Dhamma Bhoomi Ramsara Fazilka - Punjab

Dhamma Bhoomi Ramsara Fazilka - Punjab बौद्ध धम्म की क्या पहचान
मानव-मानव एक समान।
बुद्धम् शरणं गच्छामि
धम्म शरणं गच्छामि
संघम् शरणं गच्छामि

विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है...
15/02/2026

विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है। बौद्धधम्म के खज़ाने में भी देश-विदेश से अपना एक विशाल मात्रा में साहित्य मौजूद है परन्तु विश्व भर के अन्य धर्मों के साहित्य की तुलना में बौद्ध साहित्य में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। जहां अन्य धर्मों के ग्रंथों का एक भी शब्द इधर से उधर करने की अनुमति नहीं है वहीं पर बौद्धधम्म का साहित्य आलोचन के कटहरे में बरसों से खड़ा किया जाता रहा है।

इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि विश्व के अन्य धर्मों के ग्रंथ ईश्वर द्वारा रचित समझ कर पूजे जाते हैं परन्तु न तो बुद्ध ने स्वयं को एक गैर-दुनियावी पुरुष घोषित किया और न ही उनका कहा गया हर शब्द पत्थर की लकीर घोषित किया जाता है। यही कारण है कि बौद्ध साहित्य को कई परीक्षणों से गुज़रना पड़ता रहा है जिस वजह से बौद्ध साहित्य में समय-समय पर वृद्धि होती रही है।

बौद्ध धम्म का प्रहार तर्कहीन सिद्धांतों पर सबसे तीखा रहा है जिसका एक उदाहरण बौद्ध धम्म का मृत्यु के सिद्धांत के प्रति दृष्टिकोण है जो कि कर्मकांड के गोरखधंधे के विपरीत बिल्कुल पारदर्शी और सरल है।

बौद्ध यह कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं करते कि सारिपुत्र आदि प्रमुख श्रावक ही मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए, बल्कि स्वयं बुद्ध भी मृत्युरूपी सत्य द्वारा कुचल दिए गए। इस दृष्टिकोण पर बेहतरीन उदाहरण बाहरवीं शताब्दी के कल्याणी नामक भिक्षु का दिया जा सकता है जिन्होंने पालि में रचित अपनी कृति " तेलकटाहगाथा " में गाथा नं २० और २१ में बहुत स्पष्ट तौर पर मृत्यु की अनिवार्यता पर लिखा है :-

" जो सदा शुद्ध, मलरहित, श्रेष्ठा को प्राप्त सारिपुत्र प्रमुख मुनि तथा श्रावक थे, वे भी मृत्यु रूपी बड़वाग्नि के मुख में डूब गए और उसी तरह नष्ट हो गए जैसे वायु के झोंको से दीपक विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।

खिले हुए कमल की भांति निर्मल, सुन्दर नेत्रवाले, बत्तीस लक्षणों से सुशोभित रूप शोभा वाले तथा समस्त आश्रवों का क्षय करने वाले, लोक के नाथ बुद्ध भी मृत्युरूपी मस्त महाहाथी द्वारा कुचल डाले गए..."

अन्य धर्मों में मृत्यु का सिद्धांत कर्मकांडी अथवा स्वर्ग-नर्क के लालच की विचारधार पर टिका है जो धर्म की दुकान चलाने का एक बीजमंत्र है परन्तु बौद्ध धम्म में मृत्यु का सिद्धांत निरंतर परिवर्तनशीलता और परस्पर निर्भरता पर खड़ा है।

बौद्ध धम्म में वैचारिक उड़ान कितनी ऊँची तथा गहरी है, इसका अनुमान इसमें निहित नैतिक विशेषताओं अथवा दुनिया भर में मौजूद बेहिसाब बौद्ध साहित्य से लगाया जा सकता है जो विश्व के अन्य किसी धर्म के संदर्भ में नज़र नही पड़ता...!!!

डा. अमृतपाल कौर.... 🌷🌈🌅💘🌷

यहाँ भिक्खाटन वर्जित है भिक्खु“चरथ भिक्खवे चारिकं बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय”अपने शास्ता के इन शब्दों को सुनकर...
14/02/2026

यहाँ भिक्खाटन वर्जित है भिक्खु

“चरथ भिक्खवे चारिकं
बहुजन हिताय बहुजन सुखाय लोकानुकम्पाय”
अपने शास्ता के इन शब्दों को सुनकर तुम चल पड़े अलग-अलग दिशाओं में
न बहती नदियों का ख़ौफ़ था तुम्हें
न पहाड़ों ने रोका रास्ता तुम्हारा
जंगल के सारे जीव तुमसे मैत्री रखते थे
हर मनुष्य करता था सत्कार तुम्हारा।

सारनाथ से सावत्थि तक
वैसाली से राजगृह तक
बोध गया से बैराठ तक
लुम्बिनी से सीलोन तक
ख़ैबर पख़्तून से बामियान तक
जहाँ-जहाँ पड़े कदम तुम्हारे
हिंसा करुणा में बदल गई
लोभ बदल गया दान में
झूठ, निंदा और कटुता नदारद हो गई
रिश्तों ने मर्यादाएँ सीखीं
नशे का जैसे नाश हो गया
सदियों तक लहलहाती रही फसल यहाँ
प्रज्ञा, शील, समाधि करुणा और मैत्री की
तुम सदियों तक करते रहे चारिका
फ़क़त एक चीवर के सहारे
बचाये रखा धम्म का अस्तित्व
अनगिनत आक्रमणों-अतिक्रमणों के बावजूद।

