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मैंने सुना है, एक बड़ी प्राचीन, तिब्बत में कहानी है। एक आदमी यात्रा से लौटा है--लंबी यात्रा से। अपने मित्र के घर ठहरा और ...
10/09/2025

मैंने सुना है, एक बड़ी प्राचीन, तिब्बत में कहानी है। एक आदमी यात्रा से लौटा है--लंबी यात्रा से। अपने मित्र के घर ठहरा और उसने मित्र से कहा रात, यात्रा की चर्चा करते हुए, कि एक बहुत अनूठी चीज मेरे हाथ लग गई है।

और मैंने सोचा था कि जब मैं लौटूंगा तो अपने मित्र को दे दूंगा, लेकिन अब मैं डरता हूं, तुम्हें दूं या न दूं। डरता हूं इसलिए कि जो भी मैंने उसके परिणाम देखे वे बड़े खतरनाक हैं।

मुझे एक ऐसा ताबीज मिल गया है कि तुम उससे तीन आकांक्षायें मांग लो, वे पूरी हो जाती हैं। और मैंने तीन खुद भी मांग कर देख लीं। वे पूरी हो गई हैं और अब मैं पछताता हूं कि मैंने क्यों मांगीं?

मेरे और मित्रों ने भी मांग कर देख लिए हैं, सब छाती पीट रहे हैं, सिर ठोक रहे हैं। सोचा था तुम्हें दूंगा, लेकिन अब मैं डरता हूं, दूं या न दूं।

मित्र तो दीवाना हो गया। उसने कहा, 'तुम यह क्या कहते हो; न दूं? कहां है ताबीज? अब हम ज्यादा देर रुक नहीं सकते। क्योंकि कल का क्या भरोसा?' पत्नी तो बिलकुल पीछे पड़ गई उसके कि निकालो ताबीज। उसने कहा कि 'भई, मुझे सोच लेने दो। क्योंकि जो परिणाम, सब बुरे हुए।' उसके मित्र ने कहा, 'तुमने मांगा ढंग से न होगा। गलत मांग लिया होगा।'

हर आदमी यही सोचता है कि दूसरा गलत मांग रहा है, इसलिए मुश्किल में पड़ा। मैं बिलकुल ठीक मांग लूंगा।

लेकिन कोई भी नहीं जानता कि जब तक तुम ठीक नहीं हो, तुम ठीक मांगोगे कैसे? मांग तो तुमसे पैदा होगी। नहीं माना मित्र, नहीं मानी पत्नी। उन्होंने बहुत आग्रह किया तो ताबीज देकर मित्र उदास चला गया। सुबह तक ठहरना मुश्किल था।

दोनों ने सोचा, क्या मांगें? बहुत दिन से एक आकांक्षा थी कि घर में कम से कम एक लाख रुपया हो। तो पहला लखपति हो जाने की आकांक्षा थी। और लखपति तिब्बत में बहुत बड़ी बात है। तो उन्होंने कहा, वह पहली आकांक्षा तो पूरी कर ही लें, फिर सोचेंगे। तो पहली आकांक्षा मांगी कि लाख रुपया।

जैसे ही कोई आकांक्षा मांगोगे, ताबीज हाथ से गिरता था झटक कर। उसका मतलब था कि मांग स्वीकार हो गई। बस, पंद्रह मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक पड़ी।

खबर आई कि लड़का जो राजा की सेना में था, वह मारा गया और राजा ने लाख रुपये का पुरस्कार दिया। पत्नी तो छाती पीट कर रोने लगी कि यह क्या हुआ?

उसने कहा कि दूसरी आकांक्षा इसी वक्त मांगो कि मेरा लड़का जिंदा किया जाए। बाप थोड़ा डरा। उसने कहा कि यह अभी जो पहली का फल हुआ...पर पत्नी एकदम पीछे पड़ी थी कि देर मत करो कहीं वे दफना न दें, कहीं लाश सड़-गल न जाए, जल्दी मांगो।

तो दूसरी आकांक्षा मांगी कि लड़का हमारा वापिस लौटा दिया जाए। ताबीज गिरा। पंद्रह मिनट बाद दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। लड़के के पैर की आहट थी। उसने जोर से कहा, 'पिताजी।' आवाज भी सुनाई पड़ी, पर दोनों बहुत डर गये। इतने जल्दी लड़का आ गया? बाप ने बाहर झांक कर देखा, वहां कोई दिखाई नहीं पड़ता। खिड़की में से देखा, वहां कोई दिखाई नहीं पड़ता, कोई चलता-फिरता मालूम होता है।

