आर्ष दृष्टि

आर्ष दृष्टि संसार का उपकार करना आर्य समाज का मुख्य उद्देश्य है।

----------------आर्य समाज के नियम---------------
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(1.)
सब सत्यविद्या और जो विद्या से जाने जाते हैं, उन सबका आदि मूल परमेश्वर है।

(2.)
ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान्, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र, और सृष्टिकर्त्ता है, उसी की उपासना करनी योग्य है।


(3.)
वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढना-पढाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम-धर्म है।

(4.)
सत्य के ग्रहण करने और असत्य के छोडने में सर्वदा उद्यत रहना चाहिए।

(5.)
सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिएँ।

(6)
संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है अर्थात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।

(7.)
सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार, यथायोग्य वर्तना चाहिए।

(8.)
अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिए।

(9.)
प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से संतुष्ट न रहना चाहिए, किन्तु सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।

(10.)
सब मनुष्यों को सामाजिक, सर्वहितकारी नियम पालने में परतन्त्र रहना चाहिए और प्रत्येक हितकारी नियम में सब स्वतन्त्र रहें।

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आर्य समाज की स्थापनाः----
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महर्षि दयानन्द सरस्वती के कर-कमलों द्वारा आर्य समाज की स्थापना चैत्र सुदी 5, सम्वत् 1932 वैक्रमी, तदनुसार 13 अप्रैल, 1875 शनिवार को मुम्बई नगर के गिरगाँव मुहल्ले में डाक्टर माणिकचन्द की वाटिक में सायं समय हुई।

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03/10/2025

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13/07/2025

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29/06/2025

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27/06/2025

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22/06/2025

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18/06/2025
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13/06/2025

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07/06/2025

ईश्वरस्तुतिप्रार्थनोपासनामन्त्राः

24/05/2025

१.) ईश्वर की परिभाषा
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वैदिक संस्कृत Vaidik sanskrit

ईश्वर ने स्वयं परिभाषा बताई है, जो इस प्रकार है :----
ऋचो अक्षरे परमे व्योमन् यस्मिन् देवा अधि विश्वे निषेदुः ।
यस्तन्न वेध किमृचा करिष्यति य इत्तद्विदुस्त इमे समासते ।। वैदिक संस्कार
(ऋग्वेद १/१६४/३९)

जो सब दिव्य गुण, कर्म, स्वभाव, विद्यायुक्त और जिसमें पृथिवी सूर्यादि लोक स्थित है और जो आकाश के समान व्यापक सब देवों का देव परमेश्वर है, वहीं परमात्मा है, उसे ही मानना, जानना चाहिए और उसी का ध्यान करना चाहिए । वैदिक ऋषिकाएँ

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मां गृधः कस्य स्विद्धनम् ।।
(यजुर्वेद ४०/१) वैदिक-वाङ्मयम् VV

जो कुछ इस संसार में जगत् है, उस सबमें व्याप्त होकर जो नियन्ता है, वह ईश्वर कहाता है । उससे डरकर तू अन्याय से किसी के धन की आकांक्षा मत कर । उस अन्याय के त्याग और न्यायाचरणरूप धर्म से अपने आत्मा से आनन्द को भोग । वैदिक संस्कार

अहम्भुवं वसुनः पूर्व्यस्पतिरहं धनानि सं जयामि शश्वतः ।
मां हवन्ते पितरं न जन्तवोऽहं दाशुषे विभजामि भोजनम् ।। (ऋग्वेद १०/४८/१) वैदिक विचारधारा

ईश्वर सबको उपदेश करता है कि हे मनुष्यों ! मैं ईश्वर सबके पूर्व विद्यमान सब जगत् का पति हूं । मैं सनातन जगत् कारण और सब धनों का विजय करने वाला और दाता हूं । मुझ ही को सब जीव जैसे पिता को संतान पुकारते हैं, वैसे पुकारे । मैं सबको सुख देने हारे जगत् के लिए नाना प्रकार के भोजनों का विभाग पालन के लिए करता हूं । वैदिक पीयूष सुधा

अहमिन्द्रो न पराजिग्य इद्धनं न मृत्यवेऽवतस्थे कदाचन ।
सोममिन्मा सुन्वन्तो याचता वसु न मे पूरवः सख्ये रिषाथन ।। (ऋग्वेद १०/४८/५) वेद-वेदाङ्ग-उपाङ्ग Ved

