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टॉड मीना बाज़ार और राजपूत महिलाओं का ज़िक्र करते हुए बताते है कि "रायसिंह की पत्नी शाही प्रलोभन से खुद को बचा न सकी, वह ...
16/05/2026

टॉड मीना बाज़ार और राजपूत महिलाओं का ज़िक्र करते हुए बताते है कि "रायसिंह की पत्नी शाही प्रलोभन से खुद को बचा न सकी, वह अपनी इज्जत खोकर मगर गहनों से लदी हुई लौटी"। इस पर पृथ्वीराज ने भाई को खत लिखकर ताना दिया :
“वह तो सोने के गहनों की छनछनाहट के साथ लौट आई, पर तेरी मूंछ कहाँ है”
Book :Annals of Mewar

आज एक कहानी काफ़ी वायरल है सोशल मीडिया पर जिसके बारें में तथ्य इस प्रकार है की पृथ्वीराज चौहान 1192 में मर गया था और मो ...
16/05/2026

आज एक कहानी काफ़ी वायरल है सोशल मीडिया पर जिसके बारें में तथ्य इस प्रकार है की पृथ्वीराज चौहान 1192 में मर गया था और मो गौरी 1206 में मारा गया।
मो. गौरी को किसने मारा ? इसका उत्तर आपको THE STORY OF ISLAMIC IMPERIALISM IN INDIA किताब में मिल जाएगा जो आसानी से इंटरनेट पर पढ़ी जा सकती है।
गपोड़ इतिहास की बजाय ऑथेंटिक बुक्स पढ़ें।

सुरेंद्र सिंह राजपूत एक मासूम बछडी से कुकर्म करते गिरफ्तार।
16/05/2026

सुरेंद्र सिंह राजपूत एक मासूम बछडी से कुकर्म करते गिरफ्तार।

16/05/2026

दुनिया का सबसे तगड़ा धंधा है ये
Zero investment and regular income

Rajput widows were often involved in illicit relationships to satisfy their s  needs and after becoming pregnant, they k...
16/05/2026

Rajput widows were often involved in illicit relationships to satisfy their s needs and after becoming pregnant, they killed their infant to hide it.

1861 की पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, पटना डिवीजन में नवजातों को छोड़ने के मामलों में बढ़ोतरी हुई। मजिस्ट्रेट के मुताबिक, ज़्...
16/05/2026

1861 की पुलिस रिपोर्ट के अनुसार, पटना डिवीजन में नवजातों को छोड़ने के मामलों में बढ़ोतरी हुई। मजिस्ट्रेट के मुताबिक, ज़्यादातर केस राजपूत विधवाओं के थे, जो पति के मृत्यु के बाद नाजायज़ शारीरिक संबंधों से जन्मे नवजात बच्चों को समाज की बदनामी से बचने के लिए फैंक देती थीं।

बधाई हो जुग जुग जिओ बाईसा श्रीमती अंजलि भाटी जैसलमेर उर्फ़ योगेश्वरी कुमारी देवी साहिबा एंव साहिबज़ादा श्री उमर फ़ारूक़ ...
15/05/2026

बधाई हो जुग जुग जिओ बाईसा श्रीमती अंजलि भाटी जैसलमेर उर्फ़ योगेश्वरी कुमारी देवी साहिबा एंव साहिबज़ादा श्री उमर फ़ारूक़ अली जी साहेब, अल्लाह से हम यही प्रार्थना करते हैं कि आप सदा खुश रहें। कुछ लोग अभद्र कमैंट्स कर रहें हैं उन पर तरस आता हैं तुम लोग होते कौन हो किसी की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप करने वाले !

Bai Ji Lal Smt. Anjali Bhati Ji Saheba Jaisalmer AKA Yogeshwari Kumari Devi Ji Saheba is Princess of Jaisalmer. Princess married Sahibzada Shri Omar Faruq Ali Ji Saheb, Prince of Bhopal. He is the director of Bal Bhavan School, Bhopal.
*Bai Ji Lal Anjali Bhati saheba is second daughter of Maharaj Shri Chandra Vir Singh Ji Saheb of Jaisalmer and Rani Smt. Renuka Bhati Ji Sahiba.
बाई जी लाल श्रीमती अंजलि भाटी साहिबा जैसलमेर उर्फ़ योगेश्वरी कुमारी देवी साहिबा जैसलमेर की राजकुमारी सा हैं और उनके पतिश्री साहिबज़ादा श्री उमर फ़ारूक़ अली जी साहेब, राजकुमार सा (भोपाल) हैं I वे बाल भवन स्कूल भोपाल की डाइरेक्टर हैं I
*बाई जी लाल अंजलि भाटी साहिबा महाराज श्री चंद्र वीर सिंह जी साहेब जैसलमेर और रानी श्रीमती रेणुका भाटी जी साहिबा के द्वितीय सुपुत्रिका हैं I

