14/04/2026
FBP-986/26
टूटता विश्वास , दरकती व्यवस्था:-
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली उच्च न्यायालय की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत में जो कहा जो दलीलें दीं वह भारतीय इतिहास में शायद कभी नहीं हुआ।
कल 13 अप्रैल 2026 को अरविंद केजरीवाल ने निचली अदालत से खारिज आबकारी नीति मामले में हाईकोर्ट की जज जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा से खुद को केस से अलग (रिक्यूजल) करने की मांग करते हुए अपने मुकदमे की खुद पैरवी की और जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की न्यायिक विश्वसनियता पर ही सवाल उठा दिया और कहा कि उन्हें शक है कि इस अदालत में उन्हें न्याय मिलेगा क्योंकि मीलार्ड राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा का समर्थन करती हैं और उनके कार्यक्रमो में एक नहीं चार चार बार जा चुकीं हैं। (वीडियो कमेंट बॉक्स में है)
उन्होंने जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा को याद दिलाया कि वह 26 दिसंबर 2022 , 17 मार्च 2023, 30 अगस्त 2024 , 8 अगस्त 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विंग "अधिवक्ता परिषद" की बैठकों में जातीं रहीं हैं इसलिए उन्हें जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा की अदालत से न्याय की उम्मीद नहीं है.... उन्होंने जस्टिस शर्मा पर पक्षपात का गंभीर, वास्तविक और उचित आशंका जताई। उन्होंने कहा कि इस अदालत से निष्पक्षता की उम्मीद नहीं रख सकते।
सुनवाई के अंत में जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अरविंद केजरीवाल की बहस की तारीफ की और मुस्कुराते हुए कहा
"आप वकील बन सकते हैं।"
तो क्या देश में इसी तरह हर मुकदमे के प्रोसीडिंग्स और फैसले की समीक्षा होनी चाहिए? और पीठ पर बैठे जजों के जीवनकाल में उनके व्यवहार और मानसिकता, उनके धार्मिक और राजनीतिक विश्वास के आधार पर न्यायालय की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने चाहिए?
इस तरह तो सवाल यह भी उठेगा कि बाबरी मस्जिद के जिस मुकदमे में "रामलला विराजमान" मुसलमानों के खिलाफ खुद एक पक्ष थे उस मुकदमे की सुनवाई कर रही पीठ के 4 जज रामभक्त थे , तो क्या वह अपने भगवान राम के खिलाफ फैसला देते ?
तो क्या बाबरी मस्जिद के साथ न्याय हुआ?
बल्कि सिर्फ उच्चतम न्यायालय ही क्यों? फैजाबाद की जिला अदालत से लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट और उच्चतम न्यायालय तक के रामभक्त जज साहेबान क्या अपने अराध्य "श्रीराम" के खिलाफ फैसला दे सकते थे?
क्योंकि फैज़ाबाद के जिला जज जस्टिस कृष्ण मोहन पांडेय से लेकर उच्चतम न्यायालय के जज जस्टिस चंद्रचूड़ सिंह तक ने बाबरी मस्जिद पर दिए अपने फैसले को हनुमान और ईश्वर से प्रेरित बताया है।
तो क्या बाबरी मस्जिद के साथ न्याय हुआ?
और नीचे जाएं तो रामभक्त शासन और रामभक्त विधायिका के हाथों में बाबरी मस्जिद सुरक्षित थी ? नहीं सुरक्षित थी , बाबरी मस्जिद की सुरक्षा में तैनात लोग क्या रामभक्त नहीं थे ? बिल्कुल थे , इसीलिए शहीद कर दी गई। फिर केजरीवाल की तरह मुसलमानों को उनकी विश्वसनीयता पर क्यों विश्वास करना चाहिए था?
और सिर्फ बाबरी मस्जिद ही क्यों? मुसलमानों और शरियत के हर फैसले क्या न्यायालय ने मुसलमानों के खिलाफ नहीं दिए? जहां कोई अवसर आया मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखलअंदाजी नहीं की ? ऐसे जजों पर मुसलमान यकीं क्यों करें? जिन्हें शरियत और इस्लाम की मूल भावना की जानकारी और उनके प्रति विश्वास ना हो ? बल्कि उनकी मानसिकता इस्लाम और मुसलमान विरोधी भी हो सकती हो।
तो क्या शाहबानो प्रकरण, बाबरी मस्जिद, ट्रिपल तलाक , इत्यादि इत्यादि जैसे तमाम फैसले मुसलमानों के लिए धोखा हैं जो उसने अदालत पर यकीं करके उसका सम्मान किया?.
और फिर सिर्फ़ मुसलमान ही क्यों? शिड्यूल्ड ट्राइब , दलित, पिछड़े लोग अपने मुकदमें में कोई शर्मा, तिवारी , मिश्रा , जज की अदालत में न्याय पाएंगे?