अब वक़्त बदल चुका है भिक्खु
सजग रहना तुम
पहले एक पुष्यमित्र था सौ-सौ षड्यंत्र करने को
अब हर चौराहे पर सौ-सौ पुष्यमित्र हैं
तुम्हारी विरासत हड़पने को
वो तुम्हारे शास्ता का रूप बदलकर फैला देंगें ये झूठ
कि मोक्ष का रास्ता उनके पैरों के नीचे से होकर जाता है
वे तुम्हारे विहारों के चारों तरफ करेंगें इतनी परिक्रमाएँ
कि लोग तीर्थ यात्राओं को ही जीने का मकसद बना लेंगें
वे तुम्हारें जैसे वस्त्र पहन कर करेंगें इतनी अनैतिकता
कि लोगों का भरोसा उठ जाये धर्म से
वे तुम्हारे खाने में ज़हर तक मिला देंगें
ये पुष्यमित्रों का शहर है भिक्खु
यहाँ भिक्खाटन वर्जित है।

- बी एल पारस

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने...
14/01/2026

क्या सचमुच बुद्ध क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत थे? इसको लेकर अक्सर कई बातें प्रचलन में रहती है लेकिन किसी भी शंकराचार्य ने कभी बुद्ध को नहीं स्वीकारा। आदि शंकराचार्य ने विष्णु अवतार मानने से भी इंकार कर दिया था। जगतगुरू रामभद्राचार्य ने तो यहां तक कहा कि मोदी नहीं समझे बुद्ध ने हमारा कितना नुकसान किया। ऐसा क्यों कि एक ओर अपना मानना है दूसरी ओर विरोध भी करना है?

क्षत्रिय बताने के पीछे क्या तर्क और तथ्य हैं? आपने कहां पढ़ा कि बुद्ध क्षत्रिय थे? यकीनन कई इतिहास की किताबों में और कई धार्मिक लोगों की बातों में? तो सबसे पहले यह समझ लीजिए कि बुद्ध को विष्णु का अवतार घोषित करने के पीछे सबसे स्पष्ट तथ्य हैं पुराण। इन्हीं में बुद्ध के बारे में कई जिक्र हैं एयर कई प्रकार की छवि भी।

लेकिन समझना यह भी पड़ेगा कि इन्हीं पुराणों में तो रामानुजाचार्य से लेकर रानी विक्टोरिया का भारत में शासन स्थापित करने तक का भी जिक्र है। जब इनकी पौराणिक प्रामाणिकता स्वयं ही भ्रमित हैं तो फिर बाकी बातों का आकलन कीजिए। और हां कभी विष्णु का अवतार तो मुगल सम्राट अकबर को भी बताया गया था। उसका क्या?

अब बात करते हैं कि आख़िर बुद्ध कौन थे? तो बुद्ध खत्तिय थे। खत्तिय जो खेतिहर थे अर्थात किसान। वह इक्ष्वाकु वंश नहीं शाक्य वंश के थे। इखवाकु इसलिए हुए क्योंकि उनके पिता ईख की खेती करते थे। उपरोक्त चित्र जिसमें हल लगाता किसान है वह बुद्ध के पिता शुद्धोधन हैं और यह मूर्ति गांधार शैली की पाकिस्तान से मिली थी।

खेत से खेती, खेती से खेतिहर और क्षेत्र विशेष को खत तथा इससे जुड़े कागजातों को खतौनी कहने की परंपरा यहीं से संबंधित है। बाकी यह समझ लीजिए कि बुद्ध से जुड़े जितने भी पवित्र स्थल भारत में है जैसे सारनाथ, कौशांबी, नालंदा, तक्षशीला यह सब हालिया खुदाई में निकले हैं उससे पहले लोग बुद्ध को विदेशी समझते थे।

चीन, जापान, कोरिया इत्यादि देशों में बुद्ध का एकछत्र राज होने से यह भ्रम पैदा हुआ था। बाद में फ़ाह्यान, ह्वेनसांग इत्यादि की किताबों, चीन, श्रीलंका और तिब्बत की किताबों, कहानियों से बुद्ध और अशोक पुनर्जीवित हो सके। बुद्ध की विरासत सारी परिवर्तित हो चुकी थी और भारत के लोग अमूमन बुद्ध को भूल चुके थे।

अब बात करते हैं ऐतिहासिक तथ्यों पर तो डी. डी. कोसांबी ने कहा है कि "बुद्ध का विष्णु का अवतार घोषित करने के पीछे ब्राह्मणवादी समावेशन की रणनीति थी"। रोमिला थापर ने धार्मिक रणनीति बताया तो आर एस शर्मा ने अवतार बनाने के पीछे धीरे–धीरे बुद्ध को हाशिए पर धकेलने की रणनीति बताया।

इतिहासकार रामशरण शर्मा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "प्राचीन भारत में राजनीतिक विचार एवं संस्थाएँ " ( पृ. 81 ) में लिखा है कि खत्तिय उपाधि का मतलब खेतों का मालिक है आगे लिखा है कि दूसरों के खेतों के रक्षक भी।" इसलिए क्षत्रिय शब्द छत और क्षत्र तथा रक्षक से आया। दूसरे चित्र में जो छत्र है वह छत्रधारी उपाधि से है।

अर्थात सेनापति को यह उपाधि मिलती थी और सिर पर छत्र पहनाया जाता था जो कालांतर में क्षत्रिय, ठाकुर अथवा राजपूत हो गया। मेगस्थनीज राजपूत जाति को नहीं जानता था, फाहियान और ह्वेनसांग भी राजपूत जाति से वाकिफ नहीं थे। ग्यारहवीं सदी में भारत आए अलबेरुनी को भी नहीं पता था कि राजपूत जैसी कोई जाति है।

