03/08/2026
" गुरु गौरवोत्सव "
सक्षम टीचर्स फोरम (STF)
गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर के उपलक्षय पर सक्षम टीचर्स फोरम द्वारा "गुरु गौरवोत्सव" का भव्य एवं गरिमामय आयोजन दिनांक 02 अगस्त, 2026 को दौलत राम महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय में संपन्न हुआ। कार्यक्रम का उद्देश्य भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा के आदर्शों का पुनर्स्मरण, शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता एवं सम्मान प्रकट करना तथा भारतीय ज्ञान परंपरा, समावेशी शिक्षा और राष्ट्रनिर्माण में गुरु की भूमिका को रेखांकित करना था। इस गरिमामय समारोह में लगभग 250 विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के शिक्षक, विद्यार्थी, शिक्षाविद् एवं विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन, सरस्वती वंदना एवं गुरु वंदना के साथ हुआ। तत्पश्चात विशिष्ट अतिथियों का पुष्पगुच्छ एवं अंगवस्त्र भेंट कर अभिनंदन किया गया।
इस अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के प्रांत प्रचारक माननीय श्री विशाल जी का विशेष सान्निध्य प्राप्त हुआ। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्री विकास कलिया जी, अतिरिक्त निदेशक, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार रहे। मुख्य वक्ता के रूप में प्रोफेसर पवन शर्मा जी, कुलसचिव, श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संरक्षण प्रोफेसर सविता राय जी, प्राचार्या, दौलत राम महाविद्यालय द्वारा किया गया तथा अध्यक्षता प्रोफेसर दयाल सिंह पवार जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सक्षम ने की। डूटा अध्यक्ष प्रो वी एस नेगी की भी गरिमामयी उपस्थिति रही।
माननीय श्री विशाल जी का उद्बोधन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के प्रांत प्रचारक माननीय श्री विशाल जी ने अपने प्रेरक एवं चिंतनपरक उद्बोधन में कहा कि भारत ज्ञान प्राप्त करने की भूमि है और गुरु वह है जो अज्ञान का अंधकार दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। उन्होंने कहा कि गुरु बनना अपने आप में एक कठिन तपस्या है। गुरु केवल शिक्षा नहीं देता, बल्कि शिष्य के जीवन की दिशा निर्धारित करता है तथा उसे सफल, सार्थक एवं राष्ट्रोपयोगी जीवन के लिए प्रेरित करता है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में इंटरनेट एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) ज्ञान और सूचना उपलब्ध करा सकते हैं, किन्तु वे कभी भी गुरु का स्थान नहीं ले सकते, क्योंकि गुरु व्यक्ति के व्यक्तित्व, संस्कार, चरित्र एवं जीवन-दृष्टि का निर्माण करता है। उन्होंने भारतीय संस्कृति के मूल्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय जीवन-दर्शन में हिंसा का कोई स्थान नहीं है तथा समाज को योग्य, संस्कारित एवं राष्ट्रहित के प्रति समर्पित बनाना गुरु का परम दायित्व है।
उन्होंने यह भी कहा कि मनुष्य के आचरण का संचालन उसके अंतर्मन (Subconscious Mind) द्वारा होता है और उस अंतर्मन को संस्कारित एवं अनुशासित करना ही गुरु की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब अमेरिका में उनसे भारत के विषय में पूछा गया तो उन्होंने भारत को "सेवा और त्याग की भूमि" बताया। प्रत्येक भारतीय अपने माता-पिता, समाज एवं राष्ट्र का ऋणी है तथा इस ऋण का निर्वहन राष्ट्रहित में अपना योगदान देकर ही किया जा सकता है। उन्होंने शिक्षकों एवं विद्यार्थियों का आह्वान किया कि वे आत्मचिंतन करें और भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने के संकल्प को साकार करने में अपनी सक्रिय भूमिका निभाएँ।
मुख्य अतिथि श्री विकास कलिया जी का उद्बोधन
मुख्य अतिथि श्री विकास कलिया जी, अतिरिक्त निदेशक, शिक्षा निदेशालय, दिल्ली सरकार ने अपने संबोधन में भारत में दिव्यांगजन सशक्तिकरण की विकास यात्रा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय के साथ समाज एवं शासन की सोच में व्यापक सकारात्मक परिवर्तन आया है। आज दिव्यांगता को दया का विषय न मानकर समान अवसर, सम्मान, गरिमा एवं अधिकारों के दृष्टिकोण से देखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति तथा विभिन्न सरकारी योजनाओं के माध्यम से दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए शिक्षा को अधिक सुलभ, समावेशी एवं प्रौद्योगिकी-सक्षम बनाया जा रहा है। उन्होंने शिक्षकों का आह्वान किया कि वे ऐसा समावेशी शिक्षण वातावरण विकसित करें जहाँ प्रत्येक विद्यार्थी अपनी क्षमता का पूर्ण विकास कर सके और शिक्षा वास्तव में सबके लिए सुलभ बन सके।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर पवन शर्मा जी का व्याख्यान
