Agriculture Journalist Association of India - AJAI

Agriculture Journalist Association of India - AJAI Contact information, map and directions, contact form, opening hours, services, ratings, photos, videos and announcements from Agriculture Journalist Association of India - AJAI, Nonprofit Organization, 60/9 3rd Floor Yusaf Sarai Near Green Park Metro Station, Green Park.

Agriculture Journalist Association of India (AJAI) is a national-level forum that works with a vision to promote the highest standards amongst the communicators including journalists and photographers, who have dedicated their lives and works to farming,

सिर्फ खेती नहीं… अब नेतृत्व की कहानी लिखेगा किसान।भारत की असली ताकत खेतों में बसती है—और जब वही किसान अपनी आवाज़ खुद उठा...
11/04/2026

सिर्फ खेती नहीं… अब नेतृत्व की कहानी लिखेगा किसान।

भारत की असली ताकत खेतों में बसती है—
और जब वही किसान अपनी आवाज़ खुद उठाता है,
तो बदलाव सिर्फ संभव नहीं… अनिवार्य हो जाता है।

Farmer The Journalist (FTJ) के साथ बनें
आवाज़, विचार और परिवर्तन का चेहरा।

जहाँ हर खेत से उठेगी एक कहानी,
और हर कहानी बनेगी भारत की नई पहचान।

👉 किसान पत्रकार अभियान से जुड़ें — क्योंकि आपकी आवाज़ ही आपकी शक्ति है।

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Every Farmer Has a Story — Now It’s Your Time to Tell It! Be the voice of change from your own field.Join the Farmer The...
10/04/2026

Every Farmer Has a Story — Now It’s Your Time to Tell It!

Be the voice of change from your own field.
Join the Farmer The Journalist (FTJ) movement and turn your experiences into powerful stories that inspire the nation.

In association with Agriculture Journalist Association of India, this initiative empowers farmers to become storytellers, highlight innovations, and raise grassroots challenges.

Get recognized
Build your identity as a Farmer Journalist
Connect with a national agri-media network

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For more information:
Manishankar Kumar
📞 +91 8766314619

Every Field Will Become a NewsroomIndia’s agriculture is not just about farming anymore—it’s about voices, stories, and ...
08/04/2026

Every Field Will Become a Newsroom

India’s agriculture is not just about farming anymore—it’s about voices, stories, and real-time ground truth.

With the initiative of Agriculture Journalist Association of India in collaboration with Krishi Jagran, we are empowering farmers to become “Farmer The Journalist”—bringing authentic insights directly from the fields.

📢 This movement aims to bridge the gap between farmers, policymakers, and society by ensuring that real stories reach the right platforms.

Now, farmers are not just cultivators—they are reporters of reality.

Join the movement & become a part of this transformation:
👉 https://ajai.org.in/membership/membership-resources/⁠

Membership with AJAI offers:
✔️ Professional networking & growth
✔️ Participation in national-level events & workshops
✔️ A strong platform to raise agricultural voices

Let’s amplify the voice of Bharat’s backbone—our farmers.

23/03/2026

खेतों में गन्ना बुवाई की तैयारी और रोपाई तेजी से जारी है। किसान भाई मेहनत के साथ नई फसल की नींव रख रहे हैं, जिससे आने वाले समय में अच्छी पैदावार की उम्मीद है।

इस समय सही दूरी, अच्छी किस्म और संतुलित खाद का इस्तेमाल बहुत जरूरी है, ताकि गन्ने की फसल मजबूत और भरपूर हो सके।

#कृषि_पत्रकार

Video Credit: विनोद कुमार कुशवाहा ग्राम – जंगल शाहपुर पोस्ट – पडरौना जिला – कुशीनगर (उत्तर प्रदेश)

छिंदवाड़ा: जीरो टिलेज और नरवाई प्रबंधन का उभरता मॉडलछिंदवाड़ा। जिले के किसान अब 'जलवायु अनुकूल खेती' अपनाकर मिसाल पेश कर...
20/03/2026

छिंदवाड़ा: जीरो टिलेज और नरवाई प्रबंधन का उभरता मॉडल

छिंदवाड़ा। जिले के किसान अब 'जलवायु अनुकूल खेती' अपनाकर मिसाल पेश कर रहे हैं। बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA), जबलपुर के मार्गदर्शन में मोहखेड़ के ग्राम कामठी और छिंदवाड़ा के ग्राम सलैया में जीरो टिलेज (शून्य जुताई) तकनीक का सफल प्रयोग किया जा रहा है।
प्रगतिशील किसान श्री किशोर पवार (कामठी) ने गेहूं की कटाई के बाद बिना नरवाई जलाए और बिना जुताई किए सीधे मूंग की बुवाई की है। इसी तरह ग्राम सलैया के किसान श्री वेद प्रकाश रघुवंशी और श्री यदुराम रघुवंशी भी इस आधुनिक पद्धति से जुड़कर खेती कर रहे हैं।