बारहवीं सदी के कल्हण को भी राजपूत जाति का पता नहीं था। पंद्रहवीं सदी के महाराणा कुंभा के काल तक राजपूत जाति का कहीं उल्लेख नहीं है। हां महाराणा कुम्भा के बाद जो राजा के पुत्र को राजपूत कहने की परंपरा चली वहीं से आधुनिक राजपूत शब्दावली अस्तित्व में आई और खत्तिय से क्षत्रिय जाति भी स्थापित हो गई।

बाकी शाक्य गण के बुद्ध को इसी खत्तिय के आधार पर इतिहासकार क्षत्रिय बता देते हैं मगर उसी खत्तिय गण के कोलिय और मोरिय को क्षत्रिय बताने से वे भागने लगते हैं। जब ऐतिहासिक प्रमाण है कि कोली और मौर्य भी खत्तिय हैं तो उन्हें समस्या पैदा हो जाती है। अब यह भ्रम दोनों ओर है। एक तात्कालिक खत्तिय का क्षत्रिय बनने की ओर तथा दूसरा बुद्ध को क्षत्रिय बनाने की ओर।

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जी लिखते हैं कि महापरिनिब्बान सुत्त में लिखा है कि मोरियों ने कहा कि गोतम बुध खत्तिय थे और हम भी खत्तिय हैं मतलब मोरिय खत्तिय थे। सुद्धोदन खत्तिय ने कोलिय राजा को संवाद भेजा कि हम भी खत्तिय हैं और आप भी खत्तिय हैं ( रांगेय राघव, यशोधरा जीत गई, पृ. 18) मतलब कोलिय भी खत्तिय थे। तो क्या शाक्य गण, कोलिय गण, मोरिय गण सभी राजपूत थे?

तथागत बुद्ध शाक्य गण के थे, जबकि उन्हें क्षत्रिय वर्ण का बताया जाता है। बौद्ध भिक्खु महामोग्गल्लान कोलिय गण के थे, जबकि उन्हें ब्राह्मण वर्ण का बताया जाता है। सम्राट असोक मोरिय गण के थे, जबकि उन्हें शूद्र वर्ण का बताया जाता है। गौतम बुद्ध की माता कोलिय वंश की थी। सम्राट असोक की पत्नी देवी शाक्य गण की थीं, जबकि उन्हें वैश्य वर्ण का बताया जाता है।

सम्राट अशोक की एक बेटी चारुवती थी। वह नेपाल के राजकुमार देवपाल खत्तिय से ब्याही गई थी। अब आप स्वयं भी आकलन कीजिए यदि बुद्ध विष्णु अवतार या हिंदू धर्म के अनुयाई होते तो बुद्ध के साथ ब्रह्मा, विष्णु, महेश इत्यादि भी विदेशों में जाते और जापान, कोरिया सहित तमाम बौद्ध राष्ट्रों को भी हिंदू राष्ट्र मानते? ये विरोधाभास और तथ्यों का अभाव क्यों है कभी सोचा है?

डॉ राजेंद्र प्रसाद सिंह जी कहते हैं कि "ऐसा इसलिए कि भारत का इतिहास वर्ण - व्यवस्था से गण - व्यवस्था की ओर उल्टी दिशा में चलता रहे। वैदिक सभ्यता से बौद्ध सभ्यता की ओर उल्टी दिशा में चलता रहे।" वे आगे लिखते हैं कि मनुस्मृति से लेकर विष्णु पुराण तक में लिखा हुआ है कि ब्राह्मणों को नाम के आखिर में शर्मा, क्षत्रिय को वर्मा आदि लिखना चाहिए ।

पढ़ा है कि मनुस्मृति, विष्णु पुराण आदि गुप्तकाल और गुप्तकाल से पहले की लिखी हुई किताबें हैं। गुप्तकाल और गुप्तकाल से पहले के कई राजाओं, लेखकों एवं अन्य लोगों के नाम प्रामाणिक तौर पर हमें ज्ञात हैं। अभी तक प्रामाणिक तौर पर एक भी शर्मा - वर्मा नामांत नाम, उपनाम हमें नहीं मिला।

इससे साफ होता है कि इन किताबों की रचना तब हुई होगीं, जब इस तरह की जातिगत उपाधियाँ प्रचलित हुई होंगी।" अर्थात वर्णव्यवस्था ही नई नहीं है बल्कि बहुत सी धार्मिक स्थापनाएं नई है। खोज, शोध उल्टी दिशा में निकल आते हैं। आयेंगे ही जब उन्नीसवीं सदी से पहले हम सिन्धुघाटि सभ्यता से भी परिचित नहीं थे।

पहाड़ों में जितने भी उपनाम हैं वह समस्त उपाधियां रही हैं। जो वर्णव्यवस्था यहां आई वह बाहरी लोगों के आगमन के साथ तथा आदि शंकराचार्य के धार्मिक और सांस्कृतिक पुनर्व्यवस्था के पश्चात ही दिखाई पड़ती है। यही आलम पूरे देश में होना चाहिए। बुद्ध के समय या उससे पहले यह सब होता तो चीन, तिब्बत,,जापान, कोरिया वंचित ना रहते।

