12/12/2022
#सैनिकसम्मानअभियान
लोगो तक अमर गाथा पहुंचा कर पुण्य के भागी बने जय हिंद 🇮🇳🙏
जय हिन्द 🇮🇳 भारत
आज से हम #सैनिकसम्मानआभियान की की शुरुआत ऐसे वीर शहीद की गाथा के साथ कर रहे हैं जिनका नाम तो लगभग हर किसी ने सुना है4 परमवीर चक्र विजताओ में से एक है लेकिन ज्यादा कुछ पता नही है। यदि आप अपना सहयोग प्रदान करते रहेंगे तो इस आभियान को अपने लक्ष्य तक पहुंचने में बल मिलेगा।
नाम - लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पाण्डेय
जन्मस्थान - गोमती नगर लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
पिता -गोपी चन्द पाण्डेय
माता - श्रीमति मोहिनी पाण्डेय
युद्ध स्थल -खालूबर, जुबेर टॉप, बटालिक सेक्टर, कारगिल
युद्ध दिनांक -2/3 जुलाई 1999
पुरुस्कार -परमवीर चक्र, 3 जुलाई 1999
प्रथम सिपाही स्वेच्छा से कारगिल में जानें वाला 🇮🇳
मनोज कुमार पांडे का जन्म 25 जून 1975 को उस समय हुआ जब देश में आपातकाल की घोषणा हो चुकी थी । पूरा लखनऊ शांत था सभी राजनेताओं की धरपकड़ चल रही थी इनके पिता और इनकी माता जो धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी मनोज पांडे दो भाई तथा एक बहन थी इनके पिता होजरी की दुकान करते थे परिवार का खर्च बड़ी कठिनाई से चल रहा था
लेकिन मनोज पांडे को इनके पिता अच्छे से चलाना चाहते थे अतः मनोज पांडे को प्रारंभिक शिक्षा किसी पब्लिक स्कूल से दिलाई गई उसके बाद होने यूपी सैनिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा में बिठाया जाए इनकी अच्छी मेरिट आई तभी कक्षा 7 में यूपी सैनिक स्कूल लखनऊ में प्रवेश दिलाया वहां से इंटरमीडिएट परीक्षा सीबीएसई बोर्ड से उत्तीर्ण की इसके बाद इनका चयन राष्ट्रीय सुरक्षा अकादमी खड़कवासला में हो गया वहां 3 वर्ष कठिन परिश्रम कर प्रशिक्षण प्रशिक्षण प्राप्त किया कमीशन प्राप्त करने हेतु भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून 1 बरस के प्रशिक्षण हेतु चले गए कमीशन प्राप्त करने के बाद इनका चयन ए 1/11 गोरखा राइफल्स में हो गया।
1 /11 गोरखा राइफल्स को कश्मीर में आतंकवादियों का सफाया करने के लिए लगा दिया गया मनोज कुमार पांडे को जो पहला मिशन मिला उसकी कमान उनके वरिष्ठ साथी सेकंड लेफ्टिनेंट पी दत्त संभाल रहे थे सेकंड लेफ्टिनेंट पी.न दत्त ने आतंकवादियों का सफाया किया लेकिन इस पराक्रम में अपने जीवन से हाथ धो बैठे और वीरगति को प्राप्त हुऐ जिसकी परिणाम स्वरूप भारत सरकार ने उन्हें अशोक चक्र मरणोपरांत प्रदान किया इस घटना ने लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे को एक जांबाज सिपाही की तरह लड़ने को प्रेरित किया तथा लेफ्टिनेंट मनोज पांडे ने अपना प्रथम पद्धति में रहने का निर्णय किया वह अपने आप को स्वेच्छा से सैनिक कार्यवाही में जो अति विशिष्ट हो रखना चाहते थे।
प्रारंभ में मनोज कुमार को सीमा पार पेट्रोलिंग के लिए भेजा गया लेकिन लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे अपने साथियों के साथ समय से लौटे नहीं कमांडिंग ऑफिसर चिंतित थे कि लेफ्टिनेंट पांडे 2 दिन तक वापस नहीं आए जब उनसे देर से वापस आने का कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि हमें वहां कोई आतंकी नहीं मिला और हम उनकी तलाशी करते रहे तब तक वह मिल नहीं गए।
