Ekpahal

Ekpahal EK PAHAL is a registered Non Govt. Organization (NGO) working for environment for the upliftment of unprivileged class of the society.

आज अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस (Global Tiger Day) है। 29 जुलाई, 2010 को रूस के सेंट पीटर्सवर्ग में हुए बाघ सम्मेलन में बाघों...
29/07/2025

आज अंतर्राष्ट्रीय बाघ दिवस (Global Tiger Day) है। 29 जुलाई, 2010 को रूस के सेंट पीटर्सवर्ग में हुए बाघ सम्मेलन में बाघों की लुप्त हो रही प्रजातियों की ओर ध्यान आकर्षित करने, उनकी रक्षा करने के लिए अन्तर्राष्ट्रीय बाघ दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। इसी सम्मेलन में 2022 तक बाघों की संख्या दुगुनी करने का लक्ष्य रखा गया। तब से दुनिया के अधिकतर देशों में आज के दिन इस दिवस को मनाया जाता है। पर्यावरणविदों का मानना है यदि इनकी संख्या इसी तरह घटती रही तो वह दिन दूर नहीं जब बाघों का नामोनिशान इस धरती से मिट जायगा। आप और हम जिस प्राणी को देख कर तथा उसकी गर्जना को सुन कर डर जाते हैं आज उसके खुद के अस्तित्व को खतरा मंडरा रहा है। भारत में भी बाघों की घटती जनसंख्या को देखते हुए 7 अप्रैल, 1973 में तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने उत्तराखंड के जिम कार्बेट पार्क से इस बाघ बचाओ परियोजना (Project Tiger) शुरू की, जिसके अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। आज दुनिया के 70 प्रतिशत बाघ भारत में मौजूद हैं।

बाघों की जनसंख्या जिस गति से बढ़ रही है, उस हिसाब से उनके निवास एवं भोजन की पर्याप्त व्यवस्था न होने तथा उनके घरों में मनुष्यों द्वारा अतिक्रमण करने के कारण वे जंगल छोड़ कर गावों की ओर बढ़ रहे हैं तथा नरभक्षी बन रहे हैं। मेरी जानकारी के अनुसार बाघ एक ऐसा जानवर है जो झुंड में नहीं रहता है। एक नर बाघ 20 - 25 किलोमीटर के दायरे में अकेला ही रहना पसंद करता है।

EK PAHAL
12/06/2025

EK PAHAL

26/11/2024
आज महान स्वतंत्रता सेनानी, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री तथा आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल...
18/10/2024

आज महान स्वतंत्रता सेनानी, उत्तर प्रदेश तथा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री तथा आंध्र प्रदेश के पूर्व राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी जी की जयंती एवं पुण्यतिथि दोनों हैं। यह संयोग ही है कि उनका जन्म जहां 18 अक्टूबर, 1925 को नैनीताल जिले के पदमपुरी नामक गाँव में हुआ, वहीं निधन 18 अक्टूबर, 2018 को नई दिल्ली के मैक्स अस्पताल में हुआ। अभी कुछ दिन पहले मैं भीमताल के रास्ते जागेश्वर जा रहा था। रास्ते में पदमपुरी बोर्ड देखा तो तिवारी जी याद आ गये। मैंने गाड़ी रोकी, एक दुकान में चाय पी। दुकानदार से पूछा - क्या नारायण दत्त तिवारी जी इसी गांव में रहते थे? उसने सामने एक मकान दिखाया तथा बोला यहीं तिवारी जी का मकान है, इसी में वे रहते थे। पता नहीं उसकी बात में कितनी सच्चाई थी, कह नहीं सकता।उन्होंने अपना राजनीतिक जीवन पचास के दशक में प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से शुरू किया। मैंने उन्हें लाल टोपी पहने हुए मकर संक्रांति के दिन बागेश्वर के सरयू नदी के बगड़ में पहाड़ी में भाषण देते हुए सुना है। साठ के दशक में वे कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गये। नब्बे के दशक में कुछ समय कांग्रेस पार्टी (तिवारी) में रहे। जीवन के अंत में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी का दामन थाम लिया था।

नब्बे के दशक में प्रधानमन्त्री निवास में तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री पी वी नरसिंह राव जी श्री नारायण दत्त तिवारी जी की जीवनी पर लिखी एक पुस्तक का विमोचन कर रहे थे। तिवारी जी स्वयं उसमें उपस्थित थे। एक वरिष्ठ पत्रकार ने अपना भाषण शुरू करते हुए कहा -"अगर तिवारी जी इस बार लोकसभा का चुनाव जीत गये होते तो" इतना सुनते ही उत्सुकतावश मैं चौक पड़ा कि उनका अगला वाक्य क्या होगा? वह आगे बोले "आज तिवारी जी नरसिंह राव जी के दाहिने हाथ होते"। उनके यह विचार सौ प्रतिशत सही थे। भले ही तिवारी जी का नरसिंह राव जी के साथ बीच में राजनीतिक मतभेद हो गये थे परंतु दोनों की मित्रता में कोई कमी नहीं आई। नरसिंह राव जी ने प्रधानमन्त्री का पद सम्हालने के बाद उन्हें दसवें वित्त आयोग का अध्यक्ष बनने की पेशकश की परंतु तिवारी जी ने इसे ठुकरा दिया। उन्हें मेरा सहस्र नमन।

आज प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार शैलेश मटियानी जी की जयंती है। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। उनका जन्म 1931 में आ...
14/10/2024