अंत में यही कि नालंदा की जितनी खुदाई थी उसके शोधकर्ता कहते हैं वह महज़ दस प्रतिशत हिस्सा भी नहीं है। राखीगढ़ी से लेकर मोहनजोदड़ो तक कितना हो खुद सका। जब हम कुछ सदी पहले तक चक्रवर्ती राजा अशोक से भी परिचित नहीं थे। अशोक स्तंभ को महाभारत के भीम की लाठी कहते थे तो यह दावा भ्रमित ही है कि बुद्ध से पहले अन्य संस्कृति थी और वही आज की सनातन, वैदिक या हिंदू संस्कृति है। बाकी थोड़ा सोचने पर दबाव डालो बातें स्वतः ही समझ आएगी।

ी_विशाल

बुद्ध धम्म को हिन्दूधर्म का ही एक अंश बताया जाता है जो कि सरासर निराधार है। कोई भी धर्म अपनी शाखा व अंश के प्रति उस तरह ...
11/01/2026

बुद्ध धम्म को हिन्दूधर्म का ही एक अंश बताया जाता है जो कि सरासर निराधार है। कोई भी धर्म अपनी शाखा व अंश के प्रति उस तरह से अपशब्दों का प्रयोग नहीं करता जिस तरह से हिन्दूधर्म के ग्रंथों ने बुद्धधम्म के प्रति किया है। वाल्मीकीय रामायण में आता है :-

" जैसे चोर दण्डनीय होता है, उसी प्रकार (वेद विरोद्धी) बुद्ध (बौद्धमतावलंबी) भी दंडनीय है। तथागत और नास्तिक को भी यहां इसी कोटि में समझना चाहिए। इसलिए प्रजा पर अनुग्रह करने के लिए राजा द्वारा जिस नास्तिक को दण्ड दिलाया जा सके, उसे तो चोर के समान दण्ड दिलाया ही जाए; परंतु जो वश के बाहर हो, उस नास्तिक के प्रति विद्वान ब्राह्मण कभी उन्मुख न हो - उससे वार्तालाप न करे। " (श्रीमद् वाल्मीकीय रामायण, गीता प्रेस, गोरखपुर, पृ ३०३)

अशोकावदान ग्रंथ से पता चलता है कि पुष्यमित्र शुंग नामक ब्राह्मण ने मौर्यवंश के अंतिम सम्राट बृहद्रथ की हत्या करके सत्ता अपने हाथों में लेकर बुद्धइज़्म के विरुद्ध प्रतिक्रांति के एजंडे के अधीन बौधों की हत्याएं की, बुद्धविहारों को जलाकर खाक किया और साकल (स्यालकोट) पहुंचकर यह घोषणा की कि जो एक बौद्ध का सिर लाकर देगा, मैं उसे एक सौ दीनार दूंगा। यही कारण है कि चीनी बौद्ध साहित्य में पुष्यमित्र का नाम बिना अभिशाप के नहीं लिया जाता। वहां सिर्फ़ पुष्यमित्र न कह कर "पुष्यमित्र, नाश हो उसका," ऐसा कहते हैं।

रेने ग्राउसैट अपनी पुस्तक 'इन द फुटस्टेप्स आफ़ बुद्धा' में लिखते हैं कि चीनी यात्री युवां च्वांग ने लिखा है कि कश्मीर के राजा मिहिरकुल ने बौद्ध स्तूपों को गिरा दिया और मठों को नष्ट करके सैंकड़ों बौद्धों को मार डाला। वाटर्स, युवां च्वांग्स ट्रैवेल्स, भाग-२ के अनुसार चीनी यात्री ने यह भी लिखा है कि राजा शशांक ने बोधिवृक्ष कटवा दिया, बुद्ध की मूर्ति के स्थान पर महेश्वर की मूर्ति रख दी और बुद्ध के धर्म को तबाह किया।

'शंकर दिग्विजय' में राजा सुधन्वा द्वारा बौद्धों को हिन्दु धर्म के आचार्य कुमारिल भट्‌ट की आज्ञानुसार कतल किए जाने का स्पष्ट वर्णन मिलता है -

" तब राजा ने वेदविरोधी बौद्धों की हत्यायें करने का आदेश जारी करते हुए कहा कि हिमालय से लेकर रामेश्वर तक के सारे भूभाग में जो भी बौद्ध मिले, चाहे वह बच्चा हो या बूढ़ा, उसे कतल कर दो। जो ऐसा नहीं करेगा, उसे मैं कतल कर दूंगा। " (१/९२-९३)

कुमारिल भट्‌ट ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'तंत्रवार्तिक' में बुद्ध के अंहिसा आदि के उपदेशों को कुत्ते की खाल पर पड़े दूध के समान गन्दे, निकम्मे व त्यागने के योग्य कह दिया। इनके बाद आर्चाय शंकर ने अपने ब्रह्मसूत्र भाष्य में बुद्ध को 'अनाप शनाप बकने वाला दुनिया का दुश्मन' (३-२-३२) कहा।

ईसा से पूर्व द्वितीय शताब्दी में हुए वैयाकरण पतंजलि को अपने महाभाष्य में पाणिनि के एक सूत्र (२-४-९) की व्याख्या करते हुए जब ऐसे लोगों का एक उदाहरण देना पड़ा जिन का सदा से विरोध चला आ रहा हो तो उसने बौद्धों और ब्राह्मणों का उल्लेख किया जिनके आपसी विरोधाभास की बिल्ली और चूहे और सांप तथा न्योले के संबधों से तुलना की गई।

