आभा आरोग्य धाम

आभा आरोग्य धाम यह चिकित्सा पद्धति संपूर्ण प्रकृति पर आधारित है Naturopathy

07/02/2026
07/02/2026

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With Rajkumar Rajbhar – I just got recognized as one of their top fans! 🎉
07/02/2026

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Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Dharmendra Sharma, Deepak Kumar, Anil Kumar, सम्राट पार्थ...
02/02/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Dharmendra Sharma, Deepak Kumar, Anil Kumar, सम्राट पार्थ चौहान, Rajkumar Rajbhar

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02/02/2026

Shout out to my newest followers! Excited to have you onboard! Dharmendra Sharma, Deepak Kumar, Anil Kumar, सम्राट पार्थ चौहान, Rajkumar Rajbhar

इस समय आपके मोबाइल पर मैसेज की भरमार होगी, होनी भी चाहिए… लेकिन राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक कविता है, इसे भी प...
01/01/2026

इस समय आपके मोबाइल पर मैसेज की भरमार होगी, होनी भी चाहिए… लेकिन राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक कविता है,
इसे भी पढ़िए…

ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं है
अपना ये त्यौहार नहीं है
अपनी ये तो रीत नहीं है
अपना ये व्यवहार नहीं धरा ठिठुरती है
सर्दी सेआकाश में कोहरा गहरा है
बाग़ बाज़ारों की सरहद पर
सर्द हवा का पहरा है
सूना है
प्रकृति का आँगन
कुछ रंग नहीं , उमंग नहीं
हर कोई है
घर में दुबका हुआ
नव वर्ष का ये कोई ढंग नहीं
चंद मास अभी इंतज़ार करो
निज मन में तनिक विचार करो
नये साल नया कुछ हो तो सही
क्यों नक़ल में सारी अक्ल बही
उल्लास मंद है
जन -मन का
आयी है
अभी बहार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है
अपना ये त्यौहार नहीं
ये धुंध कुहासा छंटने दो
रातों का राज्य सिमटने दो
प्रकृति का रूप निखरने दो
फागुन का रंग बिखरने दो
प्रकृति दुल्हन का रूप धार
जब स्नेह – सुधा बरसायेगी
शस्य – श्यामला धरती माता
घर -घर खुशहाली लायेगी
तब चैत्र शुक्ल की प्रथम तिथि
नव वर्ष मनाया जायेगा
आर्यावर्त की पुण्य भूमि पर
जय गान सुनाया जायेगा
युक्ति – प्रमाण से स्वयंसिद्ध
नव वर्ष हमारा हो प्रसिद्ध
आर्यों की कीर्ति सदा -सदा
नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा
अनमोल विरासत के धनिकों को
चाहिये कोई उधार नहीं
ये नव वर्ष हमे स्वीकार नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं
है अपनी ये तो रीत नहीं
है अपना ये त्यौहार नहीं।

फेसबुक के पेज से.....
31/12/2025

फेसबुक के पेज से.....

निर्विशीकरण:- यदि आप नियमित रूप से अपने शरीर को थेरेपी परामर्श के अनुसार थेरेपी उपचार देते हैं, तो शरीर की सर्विसिंग प्र...
19/12/2025

निर्विशीकरण:- यदि आप नियमित रूप से अपने शरीर को थेरेपी परामर्श के अनुसार थेरेपी उपचार देते हैं, तो शरीर की सर्विसिंग प्रक्रिया प्रारंभ होती हैं। शरीर की सर्विसिंग प्रक्रिया के समय शरीर का निर्विशीकरण होता है, इस निर्विशीकरण की प्रक्रिया में कुछ लक्षण शरीर में उभरते हैं, जो कि शरीर में आए नए रोगों के लक्षण न होकर निर्विशीकरण के लक्षण होते हैं। शरीर में जहां जहां विषैले तत्वों का मल मूत्र का (टैक्सिंग) जमाव होता है, वहां से जब ये निकलते हैं तो अंगों से संबंधित ज्ञानेंद्रियों में प्रतिक्रिया आती है, इस प्रतिक्रिया को रिफ्लेक्शन भी कहा जाता है। यह प्रतिक्रिया रोगों का निदान करने में महत्वपूर्ण लक्षण देते हैं, एवं किसी भी प्रकार के विषैले तत्वों के शरीर में छुपे रहने की जानकारी देते हैं। किसी बीमारी से शरीर प्रभावित है तो उस बीमारी के लक्षण भी उभरते हैं यह प्रक्रिया दो से छह हफ्ते तक हो सकती हैं।
चिकित्सक की देख रख में यह प्रकिया नियमित रखें, पूर्वरूप में निर्विशीकरण के पश्चात ही रोग की जड़ें समाप्त होती है

मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है- आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। जब इनमें से कोई भी तत्व असंतुलित होता है यानी...
18/12/2025

मनुष्य का शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है- आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी। जब इनमें से कोई भी तत्व असंतुलित होता है यानी उस तत्व विशेष की मात्रा आवश्यकता से कम अथवा अधिक हो जाता है तो हमारा शरीर बीमार हो जाता है। आवश्यकता है जानने कि उन चिकित्सा प्रणाली की और उन औषधि की जिनके द्वारा इन पांचों तत्वों को संतुलित किया जा सकता है इसी का समन्यक ज्ञान कराता है पांच तत्वों का सिद्धांत। आवश्यकता है जानने की हमारे शरीर के उन अवयवों की जो इन पांच तत्वों से संबंध रखते हैं इनका उपचार कर हम शरीर में पांच तत्वों का संतुलन स्थापित कर सकते है। आवश्यकता है जानने की उन अन्तःस्त्रावी ग्रंथियों की जो इन पांचों तत्वों का हमारे शरीर स्राव द्वारा संतुलित करती है।

