Akshay Kalash

Akshay Kalash Charitable Trust for a Social Cause

13/03/2025

होली और होलिका दहन की कथा, इतिहास और मुहूर्त

प्राचीन पर्वों की यही सुंदरता है कि इनके पीछे छुपे पौराणिक राज हमें आकर्षित करते हैं। आइए जानें होलिका दहन का अभिप्राय और इतिहास....

होलिका दहन का पर्व संदेश देता है कि ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।

होलिका दहन, होली त्योहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।

भारत में मनाए जाने वाले सबसे शानदार त्योहारों में से एक है होली। दीवाली की तरह ही इस त्योहार को भी अच्छाई की बुराई पर जीत का त्योहार माना जाता है। हिंदुओं के लिए होली का पौराणिक महत्व भी है। इस त्योहार को लेकर सबसे प्रचलित है प्रहलाद, होलिका और हिरण्यकश्यप की कहानी। लेकिन होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है।

वैष्णव परंपरा मे होली को, होलिका-प्रहलाद की कहानी का प्रतीकात्मक सूत्र मानते हैं।

होलिका दहन का शास्त्रों के अनुसार नियम

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए -

1. पहला, उस दिन 'भद्रा' न हो। भद्रा का दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।

2. दूसरी बात, पूर्णिमा

प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए। सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।

होलिका दहन की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा कि उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुंचा सकती। किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत, होलिका जलकर भस्म हो गई और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है।
होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।
होली की केवल यही नहीं बल्कि और भी कई कहानियां प्रचलित है।

कामदेव को किया था भस्म

होली की एक कहानी कामदेव की भी है। पार्वती शिव से विवाह करना चाहती थीं लेकिन तपस्या में लीन शिव का ध्यान उनकी तरफ गया ही नहीं। ऐसे में प्यार के देवता कामदेव आगे आए और उन्होंने शिव पर पुष्प बाण चला दिया। तपस्या भंग होने से शिव को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोल दी और उनके क्रोध की अग्नि में कामदेव भस्म हो गए। कामदेव के भस्म हो जाने पर उनकी पत्नी रति रोने लगीं और शिव से कामदेव को जीवित करने की गुहार लगाई। अगले दिन तक शिव का क्रोध शांत हो चुका था, उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया। कामदेव के भस्म होने के दिन होलिका जलाई जाती है और उनके जीवित होने की खुशी में रंगों का त्योहार मनाया जाता है।

महाभारत की कहानी

महाभारत की एक कहानी के मुताबिक युधिष्ठर को श्री कृष्ण ने बताया- एक बार श्री राम के एक पूर्वज रघु, के शासन मे एक असुर महिला थी। उसे कोई भी नहीं मार सकता था, क्योंकि वह एक वरदान द्वारा संरक्षित थी। उसे गली में खेल रहे बच्चों, के अलावा किसी से भी डर नहीं था। एक दिन, गुरु वशिष्ठ, ने बताया कि- उसे मारा जा सकता है, यदि बच्चे अपने हाथों में लकड़ी के छोटे टुकड़े लेकर, शहर के बाहरी इलाके के पास चले जाएं और सूखी घास के साथ-साथ उनका ढेर लगाकर जला दें। फिर उसके चारों ओर परिक्रमा दें, नृत्य करें, ताली बजाएं, गाना गाएं और नगाड़े बजाएं। फिर ऐसा ही किया गया। इस दिन को,एक उत्सव के रूप में मनाया गया, जो बुराई पर एक मासूम दिल की जीत का प्रतीक है।

श्रीकृष्ण और पूतना की कहानी

होली का श्रीकृष्ण से गहरा रिश्ता है। जहां इस त्योहार को राधा-कृष्ण के प्रेम के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। वहीं,पौराणिक कथा के अनुसार जब कंस को श्रीकृष्ण के गोकुल में होने का पता चला तो उसने पूतना नामक राक्षसी को गोकुल में जन्म लेने वाले हर बच्चे को मारने के लिए भेजा। पूतना स्तनपान के बहाने शिशुओं को विषपान कराना था। लेकिन कृष्ण उसकी सच्चाई को समझ गए। उन्होंने दुग्धपान करते समय ही पूतना का वध कर दिया। कहा जाता है कि तभी से होली पर्व मनाने की मान्यता शुरू हुई।

होलिका दहन का इतिहास
विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है। कुछ लोग मानते हैं कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी ख़ुशी में गोपियों ने उनके साथ होली खेली थी।

हर रंग का अपना महत्व होता है

होली आई बहार लाई, संग रंगों की बौछार लाई
लाल गुलाबी हरा नीला, और सब है यहां पीला-पीला