1/11 गोरखा बटालियन को सियाचिन भेजने के आदेश हुए तो लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे ने अपनी कमांडिंग ऑफिसर को लिखा "अगर हमारी उन्हें उत्तरी ग्लेशियर भेजी जा रही है तो मुझे ' बाना पोस्ट' और यदि मध्य ग्लेशियर भेज रहा है तो ' पहलवान पोस्ट' पर नियुक्त किया जाए" यह दोनों पोस्ट ग्लेशियर के उत्तर तथा मध्य में स्थित है यह पोस्ट इतनी ऊंचाई पर है कि वहां ग्लेशियर में बर्फीले तूफान 30 से 40 किलोमीटर की तेज गति से चलते हैं हड्डियां कब कब आने वाली ठंड जो अक्सर जवान के स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालती है वहां ऑक्सीजन की बहुत कमी होती है पहलवान पोस्ट पर जो 19700 फीट समुद्र तल की ऊंचाई पर नियुक्त कर दिया गया।
1/11 गोरखा रेजीमेंट की एक बटालियन ने विधिवत रूप से सौंपी कार्य को सियाचिन में पूर्ण किया उसके बाद अधिकतर अधिकारी तथा अन्य सिपाही वहां से आने की तैयारी में जुट गए इसी के साथ पहले पहुंचने वाली पार्टी ने पूर्णा पहुंचकर अपनी हत्यार सर्दी के कपड़े सैनिक कार्यालय को सौंप दिए। और लगभग सभी बटालियन वापस आ चुकी थी लगभग सभी सैनिक लंबे समय तक सियाचिन में रहे तो उनका 5 किलो वजन कम हो गया था लेकिन जो यूनिट पुणे नहीं पहुंच पाई उन्हें तत्काल कारगिल ऑपरेशन में अपनी बटालियन के साथ पहुंचने का आदेश मिला।
1/11 गोरखा राइफल के लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे ने कारगिल ऑपरेशन में जाने की इच्छा जाहिर की स्वेच्छा से जाने वाले विजय ऑपरेशन में पहला अधिकारी था सर्वप्रथम जबरन 9 मई 1999 को पेट्रोलिंग पर गए तो इन्हें चार भारतीय जवानों के सब रास्ते में पड़े हुए मिले जिन्हें पाकिस्तानी सैनिकों ने हमारे क्षेत्र में अपनी गोली का निशाना बनाया था इस मिशन का उद्देश्य पहली "कुकरथांग"पर संपर्क कर उसके बाद जो "जुबेर टॉप"पर कब्जा कर वहां अपनी पोस्ट स्थापित करना था
2/3 जुलाई 1999 1/11 गोरखा राइफल्स की बी कंपनी को खालूबार पर कब्जा करने का आदेश मिला लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे जो नंबर 5 प्लाटून का कमांडर था उसने तुरंत खालूबार के लिए तैयारी के साथ प्रस्थान किया शत्रु की ओर से आसपास की पहाड़ियों से इन पर फायरिंग शुरू हो गई इन्होंने अपने प्लाटून को सुरक्षित स्थान पर रहते हुए बाय की तरफ चार बंकर को निशाना बनाते हुए रास्ता चुना था तथा हवलदार भीम बहादुर दाएं और के सुरक्षित स्थान से दो बंकर को निशाना बनाते हुए आगे बढ़े लेफ्टिनेंट पांडे ने दो बंकर में शत्रु के चार सैनिकों को अपनी राइफल से निशाना बनाकर ढेर कर दिया जबकि वह स्वयं भी टांग में गोली लगने से घायल हो गए इसके बाद वे तीसरे बनकर की ओर बढ़े तथा अपने हथगोले से बनकर को नष्ट कर दिया तथा चौथे बनकर पर आयो गोरखाली चिल्लाते हुए ग्रेनेड फेंका तभी शत्रु की ओर से एमएमजी से आया फायर के सामने की ओर लगा लेफ्टिनेंट पांडे के द्वारा चौथे बंकर पर फेके ग्रेनेड से शत्रु वही ढेर हो गया उनके शरीर से खून के फब्बारे निकालना शुरू हो गए लेकीन फिर भी उनके साथियों का उत्साह बढ़ा रहे