधकर साधक के सम्मुख उपस्थित होने को विवश हो जाती हैं।
किंतु इस वार्तालाप की शक्ति का गुप्त रहना ही इसकी मर्यादा है, क्योंकि यदि विवेकहीन साधक ने अपनी तृष्णा के वशीभूत होकर इन शक्तियों को सांसारिक स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम बनाया, तो माँ तारा का उग्र 'एकजटा' स्वरूप तत्काल प्रकट होकर साधक के मानसिक संतुलन का हरण कर लेता है। यह साधना एक दोधारी तलवार है जहाँ सूक्ष्म जगत की आत्माएं केवल उस साधक के वश में रहती हैं जिसकी आत्मा स्वयं तारा के करुणा भाव में विलीन हो चुकी हो। जो साधक अपनी इंद्रियों पर विजय पाकर इस साधना की गहराई में उतरता है, उसे न केवल मृत आत्माओं का ज्ञान प्राप्त होता है, बल्कि वह ब्रह्मांड के उन रहस्यों को भी सुन पाता है जो सामान्य कर्णों के लिए वर्जित हैं। यही कारण है कि सदियों से सिद्ध पुरुषों ने इसे अति गोपनीय रखा, ताकि केवल वह अधिकारी शिष्य ही इस पथ पर चले जिसने अपनी वासनाओं को तारा के चरणों में समर्पित कर दिया हो, अन्यथा इस मार्ग का अनिष्ट साधक को लोक और परलोक दोनों में कहीं का नहीं छोड़ता।