Rangdeergha - रंगदीर्घा

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 #मीना_कुमारी अपने ज़माने की एक बेहतरीन एक्ट्रेस जिनसे बेहतर ग़म की तस्वीर स्क्रीन पर बनाना किसी के बस की बात नहीं थी।फ़िल्...
31/03/2021

#मीना_कुमारी

अपने ज़माने की एक बेहतरीन एक्ट्रेस जिनसे बेहतर ग़म की तस्वीर स्क्रीन पर बनाना किसी के बस की बात नहीं थी।

फ़िल्म बैजू बावरा ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई थी। इस फ़िल्म के लिए उन्हें बेस्ट एक्ट्रेस का फ़िल्मफ़ेअर अवार्ड भी मिला था मगर उम्र भर मुश्किलों ने मीना कुमारी का दामन्द कभी न छोड़ा जिसकी वजह से उनको ट्रेजेडी क्वीन कहा जाता था।

मीना कुमारी का असल नाम मेहजबीन बानो, अब्बा का नाम अली बक्श और अम्मी का नाम इक़बाल बानो था।
उनके माँ बाप दोनों ही थिएटर आर्टिस्ट थे और उनके घर की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं थी।
अली बक्श को तीसरा बच्चा हुआ और वो भी बेटी तो उन्होंने सोचा अब इस ग़रीबी में कैसे गुज़ारा करेंगे तो उन्होंने अपने दो दिन की बच्ची को दादर में यतीमख़ाने के सीढ़ी पर रख कर आगे बढ़ने लगे।
लेकिन कुछ ही दूर चलने के बाद जब बच्ची के रोने की आवाज़ उनके कानों में पड़ी तो उनका दिल पसीज गया, जब वापस सीढ़ियों पर आए तो उस बच्ची के बदन पर चीटियाँ लग गयी थी, उन्होंने उसे साफ़ किया और मीना कुमारी को वापस घर ले आए।

कहा जाता है कि उनको पढ़ने का बहुत शौक़ था मगर तंगदस्ती के वजह से उनकी अम्मी ने उन्हें बच्चों के रोल के लिए सात साल पर ही उन्हें चाइल्ड आर्टिस्ट के लिए डायरेक्टर साहब से मिलवाया जहाँ उन्हें लेदरफेस फ़िल्म में काम मिला।
मीना कुमारी को मेहजबीन नाम प्रोड्यूसर विजय भट्ट साहब ने दिया था।
उनके चॉल के पास ही रूपतारा स्टूडियो था जिसके कंपाउंड में वो खेला करती थीं।
एक दफ़े उनके अब्बू ने उनको उस वक़्त के सुपरस्टार अशोक कुमार से मिलवाया तो उन्होंने कहा कि तुम बहुत प्यारी हो और अभी छोटी मगर थोड़ी बड़ी हो जाओ तो हमारी हीरोइन बन कर।
ये महज़ इत्तेफ़ाक़ था या कुछ और कि अशोक कुमार की ये बात सच हुई और तमाशा फ़िल्म में मीना कुमारी को अशोक कुमार के अपोज़िट कास्ट किया गया।
मीना कुमारी ने सबसे ज़्यादा फ़िल्म अशोक कुमार के साथ ही की थी।

मीना कुमारी का नाम उस दौर में सबसे ज़्यादा फ़ीस लेने वाले एक्टरों में आता था। उस दौर में दस हज़ार की मोटी रक़म फ़ीस लेती थी जो उनकी कामयाबी के साथ और बढ़ गई थी। इतनी मोटी फ़ीस के बावजूद प्रोड्यूसर उनके घर के बाहर लाइन लगाए रहते थे।
एक दफ़े उनका एक्सीडेंट हुआ था जिसके बाद उनकी दो उंगलियाँ काटनी पड़ी थी और ताज्जुब की बात ये भी रही कि उनके ऑडियंस को ये बात कभी पता नहीं चली।

