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एक दिन स्वर्गलोक की अनुपम अप्सरा रंभा दिव्य आभूषणों से अलंकृत होकर अपने प्रिय नलकुबेर से मिलने जा रही थीं। उनके प्रत्येक...
02/08/2026

एक दिन स्वर्गलोक की अनुपम अप्सरा रंभा दिव्य आभूषणों से अलंकृत होकर अपने प्रिय नलकुबेर से मिलने जा रही थीं। उनके प्रत्येक कदम के साथ पुष्पों की सुगंध वातावरण में फैल रही थी। उसी समय लंका का राजा रावण वहाँ से गुज़रा। उसकी दृष्टि जैसे ही रंभा पर पड़ी, उसका मन वासना और अहंकार से भर उठा। उसने रंभा का मार्ग रोक लिया। रंभा भय से काँप उठीं। हाथ जोड़कर उन्होंने विनती की, "हे लंकेश, मैं आपके बड़े भाई कुबेर के पुत्र नलकुबेर की प्रिय हूँ। इस संबंध से मैं आपकी पुत्रवधू के समान हूँ। कृपया धर्म का पालन कीजिए।"

लेकिन अहंकार से अंधा हो चुका रावण किसी की मर्यादा सुनने की स्थिति में नहीं था। उसने रंभा की विनती को अनसुना कर दिया और उनका घोर अपमान किया। अपमान और पीड़ा से व्याकुल रंभा किसी तरह वहाँ से निकलकर नलकुबेर के पास पहुँचीं। उनकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। जब नलकुबेर ने पूरी घटना सुनी तो उनका क्रोध प्रचंड अग्नि की तरह भड़क उठा। उन्होंने अपने हाथों में जल लेकर संकल्प किया और कहा, "आज मैं रावण को ऐसा श्राप देता हूँ कि यदि वह भविष्य में किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध स्पर्श करेगा, तो उसी क्षण उसका मस्तक सौ टुकड़ों में विभाजित हो जाएगा।" नलकुबेर के इस श्राप की गूँज तीनों लोकों में फैल गई। उसी क्षण से रावण के विनाश का एक अदृश्य अध्याय प्रारंभ हो चुका था।

समय बीतता गया। हिमालय के निर्जन वनों में एक महान तपस्विनी कठोर तप कर रही थीं। उनका नाम था वेदवती। बचपन से ही उन्होंने भगवान विष्णु को अपना पति मान लिया था और संकल्प लिया था कि वे केवल उन्हीं को अपना सर्वस्व स्वीकार करेंगी। वर्षों की कठिन तपस्या के बाद भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए। उन्होंने प्रसन्न होकर कहा, "देवि, इस जन्म में नहीं, लेकिन मेरे अगले अवतार में तुम मेरी अर्धांगिनी बनोगी।" यह सुनकर वेदवती का हृदय आनंद से भर उठा।

इसी बीच वहाँ रावण पहुँचा। उसने तपस्विनी वेदवती का दिव्य तेज और अद्भुत सौंदर्य देखा तो उसका अहंकार फिर जाग उठा। उसने वेदवती से कहा, "त्रिलोक में मुझसे बड़ा कोई नहीं। मुझे अपना पति स्वीकार करो।" वेदवती ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "मैंने अपने जीवन, मन और आत्मा को भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया है। तुम्हारे लिए मेरे मन में कोई स्थान नहीं है।"

रावण का अहंकार इस उत्तर को सहन नहीं कर सका। उसने क्रोध में आकर वेदवती के केश पकड़ लिए। अगले ही क्षण वेदवती की आँखों में अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने अपने केश स्वयं काट डाले और दृढ़ स्वर में कहा, "हे अधर्मी रावण! तूने मेरी तपस्या और मर्यादा का अपमान किया है। मैं इस शरीर का त्याग करती हूँ, लेकिन पुनर्जन्म लेकर तेरे सर्वनाश का कारण अवश्य बनूँगी।"

इतना कहकर वे अग्नि में प्रवेश कर गईं। देखते ही देखते उनका शरीर अग्नि में विलीन हो गया, लेकिन उनकी प्रतिज्ञा वन की प्रत्येक दिशा में गूँजती रही—"मैं लौटूँगी... और तेरे अहंकार का अंत करूँगी।"

कालचक्र निरंतर घूमता रहा। वर्षों ने शताब्दियों का रूप ले लिया। एक ओर लंका में रावण का अत्याचार बढ़ता गया। देवता, ऋषि और समस्त पृथ्वी उसके आतंक से व्याकुल हो उठे। दूसरी ओर धर्म की रक्षा के लिए देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ श्रीराम के रूप में अवतार लिया।

उधर मिथिला में भी नियति अपना चमत्कार रच रही थी। भयंकर अकाल से पीड़ित राज्य को बचाने के लिए राजा जनक स्वयं स्वर्ण का हल लेकर भूमि जोतने निकले। जैसे ही हल धरती में चला, भूमि के भीतर से एक दिव्य कलश प्रकट हुआ। उस कलश के भीतर एक तेजस्विनी कन्या विराजमान थी। राजा जनक ने उस दिव्य बालिका को अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उसका नाम रखा—सीता।

ऋषियों ने कहा कि यह कोई साधारण कन्या नहीं, बल्कि वही वेदवती थीं जिन्होंने रावण के विनाश का संकल्प लिया था। अब वे सीता के रूप में पुनर्जन्म लेकर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने आई थीं।

समय के साथ श्रीराम और सीता का दिव्य विवाह हुआ। संपूर्ण पृथ्वी इस मंगल मिलन की साक्षी बनी। किंतु किसी को ज्ञात नहीं था कि यह केवल एक विवाह नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के अंतिम युद्ध की भूमिका थी।

कुछ समय बाद परिस्थितियाँ ऐसी बनीं कि श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण वनवास के लिए निकल पड़े। वहीं पंचवटी के वन में रावण की बहन शूर्पणखा का अपमान हुआ और प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए उसने रावण को सीता के अद्वितीय सौंदर्य का वर्णन किया। रावण का अहंकार और वासना एक बार फिर जाग उठी।

उसने छलपूर्वक स्वर्ण मृग की योजना बनाई। जब श्रीराम और लक्ष्मण कुटिया से दूर गए, तब रावण साधु का वेश धारण कर सीता के द्वार पहुँचा। सीता ने अतिथि समझकर उसका सम्मान किया, लेकिन अगले ही क्षण रावण ने अपना वास्तविक रूप धारण कर लिया।

उसने माता सीता का हरण अवश्य किया, परंतु नलकुबेर के श्राप के कारण वह उनकी इच्छा के विरुद्ध उन्हें स्पर्श करने का साहस नहीं कर सका। वह केवल उन्हें पृथ्वी सहित उठाकर पुष्पक विमान में बैठा ले गया। यही कारण था कि अशोक वाटिका में रहते हुए भी रावण कभी माता सीता की मर्यादा भंग नहीं कर सका।

