17/05/2026
अपील 🙏🏻🙏🏻🙏🏻
आदमी सिर्फ जिंदा है इंसानियत मर चुकी है
एक बार सोचना ज़रूर… क्या यही विकास है?
आदमी की शक्ल से, अब डर रहा है आदमी
आदमी को लुटकर, घर भर रहा है आदमी
आदमी ही मारता है, मर रहा है आदमी
समझ कुछ आता नहीं, क्या कर रहा है आदमी
व्यथित मन से दिल के उदगार....
आज हमारा देश विकसित देश के रूप में आगे बढ़ रहा है ऐसा शब्द सुनकर कान को अच्छा लगता है पर मन में काफी पीड़ा होती है । विकसित देश की परिभाषा क्या है?
लिंगभेद, वर्णवाद, वर्गवाद, संप्रदायवाद, उच्च-नीच, छुआछूत की जटिल मान्यताएं, पूंजीवाद, धर्म के नाम पर जाति के नाम पर लोगों की पहचान की जा रही हो। लोगों को बांटा जा रहा हो, नफरत फैलाई जा रही हो।
ऐसे विकास से विकास ना होना ज्यादा बेहतर है
इसके लिए जिम्मेदार वे लोग हैं जो स्वार्थ की राजनीति करने वाले, धार्मिक पाखंड करने वाले कथाकार बाबा, बिकी हुई मीडिया, बिका हुआ कानून व्यवस्था , सोई हुई और निज स्वार्थ में लिप्त जनता, भ्रष्ट शासन प्रशासन।
सत्य के लिए आवाज ना उठाने वाले तुम्हारे जिंदा होने ना होने का कोई अर्थ नहीं।
अगर जमीर जाग जाए तो जरूर विचार करना
1. विकास के नाम पर प्रकृति का अंधाधुंध दोहन कर धरती को छिन्न-भिन्न कर देना।
2. शिक्षा के नाम पर बच्चों और युवाओं का मानसिक शोषण करना।
3. गरीब और असहाय लोगों को प्रलोभन देकर उनका उपयोग करना।
4. धर्म और संप्रदाय के आधार पर राजनीति कर समाज को बाँटना।
5. नशे और व्यसनों को बढ़ावा देने वाली योजनाओं को बढ़ाना।
6. मेहनत-मज़दूरी कर 100–200 रुपये कमाने वालों से लाखों कमाने वाले लोगों का घूस लेना।
7. भ्रष्टाचार का निरंतर बढ़ना और ईमानदारी का उपहास बनना।
8. सीधे-सादे और शांत लोगों को प्रताड़ित करना।
9. सत्य और न्याय की आवाज़ को दबाने का प्रयास करना।
10. आजादी के नाम पर अश्लीलता, अंग-प्रदर्शन और चरित्रहनन को बढ़ावा देना।
11. सेवा के नाम पर केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करना।
12. मानवता से अधिक धन और दिखावे को महत्व देना।
13. रिश्तों में प्रेम और विश्वास की जगह स्वार्थ और उपयोगिता का बढ़ना।
14. सोशल मीडिया पर झूठ, नफ़रत और भ्रम फैलाना।
15. किसानों और मजदूरों की मेहनत का उचित सम्मान न होना।
16. नैतिकता और संस्कारों को “पुराने विचार” कहकर तिरस्कृत करना।
17. बच्चों को मानवता नहीं, केवल प्रतिस्पर्धा और भौतिकता सिखाना।
18. धर्म के नाम पर भय, व्यापार और अंधविश्वास फैलाना।
19. स्त्री और पुरुष को बराबरी से न देखकर भेदभाव करना।
20. जाति और ऊँच-नीच के आधार पर इंसानों का मूल्य तय करना।
21. गरीबों की आवाज़ को कमजोर और अमीरों की गलती को प्रभावशाली बना देना।
22. सच्चे समाजसेवियों की उपेक्षा और चापलूसों का सम्मान होना।
23. युवाओं को ज्ञान और विवेक की जगह केवल मनोरंजन और व्यसन में उलझाना।
25. कानून का डर गरीबों के लिए और सुविधा अमीरों के लिए होना।
26. दिखावटी सभ्यता के पीछे संवेदनहीनता का बढ़ना।
27. इंसान का मशीनों से जुड़ना, पर इंसानों से दूर हो जाना।
अगर थोड़ा बहुत भी आपके अंदर संवेदना है तो जागो, समझो, खुद को पहचानो, खुद के अंदर इंसानियत बढ़ाओ और समाज में जागरूकता लाओ...
रविकर दास (यथार्थ)
अध्यक्ष छत्तीसगढ़ संत संगठन
सदगुरु कबीर विश्व शांति मिशन.....