10/05/2026
◆बंगाल के संगठन शिल्पी : रामचंद्र पांडेय◆
राजनीति के आकाश में चमकते सितारों को तो दुनिया पहचान लेती है, पर उन दीपों को कौन देखता है, जो अंधेरों में जलकर रास्ते बनाते हैं?
जीत के बाद मंच सजते हैं, चेहरे दमकते हैं, और जयघोष गूंजते हैं—
परंतु उस विजय की नींव में वर्षों तक तपने वाले पत्थरों का नाम प्रायः इतिहास भी नहीं लिखता।
राजनीतिक और सार्वजनिक क्षेत्र में कार्य करने वाले अनेक व्यक्ति कई बार व्यग्र होकर असंतुष्ट हो जाते हैं। कभी निमंत्रण पत्र में नाम न होने का मलाल, तो कभी प्रेस समाचारों में उल्लेख न आने की पीड़ा; कभी मंच पर बोलने का अवसर न मिलने की कसक—ये भाव स्वाभाविक भी हैं। परंतु समाज जीवन में आज भी असंख्य ऐसे जीवनव्रती साधक हैं, जो इन क्षणिक मान-सम्मानों से परे, प्रचार की चकाचौंध से दूर, निःशब्द भाव से अपने ध्येय की साधना में निरंतररत रहते हैं। उनका सुख प्रसिद्धि में नहीं, बल्कि कार्य की सिद्धि में होता है।
ऐसे ही एक प्रसिद्धि परांगमुख विराट व्यक्तित्व हैं— रामचंद्र जी पांडेय।
वर्ष 1967… एक साधारण युवक, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ से निकलता है।
न कोई आकांक्षा, न कोई महत्वाकांक्षा—सिर्फ एक संकल्प—राष्ट्र का परम् वैभव।
प्रो. राजेंद्र सिंह जी (रज्जू भैया) के सान्निध्य में उस युवक स्वयं को संघकार्य के लिए समर्पित कर दिया।
और फिर… जीवन उनका नहीं रहा, वह संगठन का हो गया।
तीन दशक से अधिक समय तक—पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड की धूल भरी पगडंडियों पर—
वो चलते रहे…
लोग जुड़ते गए, कारवां बनता गया।
कई ऐसे नाम, जो आज बड़े पदों पर हैं, कभी उनके मार्गदर्शन में संगठन के संस्कारों से गढ़े गए।
पर असली परीक्षा तो तब शुरू हुई, जब उन्हें पश्चिम बंगाल का दायित्व मिला।
बंगाल एक ऐसी भूमि, जहाँ वैचारिक विरोध अपने चरम पर था…
जहाँ संघ और भाजपा के लिए जमीन तैयार करना किसी तपस्या से कम नहीं था।
कोलकाता की गलियों से लेकर
सिलीगुड़ी की सरहदों तक,
मालदा, मुर्शिदाबाद, बर्दवान, आसनसोल—
कोई कोना नहीं बचा, जहाँ उनके चरण न पड़े हों।
वे सिर्फ संगठन नहीं बना रहे थे—
वे विश्वास गढ़ रहे थे…
वे संवाद के सेतु बना रहे थे…
इसी तपस्या का एक महत्वपूर्ण अध्याय बना वर्ष 2018,
जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी नागपुर के संघ मुख्यालय पहुँचे।
यह केवल एक कार्यक्रम नहीं था—
यह एक वैचारिक दूरी के पाटने का ऐतिहासिक क्षण था,
जिसने बंगाल के बौद्धिक समाज में एक नई सोच का द्वार खोला।
रामचंद्र पांडेय का जीवन वैभव का नहीं, त्याग का है।
दो जोड़ी वस्त्र, साधारण चप्पल, और अनवरत प्रवास—
यही उनकी पूँजी है।
न कोई प्रचार, न कोई पद की चाह—
बस एक ही ध्येय—कार्य, और केवल कार्य।
वे उन विरले लोगों में हैं,
जो इतिहास बनाते हैं, पर इतिहास में अपना नाम नहीं लिखवाते।
आज यदि कहीं परिवर्तन की आहट सुनाई देती है,
तो उसके पीछे वर्षों का यह मौन तप भी है—
जिसे न कैमरों ने देखा, न सुर्खियों ने छुआ।
जलकर जो खुद राख हुए, वो दीप कहां पहचाने गए,
नींवों में जो दबे रहे, वो शिल्पी कब माने गए।
मंचों पर जयघोष बहुत, पर सत्य यही हर बार रहा—
इतिहास की नींव वे ही होते हैं, जो सदा गुमनाम ही रहे।
Lalit bhushan mishra
#संघ #बंगाल