आज प्रसिद्ध हिन्दी साहित्यकार शैलेश मटियानी जी की जयंती है। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। उनका जन्म 1931 में आज ही के दिन उत्तराखंड राज्य के अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना नामक ग्राम में एक गरीब परिवार में हुआ था। बचपन में ही माता-पिता का साया उनके सिर से उठ गया। पाँचवी कक्षा पास करने के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी और अपने चाचा की गाय बकरियाँ चराने लगे। पर उन्हें पढ़ने का बड़ा चाव था। जंगल में जब वह गाय बकरियां चरा रहे होते तो उनका ध्यान स्कूल की तरफ ही रहता। उनकी इस अभिलाषा को देख कर स्कूल के एक अध्यापक ने उनके चाचा से निवेदन किया कि वह इस बच्चे को स्कूल भेज दें, यह बहुत होनहार लड़का है। चाचा मान गये। 17 साल की उम्र में फिर पढ़ना शुरू किया और विकट परिस्थितियों में हाईस्कूल परीक्षा उत्तीर्ण की। उसके बाद अल्मोड़ा आकर अपने चाचा की दुकान में काम करने लगे। वहीं से उनके दिल में लेखक बनने के अंकुर फूटने शुरू हुए। 1951 में वह अल्मोड़ा छोड़ कर सीधे दिल्ली आ गये। दिल्ली आकर कुछ समय रहने के बाद मुंबई चले गए। यहाँ वे 'अमर कहानी' के संपादक, आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रहने लगे। तब तक 'अमर कहानी' और 'रंगमहल' में उनकी कहानियां प्रकाशित हो चुकी थीं। फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें कई कठिन अनुभवों से गुजरना पड़ा। 1956 में श्रीकृष्ण पुरी हाउस में काम मिला जहाँ वे साढ़े तीन साल तक रहे। इतना कष्टमय जीवन में भी अपना लेखन जारी रखा। पुरी हाउस में बिताये अपने दिनों का वर्णन अपनी आत्मकथा 'पर्वत से सागर तक' में लिखते हैं - "चाट हाउस में मालिकों के द्वारा मंगाई जाने वाली गुजराती भाषा की पत्रिकाएं भी आया करती थीं। उस क्रम में ही बड़े सेठ ने 'सरस्वती' का अंक भी खोलकर देख लिया था, मेरी अनुपस्थिति में और कुछ अन्य नौकरों को मेरा फोटो छपा दिख कर, कहा था कि यह तो रघुनाथ का फोटो छपा है। लोगों ने बताया कि मैं मोरी में बैठे-बैठे कुछ लिखता रहा हूँ, लेकिन यह कई महीनों के बाद की बात थी। तब तक मोरी का काम मुझसे छूट चुका था और ग्राहकों को आर्डर वाले रामचंद्र या ज्ञानी के बताये अनुसार सामान पहुंचाया करता था। तब तक कई पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं छप चुकी थीं, अनेकों कहानियां थी, जो या तो पहाड़ के परिवेश को लेकर लिखी गई हुआ करती थीं, या बम्बई कर परिवेश को।" उन दिनों साप्ताहिक 'धर्मयुग' में उनकी कई कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी थीं।

उन्होंने कहीं लिखा है कि जब वह दिल्ली में थे तो मुंबई जाने के लिए उनके पास पैंसे नहीं थे तो वह कागज और पेंसिल लेकर लालकिले के घास के मैदान में बैठ गये और एक सप्ताह में उन्होंने एक उपन्यास लिख डाला और उसको आत्माराम एंड संस को बेचकर सीधे मुंबई चले गये। इन्हीं संघर्षपूर्ण जीवन में रह कर मटियानीजी ने सौ से अधिक उपन्यास और कहानियां लिखी। 1992 में छोटे पुत्र की मृत्यु के बाद उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। जीवन के अंतिम वर्षों में वे हल्द्वानी आ गये। विक्षिप्तता की स्थिति में 24 अप्रेल, 2001 को दिल्ली के शाहदरा अस्पताल में उनका देहांत हुआ।

इस महान लेखक को मेरा सहस्र नमन।

*सरोकार* -*शिप्रा शुद्धिकरण : मुख्यमंत्री डॉ. यादव के निर्देश पर आस जगी*                           *डॉ. चन्दर सोनाने*   ...
30/12/2023