तकनीकी विशेषज्ञ दीपेंद्र सिंह के नेतृत्व में ये किसान अपने स्वयं के बीजों का उपयोग कर लागत घटा रहे हैं। यह तकनीक न केवल मिट्टी की नमी और मित्र कीटों को बचाती है, बल्कि नरवाई न जलाने से पर्यावरण को प्रदूषित होने से भी रोकती है। छिंदवाड़ा का यह मॉडल अब अन्य क्षेत्रों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है।

#कृषि_पत्रकार

रिपोर्टर Dipendra Singh Thakur छिंदवाड़ा

बरेली में स्वदेशी गौवंश आनुवंशिकी एवं जीनोमिक्स के इंटीग्रेटेड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उद्घाटनबरेली, उत्तर प्रदेश, 24 फरवर...
24/02/2026

बरेली में स्वदेशी गौवंश आनुवंशिकी एवं जीनोमिक्स के इंटीग्रेटेड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का उद्घाटन

बरेली, उत्तर प्रदेश, 24 फरवरी 2026: उत्तर प्रदेश के पशुधन एवं डेयरी क्षेत्र को नई दिशा देने की दिशा में बरेली स्थित बी.एल. कामधेनु परिसर में स्वदेशी गौवंश आनुवंशिकी एवं जीनोमिक्स हेतु इंटीग्रेटेड सेंटर ऑफ एक्सीलेंस का विधिवत उद्घाटन किया गया। इस अवसर को प्रदेश के वैज्ञानिक एवं कृषि समुदाय ने ऐतिहासिक पहल के रूप में देखा।

केंद्र का उद्घाटन अरुण कुमार सक्सेना, माननीय मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया गया। कार्यक्रम में राज्य सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, पशुपालक, कृषि विशेषज्ञ तथा ब्राज़ील से आए उच्चस्तरीय आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति रही।

करीब 25 एकड़ क्षेत्र में विकसित यह एकीकृत परिसर स्वदेशी नस्लों के संरक्षण, संवर्धन और वैज्ञानिक उन्नयन के उद्देश्य से स्थापित किया गया है। केंद्र में उन्नत इन विट्रो फर्टिलाइजेशन–एम्ब्रियो ट्रांसफर (आईवीएफ–ईटी) प्रयोगशाला, आधुनिक पैथोलॉजी परीक्षण प्रयोगशाला तथा जीनोमिक विश्लेषण सुविधाएँ उपलब्ध कराई गई हैं।

पैथोलॉजी प्रयोगशाला के माध्यम से पशुओं में रोगों की शीघ्र और सटीक पहचान सुनिश्चित की जाएगी, जिससे जैव-सुरक्षा मजबूत होगी और पशुधन की उत्पादकता में वृद्धि होगी। जीनोमिक प्रयोगशाला नस्ल सुधार, श्रेष्ठ पशुओं की पहचान तथा वैज्ञानिक, डेटा-आधारित प्रजनन प्रणाली को बढ़ावा देगी। वहीं आईवीएफ–ईटी तकनीक के माध्यम से उच्च गुणवत्ता वाली स्वदेशी नस्लों के नियंत्रित एवं तीव्र संवर्धन को गति मिलेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, इन सभी व्यवस्थाओं का एकीकृत स्वरूप पशुधन विकास के लिए समग्र एवं दीर्घकालिक समाधान प्रस्तुत करता है।

कार्यक्रम में ब्राज़ीलियन एसोसिएशन ऑफ ज़ेबू ब्रीडस के अध्यक्ष सहित एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने केंद्र का अवलोकन किया। प्रतिनिधिमंडल ने प्रयोगशालाओं, अनुसंधान अवसंरचना और पशुधन प्रबंधन प्रणाली का निरीक्षण करते हुए भारत–ब्राज़ील के बीच वैज्ञानिक सहयोग की संभावनाओं पर सकारात्मक चर्चा की।

इस पहल को दोनों देशों के बीच पशु आनुवंशिकी और डेयरी विकास के क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का प्रतीक माना जा रहा है।

अपने संबोधन में मंत्री श्री सक्सेना ने कहा कि यह केंद्र माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘तीन सौ साठ डिग्री’ समग्र विकास दृष्टिकोण से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि इस मॉडल में पशुधन, जैव विविधता, जैविक कृषि, ऊर्जा उत्पादन और अपशिष्ट प्रबंधन को एकीकृत कर सतत ग्रामीण विकास की अवधारणा को साकार किया जा रहा है।

उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा डेयरी उत्पादक राज्य है और वैज्ञानिक प्रजनन पद्धतियों तथा उन्नत जीनोमिक अनुसंधान के माध्यम से राज्य उत्पादन वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण, विशेषकर मीथेन उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में भी योगदान दे सकता है।

