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The Government has appointed Air Marshal Ashutosh Dixit, PVSM, AVSM, VM, VSM, presently serving as Vice Chief of the Air...
07/10/2026

The Government has appointed Air Marshal Ashutosh Dixit, PVSM, AVSM, VM, VSM, presently serving as Vice Chief of the Air Staff, as the 29th Chief of the Air Staff, in the rank of Air Chief Marshal, with effect from the afternoon of October 31, 2026.

He will succeed Air Chief Marshal Amar Preet Singh, who superannuates on October 31, 2026.

An Experimental Test Pilot and Qualified Flying Instructor with over 3,500 hours of flying experience, Air Marshal Dixit has held key operational and strategic appointments, including CISC, HQ IDS and AOC-in-C, Central Air Command.
Jai Hind 🇮🇳

कश्मीर में एक खतरनाक अभियान साल 1996 की गर्मियों में चली थी..  जुलाई का महीना समाप्त होने वाला था... मौसम खुला हुआ था......
01/10/2026

कश्मीर में एक खतरनाक अभियान साल 1996 की गर्मियों में चली थी.. जुलाई का महीना समाप्त होने वाला था... मौसम खुला हुआ था...मेजर जयंत तिवारी उस समय यूनिट 1/5 गोरखा राइफल्स की बी कंपनी संभाल रहे थे और हाइली एक्टिव कुपवाड़ा पंचगाम के त्रेहगाम सेक्टर में थे....

पर जब सब कुछ शांत दिखाई दे ,मतलब कुछ बड़ा होने की संभावनाएं लग रही थी, पर कोई हलचल नही थी..लेकिन जल्द ही सब खतरा सामने आने वाली थी...

एक शाम इस गोरखा राइफल्स की युनिट ने हिजबुल मुजाहिदीन के दो लीडर्स के बीच हो रही रेडियो बातचीत को इंटरसेप्ट किया... उनमें से एक खुद को हिजबुल का बटालियन कमांडर और दूसरा खुद को कंपनी कमांडर बता रहा था...

रेडियो बातचीत से पता चला कि पाकिस्तानी और विदेशी आतंकवादियों का एक समूह सीमा पार से कश्मीर में घुसपैठ कर आ चुका था.. ये दोनो लोग जो बात कर रहे थे इनकी जिम्मेदारी थी कि ये विदेशी आतंकवादियों को उनके मकसद तक पहुंचा दे और तब तक ये किसी सेफ जगह पर छुप जाए...

चूंकि वो लोग ऐसे विदेशी आतंकवादियों को मेहमान मुजाहीद कहते थे तो सेना को अंजादा हो गया कि किसी जीरो प्वॉइंट जगह पर इन्हे सेफ पैसेज देने का प्लान चल रहा है..


मेजर तिवारी की अगुवाई में सर्च और डिस्ट्राय के लिए B Company पुरे हथियारों के साथ तैयार हो गई पर
जमीन पर जीरो वास्तव में कहां था, यह केवल उन दोनों आतंकवादी नेताओं को पता था...

पर मेजर तिवारी को अंजादा लग चुका था उस बातचीत को सुन कर कि हिजबुल का एक कमांडर पहले ही आतंकवादियों के साथ पहुंच चुका था और अब उसे अपने दूसरे कंपनी कमांडर को यह समूह सौंपना था, ताकि वह उन्हें आगे उनके उस जगह तक ले जा सके,जहां ये कश्मीर में किसी खास जगह पर हमला कर सके...

मेजर तिवारी ने अपने सैनिकों के साथ 31 जुलाई की रात के तैयारी बाद बस एक JCO और 24 जवानों के साथ ये संभावित जीरो प्वॉइंट कहां था उसकी तलाश में निकल पड़े....

उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती थी....कुपवाड़ा वैसे भी डीफेम जगह थी वहां यह अनुमान लगाना था कि जमीन पर हैंडलिंग पवाइंट कहां होगा भूसे से सुई निकालने जैसे था...

उन्होने अपने सीनियर्स और जेसीओ के साथ इलाके की बनावट, एरिया की स्थिति और उन दोनों आतंकवादियों के संभावित ऑपरेशन क्षेत्र को ध्यान में रखते हुए कुछ स्थानों को मार्क कर लिया..