*सरोकार* -
*शिप्रा शुद्धिकरण : मुख्यमंत्री डॉ. यादव के निर्देश पर आस जगी*
*डॉ. चन्दर सोनाने*
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में भोपाल में आयोजित एक बैठक में निर्देश दिए कि उज्जैन की मोक्षदायिनी शिप्रा नदी के जल के शुद्धिकरण के लिए योजना बनाई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि खान नदी का गंदा पानी शिप्रा नदी में नही मिले, यह सुनिश्चित किया जाए। मुख्यमंत्री के इस निर्देश पर दशकों से प्रदूषित पतित पावन शिप्रा नदी को अपने उद्धार की एक नई आस जगी है।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के निर्देश पर तत्काल भोपाल में अधिकारियों ने बैठक की। इस बैठक में वर्चुअल रूप से उज्जैन के वरिष्ठ अधिकारी भी जुड़े। इस बैठक में सबने एक ही उपाय सुझाया और वो सुझाव यह था कि इन्दौर और सांवेर में लगे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) की क्षमता और बढ़ा दी जाए। और इसके साथ ही उज्जैन में खान नदी पर भी एक नया सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट लगा दिया जाए, ताकि शिप्रा में दूषित और प्रदूषित जल मिल नहीं पाए। बैठक में यह भी बताया गया कि देश के सबसे स्वच्छ शहर इन्दौर का सीवेज युक्त 5 क्यूसेक प्रदूषित पानी खान नदी में मिलते हुए उज्जैन आकर त्रिवेणी पर शिप्रा नदी में मिल रहा है और इससे शिप्रा प्रदूषित हो रही है। भोपाल में आयोजित बैठक में जो सुझाव आया है वह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। और इस पर ही सही मायने में ध्यान केन्द्रीत किया जाए तो शिप्रा नदी को प्रदूषण मुक्त होने में अधिक समय नहीं लगेगा।
शिप्रा शुद्धिकरण के लिए पूर्व में प्रयास नहीं किए गए, ऐसा नहीं है। पूर्व में भी सिंहस्थ 2016 के समय श्रद्धालुओं को शुद्ध जल में स्नान पुण्य लाभ मिल सके इसके लिए 95 करोड़ रूपए खर्च कर खान डायवर्सन पाईप लाइन योजना को धरातल पर उतारा गया था, किन्तु वह पूरी तरह असफल सिद्ध हो गई। इसी प्रकार गत वर्ष 5 दिसम्बर 2022 को जल संसाधन विभाग द्वारा 598 करोड़ 66 लाख रूपए कि खान डायवर्सन क्लोज डक्ट परियोजना स्वीकृत की गई थी। यह योजना अभी तक धरातल पर उतरी नहीं है, किन्तु इसके भी असफल होने की पूरी तरह से संभावना है। क्योंकि यह योजना भी खान डायवर्सन पाईपलाईन योजना के मूल उद्देश्य को ध्यान में रखकर बनाई गई। जिस प्रकार वह योजना असफल सिद्ध हुई, उसी प्रकार इस नवीन योजना के असफल होने की संभावना के कारण विभिन्न क्षेत्रों से इसका विरोध किया जाने लगा। इसी कारण से लगता है यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का नया निर्देश आशा जगाने वाला है। उन्होंने अपने निर्देश में कहीं भी 5 दिसम्बर 2022 की क्लोज डक्ट परियोजना का उल्लेख नहीं करते हुए नवीन योजना बनाने के निर्देश दिए। इससे यह संभावना पुख्ता हुई कि सही समय पर उक्त योजना को शुरू होने से पहले ही रोक दिया गया। यह खबर आशा जगाने वाली है।
खुशी की बात है कि पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने इंदौर और उज्जैन में बहने वाली खान नदी को राष्ट्रीय गंगा संरक्षण मिशन नमामि गंगे प्रोजेक्ट में शामिल करते हुए 511 करोड़ रूपए की मंजूरी दी है। इसके अर्न्तगत 195 एमएलडी के तीन सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट ( एसटीपी ) बनाए जायेंगे। इनमें से 120 एमएलडी का एसटीपी कबीटखेड़ी, 35 एमएलडी का लक्ष्मीबाई प्रतिमा और 40 एमएलडी का एसटीपी कनाड़िया पर बनाया जायेगा। यह खान नदी गंगा बेसिन में शामिल की गई है। इसका पानी शिप्रा, चंबल और यमुना नदी के माध्यम से गंगा नदी में मिलता है।
केन्द्र सरकार द्वारा दी गई यह मंजूरी इंदौर शहरी सीमा से सटे गाँव और शिप्रा शुद्धिकरण के लिए दी गई है। इस मंजूरी के अन्तर्गत 244 करोड़ रूपये से एसटीपी का निर्माण किया जायेगा और 190 करोड़ रूपये मेंटेनेंस के लिए भी दिए जायेंगे। दो साल में इस प्रोजेक्ट को पूरा करने का लक्ष्य तय किया गया है। इस परियोजना के अर्न्तगत 13 किलोमीटर की पाईप लाईन भी डाली जायेगी। इसके पानी का उपयोग बगीचे, खेल मैदान, सड़क धुलाई आदि में किया जा सकेगा। हाल फिलहाल इन्दौर नगर निगम 10 एसटीपी से 412 एमएलडी पानी प्रतिदिन उपचार कर रहा है। 90-90 एमएलडी के एसटीपी पुरानी टेक्नोलॉजी के है। अब नई परियोजना के अर्न्तगत नई टेक्नोलॉजी से एसटीपी बनाए जायेंगे।
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा मुख्यमंत्री का पदभार ग्रहण करने के बाद जल्द ही उन्होंने शिप्रा शुद्धिकरण की सुध ली है, यह सराहनीय है। अब यह उम्मीद बनी है कि इन्दौर और सांवेर में सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता बढ़ा देने से वहाँ और तेजी से एवं अधिक अशुद्ध जल का शुद्धिकरण हो सकेगा। वहीं उज्जैन के त्रिवेणी पर खान नदी पर एक नया सीवरेज प्लांट बनाने से खान नदी का प्रदूषित पानी शुद्ध हो सकेगा और वह शिप्रा नदी में मिलने से नदी प्रदूषित नहीं हो पायेगी। इसके साथ ही यह भी प्रयास किया जाना चाहिए कि आगामी सिंहस्थ 2028 में शिप्रा के जल से ही श्रद्धालु स्नान कर सके, इसके लिए शिप्रा को प्रवाहमान बनाने की भी आवश्यकता है। इस दिशा में भी जल विशेषज्ञों की मदद लेकर कार्य करने की आवश्यकता है, ताकि आगामी सिंहस्थ में श्रद्धालुगण शिप्रा के जल में ही स्नान कर सके।
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आज आर्यसमाज के प्रसिद्ध नेता, संसद में हिन्दी के ओजस्वी वक्ता, हिंदी एवं संस्कृत के प्रकांड विद्वान पूर्व सांसद स्वर्गीय...
30/12/2023

आज आर्यसमाज के प्रसिद्ध नेता, संसद में हिन्दी के ओजस्वी वक्ता, हिंदी एवं संस्कृत के प्रकांड विद्वान पूर्व सांसद स्वर्गीय श्री प्रकाशवीर शास्त्री जी की जन्मशती है। उनका जन्म 30 दिसंबर, 1923 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद (अब जे पी नगर) के रेहरा नामक गांव में हुआ था। आगरा विश्वविद्यालय से एम ए करने के बाद वे गुरुकुल वृन्दावन के उप कुलपति नियुक्त किये गये। सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय बनारस से शास्त्री की डिग्री हासिल की। तब से ही वह अपने नाम के आगे शास्त्री लगाने लगे। वैसे वह त्यागी परिवार से थे। देश के प्रथम शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम आज़ाद के देहांत के बाद 1958 में गुड़गांव से उप चुनाव में जीत हासिल कर उन्होंने संसद के निचली सदन (लोक सभा) में निर्दलीय सदस्य के रूप में प्रवेश किया। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। 1962 में तृतीय लोक सभा के सदस्य बिजनौर, 1967 में हापुड़ गाज़ियाबाद संसदीय सीट से संसद में पहुंचे। 1971 का पांचवीं लोक सभा का चुनाव उन्होंने फिर हापुड़ गाजियाबाद से ही भारतीय क्रांति दल के टिकट पर लड़ा, पर इस बार उन्हें सफलता नहीं मिली। 1974 में उत्तर प्रदेश से जनसंघ के समर्थन से शास्त्री जी राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।

संसद में धाराप्रवाह हिंदी में जब वह सरकार की आलोचना करते थे तो विरोधी दल के साथ साथ सरकारी बेंच के सदस्य भी उनकी वाणी सुनने के लिए उत्सुक रहते थे। उन दिनों संसद में मंजे हुए वक्ताओं में शास्त्री जी की गिनती की जाती थी।

हिन्दी के क्षेत्र में शास्त्री जी द्वारा किये गये प्रयासों को लोग आज भी याद करते हैं। आकाशवाणी से उन दिनों अंग्रेजी के समाचार पहले प्रसारित होते थे, हिन्दी के बाद में। शास्त्री जी ने संसद में इस पर मांग की कि हिन्दी राष्ट्रभाषा है तो उसका प्रसारण पहले होना चाहिये, अंग्रेजी का बाद में। सरकार ने उनके इस सुझाव को मान लिया। इसी प्रकार भारत सरकार की राष्ट्रीय मुद्रा में रिजर्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर तब केवल अंग्रेजी भाषा में ही होते थे परंतु शास्त्री जी के सुझाव के बाद यह दोनों भाषाओं अंग्रेजी तथा हिन्दी में होने लगे।