होली को अगर हम अंग्रेजी के सापेक्ष में देखें तो इसका मतलब होता है पवित्रता।

यह पवित्रता है इस प्रकृति की, पवित्रता इस धरती की, हमारी पौराणिक संस्कृति की और सबसे खास होली के ढेर सारे रंगों की, जो बसंत के इस अनूठे वातावरण में अपनी छटा से सबको मोह लेते हैं और अपने साथ रंगने पर मजबूर कर देते हैं।
रंग रंगीले होते हैं, छबीलें होते हैं, न्यारे होते हैं तो प्यारे भी होते हैं। रंगों में त्याग का भाव होता है। रंग इस प्रकृति के कण-कण में अलग-अलग रूप में बसे हैं। ये रंग होली पर पिचकारियों में नजर आते हैं, घर की रंगोली में नजर आते हैं तो कई बीमारियों के इलाज में भी नजर आते हैं। हर रंग हमसे कुछ कहता है, हर रंग की अपनी एक खासियत है।

लाल रंग-
लाल रंग को सबसे चमकीला रंग माना जाता है। शरीर में रक्त का रंग लाल है, दक्षिण दिशा का रंग लाल है, मंगल ग्रह का रंग लाल है, उगते सूरज का रंग भी लाल है। मानवीय चेतना में अधिकतम कंपन भी लाल रंग ही पैदा करता है। लाल रंग ऊर्जा, उत्साह, साहस, महत्वाकांक्षा, क्रोध, उत्तेजना और पराक्रम, यानि जीत का प्रतीक है। प्रेम का रंग भी लाल है। धार्मिक दृष्टि से भी लाल रंग का बहुत महत्व है। देवी मां की साधना करने के लिए, मंदिर में, रामायण का पाठ करने में लाल रंग की जरूरत पड़ती है। साथ ही हनुमान जी का चोला भी लाल रंग का ही होता है। यह रंग रक्त व हृदय संबंधी समस्याओं, मानसिक क्षीणता को दूर करने में तथा आत्मविश्वास बढ़ाने में सहायता करता है।

गुलाबी रंग-
यह रंग सुंदरता का प्रतीक है। जीवित प्राणियों को प्रभावित करने में गुलाबी रंग का बहुत ही महत्व है, खासकर की यह महिलाओं का पसंदीदा माना जाता है। कई त्याहारों पर पैरों में महावर के रूप में गुलाबी रंग ही लगाया जाता है। सौंदर्य वृद्धि के साथ यह रंग आंतरिक शक्ति और पवित्रता का भी प्रतीक है। गुलाबी रंग को बढ़ोतरी का रंग भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि गुलाबी प्रकाश में पौधे अच्छी तरह उगते हैं व पक्षियों की प्रजनन क्षमता में वृद्धि होती है। ज्वर, छोटी चेचक जैसी बीमारियों में भी गुलाबी रंग के प्रकाश से लाभ होते देखा गया है। प्रसिद्ध जीव शास्त्री विक्टर इन्यूशियन ने मालक्युलर बायोलाजी के नये प्रयोगों के दौरान यह सिद्ध किया है कि गुलाबी रोशनी के जैविक क्रियाकलाप उसकी आत्मिक प्रकृति के साथ संबंध रखते हैं।

हरा रंग-
यह प्रकृति को हर लेने वाला अर्थात् सम्मोहित करने वाला रंग है। पहाड़ों पर वनस्पतियों का रंग हरा है तो जंगलों में पेड़ों का, खेतों में सब्जियों का रंग हरा है तो मैदानों में घास का। सौभाग्य और समृद्धि का यह रंग आत्मविश्वास, प्रसन्नता, ताजगी, हरियाली, सकारात्मकता, गौरव तथा शीतलता का प्रतीक है। यह मोह का रंग है, जब भी कहीं पहाड़ों, खेतों या प्रकृति की हरियाली को देखते हैं तो मन खुश हो जाता है। यह रंग उदास लोगों के चेहरे पर मुस्कान ले आता है। हरा रंग कार्यक्षमता को बढ़ाने में भी मददगार है। ऐसे ही एक बार हवाईजहाज बनाने वाले कारखाने में घास के हरे रंग का प्रयोग किया गया और उस पर कृत्रिम तरीके से सूर्य का प्रकाश डाला गया, जिससे मजदूरों की कार्य क्षमता में व्यापक वृद्धि देखने को मिली। यह रंग तनाव दूर करने में, लिवर, आंत व नाड़ी संबंधी रोगों में तथा रक्त शोधन के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

नीला-
नीला रंग अनंतता का रंग है। इस संसार में जो भी चीज बेहद विशाल और समझ से परे है, उसका रंग आमतौर पर नीला ही है। चाहे फिर वह आकाश हो या गहरा समुद्र। संक्षेप में कहें तो नीला रंग विशालता का प्रतीक है। हमारे शरीर में उपस्थित 90 प्रतिशत जल के रूप में भी नीला रंग है। यहां तक कि श्री कृष्ण के शरीर का रंग भी नीला कहा गया है। धार्मिक और ज्योतिष की दृष्टि से भी इस रंग का काफी महत्व है। नीला रंग प्रेम, कोमलता, विश्वास, स्नेह, वीरता, पौरुषता को दर्शाने वाला रंग है। यह रक्तचाप, सांस संबंधी समस्याओं व आंखों के लिए काफी फायदेमंद होता है।

