04/08/2022
हमारे सारे धर्मग्रंथ राक्षसों के वध से भरे पड़े हैं। राक्षस भी ऐसे ऐसे वरदानों से सुरक्षित थे कि दिमाग घूम जाए। किसी को वरदान प्राप्त था कि वो न दिन में मरेगा, न रात में, न आदमी से मरेगा, न जानवर से, न घर में मरेगा, न बाहर, न आकाश में मरेगा, न धरती पर।
उसी तरह... दूसरे को वरदान था कि वे भगवान भोलेनाथ और विष्णु के संयोग से उत्पन्न पुत्र से ही मरेगा।
तो, किसी को वरदान था कि... उसके खून की जितनी बूंदे जमीन पर गिरेगी... उसकी उतनी प्रतिलिपि पैदा हो जाएगी।
तो, कोई अपनी नाभि में अमृत कलश छुपाए बैठा था।
लेकिन... हर राक्षस का वध हुआ।
हालाँकि... सभी राक्षसों का वध अलग अलग देवताओं ने अलग अलग कालखंड एवं अलग अलग प्रदेशों में किया।
लेकिन... सभी वध में एक चीज सामान्य रही कि... किसी भी राक्षस का वध उसका विशेष दर्जा हटाकर अर्थात उसके वरदान को निरस्त कर के नहीं किया गया... कि, तुम इतना उत्पात मचा रहे हो इसीलिए, हम तुम्हारा वरदान निरस्त कर रहे हैं... और, फिर उसका वध कर दिया।
बल्कि... हुआ ये कि... देवताओं को उन राक्षसों को निपटाने के लिए उसी वरदान में से रास्ता निकालना पड़ा कि इस वरदान के मौजूद रहते हम इसे कैसे निपटा सकते हैं।
और, अंततः कोशिश करने पर वो रास्ता निकला भी... एवं, सब राक्षस निपटाए भी गए।
कहने का मतलब है कि... परिस्थिति कभी भी अनुकूल होती नहीं है बल्कि उसे पुरुषार्थ से अनुकूल बनाई जाती है।
आप किसी भी एक राक्षस के बारे में सिर्फ कल्पना कर के देखें कि अगर उसके संदर्भ में अनुकूल परिस्थिति का इंतजार किया जाता तो क्या वो अनुकूल परिस्थिति कभी आती?
उदाहरण के लिए सर्वचर्चित रावण को ही ले लेते हैं।
रावण के बारे में भी ये बहाना दिया जा सकता था कि... रावण को कैसे मारेंगे भला? उसे तो पचासों तीर मारे और उसके सर को काट भी दिए... लेकिन, उसका सर फिर जुड़ जाता है तो इसमें हम क्या करें?
इसके बाद अपनी इस असफलता का सारा ठीकरा रावण को ऐसा वरदान देने वाले ब्रह्मा पर फोड़ दिया जाता कि... उन्होंने ही रावण को ऐसा वरदान दे रखा है कि अब उसे मारना असंभव हो चुका है।
और फिर.. ब्रह्मा पर ये इल्जाम डाल कर चल दिया कि जब ब्रह्मा खुद रावण को ऐसा अमरत्व के सरीखा वरदान देकर धरती पर राक्षसों का राज लाने में लगे हैं तो भला हम क्या कर सकते हैं।
लेकिन... ऐसा नहीं हुआ... बल्कि, भगवान राम ने उन वरदानों के