Siddha-Yoga

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02/03/2026

"योगेश्वर प्रभु रामलाल जी का जीवन प्रकाश" नामक पुस्तक से उद्धृत"

प्रभु जी के पूर्वज़ व आज तक की वंशावली

वंश-जोशी, ब्राह्मणों में उच्च जाति ।

प्रवर मुख्य - ऑङ्गिरस ऋषि
गौत्र- मौद्गल्य
शाखा- माध्यन्दिनी (सारस्वत ब्राह्मण) और सूत्र कात्यायनी

योगेश्वर प्रभु राम लाल जी के वंश का लेखा जोखा पूरा-पूरा नहीं मिलता परन्तु पांच पीढ़ियों से आज तक वृत्तान्त निम्नलिखित है।

1. पंडित चढ़त राम जी : पंडित चड़त राम जी जालन्धर के गांव धिहाड़ा में रहते थे। एक बार सतलुज नदी में बाढ़ आ गई। पंडित जी गांव छोड़ कर लाहौर जिले के गांव नौशहरा में बस गये। जो आजकल पाकिस्तान में है। पंडित जी अनन्य प्रभु भक्त थे। संसार से विरक्त थे।

एक दिन गांव के बाहर तालाब पर स्नान कर रहे थे तो गांव के ही वासी ने आकर पंडित जी को बताया कि आप के घर पुत्र हुआ है। उन्होंने प्रभु जी का शुक्रिया किया तथा वहीं से भक्ति करने के लिये जंगलों में चले गये। उसके पश्चात् उनका कोई पता नहीं चला।

2. पंडित साई दत्त जी : पंडित चढ़त राम जी के पुत्र का नाम साई दत्त रखा। एक वर्ष एक गांव नौशहरा में माता जी के साथ रहे परन्तु पिता चढ़त जी का जब कोई पता नहीं चला तो माता जी अपने मायके बग्याना (लाहौर) में आ गई। आप की माता जी ने ही आप की परवरिश व पढाई करवाई।

पंडित साई दत्त जी ईश्वर भक्त थे। एक चालिस दिनों के अनुष्ठान के लिये वे बिना बताये घर से नदी किनारे एक कुटिया में अनुष्ठान के लिये गये। सारे गांव वाले भी पंडित जी को ढूंढते रहे परन्तु उनका कुछ पता नहीं चला। एक दिन गांव वासियों को पता चला कि साई दत्त जी नदी किनारे कुटिया में रह रहे हैं। उस गांव बासी ने साई दत्त जी के मामा को बताया तो वो उसी समय नदी पर पहुंचे। मामा जी ने देखा कि वह अनुष्ठान में मग्न है तो मामा जी ने आवाज लगाई तथा घर चलने को कहा परन्तु साई दत्त जी ने कहा मामा जी आज 39 दिन हो गये हैं अनुष्ठान करते हुये। कल घर आ जाऊंगा। परन्तु मामा जी ने डांटते हुये कहा
घर चलो। साई दत्त जी अनुष्ठान छोड़कर उसी समय मामा जी के साथ घर आ गये।
एक दिन गांव के मुखिया के पुत्र की खेलते-खेलते अचानक मृत्यु होगई। जब संस्कार के लिये उसे श्मशान लेकर जा रहे थे तो पंडित साई दत्त जी के घर के सामने से गुजरते या पंडित ने पूछा किस का देहान्त हुआ है तो पता चला कि गांव के मुखिया के पुत्र का देहान हुआ है। परन्तु उन्होंने शव यात्रा को रुकवा कर शव को देखा। उन्होंने शव के चारों तरफ जल छिड़का तथा चावलों को भी मन्त्रों के साथ शव के दक्षिण पर फेका। कुछ समय के पश्चात् एक कुरूप स्त्री (चुडेल) आकर खड़ी हो गई। पंडित जी के पूछने पर कि इस बालक की तूने जान क्यों ली है। इसे इसी समय जीवित कर वरना तेरे साथ अच्छा नहीं होगा। वह चुडेल स्त्री डर गई तथा उसने कहा इस कार्य के लिये किसी की बलि देनी होगी। बाद में एक पशु की बलि दी। कुछ समय बाद वह बालक जीवित हो गया। उस स्त्री ने फिर ऐसा कर्म न करने की प्रतिज्ञा की तथा उसको पंडित जी ने क्षमा कर दिया।

3. पंडित कन्हैया लाल जी : पंडित साई दत्त जी के घर दो पुत्र हुये। पंडित सुख दयाल तथा पंडित कन्हैया लाल जी। साई दत्त जी लगभग 52 वर्ष की आयु में स्वर्गवास हो गये। पंडित सुख दयाल जी उच्च कोटि के विद्वान थे। पंडित कन्हैया लाल जी दयालु स्वभाव के वैद्य थे।