सफेद-
संस्कृत में सफेद, यानी श्वेत। यह रंग अपने आप में पूर्णता लिये हुए है। इसका कोई अपना रंग नहीं है, लेकिन फिर भी यह दूसरे रंगों को रंग देता है। सफेद रंग अपने अंदर सारे रंगों का समावेश लिये हुए स्वयं में पूर्ण है। यह रंग शांति और शुद्धता का प्रतीक है। यह अशांत को शांत करने का रंग है, विद्या प्राप्ति में सहायक है और जीवन में सकारात्मकता का संचार करने का प्रतीक है। यह हमारे मन और मस्तिष्क को शुद्ध करता है। यह रंग हमें त्याग सीखाता है। इसलिए आध्यात्मिकता का रंग भी सफेद है। यह शांत है, इसलिए सबसे बेहतर है। कहते हैं एक बार यदि आपने सफेद को अपना लिया तो अन्य रंगों से आप स्वतः ही दूर हो जायेंगे। क्योंकि यह अकेला ही आपको रंगों से परिपूर्ण कर देगा।

काला रंग-
जैसे सफेद रंग में त्यागने का भाव है, वैसे ही काले रंग में सबको अपने अंदर समाने का भाव है। सफेद की तरह यह कुछ भी परावर्तित नहीं करता बल्कि सब कुछ सोख लेता है। काले रंग में ग्रहण करने की क्षमता होती है। इसलिए किसी चीज का आत्मसात करने के लिए काला रंग सबसे उपयुक्त है और शिव इसका अच्छा उदाहरण हैं। शिव में खुद को बचाए रखने की भावना नहीं है, वह हर चीज को ग्रहण कर लेते हैं, किसी भी चीज का विरोध नहीं करते। यहां तक कि उन्होंने विष को भी सहजता से पी लिया।

पीला-
यह रंग खुशियों का, प्रेम का, ऊर्जा का और शुभ का सूचक है। भारतीयों ने इस रंग की महत्ता को बहुत पहले ही जान लिया था। इसीलिए हम लंबे समय से शादी-ब्याह तथा अन्य शुभ कामों में पीले रंग का उपयोग होते देख रहे हैं। यह हमारे शरीर की गर्मी का संतुलन बनाए रखने में सहायता करता है। यह रंग आरोग्य, शांति, सुकून, योग्यता, ऐश्वर्य तथा यश को दर्शाता है। यह बौद्धिक विकास को दर्शाता है। मंदबुद्धि बच्चों के अध्ययन कक्ष के लिए पीला रंग बहुत अच्छा होता है, यह डिप्रेशन दूर करने में कारगर है। पेट व आंत के तनाव को दूर करने, पित्त व पाचन संबंधी समस्याओं को ठीक करने, आंख की पुतली के भीतर की झिल्ली को दुरुस्त रखने और विटामिन-बी को बढ़ाने में तथा अत्यधिक मोटे व कफ प्रकृति के व्यक्ति के लिए यह रंग फायदेमंद होता है।

🙏🙏होली की हार्दिक शुभकामनाएं

13/03/2025

🙏🙏 सूर्य संवेदना पुष्पे, दीप्ति कारुण्यगंधेन।
लब्ध्वा शुभं होलिकापर्वेऽस्मिन कुर्यात्सर्वस्य मंगलम्।।

जिस तरह सूर्य प्रकाश देता है, संवेदना करुणा को जन्म देती हैं, पुष्प सदैव महकता है, उसी तरह यह होली का पर्व आप के लिए हर दिन, हर पल के लिए मंगलमय हो।

आप सभी का जीवन मंगलमय् हो आनन्दमय् हो, सुखमय्, शांतिमय् हो,

इन्हीं मंगल कामनाओं के साथ होली की हार्दिक शुभकामनाएं.. 💐💐💐

10/03/2025

कौन सी धातु के बर्तन में भोजन करने से क्या क्या लाभ और हानि होती है।

सोना

सोना एक गर्म धातु है। सोने से बने पात्र में भोजन बनाने और करने से शरीर के आन्तरिक और बाहरी दोनों हिस्से कठोर, बलवान, ताकतवर और मजबूत बनते है और साथ साथ सोना आँखों की रौशनी बढ़ता है।

चाँदी

चाँदी एक ठंडी धातु है, जो शरीर को आंतरिक ठंडक पहुंचाती है। शरीर को शांत रखती है इसके पात्र में भोजन बनाने और करने से दिमाग तेज होता है, आँखों स्वस्थ रहती है, आँखों की रौशनी बढती है और इसके अलावा पित्तदोष, कफ और वायुदोष को नियंत्रित रहता है।

कांसा

काँसे के बर्तन में खाना खाने से बुद्धि तेज होती है, रक्त में शुद्धता आती है, रक्तपित शांत रहता है और भूख बढ़ाती है। लेकिन काँसे के बर्तन में खट्टी चीजे नहीं परोसनी चाहिए खट्टी चीजे इस धातु से क्रिया करके विषैली हो जाती है जो नुकसान देती है। कांसे के बर्तन में खाना बनाने से केवल ३ प्रतिशत ही पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