राइटर डायरेक्टर कमाल अमरोही के साथ उनकी दुखद प्रेमकहानी जग जाहिर है। एक्सीडेंट के बाद दोनों बहुत करीब आए। दोनों एक दूसरे को ख़त लिखा करते थे और पूरी पूरी रात फ़ोन पर बात करते थे।
उन्नीस साल की मीना कुमारी घर से छुप कर अपने से पंद्रह साल बड़े कमल अमरोही से शादी कर उनके घर रहने लगी।

हालांकि कुछ साल में ही ये रिश्ता कमज़ोर होने लगा और दोनों की ईगो पर बात या गयी। कमाल अमरोही ज़रूरत से ज़्यादा पोसेसिव निकले और उन्होंने कई बंदिशें लगा रखी थी। कहते हैं एक असिस्टेंट रखा था जो मीना कुमारी का साया हो चुका था जो उन्हें पल पल की ख़बर देता था।

दस साल का ये रिश्ता रेंगते रेंगते अपने इन्तेहाँ पर आ ही पहुँचा।

कमाल अमरोही उस वक़्त 1958 में पाकीज़ा फ़िल्म बनाने की सोची तब दोनों के रिश्ते काफ़ी ख़राब हो चुके थे। फ़िल्म की प्लानिंग शुरू हो गई थी।
1964 में दोनों अलग हो गए।
पाकीज़ा बीच में ही रह गई।
फिर 1969 सुनील दत्त और नर्गिस ने दोनों को फ़िल्म पूरा करने को मनाया।
फ़िल्म 1972 में रिलीस हुई मगर उस वक़्त फ़िल्म कुछ खास न कर पाई।
लेकिन 31 मार्च 1972 में मीना कुमारी के मरने के बाद फ़िल्म सुपर हिट हुई।

कमाल अमरोही से अलग होने के बाद मीना कुमारी बहुत अकेली पड़ गई थी।
धीरे धीरे वो धर्मेंद्र के क़रीब आ गई वो भी ऐसे जैसे धर्मेंद्र ने उन पर कोई जादू कर दिया था।
मीना कुमारी के सितारे बुलंदी पर थे, इसका पूरा फ़ायदा धर्मेंद्र को मिला बनिस्बत उनसे मीना कुमारी के इश्क़ का।
उन्होंने धर्मेंद्र को एक्टिंग सिखाई और उनके डूबते कैरियर को नया मोड़ दिया। ये उनके प्यार का पागलपन था कि धर्मेन्द्र क़ामयाब होते चले गए।

फ़िल्म फूल पत्थर के बाद से धर्मेन्द्र ने मीना कुमारी से दूरियां बनानी शुरू कर दी और दोनों का रिश्ता बहुत दिन चल नहीं पाया।

धर्मेन्द्र की ये बेवफ़ाई वो झेल नहीं पाई और उन्होंने ख़ुद को शराब में डूबा लिया था।

ये भी कहा जाता है कि धर्मेन्द्र पाकीज़ा में राज कुमार की जगह पर थे मगर कमाल अमरोही को उनकी बढ़ती नज़दीकियां पसंद नहीं थी।

अपने आख़िरी वक़्त में मीना कुमारी गुलज़ार साहब के बहुत करीब रहीं। हालांकि इस रूमानी रिश्ते का ज़िक्र कहीं साफ़ नहीं है।

गुलज़ार साहब मीना कुमारी के ज़िन्दगी में क्या मायने रखते हैं इसका अंदाज़ा बस इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने अपनी तमाम लिखी पोएट्री गुलज़ार साहब को ही सौंप दी थी।

तुम क्या करोगे सुनकर मुझसे मेरी कहानी
बेलुत्फ़ ज़िन्दगी के किस्से हैं फीके फीके

~ मीना कुमारी

From - Fiyaz Siddiqi

आज ही के दिन 24 दिसंबर 1924 को कोटला सुल्तानपुर में मोहम्मद रफी साहब का जन्म हुआ थान फनकार तुझ सा तेरे बाद आया।मोहम्मद र...
25/12/2020