हिन्दी को अन्तराष्ट्रीय मंच पर उभारने का प्रथम श्रेय प्रकाशवीर शास्त्री को जाता है। वह एक बार अन्तर्सन्सदीय सम्मेलन (Inter Parliamentary Union) में भाग लेने स्पेन की राजधानी मेड्रिड (Medrid) गये। इस सम्मेलन का समस्त कार्य अंग्रेजी या फ्रांसीसी भाषा में ही होता था। परंतु सदस्यों को छूट थी कि अगर वे इसके अतिरिक्त अपना भाषण किसी अन्य भाषा में देना चाहें तो भाषण की पांच प्रतियां अंग्रेजी या फ्रांसीसी भाषा में टाईप करा कर अग्रिम दे दें तो वे अपनी भाषा में बोल सकते हैं। शास्त्री जी ने इस सुविधा का लाभ उठा कर इस अन्तर्राष्ट्रीय मंच से पहली बार राष्ट्रभाषा हिन्दी में अपना भाषण दिया।

23 नवम्बर, 1977 को जयपुर से एक विवाह समारोह में शामिल होने के बाद वापिस दिल्ली आते हुए श्री प्रकाशवीर शास्त्री जी का हरियाणा में रेवाड़ी के पास रेल दुर्घटना में देहांत हो गया। इस प्रकार इस दुर्घटना में देश ने एक अच्छे वक्ता को खो दिया, जिसकी कमी संसद व संसद से बाहर आज भी खलती है। उनकी स्मृति में राष्ट्रपति भवन से नार्थ एवेन्यू तक की सड़क का नाम 'प्रकाशवीर शास्त्री मार्ग' रखा गया है।

कोटिशः नमन।

*सोनगिरि* यह मध्यप्रदेश के दतिया जिले में है और जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। दतिया से लगभग 15 कि.मी. दूर स्थिति सोनगि...
19/12/2023

*सोनगिरि* यह मध्यप्रदेश के दतिया जिले में है और जैन मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। दतिया से लगभग 15 कि.मी. दूर स्थिति सोनगिरि पर्वत की, छोटी पहाड़ियों पर 9वीं और 10वीं शताब्दी के 107 जैन मंदिरों की श्रंखला हैं। चंद्र-पवित्र (8वें तीर्थंकर) के समय से स्वयं और अनुष्ठान, तपस्या के लिए अभ्यास करने हेतु भक्तों और संन्यासी संतों में यह अद्भुत पवित्र स्थान लोकप्रिय है। यहां साढ़े पांच करोड़ संन्यासी संतों ने मोक्ष को प्राप्त किया है। कहा जाता है कि अनंग कुमार ने यहां से मोक्ष प्राप्त करके जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति पाई थी। पहाड़ी पर 76 जैन मंदिर हैं और 26 मंदिर गांव में हैं। पहाड़ी का जो 57 नंबर का मंदिर है वह मुख्य मंदिर चंद्रप्रभ भगवान की मूलनायक प्रतिमा से युक्त है जो 17 फुट ऊंची है। यह 132 एकड़ की 2 पहाड़ियों से जुड़ा है। यह स्थान और यहां के मंदिर जैन धर्म के ‘दिगम्बर संप्रदाय’ के पवित्रतम स्थान हैं। इस तीर्थस्थल को प्रकृति ने अपनी भरपूर छटा से संवारा, इतिहास ने स्तुत्य गौरव प्रदान किया और अध्यात्म ने इसे तपोभूमि बनाकर निर्वाण के कारण सिद्ध क्षेत्र बनाया है। यह एक अनोखी अद्भुत जगह है। जो शांति के लिए लोकप्रिय है।

*सरोकार* -*जातीय सर्वे : अब नए सिरे से तय होगी राजनीति की दशा और दिशा*                     *डॉ. चन्दर सोनाने*           ...
11/10/2023