तांबा

तांबे के बर्तन में रखा पानी पीने से व्यक्ति रोग मुक्त बनता है, रक्त शुद्ध होता है, स्मरण-शक्ति अच्छी होती है, लीवर संबंधी समस्या दूर होती है, तांबे का पानी शरीर के विषैले तत्वों को खत्म कर देता है इसलिए इस पात्र में रखा पानी स्वास्थ्य के लिए उत्तम होता है. तांबे के बर्तन में दूध नहीं पीना चाहिए इससे शरीर को नुकसान होता है।

पीतल

पीतल के बर्तन में भोजन पकाने और करने से कृमि रोग, कफ और वायुदोष की बीमारी नहीं होती। पीतल के बर्तन में खाना बनाने से केवल ७ प्रतिशत पोषक तत्व नष्ट होते हैं।

लोहा

लोहे के बर्तन में बने भोजन खाने से शरीर की शक्ति बढती है, लोह्तत्व शरीर में जरूरी पोषक तत्वों को बढ़ता है। लोहा कई रोग को खत्म करता है, पांडू रोग मिटाता है, शरीर में सूजन और पीलापन नहीं आने देता, कामला रोग को खत्म करता है, और पीलिया रोग को दूर रखता है. लेकिन लोहे के बर्तन में खाना नहीं खाना चाहिए क्योंकि इसमें खाना खाने से बुद्धि कम होती है और दिमाग का नाश होता है। लोहे के पात्र में दूध पीना अच्छा होता है।

स्टील

स्टील के बर्तन नुक्सान दायक नहीं होते क्योंकि ये ना ही गर्म से क्रिया करते है और ना ही अम्ल से. इसलिए नुक्सान नहीं होता है. इसमें खाना बनाने और खाने से शरीर को कोई फायदा नहीं पहुँचता तो नुक्सान भी नहीं पहुँचता।

एलुमिनियम

एल्युमिनिय बोक्साईट का बना होता है। इसमें बने खाने से शरीर को सिर्फ नुक्सान होता है। यह आयरन और कैल्शियम को सोखता है इसलिए इससे बने पात्र का उपयोग नहीं करना चाहिए। इससे हड्डियां कमजोर होती है. मानसिक बीमारियाँ होती है, लीवर और नर्वस सिस्टम को क्षति पहुंचती है। उसके साथ साथ किडनी फेल होना, टी बी, अस्थमा, दमा, बात रोग, शुगर जैसी गंभीर बीमारियाँ होती है। एलुमिनियम के प्रेशर कूकर से खाना बनाने से 87 प्रतिशत पोषक तत्व खत्म हो जाते हैं।

मिट्टी

मिट्टी के बर्तनों में खाना पकाने से ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो हर बीमारी को शरीर से दूर रखते थे। इस बात को अब आधुनिक विज्ञान भी साबित कर चुका है कि मिट्टी के बर्तनों में खाना बनाने से शरीर के कई तरह के रोग ठीक होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार, अगर भोजन को पौष्टिक और स्वादिष्ट बनाना है तो उसे धीरे-धीरे ही पकना चाहिए। भले ही मिट्टी के बर्तनों में खाना बनने में वक़्त थोड़ा ज्यादा लगता है, लेकिन इससे सेहत को पूरा लाभ मिलता है। दूध और दूध से बने उत्पादों के लिए सबसे उपयुक्त हैमिट्टी के बर्तन। मिट्टी के बर्तन में खाना बनाने से पूरे १०० प्रतिशत पोषक तत्व मिलते हैं। और यदि मिट्टी के बर्तन में खाना खाया जाए तो उसका अलग से स्वाद भी आता है।

पानी पीने के पात्र के विषय में 'भावप्रकाश ग्रंथ' में लिखा है....

जलपात्रं तु ताम्रस्य तदभावे मृदो हितम्।
पवित्रं शीतलं पात्रं रचितं स्फटिकेन यत्।
काचेन रचितं तद्वत् वैङूर्यसम्भवम्।
(भावप्रकाश, पूर्वखंडः4)

अर्थात् पानी पीने के लिए ताँबा, स्फटिक अथवा काँच-पात्र का उपयोग करना चाहिए। सम्भव हो तो वैङूर्यरत्नजड़ित पात्र का उपयोग करें। इनके अभाव में मिट्टी के जलपात्र पवित्र व शीतल होते हैं। टूटे-फूटे बर्तन से अथवा अंजलि से पानी नहीं पीना चाहिए।

08/03/2025

*‘’नारी और उसका अस्तित्व ‘’*

*🙏🙏महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाये*

पर सिर्फ यह एक दिन ही हमारा क्यों ?