आज ही के दिन 24 दिसंबर 1924 को कोटला सुल्तानपुर में मोहम्मद रफी साहब का जन्म हुआ था

न फनकार तुझ सा तेरे बाद आया।
मोहम्मद रफी तू बहुत याद आया।।

मोहम्मद रफी को ''शहंशाह-ए-तरन्नुम'' भी कहा जाता था। 40 के दशक से आरंभ कर 1980 तक इन्होने कुल 26,000 गाने गाए।
इनकी पहली पत्नी ने आज़ादी के बाद भारत में रहने से इनकार कर दिया क्योंकि उनके कई रिश्तेदार दंगो में मरे गये।रफी ने पाकिस्तान जाने से मना कर दिया।बाद में इनकी दूसरी शादी हुई।अनगिनत कहानियां हैं।
मुझे इनका गाना" तुम मुझे यूँ भुला न पाओगे " सबसे ज्यादा पसंद है।

24 दिसम्बर 1924 को अमृतसर, के पास कोटला सुल्तान सिंह में जन्मे मोहम्मद रफ़ी कम उम्र में ही वक़्त की ठोकरों से गुजर कर जीवन तराशने में लग गये थे | इनका परिवार लाहौर से अमृतसर आ गया। घर में साधारण सा गायन का माहौल था वो भी वह ज्यादा प्रेरक न था, हां, ईश्वर का दिया बेहतरीन सुर, स्वर व गला उनके पास था। रफ़ी की बड़े भाई की नाई की दुकान थी वही रफ़ी साहब का ज़्यादा वक़्त गुज़रता था और वह दुकान ही रियाज़ घर बन गई थी | कहा जाता है कि रफ़ी जब सात साल के थे तो वे अपने बड़े भाई की दुकान से होकर गुजरने वाले एक फकीर का पीछा किया करते थे जो उधर से गाते हुए जाया करता था। उसकी आवाज रफ़ी को पसन्द आई और रफ़ी उसकी नकल किया करते थे। उनकी नकल में अव्वलता को देखकर लोगों को उनकी आवाज भी पसन्द आने लगी। लोग नाई दुकान में उनके गाने की प्रशंसा करने लगे। लेकिन इससे रफ़ी को स्थानीय ख्याति के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिला। इनके बड़े भाई मोहम्मद हमीद ने इनके संगीत के प्रति इनकी रुचि को देखा और उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने को कहा। एक बार आकाशवाणी (उस समय ऑल इंडिया रेडियो) लाहौर में उस समय के प्रख्यात गायक-अभिनेता कुन्दन लाल सहगल अपना प्रदर्शन करने आए थे। इसको सुनने के लिए मोहम्मद रफ़ी और उनके बड़े भाई भी गए थे। बिजली गुल हो जाने की वजह से सहगल ने गाने से मना कर दिया। रफ़ी के बड़े भाई ने आयोजकों से निवेदन किया की भीड़ की व्यग्रता को शांत करने के लिए मोहम्मद रफ़ी को गाने का मौका दिया जाय। उनको अनुमति मिल गई और 13 वर्ष की आयु में मोहम्मद रफ़ी का ये पहला सार्वजनिक प्रदर्शन था। प्रेक्षकों में श्याम सुन्दर, जो उस समय के प्रसिद्ध संगीतकार थे, ने भी उनको सुना और काफी प्रभावित हुए। उन्होने मोहम्मद रफ़ी को अपने लिए गाने का न्यौता दिया। मोहम्मद रफ़ी का प्रथम गीत एक पंजाबी फ़िल्म गुल बलोच के लिए था जिसे उन्होने श्याम सुंदर के निर्देशन में 1944 में गाया। सन् 1946 में मोहम्मद रफ़ी ने बम्बई आने का फैसला किया। उन्हें संगीतकार नौशाद ने पहले आप नाम की फ़िल्म में गाने का मौका दिया।
