28/06/2026
मुंडका में तीन सफाई कर्मचारियों की मौत: यह एक व्यवस्थागत हत्या है!
सीटू और बिरादराना संगठनों की टीम ने किया कारखाने का दौरा! : न्याय तक जारी रहेगा संघर्ष!
27 जून 2026 को दिल्ली के मुंडका औद्योगिक क्षेत्र में 'मारवाह प्रिंटर्स' की फैक्ट्री में तीन सफाई कर्मचारियों — अरुण (38), संदीप (32), और चाँद (42) — की मौत सेप्टिक टैंक में ज़हरीली गैस के कारण हो गई। तीनों सुल्तानपुरी के इंदिरा झील के निवासी थे। एक प्राइवेट ठेकेदार ने उन्हें बिना किसी सुरक्षा उपकरण के टैंक में उतार दिया। एक के बाद एक वे बेहोश हुए और तीनों की मौत हो गई। यह हादसा नहीं था — यह हत्या थी।
यह फैक्ट्री उसी गली में है जहाँ दो साल पहले आग लगने से 30 मज़दूर जलकर मर गए थे। यह महज़ संयोग नहीं है। यह उसी व्यवस्था की निरंतरता है जो मज़दूरों की जान को मुनाफ़े से सस्ता समझती है।
CITU और बिरादराना संगठनों ने फैक्ट्री गेट पर विरोध प्रदर्शन किया और फैक्ट्री मालिक, ठेकेदार व मैनेजर की गिरफ़्तारी तथा 30 लाख रुपये मुआवज़े की माँग की। पुलिस ने तीन लोगों को गिरफ़्तार किया है — लेकिन किस धारा में, किस सज़ा के साथ, यह अभी साफ़ नहीं है। हम मामले पर नज़र रखे हुए हैं। किसी भी ढिलाई पर मुंडका थाने पर ज़ोरदार प्रदर्शन किया जाएगा।
यह लड़ाई सिर्फ़ एक मालिक के खिलाफ़ नहीं है। पिछले पाँच वर्षों में पूरे देश में 419 सफाई कर्मचारी सीवर और सेप्टिक टैंक साफ करते हुए मारे जा चुके हैं। 2026 के शुरुआती महीनों में ही दर्जनों मौतें दर्ज हो चुकी हैं। दिल्ली इस साल इस शर्मनाक सूची में सबसे ऊपर है — और एक भी पीड़ित परिवार को अब तक मुआवज़ा नहीं मिला है।
2013 का मैनुअल स्कैवेंजिंग निषेध कानून कहता है कि कोई भी इंसान बिना सुरक्षा उपकरण के सीवर या टैंक में नहीं उतरेगा। 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने हर मौत पर 30 लाख मुआवज़े का आदेश दिया। लेकिन संसद में पेश सरकारी रिपोर्ट खुद स्वीकार करती है कि 90 प्रतिशत मामलों में मज़दूरों को बिना किसी सुरक्षा के टैंक में धकेला गया। कानून है, अदालत का हुक्म है — लेकिन मालिकों पर कोई लगाम नहीं।
यह भी जानना ज़रूरी है कि यह काम किस पर थोपा जाता है। 77 प्रतिशत से अधिक सफाई कर्मचारी दलित समुदाय से हैं। जाति और मज़दूर-दुश्मन ठेकेदारी प्रथा मिलकर इस हत्या की व्यवस्था को ज़िंदा रखती है। सरकार संसद में दावा करती है कि मैनुअल स्कैवेंजिंग खत्म हो गई — यह झूठ है, यह आँकड़े छुपाना है, यह जवाबदेही से भागना है।
माँग साफ़ है: ठेकेदारी प्रथा पर सख्त नियंत्रण हो, सफाई का पूर्ण यंत्रीकरण हो, हर मौत पर तत्काल 30 लाख मुआवज़ा दिया जाए, और दोषी मालिकों पर गैर-इरादतन हत्या का मुकदमा चले। अरुण, संदीप और चाँद की मौत को हम हादसा नहीं मानते — यह पूँजीवादी लापरवाही और जातिगत उत्पीड़न द्वारा मिलकर की गई हत्या है। इसका जवाब संगठित लड़ाई से दिया जाएगा।