23/09/2026
राजा राव तुलाराम अमर रहे।
राव तुलाराम जी के शहीदी दिवस पर विशेष श्रद्धांजलि
भाईयो आज का दिन भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। आज हम उस महान योद्धा, उस वीर सपूत की 200वीं जयंती मना रहे हैं, जिसने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। हम बात कर रहे हैं भारत के शेर, रेवाड़ी के राजा, महान स्वतंत्रता सेनानी राव तुलाराम जी की।
🚩 आरंभिक जीवन और सत्ता का दायित्व
राव तुलाराम जी का जन्म रेवाड़ी राज परिवार में हुआ था, लेकिन उनका जीवन फूलों की सेज नहीं, बल्कि काँटों का ताज था। नियति ने बहुत छोटी उम्र में ही उनके कंधों पर राज सिंहासन का भार डाल दिया। पिता की मृत्यु के बाद, एक किशोर बालक ने जिस परिपक्वता और साहस के साथ सत्ता संभाली, उसने यह सिद्ध कर दिया था कि यह बालक आगे चलकर इतिहास रचेगा। उनमें बचपन से ही नेतृत्व के गुण और देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी थी।
⚔️ अंग्रेजों के खिलाफ सुनियोजित विद्रोह का शंखनाद
1857 की क्रांति केवल एक तात्कालिक आक्रोश का परिणाम नहीं थी, बल्कि कई जगहों पर यह एक सुनियोजित रणनीति थी, और राव तुलाराम इसके प्रमुख सूत्रधारों में से एक थे। वे अंग्रेजों की विस्तारवादी और शोषणकारी नीतियों को भली-भांति समझते थे। उन्होंने चुपचाप अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाई, हथियार जुटाए और जनता को एकजुट किया। जैसे ही क्रांति का बिगुल बजा, राव तुलाराम ने रेवाड़ी क्षेत्र से अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंका और खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। उनकी संगठनात्मक क्षमता अद्भुत थी।
🔥 नसीबपुर का ऐतिहासिक युद्ध:
1857 की सबसे भीषण लड़ाई।इतिहास गवाह है कि 16 नवंबर 1857 को नारनौल के पास नसीबपुर के मैदान में जो युद्ध हुआ, वह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की और अविभाजित भारत की सबसे बड़ी और सबसे खूनी लड़ाइयों में से एक था। यह कोई छोटी-मोटी झड़प नहीं थी, बल्कि एक महायुद्ध था।
राव तुलाराम और उनके भाई गोपाल देव के नेतृत्व में लगभग 5000 वीरों ने अंग्रेजों और उनके सहयोगियों की विशाल और आधुनिक सेना का सामना किया। नसीबपुर की धरती उस दिन वीरों के रक्त से लाल हो गई थी। राव तुलाराम की सेना ने अदम्य साहस का परिचय दिया। अंग्रेजी कमांडर भी उनकी वीरता देखकर दंग रह गए थे। भले ही संसाधनों की कमी के कारण इस युद्ध का परिणाम अपेक्षित नहीं रहा, लेकिन इस युद्ध ने अंग्रेजों की कमर तोड़ दी थी और यह साबित कर दिया था कि भारतीय वीर अपनी मिट्टी के लिए किस हद तक जा सकते हैं।
।। संघर्ष की निरंतरता और मातृभूमि के लिए अंतिम सांस तक प्रयास ।।
नसीबपुर के युद्ध के बाद भी राव तुलाराम का मनोबल नहीं टूटा। वे जानते थे कि यह संघर्ष लंबा चलेगा। वे भूमिगत हो गए और देश के अन्य हिस्सों, विशेषकर राजस्थान में जाकर, तात्या टोपे और अन्य क्रांतिकारी नेताओं के साथ मिलकर संघर्ष जारी रखा। उन्होंने कभी हार नहीं मानी।
जब उन्हें लगा कि देश के भीतर से अंग्रेजों को हराना मुश्किल हो रहा है, तो उन्होंने एक दूरदर्शी कदम उठाया। वे विदेशी सैन्य सहायता प्राप्त करने के लिए एक कठिन और जोखिम भरी यात्रा पर निकल पड़े। रूस के जार से मिलने की कोशिश में वे ईरान गए और फिर अफगानिस्तान के शासकों से मदद की गुहार लगाई। उनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय सैन्य सहयोग से भारत को आजाद कराना था।
देश को गुलामी की बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए विदेश से सैन्य सहायता का प्रयास करने वाले वो अविभाजित भारत के प्रथम राजदूत थे, उनके बाद ऐसा दूसरा व्यक्ति नेता जी सुभाष चंद्र बोस थे।
दुर्भाग्यवश, काबुल (अफगानिस्तान) में लगभग 38 वर्ष की छोटी उम्र में आज ही के दिन यानी कि 23 सितंबर 1863 को, मातृभूमि की आजादी का सपना अपनी आँखों में लिए, यह महान योद्धा हमेशा के लिए सो गया। वे अपनी मातृभूमि पर वापस नहीं लौट सके, लेकिन उनकी शहादत ने स्वतंत्रता की जो अलख जगाई, वह कभी नहीं बुझी। काबुल में वहां के रहा शेर अली खान के शाही फरमान अनुसार उनके अंतिम संस्कार के दिन पूरे काबुल बाजार को बंद रखा गया, फौज़ द्वारा शाही अंदाज में इनको गर्जती तोपो के द्वारा सलामी दी गई, अंतिम यात्रा में हजारों लोग शामिल हुए जिसकी भीड़ लगभग 2 किलोमीटर की दूरी तक फैली हुई थी। अंतिम यात्रा की अगुवाई अफगान राजा के दोनों बेटे और राव तुलाराम के अंतर्राष्ट्रीय मिशन में लगातार उनके साथ रहे 6 भारतीय सहयोगी कर रहे थे। उनका अंतिम संस्कार श्मशान खत्रियां जो पेशावर रोड पर था वहां किया गया।
25 नवंबर 1863 को अंग्रेजों की नजरों से बचाकर काबुल से उनके सहयोगियों द्वारा लाई गई राव तुलाराम की राख को त्रिवेणी संगम इलाहाबाद(प्रयागराज) में गंगा में अर्पित किया गया।
🙏 नमन है ऐसे वीर को 🙏
आज, इनके शहीदी, आइए हम उस महापराक्रमी राजा राव तुलाराम को नमन करें। उनका जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हों, अगर हौसला बुलंद हो तो बड़ी से बड़ी ताकतों से भी टकराया जा सकता है।
उनका त्याग, उनका बलिदान और उनकी वीरता आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी।
जय हिन्द! जय भारत! राव तुलाराम अमर रहें! 🇮🇳