14/09/2026
फिल्में कम ही देखता हूं, लेकिन कल देर रात एक फिल्म देखी, मिर्जापुर. हालांकि औपचारिक डिस्क्लेमर लगा था कि उसका वास्तविक घटनाओं-पात्रों से कोई लेना-देना नहीं है. फिर एक बड़े फिल्मकार की बात याद आई कि ‘(सिनेमा) एक आईना है जो समाज को प्रतिबिंबित करता है.’
जैसलमेर, जहां यादवों की आबादी नगण्य है, वहां का बब्बन यादव नशीले पदार्थों का कारोबारी दिखाया गया और उत्तर प्रदेश में करीब दस साल से कोई यादव मुख्यमंत्री नहीं है वहां एक यादव मुख्यमंत्री को माफियाओं से पैसे लेते दिखाया गया. और फिल्म में दिखाए गए ब्राह्मण माफिया की अगली पीढी के तीन चेहरों को विजेता की तरह दिखाया गया है.
मुझे समझ नहीं आया कि कथाकार क्या कहना चाहते हैं. -- जैसा मैंने पहले कहा, मैं सिनेमा कम देखता हूं और कोई समझ भी नहीं है. और हां, मेरा उपनाम कुछ भी हो, मैं अपने को पत्रकार के सिवा कुछ नहीं मानता.
साभार - श्री श्यामलाल यादव, वरिष्ठ पत्रकार Indian Express
ये लोग बहुत महीनता से किसी जाति का सामाजिक हनन करते है और कथित श्रेष्ठ जाति के गुंडों को अनैतिक कार्यों में संलिप्त होने के बावजूद भी उन्हें विजेता दर्शाते है।
अरे श्रेष्ठ मूर्खों, जिस सामाजिक समूह और जाति को तुम बदनाम करना चाहते हो ना - उनके पूर्वज को पूरा देश अवतारी देवता मानते हुए पूजता है। मतलब तुम्हारे देवता उनके पूर्वज है। वह जाति उन्हीं अवतारी पुरुष का अंश और वंश है।