थे कि खालूबार पर कब्जा करना आवश्यक है उसके लिए रुकना नहीं है क्योंकि हमारे रास्ते में शत्रु द्वारा 6 बनकर बनाकर जो अवरोध पैदा कर रखा था वह समाप्त हो चुका है इस कार्यवाही में शत्रु के छह बनकर तबाह हो गए थे और उन पर भारतीय फौज ने कब्जा कर लिया तथा 11 पाकिस्तानी सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया बंकर में भारी मात्रा में गोला बारूद व सामग्री इकट्ठे कर रखी थी जिनमें एक एयर डिफेंस गन भी शामिल थी इन सभी को अपने कब्जे में ले खालूबार रास्ता प्राप्त किया मनोज पांडे अपने साथियों का साहस बढ़ाते हुए छात्रों के ठिकाने तक बेहिचक पहुंचे जिससे शत्रु मारा गया और जो बचेगा भाग खड़े हुए इसके बाद लेफ्टिनेंट पांडे शहीद हो गए।
लेफ्टिनेंट पांडे को बटालिक का हीरो कहा गया मरते दम तक बंकर से बंकर तक अपने साथियों का हौसला बढ़ाते हुए सभी बंकर को नष्ट कर दिया गोलियां समाप्त हो जाने पर अपनी खुखरी का इस्तेमाल किया उन्हें मरने की कोई परवाह नहीं थी उस जांबाज सिपाही ने अपने जीवन देश के लिए जिया और देश के लिए अपने प्राण निछावर कर दिया। साथियों ने लेफ्टिनेंट पांडे के सफेद चादर से ढक दिया उनकी साथी कह रहे थे कि लेफ्टिनेंट पांडे तुम्हारा बलिदान अमर है बंकर के बाहर बहा तुम्हारा रक्त वक्त व्यर्थ नहीं जाएगा तुम अमर हो देश को तुम पर गर्व है 🇮🇳
8 जुलाई 1999 की बैकुंठ धाम स्थित श्मशान घाट पर लेफ्टिनेंट पांडे के पिता गोपीचंद में 11:20 पर उन्हें मुखाग्नि थी उनका पार्थिव शरीर पंचतत्व में विलीन हो गया कारगिल की इस योद्धा की शव यात्रा में पूरा लखनऊ उमड़पड़ा सेना के जवानों ने राइफल की गर्दन के 20 सैनिक सम्मान से लेफ्टिनेंट पांडे को श्रद्धांजलि अर्पित की तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह विधानसभा अध्यक्ष श्री श्री नाथ त्रिपाठी संपादक श्री मुलायम सिंह समाज कल्याण मंत्री श्री हरीश श्रीवास्तव तथा अन्य गणमान्य व्यक्ति मौजूद थे
शहीद पार्क से अंतिम यात्रा 2:00 बजे चलने से पूर्व यहां 1/11 गोरखा राइफल्स के जवानों ने अपनी संगीन झुकाकर श्मशान घाट तक भारी जनसमूह के साथ इस महाबली दाने को अंतिम विदाई देने के लिए ऐसे जनसमूह इससे पूर्व लखनऊ में कभी नहीं देखा गया वातावरण में लेफ्टिनेंट पांडे के पिता पुत्र विछोह में गम की अपनी आंखों में आंसू ले मनोज पांडे की बीते दिनों की याद में खो गए उन्होंने अपने आप को संभालते हुए कहा मनोज चाहता था कि वह सेना में पहुंचे और कुछ करके दिखाएं अनुशासित पर समिति के लिए जिम्मेदारी का निर्वाह करना नहीं भूला । मैंने जिंदगी को एक मामूली आदमी की तरह गुजारा है मुझे ज्यादा पैसे की जरूरत नहीं है अलबत्ता मनोज की स्मृतियों के सहारे ही शेर जिंदगी काटनी है उसकी कमी हथेली में पास की तरह जिंदगी भर चुभती रहेगी।
लेफ्टिनेंट पांडे जीवित नहीं है मगर अमर उनकी सूर्य का था जन्म जन्मांतर तक आने वाली पीढ़ियों में अपना स्थान बनाए रखेगी राष्ट्रपति महोदय द्वारा उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया।
देश के इस वीर शहीद के लिए एक like,share, comment जरूर करे और वीरों की अमर गाथा जन जन तक पहुंचाए और पुण्य के भागी बने।🇮🇳🪖💂🎖️ जय हिंद,