उसे ज्ञात नहीं था कि जिस स्त्री को वह अपनी विजय समझ रहा है, वही उसके विनाश का कारण बनने वाली है। वेदवती की प्रतिज्ञा अब पूर्ण होने वाली थी। श्रीराम की सेना समुद्र पार करेगी, लंका की स्वर्णिम दीवारें ध्वस्त होंगी, कुंभकर्ण और मेघनाद जैसे महाबली योद्धा धराशायी होंगे और अंततः स्वयं रावण अपने ही अहंकार के कारण युद्धभूमि में श्रीराम के बाणों से पराजित होगा
इस प्रकार रंभा का अपमान, नलकुबेर का श्राप, वेदवती की प्रतिज्ञा और सीता का अवतार—ये सभी घटनाएँ अलग-अलग नहीं थीं। ये सब उस दिव्य योजना के सूत्र थे, जिन्हें स्वयं समय ने रावण के अंत के लिए जोड़ा था
यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति, ज्ञान और वैभव तभी तक शोभा देते हैं जब तक उनके साथ विनम्रता और मर्यादा हो। जिस दिन अहंकार धर्म की सीमा लाँघ देता है, उसी दिन उसके पतन की शुरुआत हो जाती है

प्रिंसिपल ने माता-पिता को स्कूल बुलाकर कहा, "आज हमने बच्चों से 'मेरे पापा' पर निबंध लिखवाया था... लेकिन आपके बेटे की कॉप...
16/07/2026

प्रिंसिपल ने माता-पिता को स्कूल बुलाकर कहा, "आज हमने बच्चों से 'मेरे पापा' पर निबंध लिखवाया था... लेकिन आपके बेटे की कॉपी पढ़कर पूरा स्टाफ रो पड़ा।"

माँ और पिता दोनों घबराकर कुर्सी पर बैठ गए।

प्रिंसिपल ने धीरे से कॉपी उनके हाथ में रख दी।

ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—

"मेरे पापा"

"मेरे पापा बहुत अजीब इंसान हैं।

उनके दो हाथ हैं, लेकिन उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।

उनकी दो आँखें हैं, लेकिन मैं उन्हें कई बार रात को चुपके से रोते हुए देख चुका हूँ।

उनके पास एक पुरानी घड़ी है, जो हमेशा पाँच मिनट पीछे रहती है। शायद इसलिए क्योंकि मेरे पापा हमेशा अपनी खुशियों से भी पीछे रह जाते हैं।

मेरे पापा मुझे कहते हैं कि मैं दुनिया का सबसे अमीर बेटा हूँ। लेकिन मुझे पता है कि उन्होंने पिछले तीन साल से अपने लिए नए जूते नहीं खरीदे।

माँ कहती हैं कि तुम्हारे पापा बहुत ज़िद्दी हैं। दादी कहती हैं कि बचपन से ही ऐसे हैं। पड़ोसी कहते हैं कि तुम्हारे पापा बड़े स्वाभिमानी आदमी हैं, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाते।

लेकिन मुझे लगता है कि मेरे पापा जादूगर हैं।

क्योंकि महीने की आख़िरी तारीख़ में भी घर का राशन आ जाता है... मेरी फीस भर जाती है... मेरी किताबें आ जाती हैं... लेकिन उनके लिए कभी कुछ नहीं आता।

एक दिन मैंने उनसे पूछा था— 'पापा, आप नया मोबाइल कब लोगे?'

उन्होंने हँसकर कहा— 'जब मेरा बेटा बड़ा अफसर बन जाएगा।'

उस दिन मैंने देखा था कि उनका मोबाइल पीछे से टूट चुका था और स्क्रीन पर दरारें थीं।

एक रात मैं पानी पीने उठा। पापा बरामदे में बैठे थे। उनके हाथ में बिजली का बिल था और आँखों में आँसू।

उन्होंने मुझे देखकर तुरंत मुस्कुरा दिया और बोले— 'मच्छर बहुत हैं, इसलिए बाहर बैठा हूँ।'

मुझे पता था कि वह झूठ बोल रहे हैं।

स्कूल में जब दोस्त अपने पापा की बड़ी-बड़ी कारों की बातें करते हैं, तब मैं चुप रहता हूँ।

क्योंकि मेरे पापा के पास कार नहीं है... लेकिन उन्होंने मुझे अपने कंधों पर बैठाकर पूरी दुनिया दिखा दी है।

कुछ दिन पहले मेरी गलती से उनका चश्मा टूट गया था। मैंने सोचा था कि वह मुझे बहुत डाँटेंगे।

लेकिन उन्होंने कहा— 'कोई बात नहीं बेटा, पुराना ही तो था।'

दो दिन बाद मैंने देखा कि वह बिना चश्मे के ही काम पर चले गए।

उनकी आँखें बार-बार सिकुड़ रही थीं, फिर भी उन्होंने नया चश्मा नहीं बनवाया।

मेरे जन्मदिन पर उन्होंने मुझे साइकिल दिलाई।

मैं बहुत खुश था।

लेकिन उसी रात मैंने माँ को कहते सुना— 'तुमने अपनी दवाई फिर नहीं खरीदी?'

पापा हँसकर बोले— 'अरे, हल्का-सा दर्द ही तो है... ठीक हो जाएगा।'

मुझे तब समझ आया कि मेरी साइकिल उनकी दवाई से ज़्यादा महँगी थी।

अब मैं बड़ा होकर डॉक्टर नहीं, अफसर नहीं... सबसे पहले अपने पापा का बेटा बनना चाहता हूँ।

ताकि एक दिन मैं उनसे कह सकूँ—

'पापा... अब आपकी बारी है।'

'अब आप अपनी दवाई भी लेंगे, नया चश्मा भी बनवाएँगे, नए जूते भी पहनेंगे और पहली बार बिना खर्च गिने अपनी पसंद की मिठाई भी खाएँगे।'

अगर भगवान सच में कहीं हैं, तो मैं उनसे बस एक ही दुआ माँगूँगा—

'अगले जन्म में भी मुझे यही पापा देना... क्योंकि दुनिया में सबसे अमीर इंसान वही होता है, जिसके सिर पर पिता का हाथ होता है।'"

निबंध पढ़ते-पढ़ते माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।

उन्होंने पहली बार अपने पति की ओर देखा।

उन्हें याद आया कि सचमुच पिछले कई वर्षों से उन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं खरीदा।

हर त्योहार पर बच्चों के कपड़े आए...

पत्नी की साड़ी आई...

घर का सामान आया...