मंत्री ने इस परियोजना को आत्मनिर्भर भारत एवं ग्रामीण समृद्धि की दिशा में सशक्त पहल बताते हुए कहा कि आधुनिक आनुवंशिक तकनीकें किसानों की आय में वृद्धि, पशुधन की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार तथा दीर्घकालिक उत्पादकता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी।

श्री घनश्याम खंडेलवाल, अध्यक्ष, बीएल एग्रो इंडस्ट्रीज़ ने कहा, “आज का दिन भारतीय पशुपालन क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है, जो भारत और ब्राज़ील के बीच गहरे और सुदृढ़ संबंधों की आधारशिला पर निर्मित हुआ है। यह केंद्र 25 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है और इसमें नई पीढ़ी के पशु विज्ञान के तीन प्रमुख स्तंभ—रोग निदान (पैथोलॉजी), जीनोमिक्स तथा उन्नत प्रजनन जैव-प्रौद्योगिकी—को एक ही छत के नीचे एकीकृत किया गया है।

यह समेकित व्यवस्था पशुधन क्षेत्र के समग्र रूपांतरण के लिए ‘360 डिग्री’ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करती है, जो वैज्ञानिक, टिकाऊ और दीर्घकालिक विकास की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।”
कार्यक्रम में उपस्थित वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि यह एकीकृत अनुसंधान एवं विकास केंद्र स्वदेशी गौवंश संरक्षण, नस्ल सुधार, स्वास्थ्य प्रबंधन और समग्र ग्रामीण विकास मॉडल के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगा।

बरेली में स्थापित यह केंद्र आने वाले समय में उन्नत पशुधन अनुसंधान का प्रमुख केंद्र बनकर उभरेगा और देश के डेयरी क्षेत्र को वैज्ञानिक, सतत और आत्मनिर्भर दिशा प्रदान करेगा।

जब जमीन बोलती है — तो किसान सुनता है     #किसान मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड ब्लॉक के छोटे से गाँव कामठी में र...
24/02/2026

जब जमीन बोलती है — तो किसान सुनता है
#किसान

मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड ब्लॉक के छोटे से गाँव कामठी में रहने वाले श्री किशोर पंवार एक किसान हैं,। खेती उनके लिए सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि एक जुनून है — एक ऐसा जुनून जो हर साल कुछ नया सीखने और आजमाने की प्रेरणा देता है। इसी जुनून ने उन्हें BISA के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों के साथ जोड़ा और उनकी खेती की पूरी तस्वीर बदल दी।

जलवायु परिवर्तन की चुनौती — और एक नई राह

आज हमारे आसपास मौसम का मिजाज पूरी तरह बदल गया है। कभी बेमौसम बारिश, कभी लंबा सूखा, कभी अचानक ओले — किसान का पूरा हिसाब गड़बड़ा जाता है। छिंदवाड़ा जिले के किसान भी इस बदलते मौसम की मार झेल रहे हैं। इन्हीं चुनौतियों का सामना करने के लिए BISA (बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया) और कृषि विभाग छिंदवाड़ा ने मिलकर जिले में जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम शुरू किया। इस संयुक्त प्रयास का मकसद है — किसान को मौसम की मार से बचाना, खेती की लागत घटाना और धरती को भी सेहतमंद बनाए रखना।

श्री किशोर पंवार जब इस कार्यक्रम से जुड़े तो BISA के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने उन्हें नई तकनीकों के बारे में विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि जलवायु परिवर्तन के दौर में खेती का तरीका भी बदलना होगा — वरना घाटा बढ़ता जाएगा।

"पहले हम वही करते रहे जो दादा-परदादा से सीखा था। लेकिन BISA के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियो ने समझाया कि मौसम बदल गया है, तो हमें भी बदलना होगा।" — श्री किशोर पंवार

न पराली जलाई, न खेत जोता — फिर भी भरपूर फसल!

धान की कटाई के बाद जहाँ दूसरे किसान या तो पराली में आग लगाते हैं या ट्रैक्टर से बार-बार जुताई करते हैं, वहीं इस बार श्री किशोर पंवार ने कुछ बिल्कुल अलग किया। उन्होंने खेत की जुताई नहीं की और पराली को भी नहीं जलाया। सीधे जीरो टिलेज मशीन से DBW-303 गेहूँ की बुवाई कर दी। पराली खेत में ही पड़ी रही — जो धीरे-धीरे सड़कर खाद बन गई, मिट्टी में नमी बनाए रखी और जमीन को ताकत दी।

पराली न जलाने से न सिर्फ पैसों की बचत हुई, बल्कि आसपास का वातावरण भी साफ रहा। न धुआँ उठा, न आसमान काला हुआ। पड़ोसी किसानों ने भी राहत की साँस ली।

