22/04/2026
हनुमान जी द्वारा अशोक वाटिका में माता सीता के दर्शन का यह दृश्य सुंदरकांड का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंश है। विभीषण जी से माता सीता का पता जानने के बाद, हनुमान जी ने मसक समान रूप (मच्छर के समान छोटा रूप) धारण किया ताकि वे बिना किसी की नज़र में आए माता सीता को देख सकें।
उन्होंने बहुत ही छोटा रूप बनाया और अशोक के वृक्ष के पत्तों के बीच छिप गए ताकि रावण या राक्षसियां उन्हें देख न सकें।
माता सीता अशोक वृक्ष के नीचे बैठी थीं। वे बहुत दुखी (दीन) थीं और उनकी दृष्टि अपने चरणों की ओर थी, जबकि उनका मन भगवान श्री राम के ध्यान में लीन था।
माता सीता की विरह वेदना और उनकी दयनीय स्थिति देखकर हनुमान जी मन ही मन दुखी हुए और उन्हें प्रणाम किया।
वृक्ष की शाखाओं के बीच से हनुमान जी बड़ी व्याकुलता से यह विचार कर रहे थे कि वे माता का दुख कैसे दूर करें।
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारि तब।
जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ।।
हनुमान जी ने हृदय में विचार करके (श्री राम जी की दी हुई) अंगूठी नीचे गिरा दी। माता सीता ने उसे हर्षित होकर हाथ में उठा लिया, लेकिन वे यह सोचकर चकित हो गईं कि यह अंगूठी यहाँ कैसे आई। माता सीता ने जब अंगूठी पर भगवान श्री राम का नाम अंकित देखा, तो उन्हें विश्वास हो गया कि यह प्रभु की ही अंगूठी है।
इसके बाद हनुमान जी ने मधुर स्वर में भगवान राम के गुणों का गान शुरू किया। यह सुनकर माता सीता का दुख कुछ कम हुआ और उन्होंने हनुमान जी को सामने आने के लिए कहा। हनुमान जी वृक्ष से नीचे आए और अपना परिचय श्री राम के दूत के रूप में दिया। पहले तो सीता जी को संदेह हुआ,
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥
लेकिन हनुमान जी के विनम्र स्वभाव और राम जी के गुणों के वर्णन ने उनका विश्वास जीत लिया।