14/04/2026
बहराइच और श्रावस्ती की शिक्षा पर एक सवाल.....
जब एक ही देश में कहीं शिक्षा प्रगति का उत्सव बन चुकी हो और कहीं वही शिक्षा अब भी संघर्ष का विषय बनी रहे, तो यह केवल अंतर नहीं, बल्कि व्यवस्था और प्राथमिकताओं पर उठता एक गंभीर प्रश्न है। भारत की विकास यात्रा के बीच बहराइच और श्रावस्ती जैसे जिले हमें यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि क्या शिक्षा की रोशनी सचमुच सब तक समान रूप से पहुँची है? 2011 की जनगणना के अनुसार, बहराइच की साक्षरता दर 49.36% और श्रावस्ती की 46.74% है, जबकि भारत की औसत साक्षरता दर 74.04% है। यह तुलना स्पष्ट करती है कि ये जिले शिक्षा के मामले में काफी पीछे हैं—और यह पिछड़ापन केवल आँकड़ों का नहीं, बल्कि अवसरों और भविष्य की संभावनाओं का है।
यदि इसी स्थिति को देश के अन्य हिस्सों के संदर्भ में देखा जाए, तो एक अलग ही तस्वीर उभरती है। केरल, मिज़ोरम, त्रिपुरा और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्र, जहाँ भौगोलिक परिस्थितियाँ भी सरल नहीं हैं—कहीं पहाड़, कहीं द्वीप, तो कहीं दूरस्थ सीमाएँ—फिर भी शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हैं। यह तुलना स्वयं में एक प्रश्न खड़ा करती है कि जहाँ चुनौतियाँ अधिक थीं, वहाँ प्रगति कैसे संभव हुई, और जहाँ संसाधन अपेक्षाकृत बेहतर हैं, वहाँ शिक्षा अब भी क्यों पीछे है? बहराइच और श्रावस्ती की स्थिति को और गहराई से समझें, तो यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल साक्षरता तक सीमित नहीं है। यहाँ उच्च शिक्षा तक पहुँच भी अत्यंत सीमित है। बड़ी संख्या में छात्र माध्यमिक शिक्षा के बाद पढ़ाई छोड़ देते हैं। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की कमी, आर्थिक कठिनाइयाँ और मार्गदर्शन का अभाव इस समस्या को और गहरा बना देते हैं।
इस असमानता का सबसे बड़ा असर महिलाओं पर पड़ता है। बहराइच में महिला साक्षरता 39.18% और श्रावस्ती में मात्र 34.78% है। यह स्थिति न केवल लैंगिक असमानता को दर्शाती है, बल्कि यह भी बताती है कि समाज का एक बड़ा हिस्सा अब भी शिक्षा से पूर्ण रूप से नहीं जुड़ पाया है। इसके विपरीत केरल में महिला साक्षरता 90% से अधिक है, जो यह सिद्ध करता है कि जब महिलाओं को शिक्षा में समान अवसर मिलता है, तो समाज का समग्र विकास संभव होता है।
इस पूरे परिदृश्य में श्रावस्ती का ऐतिहासिक महत्व एक गहरी विडंबना को जन्म देता है। यही वह भूमि है जहाँ गौतम बुद्ध ने अपने जीवन का एक लंबा समय बिताया और ज्ञान, करुणा तथा जागरूकता का संदेश दिया। यह क्षेत्र कभी शिक्षा और विचार का केंद्र था, लेकिन आज वही भूमि शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ गई है—यह स्थिति केवल दुर्भाग्य नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक उपेक्षा का परिणाम भी प्रतीत होती है।
इस पिछड़ेपन के पीछे आर्थिक अभाव, जागरूकता की कमी, ग्रामीण क्षेत्रों में संस्थानों का अभाव और सामाजिक सोच जैसी अनेक वजहें हैं। लेकिन सबसे बड़ा कारण यह है कि शिक्षा को अब भी प्राथमिकता के रूप में नहीं देखा जा रहा। जन सम्मान सेवा फाउंडेशन का मानना है कि यह समय केवल समस्या को स्वीकार करने का नहीं, बल्कि समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने का है। यदि शिक्षा को एक सामाजिक आंदोलन बनाया जाए, यदि बालिका शिक्षा को विशेष महत्व दिया जाए और यदि हर स्तर पर सहयोग और जागरूकता बढ़ाई जाए, तो यह स्थिति बदली जा सकती है।
Santosh Kumar
अध्यक्ष, जन सम्मान सेवा फाउंडेशन