बहुत कहानियां हैं रफी साहब के सरल स्वभाव की उनकी दयानतदारी की
एक बार एक फांसी के कैदी से उसकी आखिरी ख्वाहिश पूछी गई तो उसने बैजू बावरा फिल्म का"ओ दुनिया के रखवाले" गीत सुनना चाहा।उसे टेप रिकॉर्डर लाकर वो गीत सुनवाया गया।
इस गीत का रियाज़ रफी ने 15 दिन किया कहते हैं गाने के बाद रफी की आवाज़ बिगड़ गई, लोग कहने लगे अब रफी कभी नहीं गा सकेंगे
लेकिन जिस इंसान के अंदर स्वरों की गंगा-यमुना-सरस्वती बह रही हो वो कैसे संगीत से दूर हो सकता था।
जब लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने अपना पहला गाना गाने के लिए रफी साहब से गुजारिश की तो कहा"हम अभी नए हैं, कोई निर्माता हमको ज्यादा पैसा नहीं देगा,आपके लिए हमने एक गाना बनाया है अगर आप गा दें तो मेहरबानी होगी"
रफी साहब ने बिना पैसे के गाया।बाद में लक्ष्मीकांत पैसे लेकर रफी साहब के पास गए तो उन्होंने पैसे लेकर वापस दे दिए और कहा"जाओ इसी तरह प्यार से मिल बांटकर खाना"
लक्ष्मीकांत ने कहा रफी साहब की ये बात वो कभी भूले नहीं।
रफी साहब मंच पर जब भी आते जनता झूम उठती मतवाली हो जाती।जिस देश प्रदेश जाते वहां की भाषा में कम से कम एक गाना तैयार करके जाते।
1980 में श्रीलंका के स्वतंत्रता दिवस पर रफी साहब को बुलाया गया
उन्होंने पहले सिंहली गाना गाया, शायद दस लाख जनता थी।
सब झूम उठे,राष्ट्रपति प्रेमदासा को जाना था लेकिन वो ऐसे बैठे कि रफी साहब के कार्यक्रम के बाद ही उठे।
बहुत संगीतकारों ने कार्यक्रम करने वालों ने उनके पैसे दबाए लेकिन रफी ने कभी नहीं मांगा।
किशोर कुमार से उनकी अभिन्न मित्रता थी।किशोर की किसी फिल्म में उन्होंने किशोर के लिए गाना गाया, पैसे लेने से मना कर दिया, किशोर बोले वो मुफ्त में रफी से नहीं गवाएंगे,रफी ने एक रुपये लेकर गाना गाया और वो एक रुपया वो हमेशा अपने पर्स में रखते थे
अनगिनत कहानियां हैं उस सुरों के शहंशाह की जिसका दिल बादशाहों का था लेकिन स्वभाव एक मासूम बच्चे का।

40 साल हो गए रफी साहब को गुजरे लेकिन जो बच्चे उनके निधन के बाद पैदा हुए उन्हें भी रफी के गाने याद हैं।

बहुत गौर से सुन रहा था ज़माना
तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते

From - Tareeq Hamid Ji

Artists who are near Gandhinagar, should try.
20/12/2020

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मुंशी प्रेमचंद जी का आज ही के दिन जन्म हुआ था  ! आप सभी को रंगदीर्घा परिवार की ओर से प्रेमचंद जयंती की ढ़ेरों शुभकामनाएं...
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मुंशी प्रेमचंद जी का आज ही के दिन जन्म हुआ था ! आप सभी को रंगदीर्घा परिवार की ओर से प्रेमचंद जयंती की ढ़ेरों शुभकामनाएं और प्रेमचंद जी को उनके अतुलनीय योगदान के लिए नमन !

