18/06/2025
प्रतिष्ठित कवि आदरणीय निखिलेश्वर वर्मा जी Nikhileshwar Verma जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रलेक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित निखिलेश्वर जी की पुस्तक
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कोई राह बाहर निकलती है
निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा के लिए कविता लिखना एक सात्विक कर्म है। वह शायद चर्चा का साधन भी इसीलिए नहीं है। लगभग आधी सदी बाद उनके दूसरे संग्रह का प्रकाशन तो यही संकेत करता है। यूँ उनकी कविताएँ कभी-कभार पत्र-पत्रिकाओं में छपती रही हैं, लेकिन एक स्थान पर एक साथ उनकी छिहत्तर गहन भावबोध में पगी कविताओं को देखना और उनके साथ होना सुखद विस्मय है। अपनी रचनात्मक यात्रा में दूर तक अकेले चले एक संवेदनशील कवि की सिद्धि का प्रमाण है पाठक की भाव-समृद्धि करने वाली ये प्रौढ़, परिपक्व रचनाएँ।
संवेदना के महीन तंतुओं से मिलकर निखिलेश्वर की कविता बनती है। बाहर घट रही घटनाओं का अंतर्मन पर जो सूक्ष्म प्रभाव होता है, उसे पकड़ने की कोशिश उनकी कविताओं में दिखती है। कविता उनके लिए तात्कालिक प्रतिक्रिया का माध्यम नहीं। वे बड़े फ्रेम में चीजों को देखते हैं। पेशे से वह चिकित्सक हैं तो उतावली वे कविता रचना में भी नहीं दिखाते, बस समय की नब्ज पर धीमे से अपनी अंगुली रखते हैं और देशकाल-परिस्थिति के विषय में अपनी राय, अपना मंतव्य बनाते हैं। उनकी कविताएँ पाठक की चेतना पर धीमी दस्तक की तरह हैं, जैसे सोए बच्चे को प्यार से जगाया जाता है। पाठक जागता है और नई आँखों से जगत-व्यापार को देखने लगता है जिसमें 'हरी दूबों के पालने' अभी बचे हुए हैं, जिसमें 'एक बाड़ा विहीन धरती का चित्र' सामने है। वहीं डरे-सहमें बच्चे हैं, मुर्दा के पास सोने की कामना करती तेरह साल की बच्ची है। जहाँ धरती पर एक ही तरह का मौसम लाने को उद्धत लोग हैं, और जहाँ छाँव की तलाश करता लकड़हारा है।
निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा की कविताएँ पाठक को यह बोध कराने में सफल दिखती हैं कि कैसे उसके अंदर की ऋजुता का, उसकी कोमल लेकिन अमूल्य भाव संपदा का हरण हो रहा है, कैसे जीवन में नमी लगातार कम पड़ती जा रही है, आँखें जिसका स्थाई आश्रय हैं। कवि धीमे से लेकिन दृढ़तापूर्वक आगाह करता है कि 'जिंदा शरीर में मुर्दा साँसें ज्यादा बड़ी त्रासदी हैं'। वास्तव में निखिलेश्वर की इन सॉफ्ट कविताओं में वर्तमान युग के संत्रास को अभिव्यक्ति मिली है। कवि स्वयं को हादसे के लिए तैयार करता है। बाजार का कसता शिकंजा उसे आतंकित करता है जो किसी 'निचुड़े प्लास्टिक की बोतल की तरह/ फेंक देता है आदमी को/ सड़क किनारे'। कवि स्वयं युद्धरत है उनसे, जो 'धरती पर एक ही तरह का मौसम लाना चाहते हैं'।
निखिलेश्वर प्रसाद वर्मा मूलतः प्रेम और औदात्य के कवि हैं। उनके यहाँ 'शहद में डूबी प्यास, 'पारे की बूँद-सी चाहत', 'गिलहरी घड़ियाँ', 'युद्धग्रस्त देश में परियाँ' जैसे अद्भुत बिम्ब मिलते हैं। उनके यहाँ संस्मृतियों का रंगीन शामियाना तना है, जैसे एक व्यामोह-सा रचा हुआ है जिसके चलते 'कदम तो चलते हैं पीछे/ सफर आगे का तय होता है'।
संग्रह की अंतिम कविता 'जेठ की दोपहर' में वर्तमान सभ्यता की इतनी कम शब्दों में ऐसी प्रखर आलोचना अत्यंत विरल है। यह याद रह जाने वाला रूपक है - 'तपता आकाश/ धरती रही दरक/ सुस्ताने के लिए/ छाँव की तलाश में/ लकड़हारा/ ढूंढ़ रहा दरख्त'। Sheo Dayal (वरिष्ठ साहित्यकार)