वह लड़का प्रेत होकर वापिस आ गया। क्योंकि शरीर तो दफना दिया जा चुका था। पत्नी और पति दोनों घबड़ा रहे हैं, कि अब क्या करें? दरवाजा खोलें कि नहीं? क्योंकि तुमने भला कितना ही लड़के को प्रेम किया हो, अगर वह प्रेत होकर आ जाए तो हिम्मत पस्त हो जायेगी।

बाप ने कहा, 'रुक अभी एक आकांक्षा और मांगने को बाकी है।' और उसने ताबीज से कहा, 'कृपा कर और इस लड़के से छुटकारा। नहीं तो अब यह सतायेगा जिंदगी भर।

यह प्रेत अगर यहां रह गया घर में...इससे छुटकारा करवा दे।' और पति आधी रात गया ताबीज देने अपने मित्र को वापिस। और कहा कि, 'इसे तुम कहीं फेंक ही दो। अब किसी को भूल कर मत देना।'

तुम्हारी पूरी जिंदगी की कथा इस ताबीज की कथा में छिपी है। जो तुम मांगते हो वह मिल जाता है। नहीं मिलता है तो तुम परेशान होते हो। मिल जाता है, फिर तुम परेशान होते हो। गरीब दुखी दिखता है, अमीर और भी दुखी दिखता है।

जिसकी शादी नहीं हुई वह परेशान है, जिसकी शादी हो गई है वह छाती पीट रहा है, सिर ठोंक रहा है। जिसको बच्चे नहीं हैं वह घूम रहा है साधु-संतों के सत्संग में, कि कहीं बच्चा मिल जाए। और जिनको बच्चे हैं, वे कहते हैं, कैसे इनसे छुटकारा होगा। यह क्या उपद्रव हो गया।

तुम्हारे पास कुछ है तो तुम रो रहे हो; तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो तुम रो रहे हो। और मौलिक कारण यह है कि तुम गलत हो। इसलिए तुम जो भी चाहते हो, वह गलत ही चाहते हो।

इसलिए समझदार व्यक्ति परमात्मा से यह नहीं कहता कि मेरी प्रार्थना पूरी करना, वह उससे कहता है, 'जो तेरी मर्जी, वह तू पूरी करना।

क्योंकि हम तो यह भी नहीं जानते, क्या मांगें? हम तो गलत ही मांगेंगे, क्योंकि हम गलत हैं। हमारी तो मांग भी उपद्रव होगी।'

और तुम्हारे पूरे जीवन की कथा यही है कि जो तुमने मांगा, वह तुम्हें मिल गया। फिर तुम उससे परेशान हो रहे हो। न मिलता तो रोते; मिल गया तो रो रहे हो। और तुम कभी गौर करके नहीं देखते।

जय श्री कृष्णा

घर और ज़मीन 100 साल से ज़्यादा एक मालिक बरदाश्त नहीं करते…ये अपना मालिक बदलती ही हैया यूँ कहिए आप घर नही बदलते,,घर बदलता...
08/07/2025

घर और ज़मीन 100 साल से ज़्यादा एक मालिक बरदाश्त नहीं करते…ये अपना मालिक बदलती ही है
या यूँ कहिए
आप घर नही बदलते,,घर बदलता है,,अपने मालिक,,
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ये मकान देखिए,,जब ये बन रहा होगा,तब इसके मालिक और उसके परिवार ने कितनी प्लानिंग की होगी,,किचन इधर बनेगा,,बाथरुम की साइज ये होना चाहिए,, ड्राइंग रूम में ये सोफा अच्छा लगेगा,,ऐसे कितने ही सुझाव ,कितने ही प्लान किए होंगे,,
मकान में जब रहने आए होंगे,,तब उनके चेचरे दमक रहे होंगे,,गर्व से मेहमानों को दिखाया भी होगा,,मेहमान ने प्रशंसा भी की होगी,,
कुछ वर्षों बाद इसके मालिक बदल गए होगें,,
कोई और रहने आए होंगे,फिर कोई और,,
अब ये खंडहर है,,बंद है,,किसी की नए मालिक की तलाश में ,,कहते है
कोई भी जमीन 100 साल से ज्यादा किसी एक के पास नही रहती,,वह मालिक बदलती है,,।
आप इस भ्रम में मत रहिए कि घर जमीन के आप मालिक है,घर जमीन खुद बदलती है अपने मालिक,,