*सरोकार* -

*जातीय सर्वे : अब नए सिरे से तय होगी राजनीति की दशा और दिशा*
*डॉ. चन्दर सोनाने*

बिहार सरकार ने पिछले दिनोंं जातीय सर्वे के आँकड़ें जारी किए। इसके साथ ही ऐसा सर्वे करने वाला बिहार देश में पहला राज्य बन गया है। बिहार की जातीय सर्वे के आँकडं़े जारी होने के बाद राजस्थान सरकार ने भी जातीय सर्वे की घोषणा कर दी है। जातीय सर्वे के आँकड़ें, एक ऐसा जिन्न है जो अब बोतल से बाहर आ गया है। इसे वापस बोतल में डालना किसी के बस की बात नहीं है। जातीय सर्वे के बाद सभी राजनैतिक दलों के अपने-अपने फायदे और अपने-अपने नुकसान है। किन्तु यह तय है कि अब जातीय सर्वे के बाद देश की राजनीति की दशा और दिशा नए सिरे से तय होगी।
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा 9 अक्टूबर 2023 को देश के 5 राज्यों में मतदान और मतगणना की तारीखों की घोषणा कर दी गई है। उसके अनुसार मिजोरम में 7 नवम्बर को मतदान होगा। छत्तीसगढ़ में 7 और 17 नवम्बर को दो चरणों में मतदान होगा। मध्यप्रदेश में 17 नवम्बर को और राजस्थान में 23 नवम्बर को मतदान की तारीख तय की गई है। तेलंगाना में 30 नवम्बर को मतदान की तिथि निश्चित की गई है। पाँचों राज्यों में एक साथ 3 दिसंबर को मतगणना होगी और चुनाव परिणाम घोषित किए जायेंगे। इसके बाद अगले साल 2024 में लोकसभा के चुनाव होंगे। यह निश्चित है कि उक्त 5 राज्यों में इस वर्ष नवम्बर में होने वाले विधानसभा चुनाव के बाद और अगले साल 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में बिहार के जातीय सर्वे के बाद नए सिरे से राजनीति की गोटियाँ बिछाई जायेंगी।
अभी देश में अनुसूचित जाति को 15 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति को 7.5 प्रतिशत और ओबीसी को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है। इस प्रकार कुल मिलाकर 49.5 प्रतिशत आरक्षण का वर्तमान में प्रावधान है। बिहार के जातीय सर्वे के बाद राजस्थान सरकार ने भी जातीय सर्वे की घोषणा कर दी है। इसके पूर्व उड़ीसा ने 1 मई 2023 को 208 पिछड़ी जातियों के लोगों की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का पहला सर्वे शुरू किया है। किन्तु इसकी रिपोर्ट अभी जारी नहीं की गई है। इसके भी पहले कन्नड़ ने 2013 में बनी कांग्रेस सरकार ने जातिवाद सामाजिक और आर्थिक सर्वे कराया था, किन्तु इसकी भी रिपोर्ट जारी नहीं की गई है। इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र और तमिलनाडु की विधानसभाओं में जातीय जनगणना का प्रस्ताव पारित हो चुके है। बिहार में हुए जातीय सर्वे के बाद निश्चित रूप से आरक्षण के उक्त प्रावधानों पर बहस छिड़ेगी और उसे बढ़ाने-घटाने पर बात होगी, यह भी तय है।
बिहार सरकार ने पिछले दिनों हुए जातीय सर्वे के जो आँकडं़े जारी किए है, उसके अनुसार करीब 13 करोड़ की आबादी वाले बिहार में 36 प्रतिशत अति पिछड़े वर्ग के लोग निवास करते हैं। इसके अतिरिक्त कुल 27 प्रतिशत पिछड़े वर्ग के लोग रहते हैं। 19 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 1.68 प्रतिशत अनुसूचित जाति के लोग हैं। सामान्य वर्ग से 15.52 प्रतिशत लोग बिहार राज्य में हैं। इस प्रकार बिहार राज्य में कुल 81.99 प्रतिशत हिन्दू और 17.7 प्रतिशत मुस्लिम हैं। बाकी के अन्य हैं। हमारे देश में पहली बार 1931 को ऐसे आँकडं़े जारी हुए थे। उसके बाद पहली इस प्रकार के आँकड़ें जारी किए गए हैं।
बिहार में हुए जातीय सर्वे के आधार पर अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़े वर्ग का कुल प्रतिशत 83.68 आ रहा है। अभी उक्त तीनों वर्गों के लोगों को 49.5 प्रतिशत का आरक्षण का प्रवधान है। बिहार राज्य के सर्वे के आधार पर जो आँकडं़े सामने आए हैं, वह एक राज्य का उदाहरण मात्र है। किन्तु यदि अन्य राज्यों में भी जातीय सर्वे होते हैं तो कमोबेश थोड़ा बहुत अंतर ही उन आँकड़ों में आयेगा। इससे राजनैतिक दलों के जातीय आधार पर की जाने वाली राजनीति निश्चित रूप से प्रभावित होगी। इससे ही विभिन्न राजनैतिक दलां की दशा और दिशा तय होगी, यह भी निश्चित है।
हमारे देश में 2021 की होने वाली जनगणना को कोरोना के कारण स्थगित कर दिया गया था। अब यह भी तय है कि आगामी जनगणना 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद ही होगी। इस वर्ष नवम्बर में होने वाले 5 राज्यों के विधानसभा चुनावों और आगामी 2024 में होने वाली लोकसभा चुनाव के समय बिहार में की गई जातीय सर्वे का जिन्न बोलेगा। इससे कोई राजनैतिक दल अछूता नहीं रह पाएगा। सभी राजनैतिक दलों को अपनी प्राथमिकताए नए सिरे से तय करनी होगी। हालांकि सभी राजनैतिक दल जातीय आधार पर चुनाव की बात से इंकार करते हैं, किन्तु वास्तव में सभी राजनैतिक दल जातीय आधार पर ही विधानसभा और लोकसभा में उम्मीदवार खड़ा करते हैं। अर्थात प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से चाहे अनचाहे रूप से सभी राजनैतिक दल इससे जुड़े हुए हैं। इससे कोई बच नहीं सकता। सभी राजनैतिक दलों को अब अपनी दशा और दिशा नए सिरे से परिभाषित करनी ही होगी। यह अच्छा होगा या बुरा यह भविष्य में ही पता चल सकेगा !
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*सरोकार* -*देश में आखिर बलात्कार के प्रकरण कम क्यों नहीं हो रहे ?*                          *डॉ. चन्दर सोनाने*          ...
03/10/2023