हमारे समाज में एक वर्ग नारी को निरीह समझता है। उनका मानना है कि शास्त्रों मे भी नारी को सिर्फ़ भोग्या माना गया है पर ऐसे लोग जिन्होने वेद कभी ढ़ंग से पढा ही नही सिर्फ़ लकीर ही पीट रहे है।

यह लोग ये बात क्यो नही समझते की हमारे पुराण और वेदों मे नारी को अत्यन्त महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्राप्त है।
शास्त्रों मे स्त्रियों की शिक्षा दीक्षा, शील, गुण , कर्तव्य, अधिकार और समाजिक भूमिका का जो सुन्दर वर्णन पाया जाता है वो और किसी ग्रन्थ मे नहीं, शास्त्रों मे नारी को ज्ञान देने वाली, सुख-संवृद्धि लाने वाली विशेष तेज वाली , पूज्यनीय देवी विदुषी सरस्वती, इन्द्राणी माना गया है।

शास्त्रों मे स्त्री पर कोई प्रतिबन्ध नही उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उनके हर काम मे सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है ।

वैदिक काल मे नारी अध्यन-अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र मे भी जाती थी, कन्या को अपना पति खुद चुनने का अधिकार देकर, वेद पुरुष से एक कदम आगे ही रखते हैं।लेकिन कुछ ऐसे रीढ की हड्डी विहीन बुद्धिवादियों ने इस देश कि सभ्यता संस्कृति को नष्ट करने का जो अभियान चला रखा है –उसके तहत वेदों मे नारी की अवमानना का ढोल पीट रहे हैं।

अथर्ववेद कहता है कि माता पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुध्दि मत्ता और विद्याबल का उपहार दे, वह उसे ज्ञान का दहेज भेट करे न कि पैसो और रंग बिरंगे उपहार का दहेज।

शास्त्र कहते है कि जब कन्या विद्या से परिपुर्ण हो, चैतन्य स्वभाव और पदार्थो को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण प्राप्त करने वाली परिपक्व हो तभी उसका विवाह करना चाहिए क्योकि एक कन्या ही माँ बन अपनी सन्तान को निशचित ज्ञान देने वाली व अपनी विधवत्ता और शुभ गुणों से सब को प्रभावित करने वाली होती है।

एक विदुषी, सम्माननीय, विचारशील, प्रसन्नचित्त पत्नी संपत्ति की रक्षा और वृद्धि करती है और घर मे सुख लाती है। एक स्त्री ही कुल की रक्षा करने वाली होती है।

एक निर्मल मन वाली स्त्री जिसका मन एक पारदर्शी स्फ़टिक जैसे परिशुद्ध जल की तरह हो जो छः वेदांगो-शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छंद को प्राप्त उस पूर्ण ज्ञान को दूसरों को देती है।

एक स्त्री कभी कमजोर नही होती है। नारी समस्त समाज़ की धुरी है उसके बिना सब कुछ अस्तित्वहीन है ।

*‘’नारी तुम कमजोर नही*
*रत्नो कि खान हो तुम,*
*उस ईश्वर कि कल्पना की*
*अद्भुत पहचान हो तुम’’*

औरत शक्ति की कोई परकाष्ठा नहीं, वो जिस भी रुप को जीती है उसे पूर्णता तक जीती है।

एक इन्सान के रुप में अगर वो कहीं हारती भी हैं तो उसके अन्दर निहीत नारी मन उसे एक असीमित शक्ति देता है।

नारी सृष्टि के अनंत को जीती है वो असहनिय कष्ट सह कर भी एक नए रुप का सृजन करती है । नारी शक्ति के आगे तो देवता भी नतमस्तक हो जाते है।

‘’रिश्ते नातो को बहुत सँजिदगी से सँवारती है वो
हर पल अपनो के लिए जीती है वो ……………………।

सब के सुख और दुख की ख्वाबगाह बनाती है वो
दुख़ खुद के आँचल मे छुपा सब को मुस्करा कर दिखाती है वो……………………………………………………

अपनो के अभिमान के लिए खुद के स्वाभिमान को
भूल जाती है वो…………………………………………………

हालाँकि हमारा समाज आज महिला दिवस मना रहा है
बहुत ही भावपुर्ण भाषण दिए जा रहे है, औरत की आज़ादी को एक सराहनीय कदम बताया जाएगा, हर क्षेत्र में पुरुषो के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने के लिए गौरवान्वित होने की बाते की जाएंगी …………

दुसरी औरतो को उंचे ओहदो पर देख कर खुश होने वाले, घर की चार दिवारी में बिल्कुल इसके विपरीत है।

वहां वो औरतो को यह जताने से नही चुकते कि औरत कि औकात आदमी से नीचे है उसका अस्तित्व सिर्फ़ बच्चे पैदा करना उन्हे पालना और चुल्हे चौके तक सीमित है।

हर क्षेत्र मे औरत की यही स्थिति ऐसी ही है। लड़का रात को घुम कर आता है तो उसको कुछ नही कहा जाता वही एक और लड़की अगर काम से भी वापस आए तो उसके चरित्र पर सीधे कटाक्ष किए जाते है।

रात के अन्धेरो मे लड़की की अस्मत लुटने वाले दिन के उजाले में चीख-चीख कर कहते है जब लड़की आधी रात को बाहर होगी तो उसके साथ ऐसा तो होगा ही ………………॥

‘’वाह रे इन्सान तुने तो खुद को ही भगवान बना डाला खुद इन्साफ़ का पुतला बन बैठा अपनी घिनौनी हवस को कितनी मासुमियत से उस लड़की के ऊपर मढ देता है । और बात करते हैं महिला दिवस की।