लेकिन उनके हिस्से में हमेशा वही पुरानी शर्ट, वही घिसे हुए जूते और वही मुस्कान आई।

प्रिंसिपल की आँखें भी नम थीं।

उन्होंने धीमे से कहा—

"हम बच्चों को पढ़ाते हैं, लेकिन आज आपके बेटे ने हम सबको जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया।"

घर लौटते समय माँ ने रास्ते में पति का हाथ पकड़ लिया।

पति हैरान होकर बोले, "क्या हुआ?"

पत्नी रोते हुए बोली—

"आज तक मैं यह गिनती रही कि तुमने मुझे क्या नहीं दिया... लेकिन कभी यह नहीं देखा कि तुमने अपने हिस्से का कितना कुछ छोड़ दिया।"

उस शाम कई सालों बाद पूरा परिवार एक साथ बैठा।

न कोई शिकायत थी...

न कोई ताना...

सिर्फ़ अपनापन था।

बेटा दौड़कर आया और अपने पापा से लिपट गया।

पिता ने उसे सीने से लगाया, लेकिन इस बार उनकी आँखों के आँसू किसी ने छिपाने नहीं दिए।

कहते हैं, माँ घर का दिल होती है... लेकिन पिता वह खामोश दीवार होते हैं, जिन पर पूरा घर टिका होता है।

जो पिता अपनी इच्छाओं का गला घोंटकर बच्चों के सपनों को साँस देते हैं, उन्हें जीवन में रहते हुए सम्मान दीजिए... क्योंकि उनके जाने के बाद सबसे ज़्यादा चुभती है उनकी वही खामोशी, जिसे हम कभी समझ ही नहीं पाए।

ऐसा लगता है मानो स्वयं भगवान ने यह संदेश लिखा हो।जिसने भी लिखा है, कमाल का लिखा है।तुमकरोड़ोंहोऔर मैंएक हूँ।मुझेशांतिसे ...
15/06/2026

ऐसा लगता है मानो स्वयं भगवान ने यह संदेश लिखा हो।
जिसने भी लिखा है, कमाल का लिखा है।

तुम
करोड़ों
हो
और मैं
एक हूँ।

मुझे
शांति
से रहना हो,
लेकिन...

तुम्हें
मंगला आरती
करनी होती है, इसलिए मुझे
वस्त्र
पहनाकर, एक गुड़िया की तरह सजा देते हो।

भोग
मुझे लगाते हो,
और
खाते
खुद हो!

जिस दिन मैं एक जलेबी
चख लूँगा,
उस दिन से
प्रसाद
चढ़ाना बंद हो जाएगा,
यह मैं जानता हूँ।

जिसकी
शादी
नहीं हो रही,
वह
मंगल फेरे
मांगता है।

जिसकी
संतान
नहीं है,
वह
पालना
मांगता है।

किसी को
नौकरी
चाहिए,
तो किसी को
लड़की।

माता-पिता शायद किसी को नहीं चाहिए,
लेकिन
संपत्ति
सबको चाहिए।

कोई
कमाना
चाहता है,
तो कोई
चोरी
करना चाहता है।

किसी को
बाज़ार
ऊँचा ले जाना है,
तो किसी को
मुफ्त का
चाहिए।

कोई
रोटी
मांगता है,
तो कोई
मकान का आँगन।

जो भी आता है,
घंटी
बजाकर मेरे
कानों को परेशान करता है।

अगर मैं किसी का काम नहीं करता,
तो मेरे प्रति उसकी
श्रद्धा
कम हो जाती है।

और अगर किसी का काम हो जाए,
तो मुझे
महाभोग
चढ़ाया जाता है।

बारिश
नहीं आती,
तो
यज्ञ
किया जाता है।

आकाश से विपत्ति आती है,
तो मुझे ही क्षमा माँगने को कहा जाता है।

लेकिन सच कहूँ,
मैं कुछ नहीं करता।

न मैं किसी की शादी कराता हूँ,
न किसी का रिश्ता तुड़वाता हूँ।

जंगल
मैंने नहीं काटे।

ऊँची-ऊँची इमारतें
मैंने नहीं बनाईं।

अमीर
मैं नहीं बनाता।

गरीबी
मैंने नहीं दी।

तुम्हें रहने के लिए
हरी-भरी पृथ्वी
दी थी,
अगर तुम उसे
राख
बना दो,
तो इसमें मेरा क्या दोष?

मैंने
अणु
दिया,
और तुमने
बम
बना लिया।

फिर कहते हो कि
शांति
स्थापित करो।

बताओ, मैं कैसे करूँ?

सच-सच बताओ,
तुम मुझे
ईश्वर
मानते हो
या
नौकर?

प्रार्थना
की आड़ में
तुम
आदेश
ही तो देते हो।

और फिर कहते हो कि
इतनी
सेवा
करने के बाद भी
मैं किसी की सुनता नहीं!

मैं कोई
मैरेज ब्यूरो
नहीं चलाता,
न ही कोई
रोजगार कार्यालय।

मैंने किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं,
और न ही मुझे किसी से कुछ चाहिए।

नारियल चढ़ाकर
मुझे और शर्मिंदा मत करो।

जो देना था, मैं दे चुका हूँ।
अब मेरे पास कुछ नहीं है।
कृपया अब कुछ माँगकर
मुझे शर्मिंदा मत करो।

जो लोग कहते हैं कि
तुम्हारा काम हो जाएगा,
वे मेरे कोई
सहायक या कमीशन एजेंट
नहीं हैं।

इसलिए ऐसे लोगों से बचो।

तुमने आज तक
बहुत सारी प्रार्थनाएँ की हैं,
लेकिन आज
मैं तुमसे
एक प्रार्थना करता हूँ।

और यह भी जानता हूँ कि
मेरी यह बात सुनने के बाद
शायद कोई
मंदिर में
मेरे पास आये भी ना
फिर भी कहूँगा...

अगर कोई
माँग
न हो,
तभी मेरे पास आना।

और हाँ...

अंत में बस इतना ही कहूँगा कि

अपने
कर्मों
पर ध्यान देना।

मेरी
व्यथा
को समझने की कोशिश करना।

इसी आशा के साथ...

शब्दों को
विराम देता हूँ।

यह सब
कर्मों का चक्र
है।

कर्म अपना फल दिए बिना कभी नहीं रहते।

✅ जैसे कर्म करोगे, वैसा ही फल भोगोगे।

– तुम्हारा ही,
तुमसे थका हुआ प्रभु 🙏

एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि  ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?"इस प्रश्न ...
22/02/2026

एक बार राजा भोज के दरबार में एक सवाल उठा कि ऐसा कौन सा कुआं है जिसमें गिरने के बाद आदमी बाहर नहीं निकल पाता?"

