24/06/2025
जो करना है अपने खुद के नाम से करो...
दूसरों की नकल करते ही क्यों हो...
उत्तर प्रदेश के कम से कम दो दर्जन कथावाचकों को जानता हूँ जो ब्राह्मण नहीं हैं। ये सारे कथावाचक अच्छे खासे प्रसिद्ध हैं, इनकी कथा में भीड़ भी होती है और इन्हें खूब सम्मान भी मिलता रहा है। चलिये कुछ नाम बता देते हैं-
आचार्या मनोरमा सिंह यादव शास्त्री! ये श्रीमद्भागवतमहापुराण की कथा कहती हैं, रामकथा कहती हैं। उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश विदेश में भी कथा कहती रही हैं। आयु कम ही है, पर इनको सुनने वालों, पसन्द करने वालों की बहुत बड़ी संख्या है। यूट्यूब पर लाखों सब्सक्राइबर हैं, वीडियोज पर मिलियन व्यू भी आते हैं।
एक हेमराज सिंह यादव हैं। आप सब ने कभी कभी उनका कोई वायरल रील जरूर ही देखा होगा। कथा के बीच में कपिल शर्मा टाइप कॉमेडी भी करते हैं। उनकी कथा के वीडियो भी मिलियन्स व्यू पाते हैं। इनकी कथा में भी भरपूर भीड़ भी होती है।
एक नीलम यादव शास्त्री हैं। उनकी कथा, उनके भजन खूब सुने जा रहे हैं। उनकी कथा में स्त्रियों की खूब भीड़ होती है। और भी अनेक नाम हैं, जो कथा प्रवचन करते हैं। उनके भक्तों श्रोताओं की बहुत बड़ी संख्या है।
इसमें एक नाम ऐसा भी है जो मुझे बहुत प्रिय है, वे बरेली वाले डॉ ब्रजेश यादव हैं। आप सर्जन हैं और अपने अस्पताल में जन्म लेने वाले हर बालक के कान में कहते हैं "सच्चा रामभक्त बनना"। लोगों को रामचरितमानस की पोथी बांटते हैं। कभी कभी कथा भी कहते हैं। व्यवहार और भाषा ऐसी कि सुन कर श्रद्धा हो जाय...
गीताप्रेस से छपने वाली रामचरितमानस जिन हनुमान प्रसाद पोद्दार जी की टीका के साथ छपती है, वे भी जाति से गैर ब्राह्मण थे। आज संसार में सबसे अधिक उन्ही की ब्याख्या पढ़ी जाती है। कथा कहने वाले भी वही पोथी लेकर जाते हैं।
कथा कहने को लेकर भारतीय समाज में यह धारणा कभी नहीं रही कि गैर ब्राह्मण कथा नहीं कह सकता। पहले भी गैर ब्राह्मण कथा कहते, गाते रहे हैं और आज भी कहते हैं। ग्रामीण क्षेत्र में, जहाँ के लोगों पर अधिक ब्राह्मणवादी होने का आरोप थोपा जाता है, वहाँ के दो तिहाई मंदिरों के पुजारी, साधू गैर ब्राह्मण हैं।
एक सच तो यह भी है कि पुरोहित कर्म करने वाले ब्राह्मण लगातार कम होते जा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र के असंख्य मंदिरों में कोई नियमित पुजारी नहीं है। जहॉं हैं, वहाँ भी सुबह शाम भोग लगाने के लिए आते हैं, शेष समय मन्दिर खाली रहता है। आप ब्राह्मण हों या हरिजन, यदि धर्म में आस्था है, पूजा अर्चना में मन लगता है तो आपको गाँव के आसपास ही किसी मन्दिर में पुजारी का काम मिल सकता है। आपको शुद्ध दो श्लोक भी कंठस्थ न हो, तब भी... कोई नहीं रोकता टोकता, बल्कि लोग तो ढूंढ रहे हैं...
बाकी मुकुट मणि अग्निहोत्री के नाम से श्रीमद्भागवत कथा कहने वाले जिस मुकुट मणि जाटव जी महाराज के लिए हल्ला हो रहा है, वे तीन चार साल पहले तक बौद्धकथा कहते थे और हिन्दू संस्कारों और देवी देवताओं के लिए अभद्र बातें कहते फिरते थे। वे बौद्ध हैं भाई साहब! उधर मलाई नहीं मिली तो इधर कूद पड़े थे...