24/06/2026
!! जय जय हे शक्तिस्वरूपा रानी दुर्गावती भवानी !!
आँगलतिथिनुसार अक्टूबर 5 , सन् 1524 जबकि भारतीय पंचागनुसार दुर्गाष्टमी तिथि को कालिंजर दुर्ग में कालिंजराधिपति कीरत सिंह चंदेल जी के घर में उनकी एकमात्र संतानरूप में जैसे स्वयं आद्यशक्ति माता जगदंबा दुर्गा भवानी ने अपने ही द्वारा रचित मनुष्य योनि में सतरंगी मानवीय भावों के रसास्वादन हेतु जन्म लिया था !
हालांकि , जानता हूँ कि यह काव्यात्मक अतिशयोक्ति है लेकिन भारतीय इतिहास में वर्णित महानतम स्त्री चरित्रों की जब जब बात की जाएगी / सूची बनाई जाएगी , तब तब रानी दुर्गावती का नाम लिखते हुए , लेखक स्वयं को धन्य समझेगा क्योंकि नाम के ही अनुरूप रानी दुर्गावती ने अनुपम तेज , अदम्य साहस , प्रचंड शौर्य एवं लावण्यमय रूप-सुंदरता अपने कुल से विरासत रूप में पाया था !
कहावत है कि महान आत्माएं जब जन्म लेतीं हैं , तो होनी-अनहोनी सदा संग रहती हैं !
यही हुआ था रानी के साथ...राजमहल में जन्मीं , राजसी सुख-साधनों में पली-बढ़ी रानी जब विवाहकर ससुराल पहुंचीं , तो जीवन लगभग एक सा था #सुखमय , लेकिन इसका अर्थ यह नही कि रानी दुर्गावती को राजसी सुख मिले तो वे कोई सुंदर गुड़िया थीं...नही...अपितु उन्होंने उनके पिता को अनेक सैन्य अभियानों में सफल संघर्ष करते जवानी पाई थी , इस कारण उनकी क्षात्रशिक्षा में विशेष अभिरुचि बनी रही...वे एक अद्वितीय योद्धा बनीं...आगे मात्र 4 ही वर्षों में अनहोनी ने उनसे उनका जीवनसाथी और राज्य से उनका राजा छीन लिया !
राजा दलपतशाह एक पराक्रमी योद्धा थे ( इनके जीवन से जुड़े कुछ बिंदुओं पर ऐतिहासिक मतभेद भी हैं ) !
राजा की मृत्योपरांत उनकी एकमात्र संतान अबोध पांच वर्षीय वीर नारायण को राजगद्दी पर बैठाते हुए रानी दुर्गावती ने श्रृंगार उतारकर रणकुशल क्षत्रियबाना धारण करके दक्ष नेतृत्वकर्ता के गुणों को उजागर करना शुरू ही किया था कि राज्यभर में राजा की मृत्यु के कारण छाए अंधकारयुक्त भविष्य की संभावनाओं के बादल छंटने शुरू हो गए...यह रानी दुर्गावती के कुशल प्रशासक होने के ही प्रमाण हैं कि गोंडवाना रियासत की समृद्धि तत्कालीन मुगल महाशक्ति अकबर के आंखों तक में खटकने लगी थी !
रानी दुर्गावती ने कुल 15 वर्षों तक संरक्षक रूप में अप्रत्यक्ष रूप से गोंडवाना पर शासन किया था...जब वीर नारायण का राज्याभिषेक किया गया , तो यह सूचना निकटवर्ती राज्य मालवा के स्वतंत्र शासक बाज बहादुर के पास भी पहुंची... उसने इसे सुनहरे मौके के रूप में पाया और अपनी कुटिल नीतियों को लेकर गोंडवाना पर चढ़ाई कर दी...लेकिन उसने यह एक बड़ी भूल की थी...क्योंकि इस युद्ध में रानी दुर्गावती ने न केवल बाजबहादुर को हराया अपितु इतना भारी नुकसान पहुंचाया कि फिर वह कभी खड़ा ही नही हो पाया , उसकी स्थिति केवल शरणार्थी की ही रह गयी थी ! बाजबहादुर ने गोंडवाना पर कुल 3 बार चढ़ाई की लेकिन हर बार उसे वहां से अपनी जान बचाकर भागना ही पड़ा !
इन तीन लगातार हार के बाद बाजबहादुर इतना कमजोर हो चुका था कि आखिरकार अपने कट्टर शत्रु अकबर के आक्रमण करने पर उसे भागकर मेवाड़ में मुंह छिपाना पड़ा ! अकबर का मालवा पर अधिकार हुआ और उसके शासन की सीमा अब गोंडवाना से जुड़ने लगीं ! अकबर ने तब तक अपने दरबारियों के मुंह रानी दुर्गावती की वीरता के किस्से सुन ही लिए थे , बाजबहादुर का हाल देख ही लिया था...शेष कमी पूरी की , गोंडवाना की समृद्धि ने जो रानी दुर्गावती के कुशल प्रशासकीय नेतृत्व के कारण , तमाम संघर्षों के बावजूद दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही जा रही थी !
आखिरकार , मुगल बादशाह अकबर ने अपने रिश्तेदार एवं सेनापति आसफ खां को गोंडवाना फतह करने की जिम्मेदारी देकर रवाना किया गया ! अहंकार में डूबे आसफखां ने भी स्त्री समझकर इसे आसान चढ़ाई ही समझा और बुरी तरह चूका , इस युद्ध में रानी दुर्गावती ने सूझबूझ के साथ उसके छक्के छुड़ा दिए , आखिरकार आसफखां भागा और अकबर के पास पहुंचा ! जहां आसफखां इस हार से बौखलाया हुआ था , वहीं अकबर स्वयं को लज्जित महसूस कर रहा था !
लगभग डेढ़ वर्ष बाद अकबर ने पुनः अपनी शक्ति का मुख गढ़मंडला , गोंडवाना की ओर किया...पुनः नेतृत्व आसफखां के हाथों में था...पुनः उसने उस रानी के खिलाफ अभियान शुरू किया जो शेरों के शिकार की इतनी शौकीन थी कि खबर मिलने पर धनुष-बाण लेकर तब तक पानी नही पीती थी , जब तक अपने हाथों से उसका शिकार न कर ले...फिर यह तो म्लेच्छ था...प्रचंड वेग से रानी दुर्गावती ने पुनः आसफखां को हूरों के दर्शन करवा दिए...इस बार आसफखां और अकबर आत्मग्लानि से भर उठे...आखिरकार उन्होंने बल काम न आने की सूरत में छल पर ध्यान देना शुरू किया !
कूटनीति के तहत कुछ सूफी म्लेच्छों को दुर्गावती के राज्य में अफवाहें फैलाने का काम सौंपा और रानी के विश्वस्त को अपनी ओर मिलाकर युद्ध अभियान को आगे बढ़ाया...इसपर फिर कभी लिखेंगे...तो आज ऐसी ही महान वीरांगना का बकिदां दिवस है , आज ही दिन रानी ने स्वयं के लिए मृत्यु का वरण किया था !
जन्म 1524
विवाह 1545
पति की मृत्यु 1550
स्वयं की मृत्यु 1564
🙏आपको बारंबार प्रणाम है...हे सिंहवाहिनी भवानी कुलवंश रक्त दुर्गावती मर्दानी🙏
✍️ प्रदुमन प्रताप सिंह चंदेल ✍️