इस प्रश्न का उत्तर कोई नहीं दे पाया।

आखिर में राजा भोज ने राज पंडित से कहा कि इस प्रश्न का उत्तर सात दिनों के अंदर लेकर आओ, वरना आपको अभी तक जो इनाम धन आदि दिया गया है,वापस ले लिए जायेंगे तथा इस नगरी को छोड़कर दूसरी जगह जाना होगा।

छः दिन बीत चुके थे।राज पंडित को जबाव नहीं मिला था।निराश होकर वह जंगल की तरफ गया। वहां उसकी भेंट एक गड़रिए से हुई।

गड़रिए ने पूछा -" आप तो राजपंडित हैं, राजा के दुलारे हो फिर चेहरे पर इतनी उदासी क्यों?

यह गड़रिया मेरा क्या मार्गदर्शन करेगा?सोचकर पंडित ने कुछ नहीं कहा।

इसपर गडरिए ने पुनः उदासी का कारण पूछते हुए कहा -" पंडित जी हम भी सत्संगी हैं,हो सकता है आपके प्रश्न का जवाब मेरे पास हो, अतः नि:संकोच कहिए।"

राज पंडित ने प्रश्न बता दिया और कहा कि अगर कलतक प्रश्न का जवाब नहीं मिला तो राजा नगर से निकाल देगा।

गड़रिया बोला -" मेरे पास पारस है उससे खूब सोना बनाओ। एक भोज क्या लाखों भोज तेरे पीछे घूमेंगेl

बस,पारस देने से पहले मेरी एक शर्त माननी होगी कि तुझे मेरा चेला बनना पड़ेगा।"

राज पंडित के अंदर पहले तो अहंकार जागा कि दो कौड़ी के गड़रिए का चेला बनूं? लेकिन स्वार्थ पूर्ति हेतु चेला बनने के लिए तैयार हो गया।

गड़रिया बोला -" पहले भेड़ का दूध पीओ फिर चेले बनो। राजपंडित ने कहा कि यदि ब्राह्मण भेड़ का दूध पीयेगा तो उसकी बुद्धि मारी जायेगी। मैं दूध नहीं पीऊंगा। तो जाओ, मैं पारस नहीं दूंगा - गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" ठीक है,दूध पीने को तैयार हूं,आगे क्या करना है?"

गड़रिया बोला-" अब तो पहले मैं दूध को झूठा करूंगा फिर तुम्हें पीना पड़ेगा।"

राजपंडित ने कहा -" तू तो हद करता है! ब्राह्मण को झूठा पिलायेगा?" तो जाओ, गड़रिया बोला।

राज पंडित बोला -" मैं तैयार हूं झूठा दूध पीने को ।"

गड़रिया बोला-" वह बात गयी।अब तो सामने जो मरे हुए इंसान की खोपड़ी का कंकाल पड़ा है, उसमें मैं दूध दोहूंगा,उसको झूठा करूंगा, कुत्ते को चटवाऊंगा फिर तुम्हें पिलाऊंगा।तब मिलेगा पारस।
नहीं तो अपना रास्ता लीजिए।"

राजपंडित ने खूब विचार कर कहा-" है तो बड़ा कठिन लेकिन मैं तैयार हूं।

गड़रिया बोला-" मिल गया जवाब। यही तो कुआं है!लोभ का, तृष्णा का जिसमें आदमी गिरता जाता है और फिर कभी नहीं निकलता। जैसे कि तुम पारस को पाने के लिए इस लोभ रूपी कुएं में गिरते चले गए।

हम सभी इस सांसारिक मायाजाल में ऐसे लिप्त हैं कि जीवन का उद्देश्य भूल कर बस इतना और, इतना और, के लोभ में फसें हुए हैं

एक सेठ बस से उतरे, उनके पास कुछ सामान था।आस-पास नजर दौडाई, तो उन्हें एक मजदूर दिखाई दिया।सेठ ने आवाज देकर उसे बुलाकर कहा...
29/12/2025

एक सेठ बस से उतरे, उनके पास कुछ सामान था।आस-पास नजर दौडाई, तो उन्हें एक मजदूर दिखाई दिया।

सेठ ने आवाज देकर उसे बुलाकर कहा- "अमुक स्थान तक इस सामान को ले जाने के कितने पैसे लोगे?'

आपकी मर्जी, जो देना हो, दे देना, लेकिन मेरी शर्त है कि जब मैं सामान लेकर चलूँ, तो रास्ते में या तो मेरी सुनना या आप सुनाना ।

सेठ ने डाँट कर उसे भगा दिया और किसी अन्य मजदूर को देखने लगे, लेकिन आज वैसा ही हुआ जैसे राम वन गमन के समय गंगा के किनारे केवल केवट की ही नाव थी।

मजबूरी में सेठ ने उसी मजदूर को बुलाया । मजदूर दौड़कर आया और बोला - "मेरी शर्त आपको मंजूर है?"

सेठ ने स्वार्थ के कारण हाँ कर दी।

सेठ का मकान लगभग 500मीटर की दूरी पर था । मजदूर सामान उठा कर सेठ के साथ चल दिया और बोला, सेठजी आप कुछ सुनाओगे या मैं सुनाऊँ। सेठ ने कह दिया कि तू ही सुना।

मजदूर ने खुश होकर कहा- 'जो कुछ मैं बोलू, उसे ध्यान से सुनना , यह कहते हुए मजदूर पूरे रास्ते बोलता गया । और दोनों मकान तक पहुँच गये।

मजदूर ने बरामदे में सामान रख दिया , सेठ ने जो पैसे दिये, ले लिये और सेठ से बोला! सेठजी मेरी बात आपने ध्यान से सुनी या नहीं।

सेठ ने कहा, मैने तेरी बात नहीं सुनी, मुझे तो अपना काम निकालना था।

मजदूर बोला-" सेठजी! आपने जीवन की बहुत बड़ी गलती कर दी, कल ठीक सात बजे आपकी मौत होने वाली है"।

सेठ को गुस्सा आया और बोले: तेरी बकवास बहुत सुन ली, जा रहा है या तेरी पिटाई करूँ:

मजदूर बोला: मारो या छोड दो, कल शाम को आपकी मौत होनी है, अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो ।

अब सेठ थोड़ा गम्भीर हुआ और बोला: सभी को मरना है, अगर मेरी मौत कल शाम होनी है तो होगी , इसमें मैं क्या कर सकता हूं । मजदूर बोला: तभी तो कह रहा हूं कि अब भी मेरी बात ध्यान से सुन लो। सेठ बोला: सुना, ध्यान देकर सुनूंगा।

मरने के बाद आप ऊपर जाओगे तो आपसे यह पूछा जायेगा कि "हे मनुष्य ! पहले पाप का हफल भोगेगा या पुण्य का "क्योंकि मनुष्य अपने जीवन में पाप-पुण्य दोनों ही करता है,

तो आप कह देना कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।

इतना कहकर मजदूर चला गया । दूसरे दिन ठीक सात बजे सेठ की मौत हो गयी। सेठ ऊपर पहुँचा तो यमराज ने मजदूर द्वारा बताया गया प्रश्न कर दिया कि 'पहले पाप का फल भोगना चाहता है कि पुण्य का' । सेठ ने कहा 'पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन जो भी जीवन में मैंने पुण्य किया हो, उसका फल आंखों से देखना चाहता हूं।

