03/09/2026
जिस फिल्म के नाम के टाइटल में ही हनुमान शब्द आ गया तो थिएटर में तो आग लगनी निश्चित है....
फतेहगढ़ का दरोगा नादिर अली चोर की जगह नीब करौरी बाबा को गिरफ्तार करके ले जाता है।
इस पूरे सीक्वेंस के संदर्भ को समझे।
ब्रिटिश शासन में सनातनी साधु-संतों की छवि पाखंडी, ढोंगी, भिखारी सरीखी बनाई गई थी। इसी थीम पर बॉलीवुड ल्यारी ने भी इमेज को वैसे ही बनाये रखा था। बल्कि लोगों के मन में भ्रम डाला गया कि सब अंधविश्वास है, भगवाधारी अर्थात् चोर, हिंसक, ठग और पाखंडी होते है। संदिग्ध बना दिया गया।
ओह माय गॉड और पीके में अंधविश्वास की आड़ में साधु-संतों पर निशाना साधा गया। मंदिर की परिभाषा भी मन के अंदर हो चली थी।
2014 से पहले हनुमान अंश सरीखी फिल्मों के लिए ट्रेड तैयार नहीं था। न निर्माता और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क था। बल्कि दर्शक वर्ग भी नहीं था। अर्थात् दर्शक वर्ग को भी अन्य कंटेंट में डायवर्ट कर दिया था। ऐसा षड्यंत्र के तहत किया गया था। ताकि यूथ सनातन की जड़ों से कटे।
2014 के बाद माहौल बदलने लगा। दर्शक वर्ग बनने लगा है और ट्रेड व निर्माताओं को विवश होना पड़ रहा है। बेशक हनुमान अंश को निर्माता नहीं मिले। किंतु इसकी अगली दो कड़ी में निर्माताओं की लाइन लग जाएगी।
निर्माताओं की विवशता का आलम देखिए कि चॉकलेटी चेहरे वाले रनबीर कपूर को लेकर रामायण बना रहे है। भले उसमें सिर्फ बिज़नेस माइंड लगा है, श्रद्धा भाव कतई नहीं है। लेकिन फिर भी बना रहे है। क्योंकि वातावरण ही ऐसा ही है।
सनातन परिवेश में इतनी कहानियाँ है कि अच्छी रिसर्च के साथ बने तो हर फ़िल्म रिकॉर्ड तोड़े।
फिल्म सोच से भी परे बहुत अच्छी है एक नौ साल का बच्चा अपने सवाल का जवाब ढूंढने के लिए निकल पड़ता है, और Heart touching स्टोरी है कि आपको कुछ भी ओवर एक्टिंग नहीं लगेगा।
सहपरिवार जरूर देखनी चाहिए।