शायद मेरी सोच गलत हो शायद मै एक तरफ़ा ही सोच रहा हूँ पर सोचने और देखने का अधिकार सब को है, तो हमलोग अपने आस पास ही क्यों अपने घर से शुरुआत करें और देखे की क्या हमलोग औरत को वो सम्मान दे पा रहे है किनहीं।

उसकी भावनाओं को कहीं कुचल तो नहीं रहे जिस दिन हर घर से यह शुरुआत हो जाएगी तो सिर्फ़ एक दिन ही औरत को देने की जरुरत नही होगी क्योंकि हर दिन औरत खुद अपनी खुशी का इजहार करके कहेगी हर दिन मेरा है ………………………………………
*‘’औरत कही कमजोर नहीं?*
*वो एक ऐसी शक्ति है !*
*अपनी पर जो आ जाए*
*ब्रह्मांड हिला सकती है !!*

नारी शक्ति को नमन व् वन्दन
🙏🙏🙏🙏🙏

https://youtu.be/P7DeZVQbrUY
08/11/2024

https://youtu.be/P7DeZVQbrUY

प्रतिभा किसी उम्र की मोहताज नहीं होती......याशिका, उम्र 6 वर्ष, चैनल को लाइक और सबस्क्राइब कीजिए ताकि नए नए वीडियो आप तक...

03/11/2024

सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया ।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःख भागवेत् ।।

भाई दूज (भातृद्वितीया) कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को मनाए जाने वाला हिन्दू धर्म का पर्व है, जिसे यम द्वितीया भी कहते हैं। भाईदूज में हर बहन रोली एवं अक्षत से अपने भाई का तिलक कर उसके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देती हैं। भाई अपनी बहन को कुछ उपहार या दक्षिणा देता है।

भाईदूज दिवाली के दो दिन बाद आने वाला ऐसा पर्व है, जो भाई के प्रति बहन के स्नेह को अभिव्यक्त करता है एवं बहनें अपने भाई की खुशहाली के लिए कामना करती हैं।

भाई दूज व्रत कथा :-

छाया भगवान सूर्यदेव की पत्नी हैं, जिनकी दो संतान हुई यमराज तथा यमुना। यमुना अपने भाई यमराज से बहुत स्नेह करती थी। वह उनसे सदा यह निवेदन करती थी, वे उनके घर आकर भोजन करें, लेकिन यमराज अपने काम में व्यस्त रहने के कारण यमुना की बात को टाल जाते थे।
एक बार कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यमुना ने अपने भाई यमराज को भोजन करने के लिए बुलाया तो यमराज मना न कर सके और बहन के घर चल पड़े। रास्ते में यमराज ने नरक में रहनेवाले जीवों को मुक्त कर दिया।

भाई को देखते ही यमुना ने बहुत हर्षित हुई और भाई का स्वागत सत्कार किया। यमुना के प्रेम भरा भोजन ग्रहण करने के बाद प्रसन्न होकर यमराज ने बहन से कुछ मांगने को कहा। यमुना ने उनसे मांगा कि- आप प्रतिवर्ष इस दिन मेरे यहां भोजन करने आएंगे और इस दिन जो भाई अपनी बहन से मिलेगा और बहन अपने भाई को टीका करके भोजन कराएगी उसे आपका डर न रहे।

यमराज ने यमुना की बात मानते हुए तथास्तु कहा और यमलोक चले गए।

तभी से यह यह मान्यता चली आ रही है कि कार्तिक शुक्ल द्वितीय को जो भाई अपनी बहन का आतिथ्य स्वीकार करते हैं उन्हें यमराज का भय नहीं रहता।

यमी ने अपने भाई से यह भी वचन लिया कि जिस प्रकार आज के दिन उसका भाई यम उसके घर आया है, हर भाई अपनी बहन के घर जाए। तभी से भाईदूज मनाने की प्रथा चली आ रही है। जिनकी बहनें दूर रहती हैं, वे भाई अपनी बहनों से मिलने भाईदूज पर अवश्य जाते हैं और उनसे टीका कराकर उपहार आदि देते हैं।

बहनें पीढियों पर चावल के घोल से चौक बनाती हैं। इस चौक पर भाई को बैठा कर बहनें उनके हाथों की पूजा करती हैं।

विधि:-
इस पूजा में भाई की हथेली पर बहनें चावल का घोल लगाती हैं उसके ऊपर सिन्दूर लगाकर कद्दू के फूल, पान, सुपारी मुद्रा आदि हाथों पर रखकर धीरे धीरे पानी हाथों पर छोड़ते हुए कुछ मंत्र बोलती हैं जैसे

"गंगा पूजे यमुना को यमी पूजे यमराज को, सुभद्रा पूजा कृष्ण को, गंगा यमुना नीर बहे मेरे भाई की आयु बढ़े"

इसी प्रकार कहीं इस मंत्र के साथ हथेली की पूजा की जाती है

" सांप काटे, बाघ काटे, बिच्छू काटे जो काटे सो आज काटे"

इस तरह के शब्द इसलिए कहे जाते हैं क्योंकि ऐसी मान्यता है कि आज के दिन अगर भयंकर पशु काट भी ले तो यमराज के दूत भाई के प्राण नहीं ले जाएंगे।