*सरोकार* -

*देश में आखिर बलात्कार के प्रकरण कम क्यों नहीं हो रहे ?*
*डॉ. चन्दर सोनाने*
महाकाल की नगरी उज्जयिनी में पिछले दिनों 12 साल की एक मासूम के साथ हुई दुष्कर्म की खबर अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि मध्यप्रदेश के ही अशोकनगर से एक ओर बुरी खबर आ गई। हाल ही में अशोकनगर जिले के गुहासा की रहने वाली एक विवाहित महिला के साथ गाँव के ही तीन निवासियों देवेन्द्र, शैलेन्द्र, मन्ना और एक ड्राइवर ने चलती कार में रातभर दरिंदगी की और सुबह ग्राम शाढ़ौरा के पास बेहोशी की हालत में अर्द्धनग्न कपड़ों में बेसहारा छोड़ दिया। आखिर हमारे देश में यह हो क्या रहा है ? दरिंदगी के प्रकरण कम क्यों नहीं हो रहे हैं ? इसके कारणों पर आज जाने की महति आवश्यकता है।
भारत सरकार के सांख्यिक अनुसंधान विभाग द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत में दर्ज बलात्कार के मामलों की संख्या 2005 से 2021 तक इस प्रकार है- वर्ष 2021 में भारत में दर्ज किए गए बलात्कार के मामलों की कुल संख्या 31 हजार से अधिक थी। यह पिछले वर्ष की तुलना में बलात्कार के मामलों में वृद्धि थी। भले ही देश में कई बलात्कारों की रिपोर्ट दर्ज नहीं की जाती है, लेकिन यह एक ऐसा मुद्दा है जो लगातार समाचारों की सुर्खियाँ बनता है, कुछ के कारण सार्वजनिक विरोध भी होता है। हालाँकि हाल के वर्षों में बलात्कार की रिपोर्टें बढ़ी हैं, फिर भी इसे अपराधी के बजाय पीड़िता के लिए शर्म से जोड़ा गया है।
भारत में बलात्कार की पीड़िता को न केवल सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है, बल्कि इससे भी अधिक, न्याय के लिए उसकी लड़ाई उस व्यवस्था के कारण आसान नहीं होती है जो अक्सर अपने दुर्भाग्य के लिए पीड़िता को दोषी ठहराती है। ऐसे उदाहरण सामने आए हैं जहाँ पीड़ितों को पुलिस स्टेशनों पर प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और अक्सर उन पर अपने मामले वापस लेने के लिए दबाव डाला जाता है। हालाँकि, एक बार जब कोई मामला सुनवाई के लिए जाता है, तो कुछ भी हल होने में दशकों लग सकते हैं। विशेष रूप से बलात्कार के मामलों को भारी लंबित मामलों का सामना करना पड़ता है, जहाँ नए मामलों की संख्या हर साल निपटाए गए मामलों की संख्या से अधिक हो जाती है। यह प्रक्रिया कठिन है और पीड़ित के जीवन में इतना आघात ला सकती है कि वे अक्सर अपने या अपराधी के परिवार के दबाव में झुक जाते हैं।
आखिर क्या कारण है कि हमारे देश में जहाँ महिलाओं को देवी मानकर उनका पूजन किया जाता है, वहाँ महिलाओं के प्रति दरिंदगी और हैवानियत की पराकाष्ठा के प्रकरण आए दिन सामने आते रहते हैं। इसके कारणों पर जाएँ तो पता चलता है कि अपराधियों को कानून के प्रति कोई खौफ नहीं है ! देश की राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया कांड के दोषियों को मौत की सजा सुप्रीम कोर्ट द्वारा दे दी जाने के बावजूद वे कई सालों तक फाँसी के फंदे से बचते रहे ! कई सालों की लंबी लड़ाई के बाद ही उन्हें फाँसी की सजा मिल पाई !
पिछले दिनों गुजरात में बिलकिस बानो का गैंगरेप करने वाले 11 दोषियों को गुजरात सरकार ने रिहा कर दिया था। जब बिलकिस बानो के साथ गैंगरेप हुआ था, उस वक्त वो 5 महीने की गर्भवती भी थी। गुजरात के गोधरा में 2002 में दंगों के बाद बिलकिस बानो के साथ जो गैंगरेप हुआ था, उस समय उसके परिवार के 7 लोगों की हत्या भी कर दी गई थी। इसके बावजूद इस मामले में 2008 में 11 दोषियों को फाँसी की सजा नहीं सुनाई गई, बल्कि उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी।
इसके बावजूद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी घटना को अंजाम देने वाले दरिंदो को उम्र कैद की सजा होने के बाद भी गुजरात सरकार ने उन्हें रिहाई कैसे दे दी ? यही नहीं इन दरिंदों की जब रिहाई हुई तो बेशर्मी की हद पार कर दी गई। उन्हें सार्वजनिक रूप से पुष्पमाला पहनाकर स्वागत सम्मान किया गया। जैसे वे कोई वीरतापूर्ण और साहसी कार्य करके आए हैं ! ऐसा क्यों हुआ ? हांलाकि यह प्रकरण फिर से सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया है, जहाँ इन 11 दरिंदों को रिहा करने के लिए सुनवाई चल रही है।
किन्तु फिर सवाल यह उठता है कि बिलकिस बानो जैसे गैंगरेप करने वालों को गुजरात सरकार द्वारा रिहा कर देने के बावजूद जब उनका रिहा होने पर पुष्पमाला पहनाकर स्वागत किया जाता है तो गैंगरेप करने वालों के मन में खौफ कैसे पैदा हो ? हाल ही में अशोकनगर में फिर गैंगरेप हुआ। अपराधियों के मन में कोई खौफ ही नहीं है। वे जानते हैं कानून में इतनी गलियाँ हैं कि वे उससे बचकर आ सकते हैं। तो वे डरे क्यो ?
इसलिए जरूरी यह है कि भारत सरकार कानून में इस प्रकार से संशोधन करें कि कहीं भी किसी भी मासूम या लड़की या विवाहित महिला के साथ बलात्कार करने वाले दरिंदों को अधिकतम एक साल के अंदर सजा हो और वो सजा भी मृत्युदंड से कम नहीं हो ! तो ही अपराधियों में कानून के प्रति भय होगा और वे ऐसा करने के बारे में 10 बार सोचेंगे। ऐसा कब होगा ? होगा कब ? या ऐसा ही चलता रहेगा ...
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*सरोकार* -*महिला आरक्षण : अभी आधी आबादी को 6 साल और करना होगा इंतजार*                                  *डॉ. चन्दर सोनाने...
26/09/2023