"भैया, जब हम पराली जलाते थे तो आँखों में आँसू आ जाते थे — धुएँ से भी और इस बात से भी कि अपने ही खेत को जला रहे हैं। इस बार न धुआँ उठा, न आँसू आए — बस हरियाली आई।" — श्री किशोर पंवार

इस एक फैसले से प्रति एकड़ ₹2,000 से ₹3,000 की सीधी बचत हुई। ट्रैक्टर का किराया नहीं, डीजल का खर्च नहीं, बार-बार खेत चक्कर लगाने की मशक्कत नहीं — पैसा भी बचा, समय भी

बारिश ने रोका — जीरो टिलेज ने बचाया

इस बार जलवायु परिवर्तन का एक और असर दिखा — सीजन में अप्रत्याशित बारिश हो गई और खेत देर तक गीला रहा। पुरानी पद्धति में खेत सूखने का इंतजार करना पड़ता और बुवाई का सही समय निकल जाता। किसान जानते हैं कि खेती में 'सही समय' का मतलब होता है — बेहतर उत्पादन। देरी हुई तो फसल खुद कमजोर हो जाती है।

लेकिन जीरो टिलेज मशीन ने यह परेशानी ही खत्म कर दी। बिना खेत सुखाए, गीली जमीन में भी मशीन ने बखूबी काम किया और सही समय पर बुवाई हो गई। यही वजह रही कि इस बार उत्पादन पर बारिश की देरी का कोई असर नहीं पड़ा — बल्कि समय पर बुवाई होने से फसल और भी अच्छी हुई।

जब बीज दिखा — और गाँव वालों ने उड़ाया मजाक...

बुवाई के बाद एक और मुसीबत आ खड़ी हुई। जीरो टिलेज से बुवाई होने के कारण बीज जमीन की सतह पर दिखाई दे रहे थे। यह देखकर गाँव के लोगों को जैसे मौका मिल गया। खेत के पास से गुजरने वाले किसान रुक-रुककर कहने लगे:

"अरे किशोर भाई, यह क्या कर दिया? बीज तो ऊपर ही पड़ा है! रोटावेटर मार दो, नहीं तो सब बर्बाद हो जाएगा। वैज्ञानिक क्या जानें हमारे खेत को? चिड़िया खा जाएगी सारा बीज, देख लेना!" — गाँव के लोग

कुछ लोगों ने तो व्यंग्य करते हुए यहाँ तक कह दिया — 'नई तकनीक वाले ऐसे ही बर्बाद होते हैं।' लेकिन श्री किशोर पंवार ने किसी की एक न सुनी। BISA के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने प्रशिक्षण में समझाया था कि जीरो टिलेज में ऐसा होना स्वाभाविक है — बीज अंकुरित होकर मजबूत पौधा बनेगा। उन्होंने भरोसा रखा और न रोटावेटर चलाया, न घबराए।

और कुछ ही दिनों में खेत हरे-भरे पौधों से लहलहा उठा। जो कल तक मजाक उड़ा रहे थे, वही आज दंग रह गए।

पहले और अब — जमीन खुद बताती है फर्क

पहले जब छिड़काव (Broadcasting) विधि से बुवाई होती थी तो बीज की मात्रा बहुत ज्यादा लगती थी क्योंकि बीज अनियमित रूप से बिखरते थे। सिंचाई में पानी भी अधिक खर्च होता था और जड़ें उथली रहने से पौधे कमजोर रहते थे। लेकिन जीरो टिलेज से कतार में बुवाई के बाद बीज सही गहराई और सही दूरी पर पड़ता है, पौधों की जड़ें मजबूत होती हैं और पानी की खपत भी काफी कम हो जाती है।

"पहले पानी देते थे तो लगता था खेत पी ही नहीं रहा — अब कम पानी में भी खेत हरा-भरा रहता है। बालियाँ भी खूब लंबी निकलीं और दाने भी मोटे-भरे हुए।" — श्री किशोर पंवार

वही लोग अब पूछते हैं — 'कैसे किया भाई?'

फसल पककर तैयार हुई तो पूरे गाँव ने देखा — शानदार उपज, लंबी बालियाँ और मोटे दाने। अब वही लोग जो कल ताने कसते थे, किशोर पंवार के पास आकर पूछने लगे — 'भाई, यह जीरो टिलेज मशीन कहाँ मिलती है? अगले साल हम भी यही करेंगे।' एक किसान की हिम्मत ने पूरे गाँव को नई तकनीक की तरफ मोड़ दिया।

आज श्री किशोर पंवार सिर्फ एक किसान नहीं, बल्कि अपने गाँव और आसपास के इलाके के लिए एक प्रेरणा बन गए हैं। उनका खेत अब एक जीती-जागती पाठशाला है जहाँ दूसरे किसान आकर नई तकनीक को अपनी आँखों से देखते और समझते हैं।