पर उन जगहों में एक पहाड़ी की रिजलाइन का लैंड सबसे ऊंचा उन्होने मार्क किया था क्योंकि वहां से एक ढलान नीचे एक नाले की ओर जाती थी और पैदल लोगों की आवाजाही संभव थी...इस सिक्स्थ सेंस के रिस्पांस में मेजर तिवारी ने सबसे पहले सुबह होने के बाद करीब एक घंटे तक इलाके की निगरानी की पर अफसोस कोई गतिविधि का ट्रेस नही मिला...

पर फिर भी मेजर तिवारी बाकी मार्किंग को छोड़ जैसे श्योर थे कि यही वह Zero Point था जिसका जिक्र आतंकवादियों ने रेडियो बातचीत में किया था...

उनकी गट फीलिंग की वजह थी कि ये
इलाका बहुत बड़ा था और विदेशी आतंकवादियों की हैंडलिंग यही कहीं हो सकती थी....

ये 26 लोगों की टीम लगभग चार घंटे तक घने जंगल और कठिन पहाड़ी इलाके में चढ़ाई करने के बाद सैनिक 31 जुलाई की सुबह करीब 4:30 बजे इस एरिया में पहुंचे थे...

अंधेरे में ही प्लान के हिसाब से मेजर तिवारी ने अपनी टीम को तीन छोटी टीम बना कर अलग अलग स्थानों पर माइक्रो टीम बना कर इलाके पर निगरानी शुरू कर दी...

सुबह हो गई थी,पर जंगल में कुहासे जैसी स्थिति थी... दो घंटे बीते,एक और घंटा बीत गया, लेकिन आतंकवादियों का कोई सुराग नहीं था...अब मेजर तिवारी को नीचे की ओर बढ़ने और तीनों टुकड़ियों के साथ सावधानीपूर्वक तलाशी जारी रखने का अगला स्टेप उठाना पड़ा...

तभी अचानक जो तीन टीमों में बीच वाली टीम थी उनके सामने कुछ ऐसे लोग आ गए जिन्होंने पठानी पोशाक पहन रखी थी... अफगानियों को तो मतलब जैसे जंगल में भूत दिख गया...

वो अभी हथियार संभालते तब तक
बिना समय गंवाए सैनिकों ने गोलीबारी शुरू कर दी...यह शुरुआती मुठभेड़ थी...दो पठानी सलवार कमीज को गोली लगी और वो जमीन पर गिर पड़े, जबकि बाकी लोग तेजी से घनी झाड़ियों में गायब हो गए...

मेजर तिवारी जब उस जगह पर अपनी टीम के साथ पहुंचे तो एक क्षण के लिए उन्हें लगा कि कहीं सैनिकों ने लोकल नागरिकों पर तो गोली नहीं चला दी...पर तभी गोरखा सैनिकों ने झाड़ियों पर खुखरी फेरी तो उसके बीच 12 से 14 लड़ाकू रंग के रक्सैक बैगों दिखाई पड़ गए...

मतलब इतने लोगों का घुसपैठ करने वाला आतंकवादी समूह था और गोरखा राइफल्स का उनसे कान्टेक्ट हो चुका था...

पर अब सबसे मुश्किल काम था कि बाकी आतंकवादियों को जंगल में भाग कर छुप चुके थे उन्हे ढूंढ कर एलिमिनेट करना ..इस जंगली इलाके में घनी झाड़ियां थीं, जो आतंकवादियों को शानदार छिपने की जगह दे रही थीं...

मेजर तिवारी समझ गए कि ऐसी परिस्थिति में उनकी तलाश करना बेहद जोखिम भरा होगा पर उनसे कान्टेक्ट की स्थिति में आगे बढ़ना ही होगा...

पर सौभाग्य से तलाशी अभियान की उनकी तीनों टुकड़ियां ऐसी स्थिति में थीं कि वे पूरे इलाके को तीन ओर से कवर कर सकती थीं...