इसलिए आप अपने भगवान को ना भूले एक दिन भगवान के यहां जाना होगा वहां मुंह दिखाना होगा भगवान की चाही जिंदगी गुजारे ।
दुनिया के 100 दिनों से अच्छा आपका 10 दिन भी उस परमपिता की चाही जिंदगी आपको स्वर्ग दे सकती हैं

*बुढ़ापे का सहारा कौन??? बेटा या बेटी??**हम सभी लोग मेन हॉल में बैठे-बैठे चर्चाएं कर रहे थे तभी मेरी बहन ने मुझसे एक प्र...
27/05/2025

*बुढ़ापे का सहारा कौन??? बेटा या बेटी??*

*हम सभी लोग मेन हॉल में बैठे-बैठे चर्चाएं कर रहे थे तभी मेरी बहन ने मुझसे एक प्रश्न पूछा कि "भैया! यह बताओ आदमी के बुढ़ापे का सहारा उसकी बेटी होती है या उसका बेटा?*

*मैंने कहा- "बहन! यह प्रश्न ना करो तो ही अच्छा है। क्योंकि इससे कोई तो खुश होगा किसी को दुख होगा।*

*तो अन्य सभी लोग जिद करने लगे नहीं नहीं यह बात तो बतानी ही पड़ेगी वह भी विस्तार से...*

मैने कहा तो फिर सुनो... *बुढापे का सहारा बेटा या बेटी नहीं "बहू" होती हैं।*

जैसा कि लोगों से अक्सर सुनते आये हैं कि बेटा या बेटी बुढ़ापे की लाठी होती है इसलिये लोग अपने जीवन मे एक *"बेटा एवं बेटी"* की कामना ज़रूर रखते हैं ताकि बुढ़ापा अच्छे से कटे।

ये बात सच भी है *क्योंकि बेटा ही घर में बहु लाता है।* बहु के आ जाने के बाद एक बेटा अपनी लगभग सारी जिम्मेदारी अपनी पत्नी के कंधे पर डाल देता है।
और *फिर बहु बन जाती है अपने बूढ़े सास-ससुर की बुढ़ापे की लाठी ।*

जी हाँ! मेरा तो यही मानना है वो बहु ही होती है जिसके सहारे बूढ़े सास-ससुर अपना जीवन अच्छे से व्यतीत करते हैं।

*एक बहु को अपने सास-ससुर की पूरी दिनचर्या मालूम होती है।*
कौन कब और कैसी चाय पीते है , क्या खाना बनाना है , शाम में नाश्ता में क्या देना , रात को हर हालत में 9 बजे से पहले खाना बनाना है ।
अगर सास-ससुर बीमार पड़ जाए तो पूरे मन या बेमन से बहु ही देखभाल करती है।

अगर एक दिन के लिये बहु बीमार पड़ जाए या फिर कही चली जाएं , तो पूरे घर की धुरी हिल जाती है । परंतु यदि बेटा 15 दिवस की यात्रा पर भी चला जाये तो भी बहू के भरोसे घर सुचारू रूप से चलता रहता है ।

बिना बहू के सास-ससुर को ऐसा लगता है *जैसा उनकी लाठी ही किसी ने छीन ली हो।* वे चाय नाश्ता से लेकर खाना के लिये छटपटा जाएंगे । कोई और पूछने वाला उनके पास नही होता ।

क्योंकि बेटे के पास समय नही है और अगर बेटे को समय मिल जाये भी तो वो कुछ नही कर पायेगा क्योंकि उसे ये मालूम ही नही है *कि माँ-बाबूजी को सुबह से रात तक क्या क्या देना है ?* क्योंकि बेटे के चंद सवाल है और उसकी ज़िम्मेदारी खत्म...

जैसे "माँ-बाबूजी ने खाना खा लिया?" "चाय पी लिये? "नाश्ता कर लिये?" लेकिन कभी भी ये जानने की कोशिश नही करते कि वे क्या खाते हैं? कैसी चाय पीते हैं? ये लगभग सभी घरों की कहानी है ।
मैमैंने तो अधिकतर ऐसी बहुएं देखी है जो अपनी सास की बीमारी में तन मन से सेवा करती हैं.. *इसलिये मेरा मानना है कि बहु ही होती हैं बुढ़ापे की असली लाठी*।

*लेकिन एक बात और सच है कि आप में भी अक्ल होनी चाहिए कि हर वक्त "मेरा राजा बेटा!" "मेरी रानी बेटी!" की रट छोड़ "मेरी अच्छी बहु रानी!" की रट भी लगानी चाहिए।*