बख्त सिंह ने एक रात अपने पिता अजीत सिंह को अपनी बीवी के साथ संभोग करते हुए पकड़ लिया। और आवेश में आके अपने खंजर से उनकी ...
15/05/2026

बख्त सिंह ने एक रात अपने पिता अजीत सिंह को अपनी बीवी के साथ संभोग करते हुए पकड़ लिया। और आवेश में आके अपने खंजर से उनकी संभोग लीला समाप्त कर दी। अजीत सिंह के खून से सनी बख्त सिंह की बीवी जो उन समय पूरी तरह न’ग्न अवस्था में थी, उसने पैर पकड़ कर माफी और दया के लिए याचना की। लेकिन बख्त सिंह ने उसकी एक न सुनी और इसके बाद उसका चेहरा तक न देखा।
इस तरह एक बूढ़े बन्ना को उन्हीं की बहु की फुद्दि ले डूबी।

खबर पिछले साल की है लेकिनबहुत दुखद और शर्मनाक घटना हुई थी ये, भन्ना कुलदीप राठौड़ ने अपनी चाचा की बेटी आरती राठौड़ से वि...
15/05/2026

खबर पिछले साल की है लेकिन
बहुत दुखद और शर्मनाक घटना हुई थी ये, भन्ना कुलदीप राठौड़ ने अपनी चाचा की बेटी आरती राठौड़ से विवाह करना चाहा लेकिन असफल होने पर घटना कारित कर फरार हो गया। बताया जा रहा है कि कुलदीप राठौड़ अपनी बहन से एकतरफा प्यार करता था।

मुग़ल-राजपूत वैवाहिक संबंधों पर एक नजर👇🏻जनवरी 1562- राजा भारमल की बेटी से अकबर की शादी (कछवाहा-अंबेर)- 15 नवंबर 1570- रा...
15/05/2026

मुग़ल-राजपूत वैवाहिक संबंधों पर एक नजर👇🏻
जनवरी 1562- राजा भारमल की बेटी से अकबर की शादी (कछवाहा-अंबेर)
- 15 नवंबर 1570- राय कल्याण सिंह की भतीजी से अकबर की शादी (राठौर-बीकानेर)
- 1570- मालदेव की बेटी रुक्मावती का अकबर से विवाह (राठौर-जोधपुर)

- 1573 - नगरकोट के राजा जयचंद की बेटी से अकबर की शादी (नगरकोट)
- मार्च 1577- डूंगरपुर के रावल की बेटी से अकबर का विवाह (गहलोत-डूंगरपुर)
- 1581- केशवदास की बेटी की अकबर से शादी (राठौर-मोरता)

- 16 फरवरी, 1584- भगवंत दास की बेटी से राजकुमार सलीम (जहांगीर) की शादी (कछवाहा-आंबेर)
- 1587- जोधपुर के मोटा राजा की बेटी से जहांगीर का विवाह (राठौर-जोधपुर)
- 2 अक्टूबर 1595- रायमल की बेटी से अकबर के बेटे दानियाल का विवाह (राठौर-जोधपुर)

- 28 मई 1608- राजा जगत सिंह की बेटी से जहांगीर की शादी (कछवाहा-आंबेर)
- 1 फरवरी, 1609- रामचंद्र बुंदेला की बेटी से जहांगीर का विवाह (बुंदेला, ओरछा)
- अप्रैल 1624- राजा गजसिंह की बहन से जहांगीर के बेटे राजकुमार परवेज की शादी (राठौर-जोधपुर)

- 1654- राजा अमर सिंह की बेटी से दाराशिकोह के बेटे सुलेमान की शादी (राठौर-नागौर)
- 17 नवंबर 1661- किशनगढ़ के राजा रूपसिंह राठौर की बेटी से औरंगज़ेब के बेटे मो. मुअज़्ज़म की शादी (राठौर-किशनगढ़)
- 5 जुलाई 1678- राजा जयसिंह के बेटे कीरत सिंह की बेटी से औरंगज़ेब के बेटे मो. आज़म की शादी (कछवाहा-आंबेर)
- 30 जुलाई 1681- अमरचंद की बेटी औरंगज़ेब के बेटे कामबख्श की शादी (शेखावत-मनोहरपुर)