यमराज बोले-" हमारे यहाँ ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, यहाँ तो दोनों के फल भुगतवाए जाते हैं।"

सेठ ने कहा कि फिर मुझसे पूछा क्यों, और पूछा है तो उसे पूरा करो, धरती पर तो अन्याय होते देखा है, पर यहाँ पर भी अन्याय है।

यमराज ने सोचा, बात तो यह सही कह रहा है, इससे पूछकर बड़े बुरे फंसे, मेरे पास कोई ऐसी पावर ही नहीं है, जिससे इस जीव की इच्छा पूरी हो जाय, विवश होकर यमराज उस सेठ को ब्रह्मा जी के पास ले गये , और पूरी बात बता दी

ब्रह्मा जी ने अपनी पोथी निकालकर सारे पन्ने पलट डाले, लेकिन उनको कानून की कोई ऐसी धारा या उपधारा नहीं मिली, जिससे जीव की इच्छा पूरी हो सके।

ब्रह्मा भी विवश होकर यमराज और सेठ को साथ लेकर भगवान के पास पहुचे और समस्या बतायी । भगवान ने यमराज और ब्रह्मा से कहा: जाइये , अपना -अपना काम देखिये , दोनों चले गये।

भगवान ने सेठ से कहा- "अब बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?

सेठ बोला- "अजी साहब, मैं तो शुरू से एक ही बात कह रहा हूं कि पाप का फल भुगतने को तैयार हूं लेकिन पुण्य का फल आँखों से देखना चाहता हूं ।

भगवान बोले- "धन्य है वो सदगुरू(मजदूर) जो तेरे अंतिम समय में भी तेरा कल्याण कर गया , अरे मूर्ख ! उसके बताये उपाय के कारण तू मेरे सामने खडा है, अपनी आँखों से इससे और बड़ा पुण्य का फल क्या देखना चाहता है। मेरे दर्शन से तेरे सभी पाप भस्मीभूत हो गये।

इसीलिए बचपन से हमको सिखाया जाता है कि, गुरूजनों की बात ध्यान से सुननी चाहिए , पता नहीं कौन सी बात जीवन में कब काम आ जाए?

अपने युग के सर्वश्रेष्ठ योद्धा रहे अपने पति के शव को अपनी गोद मे लेकर विलाप कर रही मंदोदरी के सामने ही शीश झुकाए खड़े थे ...
05/12/2025

अपने युग के सर्वश्रेष्ठ योद्धा रहे अपने पति के शव को अपनी गोद मे लेकर विलाप कर रही मंदोदरी के सामने ही शीश झुकाए खड़े थे महात्मा विभीषण, उनकी आंखों से भी लगातार अश्रु बहे जा रहे थे। पाप-पुण्य, सत्य-अस्त के तमाम प्रश्न अब समाप्त हो चुके थे, रावण के शव और विभीषण के मध्य अब केवल भाई का सम्बंध बचा था। बचपन की खेलकूद से लेकर साम्राज्य निर्माण के दिनों की यादें कलेजा तोड़ रही थीं। रोते विभीषण के मुख से निकला- मुझे क्षमा करना भाभी, मैं ही अपराधी हूँ... अपने कुल का कलंक...
मंदोदरी ने कोई उत्तर नहीं दिया पर पीछे खड़ी सूर्पनखा बोल पड़ी, "तुम क्षमा के योग्य नहीं हो विभीषण! तूम्हारे समस्त कुल का नाश कर दिया। राज्य के लोभ में तुम इतने अंधे हो जावोगे, यह हमने सोचा भी नहीं था..."
विभीषण सचमुच पीड़ा में थे, उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। लेकिन मंदोदरी से सहन नहीं हुआ। वह गरज कर बोली- लंका का नाश विभीषण ने नहीं, तुमने किया है सूर्पनखा! व्यक्ति यदि अपनी उच्छऋंखलता को ही स्वतंत्रता मान ले तो वह अपने साथ साथ पूरे समाज का नाश कर देता है। तुमने वही किया। यदि तुमने सीता के सुन्दर आंगन में अपनी नाक न फँसाई होती, तो आज तुम्हारा जगतविजेता भाई भूमि पर नहीं लेटा होता।
अपराधी प्रवृत्ति का व्यक्ति अपने कुकर्मों की चर्चा पर अत्यंत तीव्र प्रतिक्रिया देता है। सूर्पनखा ने बिदकते हुए कहा- मैंने क्या गलत किया महारानी? क्या एक स्वतंत्र जीवन की मांग करना गलत है? क्या अपने स्वाभिमान, अपने अधिकारों के लिए लड़ना गलत है? मैंने कुछ गलत नहीं किया।
"स्वतंत्रता? व्यक्ति की स्वतंत्रता जब समाज की स्वतंत्रता का अतिक्रमण करने लगे तो वह अपराध हो जाती है सूर्पनखा। तुम्हारा स्वाभिमान यदि दूसरों के लिए दुख का कारण है तो धिक्कार है तुम्हारे स्वाभिमान को। उसे कुछ और नाम दो। हम इस धरती के इकलौते नागरिक नहीं हैं, यहाँ अन्य करोड़ों लोग निवास करते हैं। अपने लिए सुख तलाश करते समय यदि हम दूसरों के सुख दुख का ध्यान नहीं रखेंगे तो हमारा एक दिन समूल नाश अवश्य ही होगा। तुम्हे सत्ता का संरक्षण प्राप्त था तो तुमने अपने असभ्य आचरण को अधिकारों की सीमा में शामिल कर लिया, पर यह गलत ही था। इतिहास तुम्हे सदैव एक उदण्ड और चरित्रहीन स्त्री के रूप में ही याद रखेगा जिसने अपने उत्पात के कारण अपने भरे पूरे वंश का सत्यानाश कर दिया।"मंदोदरी के स्वर में कठोरता नहीं थी, दुख था।
सूर्पनखा ने अपने चरित्र के अनुरूप ही उदण्ड स्वर में कहा, " जो मैंने किया वही तो तुम्हारे पति और पुत्र भी करते रहे थे महारानी! पर तुम उनकी चर्चा क्यों नहीं कर रही? क्या केवल स्त्री होने के कारण ही मैं अपराधी ठहरा दी गयी हूँ?"
"वे पुरुष थे, इसीलिए रणभूमि की धूल में लोट गए। तुम स्त्री थी, इसलिए बच गयी हो। वे अपने कुकर्मों का दंड पा चुके हैं, तुम अभी अनन्त कुकर्मों के लिए स्वतंत्र हो। सो स्त्री होने का रोना न रोवो सूर्पनखा! इसी परिवार में मेरी पुत्रवधु सुलोचना जैसी स्त्रियां भी हैं जिनके आगे शत्रुदल भी श्रद्धा से नतमस्तक है।" कहते कहते एक बार फिर मंदोदरी पीड़ा से फफक पड़ी थीं। अपने समस्त पुत्रों को खोने की आग उस साध्वी का हृदय जला रही थी। सूर्पनखा को न मानना था, न मानी। वह पैर पटकते हुए वहाँ से चली गयी।

