07/02/2026
तकनीक, मुद्रा, सबको रोजगार और राष्ट्र-निर्माण
सार्वजनिक विमर्श में एक आम धारणा यह है कि सरकारें घरों की तरह काम करती हैं और उन्हें खर्च करने से पहले कमाना या उधार लेना पड़ता है। यह दृष्टिकोण एक संप्रभु राज्य की वास्तविक प्रकृति को नहीं समझता। जो राष्ट्र अपनी स्वयं की मुद्रा जारी करता है, वह वित्तीय रूप से घरों की तरह सीमित नहीं होता; उसकी वास्तविक सीमा श्रम, तकनीक, ऊर्जा और कच्चे माल जैसे वास्तविक संसाधनों से निर्धारित होती है। इन्हीं संसाधनों के समुचित उपयोग से विकास और रोजगार सृजित होता है।
मानव इतिहास दर्शाता है कि आर्थिक प्रगति का मूल आधार तकनीक रही है। शिकारी-संग्रहकर्ता समाजों में लगभग सारा श्रम केवल जीवित रहने में लग जाता था, इसलिए अधिशेष संभव नहीं था। कृषि और औद्योगिक समाज के विकास के साथ तकनीकी उन्नति ने उत्पादकता बढ़ाई और अधिशेष का सृजन किया। इसी अधिशेष ने शासन, प्रशासन, अनुसंधान और सार्वजनिक सेवाओं को संभव बनाया। राज्य का उदय धन के कारण नहीं, बल्कि अधिशेष और श्रम के समन्वय की आवश्यकता के कारण हुआ।
मुद्रा इस समन्वय का एक प्रमुख उपकरण है। प्रारंभिक राज्यों में आधुनिक मुद्रा से पहले लेखांकन प्रणालियों के माध्यम से दायित्वों और संसाधनों का प्रबंधन किया जाता था। समय के साथ मुद्रा वस्तु-मुद्रा से फिएट मुद्रा तक विकसित हुई। फिएट प्रणाली में मुद्रा कोई दुर्लभ वस्तु नहीं, बल्कि राज्य द्वारा श्रम और संसाधनों को सक्रिय करने का नीतिगत साधन होती है। इसका सबसे महत्वपूर्ण उपयोग रोजगार सृजन में होता है।
कराधान की भूमिका भी इसी संदर्भ में समझी जानी चाहिए। कर सीधे तौर पर सरकारी खर्च को “फंड” नहीं करते। वे राज्य की मुद्रा के लिए मांग पैदा करते हैं और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में मदद करते हैं। औपनिवेशिक अर्थव्यवस्थाओं में करों ने लोगों को मौद्रिक अर्थव्यवस्था में प्रवेश के लिए बाध्य किया। आधुनिक राज्य में कर व्यवस्था का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी खर्च—विशेषकर रोजगार पर होने वाला खर्च—मूल्य स्थिरता के साथ किया जा सके।
आर्थिक सोच की एक बड़ी त्रुटि “घरेलू उपमा की त्रुटि” (Household Fallacy) है। घरों को खर्च करने से पहले कमाना पड़ता है और वे बेरोजगारों को काम नहीं दे सकते। इसके विपरीत, संप्रभु सरकार पहले खर्च करती है और निजी क्षेत्र की आय बनाती है। सरकार का घाटा निजी क्षेत्र की बचत के बराबर होता है। जब सरकार खर्च कम करती है या अधिशेष चलाती है, तो उसका सीधा परिणाम बेरोजगारी के रूप में सामने आता है।
इसी संदर्भ में “सबको रोजगार” या “यूनिवर्सल जॉब गारंटी” की अवधारणा सामने आती है। बेरोजगारी कोई प्राकृतिक स्थिति नहीं, बल्कि नीति-विफलता है। यदि अर्थव्यवस्था में श्रम उपलब्ध है और सार्वजनिक आवश्यकताएँ अधूरी हैं—जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण, देखभाल कार्य—तो राज्य का दायित्व है कि वह रोजगार प्रदान करे। जॉब गारंटी कार्यक्रम के तहत सरकार अंतिम नियोक्ता (Employer of Last Resort) की भूमिका निभाती है, जिससे कोई भी व्यक्ति जो काम करना चाहता है, वह बेरोजगार न रहे।
सरकारी खर्च की वास्तविक सीमा बजट घाटा नहीं, बल्कि मुद्रास्फीति है। यदि संसाधन बेकार पड़े हों, तो रोजगार पर किया गया सरकारी खर्च उत्पादन बढ़ाता है, कीमतें नहीं। इसके विपरीत, बेरोजगारी स्वयं एक अपव्यय है—यह श्रम, कौशल और मानवीय गरिमा का नुकसान है। इतिहास बताता है कि महामंदी के दौरान सार्वजनिक रोजगार कार्यक्रमों और विभिन्न देशों में राज्य-नेतृत्व वाले विकास ने अर्थव्यवस्थाओं को स्थिरता और दिशा प्रदान की।
अंततः, किसी राष्ट्र की वास्तविक संपत्ति उसका धन नहीं, बल्कि उसके लोग और उनकी उत्पादक क्षमता होती है। मुद्रा केवल एक साधन है। एक सक्षम राज्य का लक्ष्य केवल बजट संतुलन नहीं, बल्कि सबको रोजगार, पूर्ण उपयोग में लाई गई क्षमताएँ और दीर्घकालिक राष्ट्र-निर्माण होना चाहिए। कोई राष्ट्र पैसे की कमी से गरीब नहीं होता; वह तभी गरीब होता है जब वह अपने लोगों को काम देने और उनकी क्षमताओं का उपयोग करने में विफल रहता है।