मैं परमैश्वर्यवान् सूर्य के सदृश सब जगत् का प्रकाशक हूं । मैं कभी पराजय को प्राप्त नहीं होता और न कभी मृत्यु को प्राप्त होता हूं । मैं ही जगत् रूप धन का निर्माता हूं । सब जगत् की उत्पत्ति करने वाले मुझ ही को जानो । हे जीवों ! ऐश्वर्य प्राप्ति के यत्न करते हुए तुम लोग विज्ञानादि धन को मुझसे मांगो और तुम लोग मेरी मित्रता से अलग मत होओ । वेदोऽखिलो धर्ममूलम्

अहं दां गृणते पूर्व्यं वस्वहं ब्रह्म कृणवं मह्यं वर्धनम् ।
अहं भुवं यजमानस्य चोदिताऽयज्वनः साक्षि विश्वस्मिन् भरे ।। (ऋग्वेद १०/४९/१) वेदवाणी मासिकी

हे मनुष्यों ! मैं सत्य भाषण रूप स्तुति करने वाले मनुष्य को ज्ञान आदि धन को देता हूं । मैं ब्रह्म अर्थात् वेद का प्रकाश करने हारा और मुझको वह वेद यथावत् कहता । उससे सबके ज्ञान को मैं बढ़ाता , मैं सत्पुरुष का प्रेरक यज्ञ करने हारे को फल प्रदाता और इस विश्व में जो कुछ है, उस सब कार्य का बनाने और धारण करने वाला हूं । इसलिए तुम लोग मुझको छोड़ किसी दूसरे को मेरे स्थान मत पूजो, मत मानो और मत जानो । वेदवाणी

हिरण्मगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ।। (यजुर्वेद) भाषाणां जननी संस्कृत भाषा

हे मनुष्यों ! जो सृष्टि के पूर्व सब सूर्यादि तेज वाले लोकों का उत्पत्ति स्थान, आधार और जो कुछ उत्पन्न हुआ था, है और होगा, उसका स्वामी था, है और होगा । वह पृथिवी से लेके सूर्य लोक पर्यन्त सृष्टि को बनाके धारण कर रहा है । उस सुख स्वरूप परमात्मा ही की भक्ति जैसे हम करें , वैसे तुम लोग भी करो । चाणक्य नीति

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम् ।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्यातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।।
(यजुर्वेद ४०/८) शिशु-संस्कृतम्

वह परमात्मा सब में व्यापक, शीघ्रकारी और अनन्त बलवान् जो शुद्ध, सर्वज्ञ, सबका अन्तर्यामी, सर्वोपरि विराजमान, सनातन, स्वयं सिद्ध, परमेश्वर अपनी जीवरूप सनातन अनादि प्रजा को अपनी सनातन विद्या से यथावत् अर्थों का बोध वेद द्वारा कराता है । आर्ष दृष्टि

वह परमात्मा कभी शरीर धारण वा जन्म नहीं लेता, जिसमें छिद्र नहीं होता, नाड़ी आदि के बन्धन में नहीं आता और कभी पापाचरण नहीं करता, जिसमें क्लेश, दुःख, अज्ञान कभी नहीं होता, इत्यादि । मनुस्मृतिः

अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ।
स वेत्ति विश्वं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं पुराणम् ।। (उपनिषद्) उपनिषद् प्रकाश

परमेश्वर के हाथ नहीं, परंतु अपनी शक्तिरूप हाथ से सबक रचन, ग्रहण करता, पग नहीं, परंतु व्यापक होने से सबसे अधिक वेगवान्, चक्षु का गोलक नहीं, परंतु सबको यथावत् देखता, श्रोत्र नहीं, तथापि सबकी बातें सुनता, अंतःकरण नहीं, परंतु सब जगत् को जानता है और उसको अवधि सहित जानने वाला कोई भी नहीं । उसी को सनातन, सबसे श्रेष्ठ, सबमें पूर्ण होने से पुरुष कहते हैं । वह इंद्रियों और अंतःकरण के बिना अपने सब काम अपने सामर्थ्य से करता है । आयुर्वेद और हमारा जीवन

क्लेशकर्म विपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेषः ईश्वरः ।
(योगदर्शन) ज्ञान की बातें - आयुर्वेद के स्वास्थ्य सूत्र

जो अविद्यादि क्लेश, कुशल, अकुशल, इष्ट , अनिष्ट और मिश्र फलदायक कर्मों की वासना से रहित है, वह सब जीवों से विशेष ईश्वर कहाता है । परमात्मा का सन्देश

(जीव और प्रकृति की परिभाषा अगली पोस्ट में देंगे )

योगाचार्य डॉ. प्रवीण कुमार शास्त्री

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