21/01/2025
सातवीं शताब्दी में भीनमाल से राजस्थान पर शासन करने वाले राजा व्याघ्रमुख चाप वंश के थे। उसका सिक्का हुणों के सिक्कों की नकल है, इसलिए इसे वी.ए. स्मिथ द्वारा 'राजा व्याघ्रमुख चपराणा' के हुण सिक्के के रूप में कहा गया। मध्यप्रदेश के चंबल संभाग में चपराणा और हुण पाग-पटल भाई के रूप में जाने जाते हैं। वनराज चावड़ा, जिन्होंने अनिलवाड़ा शहर की स्थापना की थी, पंवार और पंवार हुण मूल के गुजराती थे, इस प्रकार चाप, चपराना, चावड़ा, चपोटक, छावडा, छावडी भी हुण मूल के हैं। होर्नले ने इन्हें हूण मूल का बताया है।
आठवीं शताब्दी के आरम्भ में प्रतिहार उज्जैन के शासक थे। नाग भट प्रथम ने उज्जैन में इस नवीन राजवंश की नींव रखी थी। संभवतः इस समय प्रतिहार भीनमाल के चप/चावड़ा वंशीय सामंत थे।
नक्षत्र विज्ञानी ब्रह्मगुप्त की पुस्तक ब्रह्मस्फुट सिद्धांत के अनुसार भीनमाल चाप वंश के व्याघ्रमुख का शासन था। व्याघ्रमुख का एक सिक्का प्राप्त हुआ है, इस पर ‘सासानी’ ईरानी ढंग की अग्निवेदिका उत्कीर्ण है। वी.ए. स्मिथ ने इस सिक्के की पहचान श्वेत हूणों के सिक्के के रूप में की थी तथा इस विषय पर एक शोध पत्र लिखा जिसका शीर्षक है व्हाइट हूण कोइन ऑफ़ व्याघ्रमुख ऑफ़ दी चप डायनेस्टी ऑफ़ भीनमाल। होर्नले ने इन्हें हूण मूल का बताया है।
भीनमाल के रहने वाले ज्योतिषी ब्रह्मगुप्त ने शक संवत 550 (628 ई.) में, अर्थात हेन सांग के आने के 13 वर्ष पूर्व, ब्रह्मस्फुट नामक ग्रन्थ लिखा जिसमें उसने वहाँ के राजा का नाम व्याघ्रमुख और उसके वंश का नाम चप (चपराणा, चापोत्कट, चावड़ा) बताया है।