इन पांच तत्वों के संतुलन से हम शरीर की पुरानी तथा नई, साधारण तथा घातक बीमारियों का उपचार कर सकते हैं। भविष्य में बीमारी ना आए इसके लिए रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास भी कर सकते हैं यहां तक कि आने वाली शताब्दी की घातक से घातक बीमारियों का उपचार भी इन पांच तत्व नियमन सिद्धांत में समाहित है। आवश्यकता है इन तत्वों को भली भांति जानना तथा शरीर के संचालन में इनकी महत्ता को जानना। उन लक्षणों को जानना जरूरी है जिससे पता चल सके कि शरीर में कौन से तत्व की कमी हुई है? असंतुलन किस प्रकार का है अथवा नया है तो क्या उपचार होगा अगर पुराना है तो क्या उपचार होगा।

हमारे शरीर की व्याख्या में कहा गया है कि हमारा शरीर पांच तत्वों से मिलकर बना है यह तत्व आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी हैं। इन तत्वों से संबंधित दस प्रमुख अंग है।

आकाश फेफड़ा और बड़ी आंत
वायु हृदय और छोटी आंत
अग्नि जिगर और पित्त की थैली
जल गुर्दा और पेशाब की थैली
पृथ्वी तिल्ली और आमाशय

इनके द्वारा शरीर को धारण करने वाली सात प्रकार की धातुओं का निर्माण होता है। यह धातु रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र है। इन धातुओं के द्वारा शरीर के सात प्रकार के अंग तंत्रों का निमार्ण होता है।

रस त्वचा तंत्र
रक्त नस तंत्र
मांस मांसपेशी तंत्र
मेद लसीका तंत्र
अस्थि अस्थि तंत्र
मज्जा। तंत्रिका तंत्र
शुक्र प्रतिरोधक तंत्र

इन अंगतंत्रों और धातुओं के सात प्रकार के मल होते है जिनका नियमित शरीर से निष्कासन यदि नहीं हो पाता है तो यह शरीर में दोष उत्पन्न करते है। इस दोषों में असंतुलन ही शरीर में रोगों का कारण बनता है। यह दोष तीन प्रकार के होते हैं वात, पित्त, कफ।

वात दोष आकाश और वायु
पित्त दोष अग्नि और जल
कफ दोष जल और पृथ्वी

शरीर में रोग तभी होता है जब शरीर को संतुलित आहार नहीं मिल पाता है और धातुओं के सातों प्रकार के मल का शरीर से निष्कासन नहीं हो पाता है। जिसके कारण शरीर के तीनों दोषों में असंतुलन पैदा होता है। दोषों का असंतुलन ही रोगों का कारण होता है। संक्षेप पे इतना जानना पर्याप्त है कि पांच तत्वों का असंतुलन ही रोगों का कारण है एवं संतुलन ही संपूर्ण स्वास्थ है। शरीर के इन पांचों तत्वों का ज्ञान हमें पंच तत्व चिकित्सा (प्राकृतिक चिकित्सा) के माध्यम से मिलता है 👏👏

छिति जल पावक गगन समीर की पांच ऊर्जाओं के अविरल स्रोतहमारे परिवार के बुजुर्ग एवं गुरुजन जो अब हमारे बीच में नहीं हैं जो स...
18/12/2025

छिति जल पावक गगन समीर की पांच ऊर्जाओं के अविरल स्रोत

हमारे परिवार के बुजुर्ग एवं गुरुजन जो अब हमारे बीच में नहीं हैं जो स्वर्गवासी हो गये हैं, उन्हीं को पितृ देवता या पितर कहते हैं। हमें यह शरीर रंगरूप, धर्म, जाति, ज्ञान और शिक्षा सब कुछ आपके ही द्वारा हमको मिला है। हमारी सभी प्रकार की शारीरिक एवं मानसिक परेशानियों का कारण एवं समाधान आप ही से है। आप ही के द्वारा हमारी सभी पूजा और आराधना ईश्वर तक पहुंचती है।

हमारे पितृ हजारों सालों से प्राकृतिक वातावरण एवं प्राकृतिक नियमों में रहें है, उनकी पूरी दिनचर्या प्रकृति के अनुरूप ही थी, उनके शरीर एवं निवास स्थान का वातावरण भी प्राकृतिक ही था। विकृत के वातावरण से बहुत दूर थे। उनके उपचार का माध्यम भी प्राकृतिक चिकित्सा पद्धतियां ही थी। प्राकृतिक चिकित्सा हमारी पैतृक चिकित्सा पद्धति है। इस चिकित्सा पद्धति की अनिवार्यता उन सभी लोगों के लिए है जिनके पूर्वज भारतीय प्राकृतिक वातावरण में रहें हैं। प्राकृतिक चिकित्सा पितृ स्वरूप चिकित्सा पद्धति है, मृत्यु के उपरांत मनुष्य का शरीर पांच तत्वों में समाहित हो जाता है जिसको दूसरे शब्दों में प्रकृति में समाहित होना कहा जाता है अर्थात यह प्रकृति ही हमारी पितृ या पितर हैं। इनका सानिध्य एवं इनका चिंतन मनन तथा इनके नियमों में अपने शरीर को रखना ही पितृ पूजा या प्रकृति पूजा है।👏👏

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