चारों तरफ एक अजीब-सी खामोशी थी....आतंकवादी घनी झाड़ियों में छिपकर बिल्कुल लाश जैसे शांत पड़े थे और किसी सही मौके का इंतजार कर रहे थे..उन्हे आलरेडी गुरिल्ला युद्ध का अनुभव था...मेजर तिवारी की तीन और से उस एरिया को घेरे टीम ने पुष्टि कर दी थी कि कोई आतंकवादी वहां से भाग नहीं पाया था...पर अब उन्हें झाड़ियों से बाहर निकालना जरूरी था...

सबसे ज्यादा खतरा Close Combat का था..आतंकवादियों को फायदा था क्योंकि वे छिपे हुए और शांत पड़े थे जबकि सैनिकों को आगे बढ़कर उनकी तलाश करनी पड़ रही थी...

ऐसे समय में टीम के कमांडर को इन सारी परिस्थिति का विश्लेषण और अगला फैसला बेहद तेजी से करना पड़ता है...इसको देखते हुए मेजर तिवारी ने दो Rocket Launcher Teams को ऊपर की तरफ भेजा और
बाकी सैनिकों की मदद से उन्होंने झाड़ियों वाले इलाके के चारों तरफ एक घेरा बना दिया, जहां आतंकवादियों के छिपे होने की संभावना थी...

पर अब उनके पास खुद आगे बढ़कर तलाशी लेने के लिए केवल पांच सैनिक बचे थे..उन्होने सबसे पहले झाड़ियों वाले इलाके पर भारी गोलीबारी की, लेकिन अंदर से कोई जवाब नहीं आया...

अब केवल दो संभावनाएं थीं कि या तो आतंकवादी पहले ही वहां से निकल चुके थे या फिर वे छिपकर सैनिकों पर हमला करने के लिए सही मौके का इंतजार कर रहे थे...

चूंकि दो आतंकवादी पहले ही मारे जा चुके थे और मिशन को एक हद तक सफलता मिल चुकी थी पर कंपनी कमांडर ने जोखिम उठाते हुए तलाशी जारी रखने का फैसला किया...पांच सैनिकों की छोटी टीम के साथ तलाशी शुरू हुई.... टीम में एक रेडियो ऑपरेटर और एक ट्रैकर डॉग के साथ उसके हैंडलर को लेकर आगे बढ़ गई...

मुश्किलें और तलाशी बेहद कठिन थी...

सैनिकों को झाड़ियों से झाड़ियों तक बहुत धीमी गति से, झुककर और बेहद सावधानी से आगे बढ़ना पड़ रहा था... हर सैनिक दूसरे सैनिक को कवर दे रहा था...तभी आहट पर कुछआतंकवादियों ने भागने की कोशिश की..लेकिन Rocket Launcher Team ने उन्हें देख लिया और उनकी दिशा में कुछ राउंड दागे..धमाकों के साथ धुआं, धूल और मलबा हवा में फैल गया...

कुछ देर बाद फिर चारों तरफ सन्नाटा छा गया और तलाशी दोबारा शुरू हुई...
इसी दौरान एक आतंकवादी ने मेजर तिवारी पर गोली चलाने के लिए अपनी पोजीशन बनाने की कोशिश की...
लेकिन सौभाग्य से कंपनी कमांडर के बाईं ओर मौजूद एक सैनिक ने उसे समय रहते देख लिया...उसने तुरंत गोली चलाई और आतंकवादी वहीं मारा गया...

अब मेजर तिवारी ट्रैकर डॉग की मदद से छिपे आतंकवादियों को खोज निकालना चाहते थे..लेकिन डॉग हैंडलर ने बताया कि इतने सीमित और घने इलाके में ट्रैकर डॉग को आगे भेजना उसके लिए घातक हो सकता है...

इसलिए तलाशी उसी तरह जारी रही...झाड़ी दर झाड़ी, बेहद धीमी गति से...आखिर कार तलाशी दल आतंकवादियों के और करीब पहुंच चुका था.. आतंकवादियों ने गोलीबारी शुरू कर दी,उनके पास AK सीरीज की साइलेंसर लगी राइफलें थीं..