मुख्य वक्ता प्रोफेसर पवन शर्मा जी ने "भारतीय ज्ञान परंपरा में दिव्यांगता और गुरु-शिष्य संबंध" विषय पर अत्यंत प्रेरणादायी एवं विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में दिव्यांगता को व्यक्ति की सीमा नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक शक्ति, साधना एवं आत्मबोध के संदर्भ में देखा गया है।
उन्होंने दिव्यांगता के दो स्वरूपों—जन्मजात (प्राकृतिक) तथा दुर्घटना अथवा अन्य कारणों से प्राप्त (अर्जित)—का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों ही परिस्थितियों में मनुष्य अपने ज्ञान, संकल्प और पुरुषार्थ के बल पर असाधारण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है।
उन्होंने ऋग्वेद के महान ऋषि दीर्घतमा का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि दृष्टिबाधित होने के बावजूद उन्होंने वैदिक ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया तथा समाज को अमूल्य वैचारिक धरोहर प्रदान की। उन्होंने ऋग्वेद में वर्णित वीरांगना विश्पला का उल्लेख करते हुए कहा कि युद्ध में पैर खो देने के बाद भी कृत्रिम पैर के सहारे पुनः रणभूमि में उतरकर उन्होंने अदम्य साहस और आत्मविश्वास का परिचय दिया। यह उदाहरण सिद्ध करता है कि कोई भी दिव्यांगता व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक पहुँचने से नहीं रोक सकती।
महर्षि अष्टावक्र का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि शारीरिक विकृतियों के बावजूद वे अद्वितीय ज्ञान के धनी बने। जब वे राजा जनक की सभा में पहुँचे तो उनके शरीर का उपहास किया गया, किन्तु उन्होंने अपने ज्ञान से सिद्ध कर दिया कि मनुष्य का वास्तविक मूल्य उसके शरीर से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, चरित्र और आत्मबोध से होता है।
उन्होंने कहा कि भारतीय गुरु-शिष्य संबंध त्याग, समर्पण, श्रद्धा एवं आत्मीयता पर आधारित है; यह किसी प्रकार का लेन-देन या स्वार्थ का संबंध नहीं है। गुरु का वचन शिष्य के लिए मार्गदर्शन होता है। उन्होंने महाभारत के धृतराष्ट्र एवं शकुनि के प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय परंपरा में त्याग, धर्म और लोककल्याण को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, जबकि ईर्ष्या, मोह और स्वार्थ समाज को पतन की ओर ले जाते हैं।
अपने व्याख्यान के अंत में उन्होंने कहा कि जिन व्यक्तियों में किसी प्रकार की दिव्यांगता होती है, वे प्रायः अपने अंतर्मन और संवेदनाओं से अधिक जुड़े होते हैं। यदि समाज उन्हें सम्मान, अवसर और सहयोग प्रदान करे तो वे राष्ट्र निर्माण में असाधारण योगदान दे सकते हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर दयाल सिंह पवार जी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, सक्षम ने भारतीय ज्ञान परंपरा, समावेशी शिक्षा तथा गुरु-शिष्य संबंधों के संरक्षण एवं संवर्धन पर बल दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक केवल ज्ञान का प्रसार नहीं करते, बल्कि संस्कारों, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रभावना का भी निर्माण करते हैं। समाज के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में गुरु की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।
गुरु गौरव सम्मान
समारोह का एक विशेष आकर्षण "गुरु गौरव सम्मान" रहा। इस अवसर पर शिक्षा एवं समाज सेवा के क्षेत्र में उत्कृष्ट एवं प्रेरणादायी योगदान के लिए श्री गोपाल सिंह राठौर जी तथा श्री प्रेम दत्त शर्मा जी को "गुरु गौरव सम्मान" से सम्मानित किया गया। माननीय अतिथियों द्वारा उन्हें सम्मान-पत्र, अंगवस्त्र एवं स्मृति-चिह्न भेंट कर उनके दीर्घकालीन समर्पण, उत्कृष्ट सेवाओं तथा गुरु-परंपरा के संरक्षण एवं संवर्धन में उनके अमूल्य योगदान का अभिनंदन किया गया। उपस्थित सभी शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दोनों सम्मानित विभूतियों का अभिनंदन किया। यह सम्मान समारोह समाज में गुरु के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता एवं भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण का प्रेरणास्पद संदेश देने वाला रहा।
कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. दिव्या सिंह ने किया तथा अंत में डॉ राजेश शर्मा ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का गरिमापूर्ण समापन हुआ।
निष्कर्ष
"गुरु गौरवोत्सव" केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा, समावेशी शिक्षा, दिव्यांगजन सशक्तिकरण, सेवा, त्याग एवं राष्ट्रनिर्माण के मूल्यों का जीवंत उत्सव सिद्ध हुआ। कार्यक्रम में व्यक्त विचारों ने उपस्थित सभी शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं समाजजनों को भारतीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण तथा भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने की दिशा में सक्रिय योगदान देने की प्रेरणा प्रदान की।