09/11/2025

*👉मैंने हॉस्पिटल के ICU में देखा🥹*
*👉मरीज का दुखदभरा दृश्य😇*
😥आंखों पर सेलो टेप लगी हुई
😥दोनों नाक में पाइप
😥मुंह में वेंटिलेटर का पाइप
😥गले पर दो छेद करके दो पाइप
*👉मैंन हॉस्पिटल के ICU में देखा🥹*
*👉मरीज की मजबूरी का दृश्य😇*
😥अब वह बोलकर व्यथा व्यक्त नहीं कर सकता उससे बोलने का अधिकार छीन लिया गया
😥अभीव्यक्ति का अधिकार छीन लिया गया
😥 अब उसके कराहने की आवाज को बंद कर दिया गया कराहने से जो हीलिंग होती थी उसको रोक दिया गया
😥 मैंने मरीज को चेहरे से सहमे हुए देखा
😥 अब उसको ICU में रहना सीखना पड़ेगा अब उसको समझाना पड़ेगा कि यह उसका घर नहीं है लेकिन वह यहां से जा भी नहीं सकता बेचारा
😥 ज्यादा विरोध करने पर हाथों को भी बांध दिया गया
😥 उससे बिना पूछे केमिकल दवाइयां उसके शरीर में डाली जा रही है
😥 उसका एक ही प्रश्न है भैया आपकी दवा से मेरे शरीर में सूजन क्यों आ रही है मुझे मेरे घर कब जाने दोगे लेकिन वह मजबूर है उसकी वहां कोई सुनने वाला नहीं है
😥 लेकिन जवाब देने वालों को उसकी परवाहा नहीं है क्योंकि वह उनका अपना नहीं है
😥 अब वह काले पानी की सजा पर है वहां कम से कम वह बोल तो सकते थे यहां बोलने का अधिकार नहीं है क्योंकि मुंह में पाइप डाला हुआ है
*👉 मैंने हॉस्पिटल की ICU में देखा🥹*
*👉 मरीज की बिगड़ी स्थिति को छुपाने का दृश्य😇*
😥अब आपको ज्यादा देर मरीज के पास जाने नहीं देते चाहे वह कितना ही आपका अजीज हो
😥 आप ज्यादा देर मरीज के पास रहेंगे तो उसकी बदहाल होती स्थिति को पकड़ लेंगे
😥 जब आप अंदर जाएंगे तो मरीज को पूरा चद्दर से ढक कर रखेंगे ताकि आप उसकी खराब हुई स्थिति को समझ ना सके
😥 बहाना भी बहुत सुंदर है मरीज के इंफेक्शन हो जाएगा
😥 अरे इस भारत में तो पहले लोग अपने घरों में ही ठीक होते थे तब इन्फेक्शन नाम का जीव कहां था ???
😥 और कई परम ज्ञानी उनकी हां में हां मिलाते हैं
😥 आपके मोबाइल से फोटो लेने नहीं देते आखिर में यह क्या छुपाना चाहते हैं ???
😥 अगर लोग फोटो और वीडियो बनाएंगे तो लोगों को पहले वाली स्थिति और बाद में बदहाल होती हुई स्थिति का फर्क समझ में आ जाएगा
😥 वहां काम करने वाले हर एक कर्मचारी के मुंह पर ताला है वह एक ही बात बोलेगा यह बात डॉक्टर साहब बताएंगे यह ट्रेनिंग उनकी जबरदस्त है
*👉 मैंने हॉस्पिटल के ICU में देखा🥹*
*👉 मरीज के परिजनों को कई दिनों तक आशा और निराशा के झूले में झूलते हुए देखा😇*
😥 परिजन इस आशा से घंटा खड़े रहते हैं डॉक्टर के इंतजार में गार्ड की डांट खाने के बावजूद भी की डॉक्टर साहब आएंगे और हमें अच्छी खबर देंगे
😥 लेकिन जब डॉक्टर साहब आते हैं तब वह उनको एक और लिस्ट पकड़ा देते हैं टेस्ट करवाने की साथ में एक नई बीमारी की घोषणा करते हैं
😥कोई उनसे पूछने की हिम्मत नहीं करता कि आपके पास आने के बाद यह नई बीमारी कहां से आ गई जब हम अस्पताल में लेकर आए तब हमारा पेशेंट इतना मुश्किल में नहीं था इस तरह से परिजनों की आशा पर पानी फेर देते हैं कि अभी कुछ कह नहीं सकते जांच के बाद आगे का हाल बताएंगे
😥यह सिलसिला रोज चलता रहता है चलता रहता है बिना रुके बिना थके यह हाल वहां ज्यादातर लोगों का है
😥 और दिन पर दिन बीत जाते हैं परिजन आशा छोड़ देते हैं वे आपस में ड्यूटी बदल बदल कर थक जाते हैं
😥 लेकिन वह समझ नहीं पाते अब हम क्या करें
😥 मैंने वहां कई लोगों को रोते हुए देखा कई लोगों को सिसकते हुए देखा
😥 कई लोगों को जड़ होते देखा
😥 कई लोगों को आंसू पीते हुए देखा
😥आशा की डोरी को टूटे हुए देखा
*👉 मैंने आत्मा को मरते हुए देखा😥*
*👉 मैंने लालची लोगों की भूख को देखा😥*
*👉 सिस्टम को कॉरपोरेट हाउस के हाथों में बिकते हुए देखा😥*
*👉 मीडिया को बिकते हुए देखा😥*
*👉 जिम्मेदार लोगों को चुप रहते देखा😥*
*👉 पिता को खोते हुए देखा😥*
*👉 मां को खोते हुए देखा😥*
*👉 भाई को खोते हुए देखा😥*
*👉 बहन को खोते हुए देखा😥*
*👉 पति को खोते हुए देखा😥*
*👉 पत्नी को खोते हुए देखा😥*
*👉रिश्तेदारों को खोते हुए देखा😥*
*👉 अजीज मित्रों को खोते हुए देखा😥*
*👉 लोगों की मेहनत की कमाई को सुनियोजित सरेआम लुटते हुए देखा😥*

*👉 मैंने हॉस्पिटल की ICU में देखा🥹*
*👉 मैंने हॉस्पिटल के ICU में देखा🥹*
*👉 मैंने हॉस्पिटल के ICU में देखा🥹*
🚐 बस हम मजबूर हैं यही बात वो जानते हैं