*सरोकार* -

*महिला आरक्षण : अभी आधी आबादी को 6 साल और करना होगा इंतजार*
*डॉ. चन्दर सोनाने*

हाल ही में लोकसभा और राज्यसभा से महिला आरक्षण विधेयक नारी शक्ति वंदन अधिनियम सर्वसम्मति से पारित हो गया। किन्तु इस विधेयक में यह शर्त जोड़ी गई है कि जनगणना के बाद परिसीमन होगा और उसके बाद ही इस अधिनियम को नियमानुसार लागू किया जा सकेगा। इसके पूर्व यह विधेयक देश की विधानसभाओं में भेजा जायेगा। 50 प्रतिशत विधानसभाओं से पारित होने के बाद राष्ट्रपति के पास भेजा जायेगा और उनके हस्ताक्षर होने के बाद ही यह अधिनियम विधिवत कानून की शक्ल ले सकेगा।
इसका स्पष्ट मतलब है कि आगामी 2024 में लोकसभा चुनाव के समय यह विधेयक लागू नहीं हो सकेगा। आगामी लोकसभा चुनाव के बाद जनगणना होगी और जनगणना के बाद परिसीमन होगा। जनगणना में करीब 2 साल लगेंगे। इसी प्रकार परिसीमन में भी करीब 2 साल लगेंगे। इसके बाद विधानसभाओं में इस विधेयक को पारित होने में भी समय लगेगा। अर्थात् आगामी लोकसभा चुनाव के बाद अगला लोकसभा चुनाव 2029 में होगा। इसके साथ ही यह अधिनियम कानून की शक्ल ले पायेगा। इसका अर्थ है कि अभी इस विधेयक को लागू होने में कम से कम 6 साल और लगेंगे। यानी देश की आधी आबादी को अभी कम से कम 6 साल और इंतजार करना होगा।
निःसंदेह महिला आरक्षण विधेयक देश की आधी आबादी के लिए बहुत बड़ा तोहफा है। इसके लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस सहित सभी राजनैतिक दलों को इसका श्रेय जाता है। यह पहली बार है कि देश की आधी आबादी को आरक्षण देने में देश के सभी प्रमुख राजनैतिक दलों ने एकजुटता और सर्वसम्मति दिखाई। इसके लिए सभी बधाई के भी पात्र हैं। इस विधेयक के बाद अब देश की लोकसभा में 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। इसी प्रकार देश के सभी राज्यों की विधानसभाओं में भी अनिवार्य रूप से विधायकों की 33 प्रतिशत सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो सकेगी। यह निःसंदेह अत्यन्त सुखद है।
देश के पूर्व प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी मई 1989 में पंचायतों और नगर पालिकाओं के लिए महिला आरक्षण विधेयक लाए थे। इसके बाद देश की आधी आबादी को लोकसभा और राज्यों की विधानसभा में भी आरक्षण का इंतजार था। हाल ही में लोकसभा में लगभग सर्वसम्मति से और राज्यसभा में सर्वसम्मति से यह विधेयक पारित होने से लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित होने का मार्ग प्रशस्त हो सकेगा।
यह महिला आरक्षण विधेयक करीब 3 दशक से अटका हुआ था। महिलाओं को आरक्षण देने का मुद्दा पहली बार 1974 में महिलाओं की स्थिति का आंकलन करने वाली समिति ने उठाया था। इसके बाद पहली बार 2010 में मनमोहन सरकार ने इस विधेयक को राज्यसभा में तो पास करा लिया, किन्तु कुछ राजनैतिक दलों के विरोध के कारण लोकसभा में अटक गया। तब से अनेक कारणों से लोकसभा में यह विधेयक पारित नहीं हो सका। नई संसद में प्रवेश के समय यह विधेयक पारित हो सका।
वैसे देखा जाए तो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की उपस्थिति कभी भी 15 प्रतिशत से अधिक नहीं रही। पिछले 5 लोकसभा चुनाव की ही बात की जाए तो सन 1999 में केवल 49 महिला सांसद थी। यह कुल सांसदों का 9 प्रतिशत ही था। 2004 में महिलाओं के सांसदों की संख्या और गिरकर 45 हो गई। उन सांसदो में महिलाओं का प्रतिशत 8.3 प्रतिशत ही रहा। 2009 में सांसदों की संख्या बढ़कर 59 हो गई, किन्तु यह प्रतिशत भी कुल लोकसभा सदस्यों की तुलना में 10.9 प्रतिशत ही रहा। सन 2014 में महिला सांसदों की संख्या बढ़कर 62 हो गई। यह कुल सदस्यों में से महिलाओं का 11.4 प्रतिशत रहा। पिछले लोकसभा चुनाव 2019 में पहली बार सांसदों की संख्या बढ़कर 78 हुई, किन्तु यह भी 14.4 प्रतिशत ही रहा। देश के किसी भी राज्य में 15 प्रतिशत से अधिक महिला विधायक कभी भी नहीं रही। इस मायने में देखा जाए तो यह विधेयक मील का पत्थर साबित होगा। जब देश की लोकसभाओं और विधानसभाओं में महिलाओं का 33 प्रतिशत हो जायेगा। यह जब भी होगा, निश्चित रूप से सुखद स्थिति होगी।
महिला आरक्षण अधिनियम में वर्तमान में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए दिए गए आरक्षण के अन्तर्गत ही महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। यह सराहनीय है। किन्तु और अधिक अच्छा होता, यदि इस अधिनियम में लोकसभा और विधान सभाओं में पिछड़े वर्ग के लिए भी आरक्षण का प्रावधान किया जाता और उसमें भी महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाता। भले ही लोकसभा और विधानसभाओं में पिछड़े वर्ग को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया जाता। यह अभी नहीं हुआ है। यह दुखद है।
वैसे देखा जाए तो यह विधेयक तुरंत प्रभाव से भी लागू किया जा सकता था। यदि इस विधेयक में जनगणना और परिसीमन का नियम लागू नहीं किया जाता तो निश्चित रूप से यह विधेयक आगामी लोकसभा चुनाव में लागू हो सकता था। मनमोहन सरकार ने जब राज्यसभा में सन 2010 में यह विधेयक पारित किया था, उसमें जनगणना और परिसीमन का नियम लागू नहीं किया गया था। अब देश की आधी आबादी को कम से कम 6 साल और इंतजार करना ही होगा तब जाकर सन 2029 के लोकसभा चुनाव में यह विधेयक लागू हो सकेगा। तब तक करना होगा महिलाओं को और इंतजार !

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*सरोकार* - *पेंशनरों से संबंधित धारा 49 : इसमें आपसी सहमति का उल्लेख ही नहीं!*                                *डॉ. चन्दर...
20/08/2023

*सरोकार* -

*पेंशनरों से संबंधित धारा 49 : इसमें आपसी सहमति का उल्लेख ही नहीं!*
*डॉ. चन्दर सोनाने*

राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 के अन्तर्गत पहली बार छत्तीसगढ़ सरकार के वित्त विभाग ने मध्यप्रदेश सरकार के वित्त विभाग से छत्तीसगढ़ राज्य के पेंशनरों/परिवार पेंशनरों की मँहगाई राहत में 4 प्रतिशत की वृद्धि कर 42 प्रतिशत की दर से 1 जुलाई 2023 से दिए जाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार से सहमति मांगी है। इसके पूर्व सन् 2000 से हमेशा मध्यप्रदेश सरकार ही छत्तीसगढ़ सरकार से पेंशनरों की मँहगाई राहत में वृद्धि करने के संबंध में सहमति माँगती आई है।
आइए, अब हम यह जानते हैं कि मध्यप्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 है क्या ? वह है यह -
*छठी अनुसूची*
*( धारा 49 देखिए )*
*पेंशनों की बाबत दायित्व का प्रभाजन*
*1. पैरा 3 में वर्णित समायोजनों के अधीन रहते हुए विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य द्वारा नियत दिन के पहले अनुदत्त पेंशनों की बावत प्रत्येक उत्तरवर्ती राज्य अपने-अपने खजानों में से पेंशनें देगा ।*
*2. उक्त समायोजनों के अधीन रहते हुए विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य के कार्यकलापों के संबंध में सेवा करने वाले उन अधिकारियों की पेंशनों के वारे में दायित्व, जो नियत दिन के पहले सेवानिवृत्त होते हैं या सेवानिवृत्ति पूर्व छुट्टी पर चले जाते हैं किन्तु पेंशनों के लिए जिनके दावे उस दिन के ठीक पहले वकाया हैं, मध्य प्रदेश राज्य का दायित्व होगा ।*
*3. नियत दिन से आंरभ होने वाली और उस वित्तीय वर्ष के 31 मार्च को समाप्त होने वाली कालावधि की वावत तथा प्रत्येक पश्चात्वर्ती वित्तीय वर्ष की वावत पैरा 1 और 2 में निर्दिष्ट पेंशनों के वारे में सभी उत्तरवर्ती राज्यों को किए गए कुल संदायों को संगणना में लिया जाएगा। पेंशनों की वावत विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य में के कुल दायित्व का उत्तरवर्ती राज्यों के बीच प्रभाजन जनसंख्या के अनुपात में किया जाएगा और अपने द्वारा देय अंश से अधिक का संदाय करने वाले किसी उत्तरवर्ती राज्य को आधिक्य की रकम की प्रतिपूर्ति कम संदाय करने वाले उत्तरवर्ती राज्य द्वारा की जाएगी।*
*4. नियत दिन के पहले अनुदत्त की गई और विद्यमान राज्य के राज्य क्षेत्र से बाहर किसी भी क्षेत्र में दी जाने वाली पेंशनों के बारे में विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य का दायित्व, पैरा 3 के अनुसार किए जाने वाले समायोजनों के अधीन रहते हुए मध्य प्रदेश राज्य का दायित्व होगा, मानो ऐसी पेंशन पैरा 1 के अधीन मध्य प्रदेश राज्य के किसी खजाने से ली गई हो।*
*5. (1) विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य के कार्यकलाप के संबंध में नियत दिन के ठीक पहले पश्चात सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारी की पेंशन के बारे में दायित्व, उसे पेंशन अनुदत्त करने वाले उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा, किंतु किसी ऐसे अधिकारी को विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य के कार्यकलाप के संबंध में सेवा के कारण मिलने वाली पेंशन का प्रभाग उत्तरवर्ती राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में आंवटित किया जाएगा और पेंशन अनुदत्त करने वाली सरकार उत्तरवर्ती राज्यों में से प्रत्येक राज्य से इस दायित्व का उसका अंश प्राप्त करने की हकदार होगी ।*
*(2) यदि ऐसा कोई अधिकारी नियत दिन के पश्चात पेंशन अनुदत्त करने वाले राज्य से भिन्न एक से अधिक उत्तरवर्ती राज्यों के कार्यकलापों के संबंध में सेवा करता रहा हो, तो पेंशन अनुद्त करने वाले राज्य को वह राज्य सरकार ऐसी रकम की प्रतिपूर्ति करेगी ? जिसका नियत दिन के पश्चात की उसकी सेवा के कारण मिलने वाली पेंशन, के भाग का वहीं अनुपात हो, जो प्रतिपूर्ति करने वाले राज्य के अधीन नियत दिन के पश्चात की उसकी अर्हक सेवा का उस अधिकारी को उसकी पेंशन के प्रयोजनार्थ परिकलित नियत दिन के पश्चात की कुल सेवा का है।*
*6. इस अनुसूची में पेंशन के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत पेंशन मूल्य के प्रति निर्देश भी है ।*
तो यह है बहुचर्चित धारा 49 की छठी अनुसूची। इसमें कहीं भी एक राज्य दूसरे राज्य से पेंशनरां की पेंशन बढ़ाने के संबंध में लिखित में सहमति माँगे, इसका कहीं उल्लेख ही नहीं है। इसके बावजूद सन् 2000 से सहमति माँगने का बहाना कर पेंशनरों के अधिकारों का हनन किया जा रहा है।
उल्लेखनीय है कि केन्द्र सरकार के गृह विभाग ने 13 नवम्बर 2017 को जहाँ पेंशनर्स एसोसिएशन मध्यप्रदेश भोपाल को चिट्ठी लिखकर धारा 49 के उन्मूलन की जानकारी दे दी थी। इस पत्र की प्रतिलिपि उन्होंने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को भी दी थी। इसके बावजूद दोनों राज्य इस अति महत्वपूर्ण पत्र को दबाकर बैठ गए हैं। मध्यप्रदेश पेंशनर्स एसोसिएशन के उपाध्यक्ष श्री गणेशदत्त जोशी ने अनेक बार राज्य सरकार को इस पत्र का हवाला देते हुए धारा 49 के उन्मूलन की चर्चा करते हुए छत्तीसगढ़ से सहमति नहीं माँगने का अनुरोध किया था, किन्तु राज्य सरकार के कानों पर जूं नहीं रैंगी ! इसके साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि धारा 49 यदि लागू भी होती है तो वह सन् 2000 के पहले सेवानिवृत्त होने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों पर लागू होगी! इसके बाद सेवानिवृत्त होने वाले किसी भी कर्मचारी पर यह लागू नहीं होगी। इस महत्वपूर्ण बिन्दू को ही राज्य सरकार के अधिकारी घोलकर पी गए हैं।
दो अगस्त को छत्तीसगढ़ सरकार ने सांतवें वेतनमान के कर्मचारियों को 1 जुलाई 2023 से मूल पेंशन का 5 प्रतिशत बढ़ाकर 38 प्रतिशत करने की सहमति दी है । इसी प्रकार छठवें वेतनमान के कर्मचारियों के लिए भी 1 जुलाई 2023 से परिवार पेंशन का 11 प्रतिशत बढ़ाकर 212 प्रतिशत करने की सहमति दे दी है। इसके साथ ही छत्तीसगढ़ सरकार ने 2 अगस्त को ही सातवें वेतनमान में 38 प्रतिशत से वृद्धि कर 42 प्रतिशत करने और छठवें वेतनमान में 212 प्रतिशत से वृद्धि कर 221 प्रतिशत की दर से 1 जुलाई 2023 से दिए जाने की सहमति मध्यप्रदेश सरकार से मांगी है। 2 सप्ताह से अधिक अवधि बीत जाने के बावजूद मध्यप्रदेश सरकार से अभी तक इस दिशा में कोई निर्णय नहीं लेकर पेंशनरों को अधर में अटका रखा है। मध्यप्रदेश सरकार ने 7 अगस्त को सातवें और छठवें वेतनमान के कर्मचारियों को 1 जुलाई 2023 से 5 प्रतिशत की वृद्धि का आदेश जारी कर दिया है। किन्तु इसके बावजूद अभी तक पेंशनरों को इसका लाभ मिलने की प्रतीक्षा है।
अब सवाल यहाँ यह उठता है कि मध्यप्रदेश सरकार और छत्तीसगढ़ सरकार राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 को केन्द्र सरकार के निर्देश के बावजूद उसके उन्मूलन की बात को स्वीकार नहीं कर रही है तो इन दोनों राज्यों ने धारा 49 को हटाने के लिए अभी तक क्या किया है ? और यदि अभी तक कुछ नहीं किया है तो अब कब करेंगे ??? यदि उक्त दोनों राज्य सरकारें सही मायने में पेंशनरों की हितेषी है तो इन्हें संयुक्त रूप से कार्रवाई कर केन्द्र सरकार से धारा 49 के स्थायी उन्मूलन की दिशा में ठोस पहल शीघ्र अतिशीघ्र करनी चाहिए। इसका पेंशनरों को इंतजार रहेगा। इसके अलावा वे बेचारे कर भी क्या सकते हैं !
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