लालू प्रसाद यादव का मुकदमा ही देख लीजिए उनके खिलाफ फैसले देने वाले तीन जज जस्टिस प्रवास कुमार सिंह , जस्टिस शिवपाल सिंह , जस्टिस एस.के. शशि , जिन्होंने लालू प्रसाद यादव के खिलाफ 6 में से 5 फैसले दिए उनकी सवर्ण मानसिकता उनके फैसले पर संदेह पैदा नहीं करती ?.. क्या बिहार में जातिवाद नहीं है?
जो चारा घोटाला एक ब्राह्मण मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र के काल में हुआ जिसे लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद पकड़ा , उसकी जांच कराई , मुकदमा दर्ज कराया , उसी मामले में जगन्नाथ मिश्र को कुछ नहीं हुआ मगर लालू प्रसाद यादव यादव को सज़ा देकर उनका राजनैतिक कैरियर खत्म कर दिया गया....
क्या न्यायालय पर संदेह नहीं होना चाहिए?..
और फिर सिर्फ़ न्यायालय ही क्यों? पूरी व्यवस्था पर क्यों नहीं? क्या गैर-मुस्लिम व्यवस्था जहां हर कोई धार्मिक उग्र कट्टरवाद से भरा हुआ है , जहां पुलिस अधिकारी गदा लेकर भगवा पहनकर धार्मिक जुलूस में चलते हों वहां मुसलमानों को न्याय मिलेगा?
जिस देश का प्रधानमंत्री , तमाम मुख्यमंत्री खुलेआम मुसलमानों के खिलाफ बयान देते हों क्या ऐसे शासन प्रशासन से मुसलमानों को न्याय मिल सकता है?
बात सोचने की है , अरविंद केजरीवाल ने अदालत में ही शुरुआत कर दी है , इसपर बहस होनी चाहिए, इसपर भी कि किसी के धार्मिक मामलों का फैसला ऐसे जज कैसे कर सकते हैं जिन्हें उस धर्म की जानकारी ही नहीं, बल्कि उनकी सोच उस धर्म के विरुद्ध भी हो सकती है...
इस पर भी बहस होनी चाहिए कि क्या मुकदमे का फैसला पहले से लिखकर रोस्टर के तहत जज तैनात होते हैं? इस रोस्टर का आधार क्या है? किस आधार पर सरकार के खिलाफ का सारा मुकदमा जस्टिस बेला त्रिवेदी की बेंच को जाता था और मुकदमा या खारिज या सरकार के पक्ष में दे दिया जाता था।
आखिर क्या कारण है कि दलित ओबीसी और मुसलमानों को अदालत से सालों साल राहत नहीं मिलती? ग्राहम स्टेंस, गौतम नौलखा, शरजिल इमाम, खालिद ऊमर जैसे लोग बिना मुकदमा चले 5-6 साल से जेल में हैं, ज़मानत तक नहीं मिलती ? आसाराम, राम-रहीम , नित्यानंद, जैसे लोग बाहर आते जाते रहते हैं ...
अरविंद केजरीवाल ने सोचने पर मजबूर कर दिया, उन्हें साधूवाद , क्योंकि अरविंद केजरीवाल ने अदालत में जो कहा वह इस मामले का एक छोटा सा हिस्सा है, पूरा मामला बहुत व्यापक है....
सबरीमाला पर उच्चतम न्यायालय का फैसला नहीं माना जाता और गृहमंत्री अमित शाह कहते हैं कि न्यायालय को ऐसे फैसले देना चाहिए जिसे लागू कराया जा सके, उच्चतम न्यायालय कुछ नहीं करती।
दही हांडी पर उच्चतम न्यायालय का फैसला नहीं माना जाता उच्चतम न्यायालय कुछ नहीं करती , जल्ली कट्टू पर उच्चतम न्यायालय का फैसला नहीं माना जाता उच्चतम न्यायालय कुछ नहीं करती , दिपावली के फटाके पर उच्चतम न्यायालय का फैसला ना सिर्फ माना नहीं जाता बल्कि उसके मुख्य गेट पर ही विरोध में पटाखे दागे जाते हैं उच्चतम न्यायालय कुछ नहीं करती।
बाबरी मस्जिद के मामले में एक पक्ष खुल्लमखुल्ला कहता रहा है कि उच्चतम न्यायालय का फैसला उसके खिलाफ आया तो वह नहीं मानेगा , उच्चतम न्यायालय कुछ नहीं करती , उच्चतम न्यायालय में हलफनामा देकर भी बाबरी मस्जिद को शहीद करने का गर्व से ऐलान करने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का उच्चतम न्यायालय कुछ नहीं करती।
तो विश्वास तो टूटेगा....
Md Zahaid