सम्राट अशोक ने शिलालेखों पर बुद्ध वचन खुदवाए जो ब्राह्मणों को बहुत अखरता था। अशोक को खलनायक बनाने के लिए इन्हीं ब्राह्मणों व उनके वैयाकरणों ने व्याकरण के नियम तक बदल दिए। शिलालेख में सम्राट अपने नाम के आगे 'देवानां प्रिय' शब्द लगाते हैं जिसका अर्थ है - देवताओं का प्यारा, परन्तु ब्राहणों के व्याकरण में एक विशेष नया नियम जोड़ कर घोषणा कर दी कि देवानां प्रिय का अर्थ मूर्ख है। कात्यायन ने १५० ई.पू. के आस पास इन शब्दों का अर्थ मूर्ख बताया।

संस्कृत के प्राचीन नाटकों में अनेक स्थानों पर बौद्ध भिक्खुओं को पिटते हुए पाते हैं, उनका मज़ाक उड़ाया जाता है और खुल कर निन्दा भी की जाती है। ऐसा ही एक प्राचीन व प्रसिद्ध संस्कृत नाटक है 'मृच्छकटिकम्' जिसके सातवें अंक में नायक चारुदत्त नायिका वसंतसेना से मिलने के लिए निकलता है और रास्ते में उसे एक बौद्ध भिक्खु दिख जाता है। वह कहता है -

"अरे यह पहले ही अशुभ बौद्ध भिक्खु का दर्शन क्यों हो गया?"

इतना ही नहीं, बुद्धधम्म के प्रति लोगों को सावधान करते हुए विभिन्न पुराणग्रन्थों ने भी बुद्ध और उनके धम्म की निन्दा की। ब्रह्मपुराण का कहना है कि विष्णु ने बुद्ध का अवतार धारण करके शाक्य लोगों के धर्म को नष्ट कर दिया और नकलीमाल अर्थात बुद्धइज़म थमा दिया। भविष्यपुराण कहता है कि बुद्ध ने देवधर्म का पालन करने वाले ब्राह्मणों, क्षत्रियों व वैश्यों को वेदों से विमुख करके सर्वत्र अज्ञान व अंधकार फैलाया।

बौद्ध धम्म के खिलाफ़ यह अंधविश्वास जानबूझ कर फैलाया गया ताकि लोग बौद्धों को देखने से भी परहेज़ करने लगें। ऐसे में उनके विचार कौन सुनना चाहेगा। यह बहिष्कार का अस्त्र था और अंधविश्वास साधन। अपशब्दों की इतनी भारी बौछार अथवा निंदा कोई अपने ही धर्म की शाखा पर कैसे कर सकता है? ऐसा तो कोई धर्म तभी कर सकता है जब किसी प्रतिद्वन्द्धी से उसे कठोर चुनौती मिल रही हो...!!!!

डॉ. अमृतपाल कौर....✍️💐🌟💘✍️

ये छंद बुद्ध की शारीरिक विशेषताओं और उनके महान गुणों का वर्णन करते हैं, जिन्हें यशोधरा अपने पुत्र राहुल को संबोधित करते ...
23/07/2025

ये छंद बुद्ध की शारीरिक विशेषताओं और उनके महान गुणों का वर्णन करते हैं, जिन्हें यशोधरा अपने पुत्र राहुल को संबोधित करते हुए कहती हैं। जहाँ यशोधरा बुद्ध को "नरसिहो" (नरों में सिंह, यानी सर्वश्रेष्ठ पुरुष) कहकर संबोधित करती हैं।

पालि:

चक्क-वरङ्कित-रत्त-सुपादो, लक्खण-मण्डित-आयतपण्हि।
चामर-छत-विभूसित-पादो, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

उनके चरण चक्र के चिह्नों से सुशोभित और लाल रंग के हैं,
लक्षणों से अलंकृत और सुंदर एड़ियों वाले हैं।
चामर और छत्र से सुशोभित उनके चरण हैं,
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

सक्य-कुमार-वरो सुखुमालो, लक्खण-चित्तिक-पुण्ण-सरीरो।
लोकहिताय गतो नरवीरो, एस हि तुय्ह नरसीहो॥

हिंदी:

शाक्य कुल का श्रेष्ठ कुमार, कोमल और सुंदर देह वाला,
लक्षणों से सुशोभित और पूर्ण शरीर वाला।
लोक के हित के लिए गए वह नरवीर,
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

पुण्ण-ससङ्क-निभो मुखवण्णो, देवनरान पियो नरनागो।
मत्त-गजिन्द-विलासित-गामी, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

उनका मुख पूर्णिमा के चंद्रमा-सा सुंदर है,
देवताओं और मनुष्यों को प्रिय वह नरनाग (श्रेष्ठ पुरुष)।
मस्त हाथी-राज की तरह शोभायमान चाल वाला,
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

खत्तिय-सम्भव-अग्गकुलीनो, देव-मनुस्स-नमस्सित-पादो।
सील-समाधि-पतिट्ठित-चित्तो, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

क्षत्रिय कुल में उत्पन्न, श्रेष्ठ कुल का गौरव,
देवता और मनुष्य जिनके चरणों में नमन करते हैं।
शील और समाधि में दृढ़ मन वाला,
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

आयत-युत्त-सुसण्ठित-नासो, गोपखुमो अभिनील-सुनेत्तो।
इन्दधनु-अभिनील-भमूको, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

लंबी और सुंदर नासिका वाला, गाय की तरह सुंदर पलकों वाला,
नील नयनों और इंद्रधनुष-सी भौहों वाला।
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

वट्ट-सुवट्ट-सुसण्ठित-गीवो, सीहहनु मिगराज-सरीरो।
कञ्चन-सुच्छवि उत्तम-वण्णो, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