"खेती बदलना डर लगता है, लेकिन एक बार बदल दो तो जिंदगी बदल जाती है। न पराली जलाई, न धुआँ उठाया, न खेत जोता — फिर भी फसल इतनी अच्छी हुई कि खुद हैरान हो गए। लोग हँसेंगे, रोकेंगे, डराएंगे — लेकिन अगर सही तकनीक सीखी है तो उस पर अडिग रहो। BISA के वैज्ञानिकों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने जो सिखाया, उस पर भरोसा रखा — और धरती माँ ने साथ दिया।" — श्री किशोर पंवार

जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम (CRA) — जिला छिंदवाड़ा, मध्यप्रदेश
बोरलॉग इंस्टीट्यूट फॉर साउथ एशिया (BISA) एवं कृषि विभाग, छिंदवाड़ा
किसान: श्री किशोर पंवार | ग्राम: कामठी | ब्लॉक: मोहखेड | जिला: छिंदवाड़ा

ग्लोबल AI कृषी समिटमध्ये लातूरचा दमदार ठसा — श्रीकृष्ण शिंदे झळकलेलातूर : कृषी क्षेत्रातील नवोन्मेषी कार्यामुळे लातूर जि...
24/02/2026

ग्लोबल AI कृषी समिटमध्ये लातूरचा दमदार ठसा — श्रीकृष्ण शिंदे झळकले
लातूर : कृषी क्षेत्रातील नवोन्मेषी कार्यामुळे लातूर जिल्ह्याचे नाव पुन्हा एकदा राष्ट्रीय स्तरावर झळकले आहे. कृषी नवोन्मेष सन्मानप्राप्त प्रगतिशील शेतकरी श्रीकृष्ण शिंदे यांनी २२ व २३ फेब्रुवारी रोजी मुंबई येथील Jio World Convention Centre येथे पार पडलेल्या ग्लोबल AI कृषी समिटमध्ये सहभाग घेत जिल्ह्याचे प्रतिनिधित्व केले.

त्यांची निवड विभागीय कृषी संचालनालय, लातूर व Agriculture Department Latur यांच्या वतीने ‘Agri Sponsor Awardee’ म्हणून करण्यात आली. या आंतरराष्ट्रीय परिषदेत कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), प्रिसिजन शेती, डिजिटल कृषी पायाभूत सुविधा, पीक निरीक्षण तंत्रज्ञान आणि शाश्वत शेती व्यवस्थापन या विषयांवर नामांकित वैज्ञानिक व तज्ज्ञांनी मार्गदर्शन केले.

या संधीबद्दल श्रीकृष्ण शिंदे यांनी कृषी तंत्रज्ञान व्यवस्थापन संस्था (आत्मा), लातूर तसेच कृषी विज्ञान केंद्र, लातूर यांचे मनःपूर्वक आभार मानले. समिटमधून मिळालेल्या ज्ञानाचा उपयोग जिल्ह्यातील शेतकऱ्यांच्या प्रगतीसाठी आणि आधुनिक AI आधारित शेती तंत्रज्ञानाच्या प्रसारासाठी करण्यात येणार असल्याचे त्यांनी सांगितले.

श्रीकृष्ण शिंदे यांच्या या सहभागामुळे लातूर जिल्ह्याच्या कृषी क्षेत्राचा सन्मान वाढला असून शेतकरी वर्गात अभिमानाची भावना व्यक्त होत आहे.
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लातूर के किसान को मुंबई में ग्लोबल AI एग्री समिट के लिए एग्री स्पॉन्सर अवार्डी चुना गया

लातूर: लातूर जिले के एक प्रोग्रेसिव किसान श्री कृष्ण शिंदे को एग्रीकल्चर डिपार्टमेंट लातूर ने 22 और 23 फरवरी को जियो वर्ल्ड कन्वेंशन सेंटर में होने वाले मशहूर ग्लोबल AI एग्री समिट में हिस्सा लेने के लिए एग्री स्पॉन्सर अवार्डी चुना है।

इस समिट में जाने-माने साइंटिस्ट, एग्रीकल्चर एक्सपर्ट, पॉलिसी बनाने वाले और इनोवेटर एक साथ आए ताकि मॉडर्न एग्रीकल्चर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बदलाव लाने वाली भूमिका पर चर्चा की जा सके। इस इवेंट में AI से चलने वाली फसल की मॉनिटरिंग, प्रिसिजन फार्मिंग, डिजिटल एग्रीकल्चर प्लेटफॉर्म और सस्टेनेबल फार्मिंग टेक्नोलॉजी के बारे में गहरी जानकारी दी गई।