अतः अपनी बहू में सिर्फ कमिया न ढूंढे, उसकी अच्छाइयों की कद्र करे ।

*"आज का संदेश"*
बहु की त्याग और सेवा को पहचानिएं
*बेटे एवं बेटी से पहले बहु को अपना मानिए।*

विवाह के बाद पहली बार अपने मायके आयी बेटी का स्वागत सप्ताह भर चला। सप्ताह भर बेटी को जो पसन्द है, वो सब किया गया। वापस स...
26/05/2025

विवाह के बाद पहली बार अपने मायके आयी बेटी का स्वागत सप्ताह भर चला। सप्ताह भर बेटी को जो पसन्द है, वो सब किया गया। वापस ससुराल जाते समय पिता ने बेटी को एक अति सुगंधित अगरबत्ती का पुडा दिया और कहा कि_"पुत्री तुम जब ससुराल में पूजा करोगी तब यह अगरबत्ती जरूर जलाना.

माँ ने मन्द स्वर में कहा- "बिटिया प्रथम बार मायके से ससुराल जा रही है, तो भला कोई अगरबत्ती जैसी चीज देता है?
पिता ने झट से जेब मे हाथ डाला और जेब मे जितने भी रुपये थे, वो सब बेटी को दे दिए...

ससुराल में पहुंचते ही...सासु माँ ने बहु का बैग टटोला और पूछा कि तुम्हारे माँ बाप ने बिदाई में क्या दिया, कुछ विशेष न मिलने पर उनकी नजर अगरबत्ती का पुडे पर पड़ी। क्रोधवश सासु माँ ने मुंह बना बहु को बोला कि कल पूजा में यह अगरबत्ती लगा लेना.

सुबह जब बेटी पूजा करने बैठी, अगरबत्ती का पुडा खोला तो उसमे से एक चिट्ठी निकली-
लिखा था...

बेटी यह अगरबत्ती स्वतः जलती है, मगर संपूर्ण घर को सुगंधित कर देती है। इतना ही नही, आजू-बाजू के पूरे वातावरण को भी अपनी महक से सुगंधित एवं प्रफुल्लित कर देती है. हो सकता है की तुम कभी पति से कुछ समय के लिए रुठ जाओगी या कभी अपने सास-ससुरजी से नाराज हो जाओगी, कभी देवर या ननद से भी रूठोगी, कभी तुम्हे किसी से बाते सुननी भी पड़ जाए, या फिर कभी अडोस-पड़ोसियों के बर्ताव पर तुम्हारा दिल खट्टा हो जाये,
तब तुम मेरी यह भेंट ध्यान में रखना - अगरबत्ती की तरह जलना, जैसे अगरबत्ती स्वयं जलते हुए पूरे घर, सम्पूर्ण परिसर को सुगंधित और प्रफुल्लित कर ऊर्जा से भरती है, ठीक उसी तरह तुम स्वतः सहन करते हुए ससुराल को अपना मायका समझ सबको अपने व्यवहार और कर्म से सुगंधित और प्रफुल्लित करना

बेटी चिट्ठी पढ़कर फफक-2 कर रोने लगी, सासू माँ दौड़कर आयी, पति और ससुर भी पूजा घर मे पहुंचे जहां बहु रो रही थी।
"अरे हाथ को चटका लग गया क्या? -पति ने पूछा
"क्या हुआ यह तो बताओ- ससुरजी बोले।

सासु माँ आजू बाजू के सामान में कुछ है क्या- यह देखने लगी
तो उन्हें पिता द्वारा सुंदर अक्षरों में लिखी हुई चिठ्ठी नजर आयी, चिट्ठी पढ़ते ही उन्होंने बहु को गले से लगा लिया और चिट्ठी ससुरजी के हाथों में दी।
चश्मा ना पहने होने की वजह से चिट्ठी बेटे को देकर पढ़ने के लिए कहा...सारी बात समझते ही संपूर्ण घर स्तब्ध हो गया।
"सासु माँ उच्च स्वर में बोली अरे यह चिठ्ठी फ्रेम करानी है, यह मेरी बहू को मिली हुई सबसे अनमोल भेंट है, पूजा घर के बाजू में ही इसकी फ्रेम होनी चाहिए ।

और फिर सदैव वह फ्रेम अपने शब्दों से सम्पूर्ण घर, और अगल-बगल के वातावरण को अपने अर्थ से महकाती रही, और अन्ततः अगरबत्ती का पुडा खत्म होने के बावजूद भी...
क्या आप भी ऐसे संस्कार अपनी बेटी को देना चाहेंगे ...

बेटियां दो कुलों को महकाती है....

राधे राधे🙏

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