गोल और सुंदर ग्रीवा वाला, सिंह के समान जबड़े वाला,
पशुराज के समान शरीर और स्वर्ण-सी निर्मल कांति वाला।
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

सिनिद्ध-सुगम्भीर-मञ्जु-सुघोसो, हिङ्गुलबद्ध-सुरत्त-सुजिव्हो।
वीसति-वीसति सेत सुदन्तो, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

मधुर, गंभीर और सौम्य स्वर वाला,
हिंगुल-रंग की सुंदर जिह्वा और बीस-बीस श्वेत दांतों वाला।
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

अञ्जन-वण्ण-सुनील-सुकेसो, कञ्चन-पट्ट-विसुद्ध-नलाटो।
ओसधि-पण्डर-सुद्ध-सुवण्णो, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

काजल-से नीले और सुंदर केशों वाला,
स्वर्ण-पट्ट-सा शुद्ध और विशाल ललाट वाला।
शुद्ध और चमकीली कांति वाला,
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

पालि:

गच्छति नीलपथे विय चन्दो, तारगणा-परिवेठित-रूपो।
सावक-मज्झगतो समणिन्दो, एस हि तुय्ह पिता नरसीहो॥

हिंदी:

वह नीले आकाश में चंद्रमा की तरह चलता है,
तारों से घिरा हुआ उसका रूप है।
श्रमणों (संन्यासियों) के बीच श्रेष्ठ,
वह नरों में सिंह, तेरा पिता है।

तथागत बुद्ध से ज्ञान पाने या ज्ञान का मुकाबला करने की नियत से ब्राह्मण विद्वान तथागत बुद्ध के पास आते रहते थे। ऐसे ही एक...
10/07/2025

तथागत बुद्ध से ज्ञान पाने या ज्ञान का मुकाबला करने की नियत से ब्राह्मण विद्वान तथागत बुद्ध के पास आते रहते थे। ऐसे ही एक ब्राह्मण/पंडित ने तथागत बुद्ध से पूछा कि "धम्म" क्या है और इसका उद्देश्य क्या है...?

तथागत बुद्ध ने उत्तर दिया:-

" धम्म का अर्थ अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

धम्म का उद्देश्य मनुष्य के जन्म के बाद मृत्यु तक कैसे जीना है, इसका मार्गदर्शन करना है। जीवन के सूत्रों को समझना और उनके उपयोग से दुःख निवारण करने का मार्ग है धम्म।

प्रकृति की पूजा करना धम्म नहीं है। धम्म जिज्ञासाओं को काल्पनिक धार्मिक कहानियों द्वारा मानना नहीं है। धम्म जानने और खोजने का नाम है। धम्म सत्य की अनुभूति अथवा अभिव्यक्ति है।

धम्म का आधार मनुष्य है, आस्था व अंधभक्ति नहीं। धम्म जानने के बाद मानने में है, आस्था में नहीं। धम्म अपना सहारा स्वयं बनने में है। किसी देवदृष्टी यां देवकृपा के इन्तज़ार में बैठे रहना धम्म नहीं है।

धम्म मानव निर्मित दुःखों का समाधान है। दुःख दो प्रकार के होते हैं, एक प्राकृतिक और दूसरा मानव निर्मित। प्राकृतिक दुःख का हल तो आपके तथाकथित ईश्वर के पास भी नहीं। वह भी इसे रोकने में अस्मर्थ है तो फिर ईश्वर भक्ति क्यों...? धम्म मानव निर्मित दु:खों का समाधान है। इसका अर्थ यह हुआ कि दुःखों के सबसे बड़े हिस्से का निर्माता मानव ख़ुद है जैसे सामाजिक, समता, गुलामी, रोग, मैत्री का अभाव, आदि।

धम्म समता, स्वतंत्रता, करूणा, न्याय, मैत्री का भाव जगाता है। धम्म का प्रथम सूत्र है: हर चीज़ से बड़ा है न्याय, तथाकथित ईश्वर से भी बड़ा।

न्याय विवस्था ही धम्म है। क्या कोई भी मनुष्य गुलामी, शोषण और अन्याय के बदले ईश्वर लेना चाहेगा..???

जन्म से मृत्यु के बीच सभी जीवों का जीवन सुखमय बनाना ही धम्म का अन्तिम लक्ष्य है..."

डा अमृतपाल कौर.... 🌷💝✍️💖🌷

भिक्षुक जगदीश काश्यप:  बौद्ध धम्म उत्थान के अग्रदूत“मैं नालंदा की राख से ज्ञान की चिनगारी ढूंढ लाया हूँ,अब यह भारत फिर स...
03/05/2025

भिक्षुक जगदीश काश्यप: बौद्ध धम्म उत्थान के अग्रदूत

“मैं नालंदा की राख से ज्ञान की चिनगारी ढूंढ लाया हूँ,
अब यह भारत फिर से बुद्ध की करुणा में जागेगा।”
भिक्षुक जगदीश काश्यप