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11/07/2020

ख़बर है कि महानायक श्री 'अमिताभ बच्चन' की तबियत बहुत ख़राब है और वे मुबंई के नानावती अस्पताल में भर्ती हैं ! रंगदीर्घा परिवार उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना करता है !

https://indianexpress.com/article/entertainment/bollywood/actor-amitabh-bachchan-hospitalised-july-11-6501184/

सूरमा भोपाली के नाम से मशहूर रहे अभिनेता 'जगदीप' अब हमारे बीच नहीं रहे  ! रंगदीर्घा परिवार की भावभीनी श्रद्धांजलि
09/07/2020

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आज अमरीश पुरी साहब का जन्मदिन है  ! जन्मदिन पर पढ़िये   'प्रबोध जी' का यह विशेष लेख  ! आज अमरीश पुरी को याद करते हुए क्य...
22/06/2020

आज अमरीश पुरी साहब का जन्मदिन है ! जन्मदिन पर पढ़िये 'प्रबोध जी' का यह विशेष लेख !

आज अमरीश पुरी को याद करते हुए क्योंकि मुझे जब मैनें उनकी फिल्म घातक देखी तो उस सिनेमा में उनका जो पिता का अभिनय था मैं उनमें अपनी पिता को ढूढ़ता था क्योंकि वो अक्स उनमें नजर आता था। पिता की कभी गुस्सा और कभी मासूमियत सभी उनमें दिखाई पड़ता था। आपसब देखेंगे जब इस सिनेमा में अमरीश पुरी को तो जो कि सच में उनका खूबसूरत अभिनय था वाकई अचम्भा में डालने वाला है। दरअसल अभिनय का काम ही ये होता है।
अमरीश पुरी (जन्म:22 जून 1932 -मृत्यु:12 जनवरी 2005) चरित्र अभिनेता मदन पुरी के छोटे भाई अमरीश पुरी हिन्दी फिल्मों की दुनिया का एक प्रमुख स्तंभ रहे हैं। अभिनेता के रूप निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फ़िल्मों से अपनी पहचान बनाने वाले श्री पुरी ने बाद में खलनायक के रूप में काफी प्रसिद्धी पायी। उन्होंने 1984 मे बनी स्टीवेन स्पीलबर्ग की फ़िल्म "इंडियाना जोन्स एंड द टेम्पल ऑफ़ डूम" (अंग्रेज़ी- Indiana Jones and the Temple of Doom) में मोलाराम की भूमिका निभाई जो काफ़ी चर्चित रही। इस भूमिका का ऐसा असर हुआ कि उन्होंने हमेशा अपना सिर मुँडा कर रहने का फ़ैसला किया। इस कारण खलनायक की भूमिका भी उन्हें काफ़ी मिली। व्यवसायिक फिल्मों में प्रमुखता से काम करने के बावज़ूद समांतर या अलग हट कर बनने वाली फ़िल्मों के प्रति उनका प्रेम बना रहा और वे इस तरह की फ़िल्मों से भी जुड़े रहे। फिर आया खलनायक की भूमिकाओं से हटकर चरित्र अभिनेता की भूमिकाओं वाले अमरीश पुरी का दौर। और इस दौर में भी उन्होंने अपनी अभिनय कला का जादू कम नहीं होने दिया फ़िल्म मिस्टर इंडिया के एक संवाद "मोगैम्बो खुश हुआ" किसी व्यक्ति का खलनायक वाला रूप सामने लाता है तो फ़िल्म DDLJ का संवाद "जा सिमरन जा - जी ले अपनी ज़िन्दगी" व्यक्ति का वह रूप सामने लाता है जो खलनायक के परिवर्तित हृदय का द्योतक है। इस तरह हम पाते हैं कि अमरीश पुरी भारतीय जनमानस के दोनों पक्षों को व्यक्त करते समय याद किये जाते हैं।

