18/12/2025
मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है- आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। जब इनमें से कोई भी तत्व असंतुलित होता है यानी उस तत्व विशेष की मात्रा आवश्यकता से कम अथवा अधिक हो जाता है तो हमारा शरीर बीमार हो जाता है। आवश्यकता है जानने कि उन चिकित्सा प्रणाली की और उन औषधि की जिनके द्वारा इन पांचों तत्वों को संतुलित किया जा सकता है इसी का समन्यक ज्ञान कराता है पांच तत्वों का सिद्धांत। आवश्यकता है जानने की हमारे शरीर के उन अवयवों की जो इन पांच तत्वों से संबंध रखते हैं इनका उपचार कर हम शरीर में पांच तत्वों का संतुलन स्थापित कर सकते है। आवश्यकता है जानने की उन अन्तःस्त्रावी ग्रंथियों की जो इन पांचों तत्वों का हमारे शरीर स्राव द्वारा संतुलित करती है।
इन पांच तत्वों के संतुलन से हम शरीर की पुरानी तथा नई, साधारण तथा घातक बीमारियों का उपचार कर सकते हैं। भविष्य में बीमारी ना आए इसके लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी कर सकते हैं यहां तक कि आने वाली शताब्दी की घातक से घातक बीमारियों का उपचार भी इन पांच तत्व नियमन सिद्धांत में समाहित है। आवश्यकता है इन तत्वों को भली भांति जानना तथा शरीर के संचालन में इनकी महत्ता को जानना। उन लक्षणों को जानना जरूरी है जिससे पता चल सके कि शरीर में कौन से तत्व की कमी हुई है? असंतुलन किस प्रकार का है अथवा नया है तो क्या उपचार होगा अगर पुराना है तो क्या उपचार होगा।
हमारे शरीर की व्याख्या में कहा गया है कि हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है यह तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी हैं। इन तत्वों से संबंधित दस प्रमुख अंग है।
आकाश फेफड़ा और बड़ी आंत
वायु हृदय और छोटी आंत
अग्नि जिगर और पित्त की थैली
जल गुर्दा और पेशाब की थैली
पृथ्वी तिल्ली और आमाशय
इनके द्वारा शरीर को धारण करने वाली सात प्रकार की धातुओं का निर्माण होता है। यह धातु रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र है। इन धातुओं के द्वारा शरीर के सात प्रकार के अंग तंत्रों का निमार्ण होता है।
रस त्वचा तंत्र
रक्त नस तंत्र
मांस मांसपेशी तंत्र
मेद लसीका तंत्र
अस्थि अस्थि तंत्र
मज्जा। तंत्रिका तंत्र
शुक्र प्रतिरोधक तंत्र
इन अंगतंत्रों और धातुओं के सात प्रकार के मल होते है जिनका नियमित शरीर से निष्कासन यदि नहीं हो पाता है तो यह शरीर में दोष उत्पन्न करते है। इस दोषों में असंतुलन ही शरीर में रोगों का कारण बनता है। यह दोष तीन प्रकार के होते हैं वात, पित्त, कफ।
वात दोष आकाश और वायु
पित्त दोष अग्नि और जल
कफ दोष जल और पृथ्वी
शरीर में रोग तभी होता है जब शरीर को संतुलित आहार नहीं मिल पाता है और धातुओं के सातों प्रकार के मल का शरीर से निष्कासन नहीं हो पाता है। जिसके कारण शरीर के तीनों दोषों में असंतुलन पैदा होता है। दोषों का असंतुलन ही रोगों का कारण होता है। संक्षेप पे इतना जानना पर्याप्त है कि पांच तत्वों का असंतुलन ही रोगों का कारण है एवं संतुलन ही संपूर्ण स्वास्थ है। शरीर के इन पांचों तत्वों का ज्ञान हमें पंच तत्व चिकित्सा (प्राकृतिक चिकित्सा) के माध्यम से मिलता है 👏👏