कहीं कहीं इस दिन बहनें भाई के सिर पर तिलक लगाकर उनकी आरती उतारती हैं और फिर हथेली में कलावा बांधती हैं। भाई का मुंह मीठा करने के लिए उन्हें माखन मिस्री खिलाती हैं। संध्या के समय बहनें यमराज के नाम से चौमुख दीया जलाकर घर के बाहर रखती हैं। इस समय ऊपर आसमान में चील उड़ता दिखाई दे तो बहुत ही शुभ माना जाता है। इस सन्दर्भ में मान्यता यह है कि बहनें भाई की आयु के लिए जो दुआ मांग रही हैं उसे यमराज ने कुबूल कर लिया है या चील जाकर यमराज को बहनों का संदेश सुनाएगा।

2. यमी यमराज की बहन हैं, जिनसे यमराज काफी प्रेम व स्नेह रखते हैं। कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को एक बार जब यमराज यमी के पास पहुंचे तो यमी ने अपने भाई यमराज की खूब सेवा सत्कार की। बहन के सत्कार से यमराज काफी प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि बोलो बहन क्या वरदान चाहिए। भाई के ऐसा कहने पर यमी बोली कि जो प्राणी यमुना नदी के जल में स्नान करे वह यमपुरी न जाए। यमी की मांग को सुनकर यमराज चिंतित हो गये। यमी भाई की मनोदशा को समझकर यमराज से बोली अगर आप इस वरदान को देने में सक्षम नहीं हैं तो यह वरदान दीजिए कि आज के दिन जो भाई बहन के घर भोजन करे और मथुरा के विश्राम घट पर यमुना के जल में स्नान करे उस व्यक्ति को यमलोक नहीं जाना पड़े। इस पौराणिक कथा के अनुसार आज भी परम्परागत तौर पर भाई बहन के घर जाकर उनके हाथों से बनाया भोजन करते हैं ताकि उनकी आयु बढ़े और यमलोक नहीं जाना पड़े। भाई भी अपने प्रेम व स्नेह को प्रकट करते हुए बहन को आशीर्वाद देते है और उन्हें वस्त्र, आभूषण एवं अन्य उपहार देकर प्रसन्न करते हैं।

अपना देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति अपनी भाषा अपना गौरव

वंदे मातरम्

31/10/2024

*कौनसा दीपक जलाऊँ!*

*दीपों का त्यौहार है दीपावली! जब से त्यौहार बाज़ारवाद के हवाले हो गए हैं, त्यौहार अपनी सार्थकता को खोते जा रहे हैं और त्यौहारों का वास्तविक मर्म समाप्त होता जा रहा है और त्यौहारों पर बाज़ारवाद की संस्कृति की कोख से उत्पन्न भौतिकवाद ही त्यौहारों की पहचान बनते जा रहे हैं! त्यौहार उसके मनाये जाने में निहित संदेशों को खोते जा रहे हैं! त्यौहार अब दिखावा, आडम्बर और अपनी ताक़त के प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं, ये दूसरों को हीनता का अहसास दिलाने वाले बनते जा रहे हैं!*

*दीपावली अब शानदार लाइटिंग करना, पटाखे चलाना, शानदार परिधान धारण करना, खाना-पीना, सोने-चाँदी की ख़रीद, उपहारों के आदान-प्रदान का माध्यम बन गए हैं, जबकि ये सब त्यौहार के भौतिकवादी पहलू है!*

*क्या दीपक जलाकर सूरज की रोशनी को मात दी जा सकती है?*
*पूनम के चाँद की रोशनी के सामने भी दीपक की क्या औक़ात है!*

*कहने को कह सकते हैं कि माना कि अंधेरा घना है परन्तु दीया जलाना कहाँ मना है! बेशक घने अंधेरे में एक दीपक का उजाला भी मायने रखता है लेकिन शहरी चकाचौंध में एक दीपक की क्या औक़ात है?*

*असली अंधेरा है, अज्ञानता का!*

*पढ़ा लिखा होना समझदारी की गारंटी नहीं है! जब तक समझदारी का अभाव एवं अज्ञानता का आवरण है, तब तक कितने ही दीपक जला लें, आपके मन का अंधेरा मिट नहीं सकता है और मन के अंधेरे को मिटाये बिना जीवन सार्थक नहीं है और यह मानवता पर भी भारी भरकम बोझ है!*

*आज हमारी सोच केवल हमारे हितों की अनुकूलता तक सीमित है, हम समग्रता के साथ उसके व्यापक पहलूओं को अज्ञानतावश नज़रअंदाज़ करते चले जाते हैं, नतीजन हमारे चारों तरफ़ विसंगतियों का घेरा बना हुआ है!*

*यह विसंगतियों का घेरा ही विनाश, असमानता और हमारे तनाव का कारण है! इसलिए मिटाना है तो अज्ञानता के आवरण को हटाना होगा, नहीं तो आपकी भूमिका भी विनाशकारी ही होगी और आप अन्य के तनाव तथा विनाश का कारण बन सकते हैं?*

*इसलिए दीपक जलाना है तो भीतर का दीपक जलाओ, यदि भीतर उजाला हो गया तो सारा मानव जगत उपकृत हो सकता है, मनुष्य हो तो मनुष्य के धर्म को समझना होगा और सह अस्तित्व की भावना को विकसित करना होगा, तभी दीपक जलाना सार्थक है!*

*इसलिए दीपक जलाना है तो अज्ञानता के आवरण के अंधेरे को मिटा सकने वाला जलाना होगा!*

*🙏🙏एक बार पुनः आप सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐*

31/10/2024

राष्ट्रीयता का गला घोंटकर,
छेद न करना थाली में...
मिट्टी वाले दीये जलाना,
अबकी बार दीवाली में...