कई राजपूत बच्चों ने पाई गद्दी
1587 में जहांगीर और मोटा राजा की बेटी जगत गोसांई की शादी हुई, जिससे 5 जनवरी 1592 को लाहौर में शाहजहां पैदा हुआ. अकबर ने जन्म के छठे दिन खुशी में उसका नाम खुर्रम (खुशी) रखा. जहांगीर की पत्नी नूरजहां का काफ़ी ज़िक्र होता है पर शेर के हमले से उन्हें असल में उनकी राजपूत बीवी जगत गोसांईं ने ही बचाया था. तुज़ुक-ए-जहांगीरी के मुताबिक़ उन्होंने पिस्तौल भरकर शेर पर चलाई, जिसके बाद जहांगीर की जान बची. नूरजहां ने इसके बाद ख़ुद शिकार करना सीखा.

यानी शाहजहां के बेटे औरंगज़ेब की दादी एक राजपूत थी. ग़ौरतलब यह भी है कि मुग़लों और राजपूतों के बीच शादियां औरंगज़ेब के समय भी जारी रहीं. ख़ुद औरंगज़ेब की दो पत्नियां हिंदू थीं. और उनसे पैदा हुए बच्चे कई बार बाक़ायदा उत्तराधिकार की जंग में जीते.

‘मुग़लों को मुसलमान कहना ही ग़लत’
क्लीनिकल इम्यूनोलॉजिस्ट डॉ. स्कंद शुक्ला कहते हैं कि मुग़ल बादशाहों और राजपूत रानियों से पैदा होने वाली संतानें दरअसल आधी राजपूत होंगी. उनका कहना है कि जेनेटिक्स के मुताबिक़ संतान में आधे गुण यानी 23 क्रोमोसोम पिता से और 23 क्रोमोसोम मां से आते हैं. चूंकि मुग़लों के परिवार पितृसत्तात्मक थे इसलिए उन्हें मुग़ल माना गया मगर जैविक तौर पर वो आधे भारतीय हो चुके थे. यही नहीं, डॉ स्कंद कहते हैं कि अगर इस तरह की शादियां लगातार जारी रहती हैं तो अगली पीढ़ियां पिछले गुणों को खो देती हैं. वह कहते हैं कि मेडिकल साइंस के नज़रिए से बाद की पीढ़ियों में राजपूती गुण ज़्यादा और विदेशी मूल के गुण कम हो गए होंगे.

राजपूतों की बेटियों का असर
राजपूतों की बेटियां सिर्फ हरम तक सीमित नहीं थीं. वो बादशाहों के फैसले प्रभावित करतीं थीं. बदायूंनी लिखता है कि अकबर ने अपनी हिंदू पत्नियों के कहने पर बीफ़, लहसुन-प्याज़ खाना छोड़ दिया था. 1604 में हमीदा बानो बेग़म की मौत के बाद अकबर ने सिर मुंडवाया था, क्योंकि यह हिंदू रानी की इच्छा थी. 1627 में शाहजहां की राठौर पत्नी जोधपुर में 8 दिन सिर्फ़ इसलिए रुकी ताकि वह अपने पति शाहजहां के लिए ज़रूरी समर्थन जुटा सके. 1605 में जहांगीर ने अपनी हिंदू पत्नी की मौत के ग़म में 4 दिन खाना नहीं खाया. तुज़ुक-ए-जहांगीरी में इसका तफ़सील से ज़िक्र है.

मुग़ल फ़ौज में सिर्फ़ मुसलमान नहीं थे
मुग़ल ताक़त को खड़ा करने वाले विदेशी मूल के नहीं बल्कि पूरी तरह भारतीय और अपनी बहादुरी के लिए मशहूर राजपूत, जाट और पठान थे. बर्नियर बताते हैं कि मुग़ल फ़ौज में राजपूत, पठान, ईरानी, तुर्क और उज़्बेक शामिल थे और इनमें जो गोरा यानी सफ़ेद रंग का होता था तो उसे मुग़ल मान लिया जाता था. मुग़ल सेना में पैदल, घुड़सवार और तोपखाना तीनों में कुल का 80 फ़ीसदी से ज़्यादा राजपूत, जाट और पठान होते थे और बाक़ी विदेशी मूल के सैनिक.

यही नहीं सेना में मनसबदारों को पैदल और सवार जाट, राजपूत या पठान मिलते थे. मिसाल के लिए बादशाह की ओर से इक हज़ारी की पदवी का मतलब था उस मनसबदार को 1000/1000 यानी एक हज़ार पैदल जाट और एक हज़ार घुड़सवार सेना रखने का हक़ था. अतहर अली ने अलग-अलग बादशाहों के दौर में मनसबदारों की स्थिति को बखूबी इसे बयान किया है-

Mansabdaar3
मुगलों की सेना मूलत: राजपूतों, जाटों और पठानों से मिलकर बनती थी.