●पढ़ाई● अमरीश पुरी ने अपनी शुरुआती पढ़ाई पजाब से की। उसके बाद वह शिमला चले गए। शिमला के बी एम कॉलेज(B.M. College) से पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अभिनय की दुनिया में कदम रखा। शुरुआत में वह रंगमंच से जुड़े और बाद में फिल्मों का रुख किया। उन्हें रंगमंच से उनको बहुत लगाव था। एक समय ऐसा था जब अटल बिहारी वाजपेयी और स्व. इंदिरा गांधी जैसी हस्तियां उनके नाटकों को देखा करती थीं। पद्म विभूषण रंगकर्मी अब्राहम अल्काजी से 1961 में हुई ऐतिहासिक मुलाकात ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और वे बाद में भारतीय रंगमंच के प्रख्यात कलाकार बन गए।

●करियर● अमरीश पुरी ने 1960 के दशक में रंगमंच की दुनिया से अपने अभिनय करियर की शुरुआत की। उन्होंने सत्यदेव दुबे और गिरीश कर्नाड के लिखे नाटकों में प्रस्तुतियां दीं। रंगमंच पर बेहतर प्रस्तुति के लिए उन्हें 1979 में संगीत नाटक अकादमी की तरफ से पुरस्कार दिया गया, जो उनके अभिनय कॅरियर का पहला बड़ा पुरस्कार था।

अमरीश पुरी के फ़िल्मी करियर शुरुआत साल 1971 की ‘प्रेम पुजारी’ से हुई। पुरी को हिंदी सिनेमा में स्थापित होने में थोड़ा वक्त जरूर लगा, लेकिन फिर कामयाबी उनके कदम चूमती गयी। 1980 के दशक में उन्होंने बतौर खलनायक कई बड़ी फिल्मों में अपनी छाप छोड़ी। 1987 में शेखर कपूर की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया में मोगैंबो की भूमिका के जरिए वे सभी के जेहन में छा गए। 1990 के दशक में उन्होंने ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ‘घायल’ और ‘विरासत’ में अपनी सकारात्मक भूमिका के जरिए सभी का दिल जीता।

अमरीश पुरी ने हिंदी के अलावा कन्नड़, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों तथा हॉलीवुड फिल्म में भी काम किया। उन्होंने अपने पूरे कॅरियर में 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया। अमरीश पुरी के अभिनय से सजी कुछ मशहूर फिल्मों में 'निशांत', 'गांधी', 'कुली', 'नगीना', 'राम लखन', 'त्रिदेव', 'फूल और कांटे', 'विश्वात्मा', 'दामिनी', 'करण अर्जुन', 'कोयला' आदि शामिल हैं। दर्शक उनकी खलनायक वाली भूमिकाओं को देखने के लिए बेहद उत्‍साहित होते थे।

उनके जीवन की अंतिम फिल्‍म 'किसना' थी जो उनके निधन के बाद वर्ष 2005 में रिलीज हुई। उन्‍होंने कई विदेशी फिल्‍मों में भी काम किया। उन्‍होंने इंटरनेशनल फिल्‍म 'गांधी' में 'खान' की भूमिका निभाई था जिसके लिए उनकी खूब तारीफ हुई थी। अमरीश पुरी का 12 जनवरी 2005 को 72 वर्ष के उम्र में ब्रेन ट्यूमर की वजह से उनका निधन हो गया। उनके अचानक हुये इस निधन से बॉलवुड जगत के साथ-साथ पूरा देश शोक में डूब गया था। आज अमरीश पुरी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें आज भी फिल्मों के माध्यम से हमारे दिल में बसी हैं।

अमरीश पुरी को मेरी
विनम्र श्रद्धांजलि
साथ में उनके कला को
सलाम।
💐💐💐💐

प्रबोध सिन्हा

कवि, लेखक, नाटककार, निर्देशक और एक बेहतरीन व्यक्तित्व के धनी  'हबीब तनवीर'  साहब को उनकी पुण्यतिथि पर नमन  !
09/06/2020

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