शिंदे ने यह कीमती मौका देने के लिए डिविजनल एग्रीकल्चर डायरेक्टरेट लातूर और SDAO लातूर का दिल से शुक्रिया अदा किया। उन्होंने डॉ. महेश तीर्थकर, डॉ. राजेंद्र कदम, तहसील एग्रीकल्चर ऑफिसर डॉ. जाधव, ATMA लातूर और कृषि विज्ञान केंद्र लातूर के एंटोमोलॉजिस्ट डॉ. संदीप देशमुख को भी उनके लगातार गाइडेंस और हौसला बढ़ाने के लिए खास धन्यवाद दिया। इस मौके पर बोलते हुए, शिंदे ने कहा कि समिट से मिली जानकारी का इस्तेमाल इलाके के किसान समुदाय के फायदे के लिए AI-बेस्ड नई खेती के तरीकों को बढ़ावा देने के लिए अच्छे से किया जाएगा।

बापू (गांधी का स्वराज) , सर्वोदय और हलमा का समकालीन अर्थदूनिया जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा, भूमि क्षरण और जल संकट जै...
16/01/2026

बापू (गांधी का स्वराज) , सर्वोदय और हलमा का समकालीन अर्थ

दूनिया जलवायु परिवर्तन, खाद्य असुरक्षा, भूमि क्षरण और जल संकट जैसी जटिल चुनौतियों से जूझ रही है। तकनीकी समाधान और नीतिगत सुधारों के बावजूद पृथ्वी की पारिस्थितिकी और समाज दोनों असंतुलन की ओर बढ़ रहे हैं। पर्यावरणीय विनाश, संसाधनों का अत्यधिक दोहन और सामाजिक विखंडन आधुनिक विकास के अनिवार्य परिणाम बन गए हैं। इस दौर में जब हम समाधान की तलाश में भटक रहे हैं, आदिवासी समुदाय अपनी परंपराओं, जीवनशैली और सामूहिक ज्ञान के ज़रिए एक अलग रास्ता दिखा रहे हैंवह रास्ता जो स्थिरता, सामूहिकता और संतुलन पर आधारित है।

आदिवासी समुदाय सदियों से जल, जंगल, जमीन और जीव-जंतुओं के साथ सामंजस्यपूर्ण रिश्ता बनाए हुए हैं। उनकी परंपराएँ, विशेष रूप से 'हलमा' यानी सामूहिक श्रमदान, आधुनिक विकास के लिए ठोस प्रेरणा देती हैं। यह केवल एक कृषि पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक दर्शन है जो समुदाय, पर्यावरण और आत्मनिर्भरता को एक सूत्र में पिरोता है।

हलमा एक पारंपरिक आदिवासी प्रथा है जो प्राचीन काल से आदिवासी समुदायों में प्रचलित रही है। यह सामूहिक प्रयास का वह अनूठा उदाहरण है जहां समुदाय के लोग एक दूसरे की मदद करते हैं, खासकर कृषि कार्यों में। इस प्रक्रिया में कोई आर्थिक लेन-देन नहीं होता, बल्कि सभी लोग अपनी मेहनत से योगदान करते हैं। बुआई, निराई, गुड़ाई, फसल कटाई और अन्य कृषि कार्यों के दौरान समुदाय के सभी सदस्य किसी एक सदस्य के खेत में एकत्रित होकर काम करते हैं।

हलमा का मूल उद्देश्य पारस्परिक सहयोग और समर्थन के माध्यम से समुदाय की समृद्धि और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है। यह प्रथा इस बात का प्रमाण है कि सामूहिक चेतना और सहयोग की भावना से कोई भी समुदाय न केवल अपनी आर्थिक समृद्धि सुनिश्चित कर सकता है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी मजबूत बना सकता है।

हलमा प्रणाली का संचालन दो महत्वपूर्ण स्तरों पर होता है, जो इसकी लचीलापन और व्यापकता को दर्शाते हैं। पहले स्तर पर व्यक्तिगत सहयोग आता है। जब किसी किसान के खेत में अधिक काम होता है, जैसे कि फसल कटाई का समय या बुआई का मौसम, तो अन्य ग्रामीण स्वेच्छा से मदद करते हैं। इसमें कोई हिसाब-किताब नहीं होता, बल्कि यह विश्वास होता है कि जब मुझे जरूरत होगी तो समुदाय मेरे साथ खड़ा होगा।

दूसरा स्तर सामुदायिक विकास का है। जब पूरे गाँव के हित के लिए कोई सामूहिक कार्य होता है, जैसे तालाब की खुदाई, सड़क निर्माण या जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण, तो सभी लोग बिना किसी मजदूरी के मिलकर वह काम करते हैं। यह सामुदायिक संपत्ति और सामूहिक विकास के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक है। यह दो-स्तरीय संरचना हलमा को एक समग्र सामाजिक व्यवस्था बनाती है जो व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों आवश्यकताओं को संबोधित करती है।