इसे देखकर आसानी से समझा जा सकता है कि चार बड़े मुग़ल बादशाहों के वक़्त राजपूत, दूसरे हिंदुओं और भारतीय मुस्लिम मनसबदारों की साझेदारी तक़रीबन आधी थी. ध्यान रहे कि ये सिर्फ़ ओहदेदार थे. इनकी सेना मूलत: राजपूतों, जाटों और पठानों से मिलकर बनती थी. चौंकाने वाली बात यह है कि औरंगज़ेब के समय न सिर्फ़ राजपूत मनसबदार बल्कि मराठा मनसबदारों की संख्या दूसरे मुग़ल बादशाहों के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा थी. काबुल, कांधार, बर्मा और तिब्बत तक साम्राज्य के विस्तार के लिए अगर मुग़लों को किसी पर सबसे ज़्यादा यक़ीन था तो वो थे- राजपूत.

Mansabdaar2
औरंगजेब की फौज में सबसे ज्यादा मनसबदार थे.

औरंगजेब ने जब शिवाजी को रोकने को भेजा राजपूत रिश्तेदार
जब शिवाजी को रोकने की औरंगज़ेब की सारी कोशिशें नाकाम हो गईं तो उस वक़्त के सबसे बड़े मनसबदार और अपने समधी मिर्ज़ा राजा जय सिंह को उसने दक्कन भेजा. जय सिंह ने एक के बाद एक क़िले जीतकर शिवाजी को पीछे हटने को मजबूर किया. जदुनाथ सरकार ‘शिवाजी एंड हिज़ टाइम्स’ में लिखते हैं कि कैसे जयसिंह ने 11 जून 1665 को पालकी में इंतज़ार कर रहे शिवाजी से सिर्फ इसी शर्त पर मिलना स्वीकार किया कि वह शिवाजी की कोई शर्त नहीं मानेंगे और उन्हें अपने सारे क़िले बिना शर्त मुग़लों को सौंपने होंगे. शिवाजी ने शर्त मानी और औरंगज़ेब के दरबार में आने को मजबूर हुए.

जय सिंह का ओहदा इतना बड़ा था कि उनके कहने पर औरंगज़ेब ने दाराशिकोह का पक्ष लेने वाले राजा जसवंत सिंह तक को माफ़ कर दिया था और उसकी मनसबदारी भी बरकरार रखी थी.

राजकुमार शाह शुजा जब आगरा के तख़्त के लिए बढ़ा, तो उसे रोकने के लिए शाहजहां ने राजकुमार सुलेमान शिकोह के साथ राजा जय सिंह और अनिरुद्ध गौड़ को भेजा. बड़ी ताताद में राजपूतों ने तख़्त की लड़ाई में औरंगज़ेब का साथ दिया. इनमें शुभ करन बुंदेला, भागवत सिंह हाड़ा, मनोहर दास हाड़ा, राजा सारंगम और रघुनाथ राठौर प्रमुख थे. ज़्यादातर राजपूत राजाओं ने तख्त की लड़ाई में शाहजहां और उसके बड़े बेटे दाराशिकोह का विरोध किया था.

मुग़ल शासन का हिस्सा रहे राजपूत राजाओं ने कई शहर बसाए और मंदिर बनवाए. मसलन, राजा मानसिंह ने बंगाल में राजमहल नगर, राव करन सिंह ने दक्कन में करनपुरा और रामदास कछवाहा और राम मनोहर ने पंजाब में बाग़ बनवाए. मान सिंह ने उड़ीसा में और बीर सिंह बुंदेला ने मथुरा में मंदिर बनवाया. राव करन सिंह ने नासिक के मंदिरों को भारी दान दिया. और ये सभी मुग़ल प्रशासन का हिस्सा थे.

ऐसे में अगर मुग़ल का मतलब सिर्फ़ विदेशी आक्रमणकारी मुसलमान है तो यह हास्यास्पद तो है ही, सही भी नहीं लगता. भारत में आक्रमणकारी के तौर पर वो आए तो थे मगर वो अगर टिके तो शायद इसलिए क्योंकि उन्होंने
बग़ैर किसी हिचक के उस वक़्त यहां की ताक़तों से हाथ मिलाया, उनसे गहरे पारिवारिक रिश्ते निभाए. हालांकि इसके चलते वो अपनी पहचान खोकर यहीं घुलमिल गए.

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