जब कोई व्यक्ति स्वयं को किसी आदर्श के लिए पूर्णतः समर्पित कर देता है, तब वह व्यक्ति नहीं रहता बल्कि वो एक प्रेरणा, एक आंदोलन और एक परंपरा बन जाता है।
भिक्षुक जगदीश काश्यप ऐसे ही एक महापुरुष जिन्होंने न किसी राजनीतिक मंच पर भाषण दिए, न आंदोलन की मशाल लेकर निकले लेकिन उनकी निःशब्द तपस्या और गहन साधना ने भारत में बौद्ध धम्म को पुनः चेतन कर दिया। “बुद्धं शरणं गच्छामि” जब इस प्राचीन उद्घोष के पीछे अपनी संपूर्ण चेतना समर्पित करने वाले भिक्षुक जगदीश काश्यप है। 2 मार्च 1908 को बिहार के गया ज़िले में भिक्षुक जगदीश काश्यप का जन्म हुआ,उनका मन बचपन से ही आध्यात्मिक खोज में लगा रहा। काश्यप जी का बचपन बिहार की उस भूमि पर बीता जहाँ हर कण में बुद्ध के पदचिन्ह समाए हुए हैं। लेकिन उस भूमि पर जब उन्होंने अज्ञान, छुआछूत और अंधविश्वास को पनपते देखा, तो उनका हृदय भीतर तक विदीर्ण हो गया।
एक दिन उन्होंने अपने पिता से पूछा –
"यदि ईश्वर ने सबको बनाया है, तो एक मनुष्य दूसरे को अछूत क्यों कहता है?"

यह प्रश्न ही उनका पहला बौद्धिक विद्रोह रहा क्योंकि युवा अवस्था में ही वे उस परंपरागत धार्मिक ढांचे से असंतुष्ट हो गए, जो कर्मकांडों और जातिवाद में उलझा दिखाई पड़ता इसी असंतोष ने उन्हें बौद्ध धम्म की ओर प्रेरित किया, जो उन्हें तर्क, करुणा और समता की भावना से भरपूर प्रतीत हुआ। युवा अवस्था में ही उन्होंने संस्कृत और पालि भाषा में गहरी रुचि दिखाई। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान वे दर्शनशास्त्र, बौद्ध ग्रंथ और एशियाई परंपराओं की ओर आकृष्ट हुए।1933 में उन्होंने श्रीलंका की यात्रा की और थेरवाद परंपरा में दीक्षित हुए। बौद्ध संस्कार के अनुसार उनका नाम भिक्षुक जगदीश काश्यप का नाम दिया गया। यह समय केवल धम्म दीक्षा का नहीं, बल्कि बौद्ध दर्शन, पालि भाषा और विनय पिटक के गंभीर अध्ययन का इस दौरान किया। उन्होंने अपने जीवन के उद्देश्य को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया:
"भारत, जहाँ से बुद्धत्व का प्रकाश निकला, वहाँ आज अंधकार है। मेरा कार्य है उस दीप को पुनः प्रज्वलित करना।"

श्रीलंका से लौटे तो उनके पास कोई सम्पत्ति नहीं थी,
सिर्फ एक भिक्षु की चिवर, एक कटोरा, और त्रिपिटक का ज्ञान लिए पुनः भारत लौट आए। उन्होंने नालंदा महाविहार की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसे बौद्ध अध्ययन का प्रमुख केन्द्र बनाया। 1940 के दशक में उन्होंने पालि त्रिपिटक के अनुवाद की योजना बनाई। यह कार्य उन्होंने स्वयं अकेले प्रारंभ किया, जब बौद्ध अध्ययन के लिए संसाधन और सहयोग दोनों अत्यल्प थे। उन्होंने बनारस, राजगीर, पटना और गया में पालि और बौद्ध दर्शन का प्रचार शुरू किया। कभी अपने हाथों से पाठ्यक्रम टाइप करते, कभी विद्यार्थियों को गुफाओं में बैठकर पढ़ाते। उन्होंने यात्राएं कीं, लोगों को सिखाया कि बुद्ध कौन थे,उनका धम्म क्या है, और जीवन को कैसे बदला जा सकता है। 1951 में भिक्षुक काश्यप ने एक अभूतपूर्व प्रयास की शुरुआत की – पालि त्रिपिटक का शुद्ध, प्रामाणिक और सटीक हिंदी अनुवाद। इस कार्य ने उन्हें केवल भारत में ही नहीं, श्रीलंका, थाईलैंड, बर्मा (म्यांमार) और पश्चिमी अकादमिक जगत में भी पहचान दिलाई। यह कार्य 20वीं सदी में भारतीय बौद्ध अध्ययन के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। उनका मानना था कि:
"जब तक त्रिपिटक अपनी जनभाषा में नहीं आएँगे, बुद्ध के विचार जनता तक नहीं पहुँच सकते।"

उन्होंने तीनों पिटकों – विनय, सुत्त और अभिधम्म – का एक क्रमबद्ध और सुसंगत हिंदी संस्करण तैयार किया। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के बाद ऐतिहासिक दिन 14 अक्टूबर 1956, नागपुर बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ग्रहण की। भिक्षुक काश्यप इस ऐतिहासिक परिवर्तन के सहयात्री, अभिन्न साक्षी और सहभागी रहे। तब बाबासाहेब एवं उनके लाखों अनुयायियों के सामने प्रश्न था –अब हम सीखें कैसे?
धम्म का अभ्यास करें कैसे?
भिक्षुक काश्यप ने चुपचाप उत्तर दिया –
"मैं सिखाऊँगा।"

उन्होंने धम्म दीक्षा के बाद के बौद्धों को पालि भाषा, त्रिपिटक की मूल अवधारणाओं और धम्म अनुशासन की शिक्षा दी। यह भारतीय समाज में समता, करुणा और बौद्धिक चेतना की नई लहर थी। नालंदा जिसे कभी खंडहरों में तब्दील कर दिया गया था, भिक्षुक काश्यप जी ने उसे पुनः ज्ञान की भूमि बनाया। 1961 में, बिहार सरकार द्वारा पुनः स्थापित नालंदा महाविहार में वे पहले प्रमुख बने। तब उन्होंने अपने अभिभाषण में कहा –
"यह केवल ईंटों का ढांचा नहीं, यह धम्म की ऊर्जा का स्रोत बनेगा।" यह उनके जीवन का सर्वोच्च संस्थागत कार्य रहा, उन्होंने इसे केवल विश्वविद्यालय नहीं, बल्कि 'बौद्ध धम्म के भारतीय केंद्र' के रूप में विकसित किया। यहाँ से उन्होंने बौद्ध दर्शन, पालि भाषा और संस्कृति पर शोध, प्रशिक्षण और अंतरराष्ट्रीय संवाद की परंपरा शुरू की।