आधुनिकता के दौर में जब दुनिया जल संकट से जूझ रही है, तब झाबुआ जिले के पेटलावद ब्लॉक के ग्राम गोदडिया ने अपनी समृद्ध आदिवासी परंपरा के जरिए एक नई मिसाल पेश की है। यहाँ के ग्रामीणों ने सदियों पुरानी हलमा पद्धति को पुनर्जीवित करते हुए जल संरक्षण का एक सराहनीय कार्य किया है।

ग्राम की ऊँची टेकरी पर स्थित कटारा फलिया में पानी के बहाव को रोकने और भू-जल स्तर सुधारने के लिए ग्रामीणों ने कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत की। पारंपरिक हलमा पद्धति के माध्यम से यहाँ एक गली प्लग यानी छोटा डैम बनाया गया। इस प्रयास से न केवल ग्रामीणों को दैनिक उपयोग के लिए पानी मिलेगा, बल्कि मवेशियों के लिए भी पानी की उपलब्धता सुनिश्चित होगी।

इस आयोजन की खास बात इसकी जीवंतता रही। जल संरक्षण के इस कार्य को ग्रामीणों ने किसी बोझ की तरह नहीं, बल्कि एक उत्सव की तरह मनाया। कटारा फलिया के चालीस से अधिक परिवारों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। ढोल, कुंडी और थाली की थाप पर पारंपरिक नृत्य करते हुए ग्रामीणों ने श्रमदान किया।

वागधारा गठित ग्राम स्वराज समूह के दिनेश कटारा ने कहा कि यदि समाज एकजुट होकर प्रयास करे तो जल संकट जैसी गंभीर समस्या को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कार्यक्रम के दौरान ब्लॉक सहजकर्ता मुकेश पोरवाल ने सामूहिकता के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि एकता से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं और परिणाम अधिक प्रभावी मिलते हैं।

कार्यक्रम का सफल संचालन सामुदायिक सहजकर्ता दीपक मईडा द्वारा किया गया। इस पुनीत कार्य में ग्राम स्वराज समूह के दिनेश कटारा, पूनमचंद, कैलाश, हीरा डोडियार सहित प्रेमलता डामर, ललिता कटारा और लीलावती सिंगाड़ जैसे अनेक कार्यकर्ताओं का सक्रिय योगदान रहा।

गोदडिया के जल संरक्षण प्रयास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव तब आया जब गाँव के लोगों ने महसूस किया कि यदि तुरंत आगे का कार्य नहीं किया गया तो जो कुछ हासिल हुआ है वह टिकाऊ नहीं रहेगा। तालाब के रिसाव को रोकने के लिए पत्थरों की आवश्यकता थी, लेकिन पत्थर दूर से लाने पड़े। इस चुनौतीपूर्ण कार्य में कई ग्रामीणों, खासकर महिलाओं ने मिलकर यह काम स्वयं पूरा किया।

सक्षम समूह की सदस्य ललिता कटारा के अनुसार, "यह काम कठिन था, लेकिन हमारे बीच एकता और सहयोग की भावना ने हमें आगे बढ़ाए रखा।" यह कथन हलमा की आत्मा को व्यक्त करता है कठिनाइयों के बीच भी सामूहिक संकल्प और एकता की शक्ति। महिलाओं की सक्रिय भागीदारी यह भी दर्शाती है कि हलमा केवल पुरुषों की प्रथा नहीं है, बल्कि पूरे समुदाय की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आर्थिक दृष्टि से देखें तो सामूहिक श्रम से कृषि कार्यों में बाहरी संसाधनों की आवश्यकता कम हो जाती है। मजदूरी पर खर्च न करने से किसानों की आर्थिक बचत होती है। साथ ही सामूहिक श्रम और सहयोग के माध्यम से समुदाय अपने कृषि कार्यों को खुद ही पूरा कर सकता है, जिससे बाहरी सहायता पर निर्भरता कम हो जाती है। यह आत्मनिर्भरता आर्थिक स्वतंत्रता और सशक्तिकरण का मार्ग प्रशस्त करती है। जब समुदाय अपने संसाधनों और श्रम से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता है तो वह न केवल आर्थिक रूप से मजबूत होता है, बल्कि आत्मसम्मान और गौरव की भावना भी विकसित होती है।

हलमा पारंपरिक ज्ञान और तकनीकों को सुरक्षित रखने का एक माध्यम भी है। जब समुदाय के सदस्य एक साथ मिलकर काम करते हैं तो वे अपनी कृषि विशेषज्ञता और पारंपरिक विधियों को साझा करते हैं। यह अंतर-पीढ़ीगत ज्ञान हस्तांतरण का एक प्राकृतिक और प्रभावी तरीका है। सांस्कृतिक पहचान की मजबूती में भी हलमा की भूमिका महत्वपूर्ण है। यह प्रथा आदिवासी संस्कृति, परंपरा और जीवनशैली को संरक्षित करने में मदद करती है। हलमा जैसी प्रथाएं सांस्कृतिक गौरव और आत्म-सम्मान का स्रोत बनती हैं।

