15/02/2026
विश्व के सभी धर्मों के पास अपना-अपना धार्मिक साहित्य मौजूद है जिसके आधार पर प्रत्येक धर्म के तत्वज्ञान का परिचय मिलता है। बौद्धधम्म के खज़ाने में भी देश-विदेश से अपना एक विशाल मात्रा में साहित्य मौजूद है परन्तु विश्व भर के अन्य धर्मों के साहित्य की तुलना में बौद्ध साहित्य में बहुत बड़ा अंतर देखने को मिलता है। जहां अन्य धर्मों के ग्रंथों का एक भी शब्द इधर से उधर करने की अनुमति नहीं है वहीं पर बौद्धधम्म का साहित्य आलोचन के कटहरे में बरसों से खड़ा किया जाता रहा है।
इसका महत्वपूर्ण कारण यह है कि विश्व के अन्य धर्मों के ग्रंथ ईश्वर द्वारा रचित समझ कर पूजे जाते हैं परन्तु न तो बुद्ध ने स्वयं को एक गैर-दुनियावी पुरुष घोषित किया और न ही उनका कहा गया हर शब्द पत्थर की लकीर घोषित किया जाता है। यही कारण है कि बौद्ध साहित्य को कई परीक्षणों से गुज़रना पड़ता रहा है जिस वजह से बौद्ध साहित्य में समय-समय पर वृद्धि होती रही है।
बौद्ध धम्म का प्रहार तर्कहीन सिद्धांतों पर सबसे तीखा रहा है जिसका एक उदाहरण बौद्ध धम्म का मृत्यु के सिद्धांत के प्रति दृष्टिकोण है जो कि कर्मकांड के गोरखधंधे के विपरीत बिल्कुल पारदर्शी और सरल है।
बौद्ध यह कहते हुए ज़रा भी संकोच नहीं करते कि सारिपुत्र आदि प्रमुख श्रावक ही मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए, बल्कि स्वयं बुद्ध भी मृत्युरूपी सत्य द्वारा कुचल दिए गए। इस दृष्टिकोण पर बेहतरीन उदाहरण बाहरवीं शताब्दी के कल्याणी नामक भिक्षु का दिया जा सकता है जिन्होंने पालि में रचित अपनी कृति " तेलकटाहगाथा " में गाथा नं २० और २१ में बहुत स्पष्ट तौर पर मृत्यु की अनिवार्यता पर लिखा है :-
" जो सदा शुद्ध, मलरहित, श्रेष्ठा को प्राप्त सारिपुत्र प्रमुख मुनि तथा श्रावक थे, वे भी मृत्यु रूपी बड़वाग्नि के मुख में डूब गए और उसी तरह नष्ट हो गए जैसे वायु के झोंको से दीपक विनाश को प्राप्त हो जाते हैं।
खिले हुए कमल की भांति निर्मल, सुन्दर नेत्रवाले, बत्तीस लक्षणों से सुशोभित रूप शोभा वाले तथा समस्त आश्रवों का क्षय करने वाले, लोक के नाथ बुद्ध भी मृत्युरूपी मस्त महाहाथी द्वारा कुचल डाले गए..."
अन्य धर्मों में मृत्यु का सिद्धांत कर्मकांडी अथवा स्वर्ग-नर्क के लालच की विचारधार पर टिका है जो धर्म की दुकान चलाने का एक बीजमंत्र है परन्तु बौद्ध धम्म में मृत्यु का सिद्धांत निरंतर परिवर्तनशीलता और परस्पर निर्भरता पर खड़ा है।
बौद्ध धम्म में वैचारिक उड़ान कितनी ऊँची तथा गहरी है, इसका अनुमान इसमें निहित नैतिक विशेषताओं अथवा दुनिया भर में मौजूद बेहिसाब बौद्ध साहित्य से लगाया जा सकता है जो विश्व के अन्य किसी धर्म के संदर्भ में नज़र नही पड़ता...!!!
डा. अमृतपाल कौर.... 🌷🌈🌅💘🌷