28 जनवरी 1976 पटना की एक साधारण कुटी में, एक शांत भिक्षु ने आखिरी बार सांस ली। ना अखबारों की सुर्खियाँ, ना सरकारी घोषणाएँ, ना स्मारक। लेकिन उनकी मृत्यु नहीं हुई ,धम्म की चेतना में वे समाहित हो गए।क्षभिक्षुक जगदीश काश्यप का जीवन भारत के उस आत्म-तत्व की याद दिलाता है,जो आत्मप्रकाश से न केवल स्वयं प्रकाशित होता है, बल्कि दूसरों को भी आलोकित करता है। उनका जीवन एक प्रश्न है
"क्या हम अपने भीतर बुद्ध को पुनः खोज सकते हैं?"

✍️✍️✍️✍️
पवन बौद्ध

घर-घर अलख जगाएंगे..बौद्ध धम्म अपनाएंगे...
02/05/2025

घर-घर अलख जगाएंगे..
बौद्ध धम्म अपनाएंगे...

तथागत बुद्ध ने अपने शिष्यों/भिक्खुओं को समझाया था कि धम्म सदाचार व नैतिकता का मार्ग है अथवा समाजिक संबंधों का साधन है। य...
21/01/2025

तथागत बुद्ध ने अपने शिष्यों/भिक्खुओं को समझाया था कि धम्म सदाचार व नैतिकता का मार्ग है अथवा समाजिक संबंधों का साधन है। यह वह नाव है जो भवसागर पार करने के लिए है न कि पीठ पर ढोने के लिए जैसे मनुष्य किश्ती को ढ़ोता हुआ उसके ही भार के नीचे दब जाए। धम्म/धर्म मनुष्य (समाज) के लिए है न कि मनुष्य (समाज) धम्म/धर्म के लिए।

आज की स्थिति यह है कि धर्म साधारण जनों के लिए नहीं रहा बल्कि पाखंड, कर्मकांड, प्रदर्शन और दान-दक्षिणा के साथ शोरगुल करने वालों का उपकरण बन गया है। धर्म के नाम पर लिखे गए ग्रंथ इतने पवित्र बना दिए गए हैं कि उन्हें पढ़ने की बजाय देवी-देवताओं की तरह पूजा-पाठ की वस्तु बना लिया है।

तथागत बुद्ध ने धम्म के लिए किसी अदृश्य सत्ता/ईश्वर का सहारा नहीं लिया, बल्कि अपना पथ-प्रदर्शक आप बनने के लिए कहा। हमें हमेशा स्मरण रखना चाहिए कि एक सच्चा गुरू इतना सक्षम होता है कि वह कभी अपने शिष्य को अपनी रक्षा के लिए नहीं पुकारेगा। जो लोग गुरु के चोले में सुरक्षाकर्मी लिए घूमते हैं क्या वह वास्तव में गुरु हैं?

तथागत बुद्ध को जब ज्ञात हुआ कि उनका एक भिक्खु जनसाधारण से केवल इसलिए उलझ पड़ा कि उन्होंने तथागत के ख़िलाफ़ अपमानजनक शब्द प्रयोग किए थे तो तथागत ने उसे समझाया:-

" तुममें और उसमें क्या अंतर हुआ, न तो वह ही तथागत को जानता-समझता है और न तुम ही साथ रहते हुए समझने का प्रत्यन करते हो। मैंने कभी भी अपने किसी शिष्य को आज्ञा नहीं दी कि वह मेरे गुणों व अवगुणों को लेकर किसी से उलझे, झगड़े यां हाथापाई करे अथवा मेरा पक्ष ले .... "

धर्म की अहमीयत को समझने के लिए बाबा साहिब की विचारधारा को अपनाना हमारे समाज के लिए अनिवार्य है। इस निष्फल आध्यात्मिकता का विकल्प अम्बेडकरवाद ही है।

डॉ अमृतपाल कौर.... 🌷🌼🌷

13/12/2024
इस मूर्ति को ध्यान से देखिये जो पटना म्यूजिम में है,,. माथे पर बुद्ध बने है,, ललाट पर तीसरी आंख है,,हाथ में बुद्ध का कमल...
11/12/2024

इस मूर्ति को ध्यान से देखिये जो पटना म्यूजिम में है,,. माथे पर बुद्ध बने है,, ललाट पर तीसरी आंख है,,
हाथ में बुद्ध का कमल है,
बांह पर नाग है नागवंशियो का प्रतीक,,
हथेली पर कमल बना है,
यह कमल पर खड़े है,,
आधार पर मौर्य वंशियों के दो शेर बने हैं,,
लेकिन ये अवलोकितेश्वर बुद्ध है जिन्हें बाद में ढोंगियों ने शंकर प्रचारित किया है,, ये बौद्ध धरोहर है,, पहचान लीजिये,,

Address

VPO Ramsara
Fazilka
152116

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Dhamma Bhoomi Ramsara Fazilka - Punjab posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to Dhamma Bhoomi Ramsara Fazilka - Punjab:

Share