एक गोली एक गोरखा सैनिक की जांघ में लगी...मेजर थोड़ी ऊंची जमीन पर थे...उन्होंने जोर से चिल्लाकर बताया कि गोली किस दिशा से आई है...लेकिन ऐसा करते ही उनकी आवाज सुन बेहद नजदीक से मेजर तिवारी पर भारी गोलीबारी शुरू हो गई...उन्होंने तेजी से एक तरफ हटकर पेड़ की आड़ ले ली और वहीं से आतंकवादियों पर जवाबी फायरिंग शुरू कर दी..

मेजर तिवारी घायल हो चुके थे, लेकिन उस समय उन्हें इसका एहसास भी नहीं हुआ,तनाव का लेबल इतना हाई था...
उन्होंने उस दिशा में लगातार गोलीबारी की, जहां से गोलियां आ रही थीं...

कुछ मिनट तक दोनों तरफ से लगातार गोलीबारी होती रही... मेजर तिवारी की मैगजीन खाली हो गई और उन्होंने उसे बदलने की कोशिश की, तभी उन्हें पता चला कि आतंकवादियों की गोलियां उनके पाउच में रखी अतिरिक्त मैगजीन को भी नुकसान पहुंचा चुकी थीं...

तब उन्हे अहसास हुआ कि उनके सीने के बाईं तरफ से खून बह रहा था.. दरअसल आतंकियों गोली लगने से मैगजीन के अंदर मौजूद हिस्सों के टुकड़े भी उछले और उनके बाएं कंधे और बाजू में धंस गए थे...मुठभेड़ के बीच घायल मेजर तिवारी ने अपने पीछे मौजूद सैनिक से भरी हुई मैगजीन फेंकने को कहा...

इस भारी गोलीबारी के बावजूद वह सैनिक रेंगते हुए आगे आया और मेजर तिवारी तक भरी हुई मैगजीन पहुंचाई...
मेजर तिवारी भी रेंगते हुए आगे बढ़े और मुठभेड़ जारी रही...आतंकवादी समय-समय पर गोलियों के साथ ग्रेनेड भी फेंक रहे थे...

लेकिन गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मेजर तिवारी ने सामने मौजूद दोनों आतंकवादियों पर बढ़त हासिल कर ली और दोनों को मार गिराया....

अब मुठभेड़ में कुछ समय के लिए शांति छा गई..इलाके की तलाशी में आतंकवादियों के पांच शव मिले...बाद में रेडियो इंटरसेप्ट से पता चला कि आतंकवादी समूह में कुल 12 आतंकवादी थे और इस मुठभेड़ में उनमें से 9 आतंकवादी मारे गए थे...मारे गए आतंकवादियों में वे दोनों स्थानीय हिजबुल कमांडर भी शामिल थे, जिन्हें इस आतंकवादी समूह को आगे ले जाने की जिम्मेदारी दी गई थी...

इनमें आतंकवादी समूह का प्रमुख भी शामिल था, जो खुद को हरकत उल अंसार का कमांडर बताता था...यही वह आतंकवादी था जिसने बेहद करीब से मेजर तिवारी पर गोली चलाई थी...

कुल मिलाकर गोरखा राइफल्स की इस छोटी सर्च टीम को चार अलग‌ अलग‌ बार आगे बढ़ते हुए बेहद सटीक मुठभेड़ों का सामना करना पड़ा था...

खैर ऑपरेशन समाप्त हो चुका था.. मिशन भी पुरा हो गया था.. इस शानदार छोटे स्तर के टैक्टिकल आपरेशन में फल पल खतरे से जुझते हुए जो सफलता पाई गई थी ,हो सकता था कि जैसा जोखिम बहुत बड़ा था शायद ये टीम बच नही पाती..

स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कश्मीर के लोकल ने मेजर तिवारी को अखवारों Killed in Action तक छाप दिया था...

लेकिन गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद मेजर तिवारी ने अभियान को बीच में नहीं छोड़ा और उसके सफलतापूर्वक समाप्त होने के बाद ही खुद को रेस्क्यू होने दिए ...

इस अदम्य साहस की मेजर जयंत तिवारी को भारत के प्रतिष्ठित शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया था और उन्होने बिग्रेडियर बनने तक अपनी सेवा भारतीय सेना में दिया है..
वीर सपूत को सैल्यूट 🫡🫡🫡
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