24/01/2026
मीडिया को उसकी शक्ति याद दिलाने का समय है
सुरेश शर्मा
कई बार इस बात का अहसास होता है कि भारत का मीडिया जगत यह नहीं समझ पा रहा है कि आखिरकार उसको करना क्या है? वह सरकार के साथ खड़ा होता है तब उसे गोदी मीडिया बुलाया जाने लग जाता है और विरोध में खड़ा होता है तब उसे देश के विकास का विरोधी करार दिया जाने लगता है। और जब पत्रकारिता अपनी सीमाओं को तलाशने का प्रयास करती है तब मीडिया घराने उसे पीछे खींचने का प्रयास करने में लग जाते हैं। ऐसे में मीडिया लय नहीं पकड़ पा रहा है। प्रमुख व्यावसायिक घरानों ने मीडिया को खरीदकर उनकी स्थिति क्रिकेट के खिलाड़ियों की भांति बना दी है कि एक मुश्त कीमत लेकर उनकी लाभ हानि के लिए खेलते जाएं? मीडिया कारपोरेट कामकाज करने लग गया जिसमें से पत्रकारिता गायब सी हो गई है। यह समय यही याद दिलाने का है कि उसकी शक्ति क्या है और किस प्रकार के काम में छुपी हुई है।
नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) इस बात से चिंतित है कि मीडिया घराने भ्रमित हो गए हैं कि उनको आखिरकार करना क्या है? जिससे पत्रकारिता का मूल आधार भी बचा रहे और उनके व्यापार को भी नुकसान न हो। क्योंकि जिस घराने ने मीडिया संस्थान खरीदा है उनसे अब बिड़ला जी या रामनाथ गोयनका जी जैसी उम्मीद तो नहीं कर सकते हैं। न ही टाइम्स आफ इंडिया के जैन बंधुओं जैसी सजग पत्रकारिता की ही अपेक्षा की जा सकती है। आज के मालिक अपने व्यावसायिक घरानों के संरक्षण के तौर पर मीडिया के बड़े नाम वाले संस्थानों को अपने पक्ष में ले रहे हैं। वैसे भी दूसरे दौर से ही मीडिया संचालकाें ने अपने पत्रकारीय काम के साथ व्यापार का विस्तार करना शुरू कर दिया था। वह इसलिए जरूरी था क्योंकि आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार पर निर्भर रहकर पत्रकारिता के चरित्र का संरक्षण नहीं किया जा सकता है। इसलिए विरोधाभास पनपना शुरू हुआ। जिसका निरंतर विस्तार होता जा रहा है।
देश का लोकतंत्र चार स्तंभों पर टिका हुआ है आमतौर पर यही अवधारणा है। सबसे ताकतवर न्यायपालिका है। ताकतवर इसलिए क्योंकि उसके काम का अतिक्रमण नहीं हो सकता है। उसे इस बात का शायद सन्तुलन बैठना पड़ता हो कि सरकार की बिना किसी बड़े कारण से किरकिरी न हो जाए? उसके कार्य में हस्तक्षेप जैसी बात न हो जाए। अन्यथा न्यायपालिका को अपना काम सहज रूप से करने की आजादी है। जबकि इसके विपरीत कार्यपालिका पर विधायिका की न केवल निगरानी है अपितु सीधा हस्तक्षेप है। लोकतंत्र की संरचना में ऐसा करना जरूरी भी है। कार्यपालिका को सरकार के साथ मिलकर काम करना होता है और सरकार को जनादेश लेना होता है। सरकार जनादेश के लिए जनता के पास जाती है जबकि कार्यपालिका का सीधा वास्ता जनता से पड़ता है। इसलिए सरकार अर्थात विधायिका और कार्यपालिका का तालमेल होना जरूरी है। मामूली लाइन है जो अधिकारों और जवाबदेही का निर्धारण करती है। संविधान ने इन तीनों स्तंभों के काम का बंटवारा किया है। जबकि चौथा स्तंभ खबर पालिका यानी मीडिया को संविधान प्रदत्त कोई शक्ति नहीं है। उसका काम सभी पर निगरानी रखने का तय किया गया क्योंकि सरकार चाहती है कि कार्यपालिका पर निगरानी रखने में मीडिया उसका साथ दे। इसलिए समाचारों का बड़ा भाग व्यवस्था को सुधारने में ही खप जाता था। मीडिया को जनता और सरकार के बीच सेतु की भूमिका के रूप में देखा जाता था। इसे दूसरी भाषा में जन सरोकार की पत्रकारिता कहा जाता है।
