09/10/2026
• न्याय चाहिए तो शासक बनो: "जब तक तुम वोट देकर दूसरों को राजा बनाते रहोगे, तब तक तुम्हारे साथ अन्याय होता रहेगा। अन्याय के खिलाफ न्याय तभी मिलेगा जब हम निर्णय लेने की कुर्सी (सत्ता) पर बैठेंगे, न कि भीख मांगने की लाइन में खड़े रहेंगे।"
• वोट और राज का संतुलन: उनका सबसे प्रसिद्ध नारा और विचार था— "वोट हमारा, राज तुम्हारा — नहीं चलेगा, नहीं चलेगा!" उनका मानना था कि लोकतंत्र में असली ताकत संख्या और संगठन की होती है।
• सत्ता परिवर्तन और रोटी का सिद्धांत: "रोटी हो या सत्ता, इसे हमेशा पलटते रहना चाहिए। रोटी नहीं पलटने पर जल जाती है और सत्ता नहीं पलटने पर निरंकुश हो जाती हैं
• मांगने वाले नहीं, देने वाले बनो: "बहुजन समाज आदिवासी समाज को हमेशा लाचार या मांगने वाला बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि खुद को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि वे शासन करने वाले और हक देने वाले बनें।"
संगठन, समाज और विचारधारा पर विचार
• व्यक्ति नहीं, विचारधारा बड़ी है: "कभी भी किसी व्यक्ति के पीछे नहीं भागना चाहिए, बल्कि हमेशा विचारधारा का अनुसरण करना चाहिए। व्यक्ति समय के साथ बदल या भाग सकता है, लेकिन विचारधारा हमेशा जीवित रहती है।"
• मिशन के लिए समर्पण: "मुर्दा लोग कभी आंदोलन या मिशन में भाग नहीं लेते और जिंदा लोग कभी अपने मिशन को रुकने नहीं देते।"
• संख्या बल और हिस्सेदारी: "जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी।" उन्होंने समाज को समझाया कि 85% बहुजन शोषित वर्ग अगर एकजुट हो जाए, तो देश की सत्ता का संतुलन बदला जा सकता है।
• स्वाभिमान सर्वोपरि है: "स्वाभिमानी लोग ही संघर्ष की असली परिभाषा समझते हैं। जिनका स्वाभिमान मर जाता है, वे चुपचाप गुलामी को स्वीकार कर लेते हैं।"
बाबासाहेब डॉ. आंबेडकर और अपने कार्य की तुलना
• मान्यवर कांशीराम साहब अक्सर अपने और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर के कार्यों की व्यावहारिक तुलना करते हुए कहते थे: "डॉ. आंबेडकर ने किताबें इकट्ठी कीं (ज्ञान का संचय किया) और मैंने उन किताबों को पढ़कर लोगों को इकट्ठा किया।" उनका मकसद बाबासाहेब के सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन को ग्रामीण और जमीनी स्तर तक ले जाना था।
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