4. पंडित गण्डा राम जी : विः सवंत् 1904 (सन् 1848 ई.) कार्तिक कृष्ण नवमी चन्द्रवार को पंडित कन्हैया लाल जी के यहां पुत्र हुआ। जिस का नाम गण्डा राम रखा। पंडित गंडा राम जी अपने माता-पिता के अकेले पुत्र थे। उन्होंने अमृतसर के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित विष्णु दास जी से विद्या ग्रहण की। कन्हैया जी सवत् 1938 में स्वर्गवास हो गये। (सन् 1881 ई.) विःसम्वत् 1933 ( सन् 1877 ई.) 29 वर्ष की आयु में पंडित गंडा राम जी ने कटड़ा भाई संत सिंह अमृतसर में एक दुकान किराये पर ली तथा वहां ज्योतिष का कार्य करने लगे। उसके पश्चात् नौशहरा में अपने पिता की आज्ञा से अपना परिवार अमृतसर ले आये। उस समय आप के दो बच्चे थे। एक पुत्र तीर्थराम तथा दूसरी पुत्री इसरो देवी जी। विःसवत् 1942 (सन् 1886 ई.) को पंडित गंडा राम जी के यहां जुड़वा पुत्र हुये। पंडित रामशरण दास जी व हरिकृष्ण जी। हरिकृष्ण जी का बाल्यकाल में ही देहान्त हो गया था। इस समय गंडा राम जी भाईया वाली गली नजदीक बेरी गेट रहने लगे थे। सन् 1907 व संवत् 1964 ई. में अपने धाम स्वर्ग सिधार गये।

5. इसी मकान में योगेश्वर प्रभु राम लाल जी का वि. सम्वत् 1945 (सन् 1888 ई.) में जन्म हुआ। प्रभु जी की अपनी कोई सन्तान नहीं हुई।
प्रभु जी का जन्म पंचांग के हिसाब से राम नवमी 19 अप्रैल सन् 1888, समय इष्ट 6 घड़ी 56 पल, वृहस्पतिवार, वृषभ लग्न, चैत्र शुक्ल नवमी सम्वत 1945, मकान नं. 764/4. भाईया वाली गली नजदीक बेरी गेट ( कटड़ा भाई सन्त सिंह) अमृतसर में हुआ।

पंचांग के हिसाब से राम नवमी 19-20 अप्रैल सन् 1888 ई. बनती है। इस हिसाब से शुक्रवार बनता है परन्तु काक नाड़ी ग्रंथ के अनुसार वीरवार है। कई वार पंडित लोग एक त्यौहार को दो-दो दिनों तक मान लेते हैं। ग्रह नक्षत्रों के अनुसार। परन्तु ऋषि कांक भुषुण्ड़ी जी के अनुसार वीरवार लिखा है। इस लिये वीरवार ही मान्य है। पिता गंडा राम जी ने प्रभु राम लाल जी की जन्म पत्री देख कर कहा कि ये बहुत उच्च आत्मा है। जन्म पत्री में ऐसे ग्रह भगवान् के होते हैं।

योगेश्वर सद्गुरु चरणकमलेभ्यो नमः

11/02/2026

Acharya ji

20/01/2026

4 फेरे / 7 फेरे?
यह प्रश्न गहरा + सूक्ष्म है
विवाह सह-यात्रा है। Prem भावना है, सख्य धर्म है।
हिंदू धर्म में विवाह एक गहन दार्शनिक और आध्यात्मिक अवधारणा है I (DharmaPatni and not KaamPatni )

भारतीय परंपरा में 4 फेरे और 7 फेरे, दोनों ही सही हैं
भारतीय ज्ञान चेतना, उद्देश्य और संदर्भ के अनुसार कभी एक ही नियम सबके लिए नहीं कहता।

वैदिक दृष्टि में विवाह यज्ञ है। Contract नहीं I

4 फेरे: प्रवृत्ति मार्ग = संसार में रहते हुए धर्म /Artha-Centric Marriage. धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
यह सामाजिक और व्यावहारिक विवाह है। Arya Samaj, sikhs etc

7 फेरे (सप्तपदी) शास्त्रीय रूप से विवाह पूर्णi दो चेतनाओं का सात स्तरों पर एक हो जानाI यही योग bhi है I
तं विद्यात् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। भगवद गीता (6.23)
दुःख से संयोग के वियोग को ही योग कहते हैं।
सप्तपदी का उद्देश्य = दो व्यक्तियों के अहंकार का वियोग, और चेतना का संयोग।