पत्रकार की भूमिका इसी बात के लिए है कि वह एक तो सेतु का काम करें? वह सेतु जनता और सरकार के बीच में भी हो सकता है। वह कार्यपालिका और विधायिका के बीच में भी हो सकता है तथा न्यायपालिका को सत्य और तथ्य देने के लिए भी हो सकता है। यही बात है कि पत्रकारिता से सभी मित्रता भी रखना चाहते हैं और दूरी है यह दिखाने का प्रयास भी करते हैं। इसका कोई सभी पक्षों के कामकाज में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं पड़ता था।
न्यायपालिका के पास राजनीतिक विवाद के मामले अधिक पहुंचने लगे हैं। तब वह संविधान की व्याख्या करने में ज्यादा समय देने लग गयी। सरकार के कार्यों को, सत्ता के संचालन का अनुभवी विपक्ष न्यायालय में चुनौती देने लग गया तो न्याय व्यवस्था को भी सरकार के साथ खेलने में मजा आने लग गया। परिणाम यह हुआ कि खुद के काम को बोझ कम हो नहीं पाता है। बोझ है तभी इसके कारण मीडिया के साथ सख्ती का प्रदर्शन करना पड़ता है। इसके बाद भी न्यायपालिका की सराहना करना पड़ेगी कि वह आज भी मीडिया की नजर में सर्वश्रेष्ठ है।
कार्यपालिका की जवाबदेही तय करने का दायरा भी कम होता जा रहा है और साधन भी कम हो रहे हैं। विधानसभाओं के सत्र कम अवधि के होने के कारण लोकतंत्र तो प्रभावित होता ही है साथ में विधायकी का कार्यपालिका पर दबाव का अधिकार भी सीमित होता जा रहा है। विपक्ष को तो इससे सबसे अधिक घाटा हो रहा है। वैसे भी पिछले कुछ वर्षों से मीडिया के समाचारों का केन्द्र राजनीति की तरफ अधिक घूमा है। कार्यपालिका जबकि अधिकांश अव्यवस्थाओं के लिए सीधे जिम्मेदार होती है लेकिन निशाना राजनीति करने वालों पर साधा जाता है। इससे भी ब्यूरोक्रेसी में काम के प्रति लापरवाही का भाव पनता जा रहा है। इसे संभालने या सन्तुलित बनाने का काम खबर पालिका के पास आ जाता है। लेकिन पत्रकार संगठन के नाते यदि समीक्षा करते हैं तब यह लगता है कि कार्यपालिका को दिशा दिखाने या सेतु बनने की हमारी भूमिका कमजोर हो रही है। मीडिया के बाद जनता के साथ तालमेल वाला स्तंभ कार्यपालिका ही होता है। जिसका हाथ जनता की नब्ज पर होता है। मीडिया का तालमेल या सेतु बनने का जोड़ कम हो रहा है तब जनता की नब्ज को पहचानने की क्षमता पत्रकारिता की भी कम होती जा रही है।
इसका असर राजनीतिक क्षेत्र पर सीधा पड़ता है। राजनेताओं का मीडिया के साथ तालमेल का आधार कोई भय नहीं है। पत्रकारिता की जनता की नब्ज पर पकड़ होती है और राजनेता इसका अपने हित में उपयोग करते हैं। जब यह पकड़ ही कमजोर होती जायेगी तब पत्रकार राजनेता के किस काम का रहेगा। इससे खीज कर मीडिया ने नेताओं को हर विषय को दोषी बताना शुरू कर दिया। खबरों के केन्द्र में नेताओं को रखना शुरू कर दिया और ब्यूरोक्रेसी को दूर करना शुरू कर दिया। तब नेताओं के दिमाग से पत्रकार की असल परिभाषा गायब होने लग गई। अब सरकारों में भी खबर पालिका का प्रभाव कम होने लग गया है। जिन समाचार पत्रों का संचालन घराने करने लग गए वे अपने व्यावसायिक कार्यों के लिए पत्रकार के नाम व काम का उपयोग करने लग गए। ऐसे में पत्रकार की ताकत कम हो गई और समाचार संस्थान की व्यापारिक कमी का सरकार को पता चलता गया। जिससे यह खबर पालिका नामक संस्था कमजोर होती चली जा रही है। संस्थान ने पत्रकार को कर्मचारी बना दिया और वह कार्यालय में पहुंचने के बाद नौकर की भूमिका में आ जाता है। परिवार चलाने का डर उसको भी खुलकर पत्रकारिता नहीं करने देता है।