देश के धन को देश में रखना,
नहीं बहाना नाली में..
मिट्टी वाले दीये जलाना,
अबकी बार दीवाली में...

बने जो अपनी मिट्टी से,
वो दिये बिकें बाज़ारों में...
छुपी है वैज्ञानिकता अपने,
सभी तीज़-त्यौहारों में...

चायनिज़ झालर से आकर्षित,
कीट-पतंगे आते हैं...
जबकि दीये में जलकर,
बरसाती कीड़े मर जाते हैं...

कार्तिक दीप-दान से बदले,
पितृ-दोष खुशहाली में...
मिट्टी वाले दीये जलाना...
अबकी बार दीवाली में...

कार्तिक की अमावस वाली,
रात न अबकी काली हो...
दीये बनाने वालों की भी,
खुशियों भरी दीवाली हो...
अपने देश का पैसा जाये,
अपने भाई की झोली में...
गया जो दुश्मन देश में पैसा,
लगेगा रायफ़ल गोली में...

देश की सीमा रहे सुरक्षित,
चूक न हो रखवाली में...
मिट्टी वाले दीये जलाना...
अबकी बार दीवाली में...
*मिट्टी वाले दीये जलाना..*
*अबकी बार दीवाली में...*

🙏आप सभी को दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐

31/10/2024

*सत्याधारस्तपस्तैलं दयावर्ति: क्षमाशिखा* ।
*अंधकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्नेन वार्यताम्* ॥

*शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।*
*शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते।।*

*दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।*
*दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते।।*

एक दिया ऐसा भी हो,
जो भीतर तलक प्रकाश करे,

एक दिया सादा हो इतना,
जैसे साधु का जीवन।

एक दिया इतना सुन्दर हो,
जैसे देवों का उपवन |

एक दिया जो भेद मिटाए,
क्या तेरा क्या मेरा है।

एक दिया जो याद दिलाये,
हर रात के बाद सवेरा है।

एक दिया उनकी खातिर हो,
जिनके घर में दिया नहीं ।

एक दिया सीमा के रक्षक,
अपने वीर जवानों का ।

एक दिया मानवता-रक्षक,
चंद बचे इंसानों का |

एक दिया विश्वास दे उनको,
जिनकी हिम्मत टूट गयी।

एक दिया उस राह में भी हो,
जो कल पीछे छूट गयी |

एक दिया जो अंधकार का,
जड़ के साथ विनाश करे।

एक दिया ऐसा भी हो,
जो भीतर तलक प्रकाश करे||

*सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं !!!!!*

🌹🙏🙏🙏🙏🌹

30/10/2024

*🙏एक विनम्र निवेदन*

दीपावली पर लगभग हर घर में श्री गणेश और श्री लक्ष्मी जी की नई मूर्तियों की पूजा होगी..

लेकिन, पुरानी मूर्ति का क्या होगा..?

कुछ लोग शायद इसे प्रवाहित कर देंगे और कुछ लोग.. पेड़ के नीचे रख देंगे..??

जिन लोगों ने इन मूर्तियो की साल भर पूजा की..अपने लिए बहुत कुछ माँगा भी होगा अब उन्हें ऐसे ही किसी पेड़ के नीचे रख देंगे .(यह उसी तरह होगा जैसे माँ-बाप जब बुड्ढे हो जाते हैं तब उन्हें आश्रम भेज दिया जाए)
कृपया, ऐसा न करें।🙏🏻

ऐसा कदापि न करें । बल्कि एक बाल्टी या टब में पानी लेकर थोड़ा गंगाजल डाल कर मूर्ति को उसमें रख दें।

एक-दो दिन में मूर्ति स्वतः उस में घुल जायेगी। मूर्ति घुले जल को किसी गमले या पेड़ की जड़ में डाल सकते हैं।

आपका यह प्रयास मूर्ति का सम्मानजनक विसर्जन तो होगा ही.. नदियों को स्वच्छ रखने को उठाया गया सार्थक पहला कदम भी होगा..!

लोग हमारे धर्म का मजाक भी नही बनायेगे, आपने देखा होगा अन्य धर्म के लोग हमारे देवी देवताओं की यहाँ वहाँ मूर्तियों पड़ी होने पर तंज कसते है।

उम्मीद है आप लोग इस तरह का कार्य न खुद करेंगे और दूसरो को भी ऐसा करने से रोकेंगे।

🙏🙏सहयोग की अपेक्षा के साथ 🙏🙏

*दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं 💐💐*

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