😥🥹😇😥🥹😇😥🥹😇*

मैंने सुना है, एक बड़ी प्राचीन, तिब्बत में कहानी है। एक आदमी यात्रा से लौटा है--लंबी यात्रा से। अपने मित्र के घर ठहरा और ...
10/09/2025

मैंने सुना है, एक बड़ी प्राचीन, तिब्बत में कहानी है। एक आदमी यात्रा से लौटा है--लंबी यात्रा से। अपने मित्र के घर ठहरा और उसने मित्र से कहा रात, यात्रा की चर्चा करते हुए, कि एक बहुत अनूठी चीज मेरे हाथ लग गई है।

और मैंने सोचा था कि जब मैं लौटूंगा तो अपने मित्र को दे दूंगा, लेकिन अब मैं डरता हूं, तुम्हें दूं या न दूं। डरता हूं इसलिए कि जो भी मैंने उसके परिणाम देखे वे बड़े खतरनाक हैं।

मुझे एक ऐसा ताबीज मिल गया है कि तुम उससे तीन आकांक्षायें मांग लो, वे पूरी हो जाती हैं। और मैंने तीन खुद भी मांग कर देख लीं। वे पूरी हो गई हैं और अब मैं पछताता हूं कि मैंने क्यों मांगीं?

मेरे और मित्रों ने भी मांग कर देख लिए हैं, सब छाती पीट रहे हैं, सिर ठोक रहे हैं। सोचा था तुम्हें दूंगा, लेकिन अब मैं डरता हूं, दूं या न दूं।

मित्र तो दीवाना हो गया। उसने कहा, 'तुम यह क्या कहते हो; न दूं? कहां है ताबीज? अब हम ज्यादा देर रुक नहीं सकते। क्योंकि कल का क्या भरोसा?' पत्नी तो बिलकुल पीछे पड़ गई उसके कि निकालो ताबीज। उसने कहा कि 'भई, मुझे सोच लेने दो। क्योंकि जो परिणाम, सब बुरे हुए।' उसके मित्र ने कहा, 'तुमने मांगा ढंग से न होगा। गलत मांग लिया होगा।'

हर आदमी यही सोचता है कि दूसरा गलत मांग रहा है, इसलिए मुश्किल में पड़ा। मैं बिलकुल ठीक मांग लूंगा।

लेकिन कोई भी नहीं जानता कि जब तक तुम ठीक नहीं हो, तुम ठीक मांगोगे कैसे? मांग तो तुमसे पैदा होगी। नहीं माना मित्र, नहीं मानी पत्नी। उन्होंने बहुत आग्रह किया तो ताबीज देकर मित्र उदास चला गया। सुबह तक ठहरना मुश्किल था।

दोनों ने सोचा, क्या मांगें? बहुत दिन से एक आकांक्षा थी कि घर में कम से कम एक लाख रुपया हो। तो पहला लखपति हो जाने की आकांक्षा थी। और लखपति तिब्बत में बहुत बड़ी बात है। तो उन्होंने कहा, वह पहली आकांक्षा तो पूरी कर ही लें, फिर सोचेंगे। तो पहली आकांक्षा मांगी कि लाख रुपया।

जैसे ही कोई आकांक्षा मांगोगे, ताबीज हाथ से गिरता था झटक कर। उसका मतलब था कि मांग स्वीकार हो गई। बस, पंद्रह मिनट बाद दरवाजे पर दस्तक पड़ी।

खबर आई कि लड़का जो राजा की सेना में था, वह मारा गया और राजा ने लाख रुपये का पुरस्कार दिया। पत्नी तो छाती पीट कर रोने लगी कि यह क्या हुआ?

उसने कहा कि दूसरी आकांक्षा इसी वक्त मांगो कि मेरा लड़का जिंदा किया जाए। बाप थोड़ा डरा। उसने कहा कि यह अभी जो पहली का फल हुआ...पर पत्नी एकदम पीछे पड़ी थी कि देर मत करो कहीं वे दफना न दें, कहीं लाश सड़-गल न जाए, जल्दी मांगो।

तो दूसरी आकांक्षा मांगी कि लड़का हमारा वापिस लौटा दिया जाए। ताबीज गिरा। पंद्रह मिनट बाद दरवाजे पर किसी ने दस्तक दी। लड़के के पैर की आहट थी। उसने जोर से कहा, 'पिताजी।' आवाज भी सुनाई पड़ी, पर दोनों बहुत डर गये। इतने जल्दी लड़का आ गया? बाप ने बाहर झांक कर देखा, वहां कोई दिखाई नहीं पड़ता। खिड़की में से देखा, वहां कोई दिखाई नहीं पड़ता, कोई चलता-फिरता मालूम होता है।

वह लड़का प्रेत होकर वापिस आ गया। क्योंकि शरीर तो दफना दिया जा चुका था। पत्नी और पति दोनों घबड़ा रहे हैं, कि अब क्या करें? दरवाजा खोलें कि नहीं? क्योंकि तुमने भला कितना ही लड़के को प्रेम किया हो, अगर वह प्रेत होकर आ जाए तो हिम्मत पस्त हो जायेगी।

बाप ने कहा, 'रुक अभी एक आकांक्षा और मांगने को बाकी है।' और उसने ताबीज से कहा, 'कृपा कर और इस लड़के से छुटकारा। नहीं तो अब यह सतायेगा जिंदगी भर।

यह प्रेत अगर यहां रह गया घर में...इससे छुटकारा करवा दे।' और पति आधी रात गया ताबीज देने अपने मित्र को वापिस। और कहा कि, 'इसे तुम कहीं फेंक ही दो। अब किसी को भूल कर मत देना।'

तुम्हारी पूरी जिंदगी की कथा इस ताबीज की कथा में छिपी है। जो तुम मांगते हो वह मिल जाता है। नहीं मिलता है तो तुम परेशान होते हो। मिल जाता है, फिर तुम परेशान होते हो। गरीब दुखी दिखता है, अमीर और भी दुखी दिखता है।

जिसकी शादी नहीं हुई वह परेशान है, जिसकी शादी हो गई है वह छाती पीट रहा है, सिर ठोंक रहा है। जिसको बच्चे नहीं हैं वह घूम रहा है साधु-संतों के सत्संग में, कि कहीं बच्चा मिल जाए। और जिनको बच्चे हैं, वे कहते हैं, कैसे इनसे छुटकारा होगा। यह क्या उपद्रव हो गया।

तुम्हारे पास कुछ है तो तुम रो रहे हो; तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो तुम रो रहे हो। और मौलिक कारण यह है कि तुम गलत हो। इसलिए तुम जो भी चाहते हो, वह गलत ही चाहते हो।

इसलिए समझदार व्यक्ति परमात्मा से यह नहीं कहता कि मेरी प्रार्थना पूरी करना, वह उससे कहता है, 'जो तेरी मर्जी, वह तू पूरी करना।