पत्रकारिता का एक वर्ग वह भी है जो घरानों की परिधि में नहीं आता है लेकिन प्रभावशाली मीडिया पक्ष होता है। उसको राजनेता भी आर्थिक सहयोग करते थे। व्यावसायिक घराने भी मदद करते थे और सरकार की मंशा भी यह होती थी कि पत्रकारिता जिंदा रहे इसके लिए इनका बचे रहना जरूरी है। लेकिन जनसरोकार कम होता गया और इस प्रकार के वर्ग के सामने आर्थिक संकट आता चला गया। अत: यह पक्ष भी कमजोर होता चला जा रहा है। अब सरकारों ने मीडिया प्रबंधन के लिए पुराना वह तरीका जिसमें पत्रकार या समाचार पत्र संचालक के साथ बात करके खबर का सच जानने का प्रयास किया जाता था वह रास्ता पूरी तौर पर बंद कर दिया गया। अब तो सरकार सीधे दंडात्मक कार्यवाही करती है। छोटे-बड़े ही क्या सभी के विज्ञापन बंद करने की कार्यवाही पुलिसिया चालानी कार्यवाही की भांति की जाने लगी है। मीडिया प्रबंधन अब दबाव में लाकर किया जाने लग गया है। यही कारण है कि अब देश में मीडिया कमजोर होता जा रहा है।
इसका आखिरकार रास्ता क्या है? इसको लेकर चिंता कौन करेगा? अब आप मीडिया घरानों से इसकी अपेक्षा मत रखिए। क्योंकि मीडिया घरानों को धनपतियों ने खरीदा ही अपने कार्य के लिए है। उनका जन सरोकार नामक चिड़िया से कोई सरोकार नहीं है। जनसरोकार, भ्रष्टाचार, संवेदनहीनता, लापरवाही, गैर जिम्मेदारी की खबरें अब इनके माध्यम ये तो आना नहीं हैं। पत्रकारिता में दूसरे वर्ग का क्षेत्र ही कुछ कर सकता है। उसे आर्थिक सहारा नहीं मिलने पर वह तत्काल घुटनों पर आ जाता है। तब वह सच या सरोकार की बात कहां से कर पाएगा? यही इस समय देश में हो रहा है। यही तो बदलना है?
इसका यह तात्पर्य कतई नहीं है कि देश में मीडिया कमजोर हो गया? वास्तव में पत्रकारिता कमजोर नहीं हुई है उसने किन्हीं कारणों से राह बदली ली। राह भी ऐसी बदल ली कि उसे यह याद ही नहीं है कि उसकी असल राह कौन सी है? इसलिए नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) का कहना है कि आज का मीडिया उस हनुमान की भांति हो गया है जिसे अपने विवेक और शक्ति का अहसास नहीं है। वह भूल गया है कि वह सौ योजन का यह समुन्दर एक बार में ही लांघ कर जा सकता है? उसे उस शक्ति का अहसास कराने या याद दिलाने के लिए एक जामवंत की जरूरत है। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) ने जामवंत बनने का बीड़ा उठाया है। हमने राजस्थान के बीकानेर की कार्यसमिति की बैठक में इस पर विस्तृत चर्चा की और देश में अलख जगाने का तय किया। मीडिया बुद्धि, विवेक और शक्ति संपन्न हनुमान की भूमिका में आए। इसके लिए उसे जन सरोकार के अपने धर्म की राह पर चलना होगा और तभी भारत के लोकतंत्र की सही रक्षा की जा सकती है। इसके लिए आज की जरूरतों वाले कानून भी पत्रकारिता का संरक्षण करने के लिए बनना चाहिए। नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) की दूसरी कार्यसमिति की बैठक विजयवाड़ा आंध्र प्रदेश में यह तय किया गया कि सरकार को इस बात का अहसास कराया जाये कि जिस अनुच्छेद 19 (एक) (ए) में अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार आम जनता को दिया गया है यदि उतना ही अधिकार पत्रकारिता को भी दिया जायेगा तब यह पत्रकारिता की स्वतंत्रता कहने जाने वाली बात नहीं होगी। पंडित नेहरू से लगाकर अटल बिहारी वाजपेयी स्वतंत्र पत्रकारिता के पक्षधर रहे हैं। पत्रकारिता को लोकतंत्र का सबसे ताकतवर स्तंभ माना जाता रहा है। अभिव्यक्ति कानून से उस व्यक्ति को संरक्षण मिलता है जो अपनी बात कहता है। लेकिन पत्रकारिता तो दूसरे की बात को अपनी जुबान देती है। इसलिए उसके लिए पत्रकारिता में कहने के अधिकार की अलग से व्याख्या करने की जरूरत है। यही तो वह शक्ति है जिसकी जानकारी पत्रकार जगत को देना जरूरी है। जनसरोकार के बिना पत्रकारिता प्राणरहित होती है। ऐसी मरी हुई पत्रकारिता लोकतंत्र का बोझ नहीं उठा सकती है।
(लेखक नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और देश के जाने माने पत्रकार हैं)