आधुनिक अर्थव्यवस्था मुद्रा-केंद्रित है। हर चीज़ का मूल्य पैसे में आंका जाता है और हर रिश्ता एक आर्थिक लेन-देन में बदल गया है। इस व्यवस्था में श्रम एक वस्तु है जिसे खरीदा और बेचा जाता है। लेकिन हलमा एक बिल्कुल अलग अर्थव्यवस्था प्रस्तुत करता है एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो मुद्रा के बिना काम करती है, जहां संबंधों का मूल्य पैसे से नहीं मापा जाता।

हलमा में लेन-देन नहीं होता, बल्कि आदान-प्रदान होता है। आज मैं आपके खेत में काम करता हूं, कल आप मेरे खेत में आएंगे। यह कोई करार नहीं है, बल्कि विश्वास है। यह कोई हिसाब-किताब नहीं है, बल्कि रिश्ता है। जब कोई व्यक्ति हलमा में भाग लेता है तो वह केवल एक मजदूर नहीं होता—वह समुदाय का सम्मानित सदस्य होता है। उसका श्रम उसकी गरिमा को बढ़ाता है,
महात्मा गांधी ने स्वराज की जो अवधारणा प्रस्तुत की थी, वह हलमा की भावना से गहराई से जुड़ी है। गांधी जी का स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं था, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता, सामुदायिक सशक्तिकरण और ग्राम स्वराज की अवधारणा थी। गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों में ग्रामोद्योग, श्रमदान और सामुदायिक कार्य शामिल थे। हलमा इन सभी तत्वों को एक साथ लाता है।

जब गोदडिया के ग्रामीण मिलकर जल संरक्षण करते हैं तो वे गांधी जी के स्वराज के सपने को साकार कर रहे होते हैं। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान श्रमदान एक महत्वपूर्ण हथियार था। लोग स्वेच्छा से मिलकर सड़कें बनाते थे, स्कूल खोलते थे और समाज सेवा करते थे। हलमा यह परंपरा आज भी जीवित रखे हुए है। विनोबा भावे के सर्वोदय आंदोलन में भी सामुदायिक श्रम और सहयोग का महत्व था। हलमा सर्वोदय के आदर्शों को व्यावहारिक रूप देता है जहां सबका उत्थान होता है, किसी का शोषण नहीं।

गोदडिया की कहानी में महिलाओं की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है। ललिता कटारा, प्रेमलता डामर, लीलावती सिंगाड़ जैसी महिलाओं ने न केवल भाग लिया बल्कि नेतृत्व भी किया। हलमा में महिलाएं और पुरुष समान रूप से भाग लेते हैं। महिलाओं को सार्वजनिक क्षेत्र में सम्मानजनक स्थान देता है।महिलाएं केवल श्रम नहीं करतीं बल्कि योजना बनाने और निर्णय लेने में भी शामिल होती हैं। सक्षम समूह की ललिता कटारा का कथन इस बात का प्रमाण है कि महिलाएं संगठित हैं और अपनी आवाज़ रखती हैं। जब महिलाएं सामुदायिक संसाधनों के निर्माण और प्रबंधन में भाग लेती हैं तो उनका आर्थिक अधिकार भी स्थापित होता है।

हलमा केवल एक कृषि पद्धति या श्रमदान की व्यवस्था नहीं है। यह एक जीवन दर्शन है जो सामूहिकता, सहयोग, पर्यावरण संरक्षण और आत्मनिर्भरता को एक साथ जोड़ता है। गोदडिया गाँव का उदाहरण दर्शाता है कि आधुनिक चुनौतियों का समाधान पारंपरिक ज्ञान में निहित है।

जब दुनिया भर के विकासशील और विकसित देश जल संकट, पर्यावरणीय विनाश और सामाजिक विखंडन से जूझ रहे हैं, तब हलमा जैसी परंपराएं एक वैकल्पिक मार्ग दिखाती हैं। यह मार्ग न तो पूंजीवादी विकास का है और न ही राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था का, बल्कि यह सामुदायिक स्वराज और सहकारिता का मार्ग है।

आज जब हम सतत विकास लक्ष्यों की बात करते हैं, जब हम जलवायु परिवर्तन से लड़ने की रणनीतियां बनाते हैं, तब हमें आदिवासी समुदायों की ओर देखना चाहिए। उनकी परंपराओं में, उनकी जीवनशैली में और हलमा जैसी प्रथाओं में भविष्य के समाधान छिपे हैं।

From : Vikas Meshram, AJAI Report, Rajasthan

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