क्योंकि हम तो यह भी नहीं जानते, क्या मांगें? हम तो गलत ही मांगेंगे, क्योंकि हम गलत हैं। हमारी तो मांग भी उपद्रव होगी।'

और तुम्हारे पूरे जीवन की कथा यही है कि जो तुमने मांगा, वह तुम्हें मिल गया। फिर तुम उससे परेशान हो रहे हो। न मिलता तो रोते; मिल गया तो रो रहे हो। और तुम कभी गौर करके नहीं देखते।

जय श्री कृष्णा

घर और ज़मीन 100 साल से ज़्यादा एक मालिक बरदाश्त नहीं करते…ये अपना मालिक बदलती ही हैया यूँ कहिए आप घर नही बदलते,,घर बदलता...
08/07/2025

घर और ज़मीन 100 साल से ज़्यादा एक मालिक बरदाश्त नहीं करते…ये अपना मालिक बदलती ही है
या यूँ कहिए
आप घर नही बदलते,,घर बदलता है,,अपने मालिक,,
----
ये मकान देखिए,,जब ये बन रहा होगा,तब इसके मालिक और उसके परिवार ने कितनी प्लानिंग की होगी,,किचन इधर बनेगा,,बाथरुम की साइज ये होना चाहिए,, ड्राइंग रूम में ये सोफा अच्छा लगेगा,,ऐसे कितने ही सुझाव ,कितने ही प्लान किए होंगे,,
मकान में जब रहने आए होंगे,,तब उनके चेचरे दमक रहे होंगे,,गर्व से मेहमानों को दिखाया भी होगा,,मेहमान ने प्रशंसा भी की होगी,,
कुछ वर्षों बाद इसके मालिक बदल गए होगें,,
कोई और रहने आए होंगे,फिर कोई और,,
अब ये खंडहर है,,बंद है,,किसी की नए मालिक की तलाश में ,,कहते है
कोई भी जमीन 100 साल से ज्यादा किसी एक के पास नही रहती,,वह मालिक बदलती है,,।
आप इस भ्रम में मत रहिए कि घर जमीन के आप मालिक है,घर जमीन खुद बदलती है अपने मालिक,,

इसलिए आप अपने भगवान को ना भूले एक दिन भगवान के यहां जाना होगा वहां मुंह दिखाना होगा भगवान की चाही जिंदगी गुजारे ।
दुनिया के 100 दिनों से अच्छा आपका 10 दिन भी उस परमपिता की चाही जिंदगी आपको स्वर्ग दे सकती हैं

*बुढ़ापे का सहारा कौन??? बेटा या बेटी??**हम सभी लोग मेन हॉल में बैठे-बैठे चर्चाएं कर रहे थे तभी मेरी बहन ने मुझसे एक प्र...
27/05/2025

*बुढ़ापे का सहारा कौन??? बेटा या बेटी??*

*हम सभी लोग मेन हॉल में बैठे-बैठे चर्चाएं कर रहे थे तभी मेरी बहन ने मुझसे एक प्रश्न पूछा कि "भैया! यह बताओ आदमी के बुढ़ापे का सहारा उसकी बेटी होती है या उसका बेटा?*

*मैंने कहा- "बहन! यह प्रश्न ना करो तो ही अच्छा है। क्योंकि इससे कोई तो खुश होगा किसी को दुख होगा।*

*तो अन्य सभी लोग जिद करने लगे नहीं नहीं यह बात तो बतानी ही पड़ेगी वह भी विस्तार से...*

मैने कहा तो फिर सुनो... *बुढापे का सहारा बेटा या बेटी नहीं "बहू" होती हैं।*

जैसा कि लोगों से अक्सर सुनते आये हैं कि बेटा या बेटी बुढ़ापे की लाठी होती है इसलिये लोग अपने जीवन मे एक *"बेटा एवं बेटी"* की कामना ज़रूर रखते हैं ताकि बुढ़ापा अच्छे से कटे।

ये बात सच भी है *क्योंकि बेटा ही घर में बहु लाता है।* बहु के आ जाने के बाद एक बेटा अपनी लगभग सारी जिम्मेदारी अपनी पत्नी के कंधे पर डाल देता है।
और *फिर बहु बन जाती है अपने बूढ़े सास-ससुर की बुढ़ापे की लाठी ।*

जी हाँ! मेरा तो यही मानना है वो बहु ही होती है जिसके सहारे बूढ़े सास-ससुर अपना जीवन अच्छे से व्यतीत करते हैं।

*एक बहु को अपने सास-ससुर की पूरी दिनचर्या मालूम होती है।*
कौन कब और कैसी चाय पीते है , क्या खाना बनाना है , शाम में नाश्ता में क्या देना , रात को हर हालत में 9 बजे से पहले खाना बनाना है ।
अगर सास-ससुर बीमार पड़ जाए तो पूरे मन या बेमन से बहु ही देखभाल करती है।

अगर एक दिन के लिये बहु बीमार पड़ जाए या फिर कही चली जाएं , तो पूरे घर की धुरी हिल जाती है । परंतु यदि बेटा 15 दिवस की यात्रा पर भी चला जाये तो भी बहू के भरोसे घर सुचारू रूप से चलता रहता है ।

बिना बहू के सास-ससुर को ऐसा लगता है *जैसा उनकी लाठी ही किसी ने छीन ली हो।* वे चाय नाश्ता से लेकर खाना के लिये छटपटा जाएंगे । कोई और पूछने वाला उनके पास नही होता ।

क्योंकि बेटे के पास समय नही है और अगर बेटे को समय मिल जाये भी तो वो कुछ नही कर पायेगा क्योंकि उसे ये मालूम ही नही है *कि माँ-बाबूजी को सुबह से रात तक क्या क्या देना है ?* क्योंकि बेटे के चंद सवाल है और उसकी ज़िम्मेदारी खत्म...

जैसे "माँ-बाबूजी ने खाना खा लिया?" "चाय पी लिये? "नाश्ता कर लिये?" लेकिन कभी भी ये जानने की कोशिश नही करते कि वे क्या खाते हैं? कैसी चाय पीते हैं? ये लगभग सभी घरों की कहानी है ।
मैमैंने तो अधिकतर ऐसी बहुएं देखी है जो अपनी सास की बीमारी में तन मन से सेवा करती हैं.. *इसलिये मेरा मानना है कि बहु ही होती हैं बुढ़ापे की असली लाठी*।

*लेकिन एक बात और सच है कि आप में भी अक्ल होनी चाहिए कि हर वक्त "मेरा राजा बेटा!" "मेरी रानी बेटी!" की रट छोड़ "मेरी अच्छी बहु रानी!" की रट भी लगानी चाहिए।*

अतः अपनी बहू में सिर्फ कमिया न ढूंढे, उसकी अच्छाइयों की कद्र करे ।

*"आज का संदेश"*
बहु की त्याग और सेवा को पहचानिएं
*बेटे एवं बेटी से पहले बहु को अपना मानिए।*

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