सातवें फेरे के बाद पत्नी/पति = सहधर्मी ।
भारतीय ब्रह्मांडीय संरचना सप्त है 7 चक्र, 7 लोक, 7 ऋषि, 7 स्वर, 7 अग्नियाँ (शरीर में)

सप्तमे पदे सख्यं भवति।
सातवें कदम पर पति-पत्नी के बीच सख्य (शाश्वत मित्रता) स्थापित होती है।
चार फेरे जीवन की व्यवस्था सिखाते हैं,
सप्तपदी जीवन का रहस्य।

संक्षेप में: 4 फेरे = सही.जीवन की व्यवस्था
7 फेरे = पूर्ण, आत्मा का बंधन
अब हम विवाह को कर्मकाण्ड से निकालकर योग में स्थापित करते हैं

वह गुप्त योगिक सत्य है
हर व्यक्ति अधूरा है, विवाह पूरा करने के लिए नहीं, अहं को गलाने के लिए है
जो विवाह अहं बढ़ाए, वह बंधन है, जो अहं मिटाए, वही योग है

योग में विवाह = दो शरीर नहीं, दो प्राण-तंत्रों का संयोग
पति और पत्नी प्रतीक हैं इड़ा–पिंगला नाड़ी, शिव–शक्ति, चेतना–ऊर्जा
अग्नि = कुंडलिनी की जाग्रत शक्ति

अग्निर्यथैको भुवनं प्रविष्टो
रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव। कठोपनिषद्
एक ही अग्नि सबमें प्रवेश कर अनेक रूपों में प्रकट होती है। विवाह में अग्नि बताती है दो देहों में एक ही चेतना है।

चार फेरे हठयोग के चार स्तम्भ हैं धर्म= यम, अर्थ= नियम, प्काम= राण, ध्मोक्ष= ध्यान

चार फेरे = योग की नींव
सप्तपदी = कुंडलिनी का सात चक्रों में आरोहण
मूलाधार = सुरक्षा, भरोसा
स्वाधिष्ठान = भावनात्मक संतुलन
मणिपूर= इच्छाशक्ति
अनाहत = प्रेम का शुद्ध रूप
विशुद्ध = सत्य संवाद
आज्ञा= एक दृष्टि
सहस्रार = सख्य (द्वैत समाप्त) friendship/ true love/being soulmates

सातवें फेरे पर अहं समाप्त. अब मित्रता I मैं और तुम” का अंत।
यत्रोपरमते चित्तं
निरुद्धं योगसेवया
विवाह वही है जहाँ दूसरे की उपस्थिति में मन शांत हो जाए।

4 फेरे = हठयोग (स्थूल शुद्धि)
7 फेरे = राज/कुंडलिनी योग (सूक्ष्म जागरण)
विवाह = दैनिक साधना, जिसमें दूसरा व्यक्ति तुम्हारा गुरु बन जाता है।

विवाह
वि (vi) = एक विशेष उत्तरदायित्व, आगे ले जाने, विकसित करने का उत्तरदायित्व
वह (vah) = वहन करना या मार्गदर्शन करना

अब आइए विवाह के कुछ विज्ञान की बात करें।
यह बात खासकर उस युवा पीढ़ी के लिए है, जो किसी भी चीज़ को तभी मानती है जब उसके पीछे विज्ञान हो।

विवाह केवल भावना नहीं है, यह Behavioral Engineering है। कर्मकाण्ड इसलिए काम करते हैं क्योंकि जब कोई काम मेहनत वाला हो, नियमों में बंधा हो, सबके सामने हो तो वह गंभीरता का संकेत देता है और casual relationships को अलग कर देता है। ऐसे संस्कारों को दंपति ज़्यादा गहराई से याद रखते हैं और निभाते हैं।
विवाह महँगा और सार्वजनिक क्यों होता है?
क्योंकि महँगे और सार्वजनिक rituals भरोसा पैदा करते हैं। जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से, मेहनत से, नियमों में बंधकर कुछ करता है तो बाद में यह कहना मुश्किल हो जाता है कि “मैंने तो सच में चाहा ही नहीं था।” इससे कमिटमेंट और सहयोग दोनों बढ़ते हैं।
जब लोग एक ही लय में चलते हैं जैसे कदम से कदम मिलाकर चलना (army marching), अग्नि के चारों ओर घूमना, मंत्र जप तो science बताता है कि इससे सहयोग और आपसी बंधन बढ़ता है, भरोसा बढ़ाता है, और दर्द सहने की क्षमता तक बदल देता है। ।बार-बार होने वाली, synchronized movement दो लोगों के नर्वस सिस्टम को ऐसा महसूस कराती है जैसे वे एक ही टीम हों।शरीर पहले “हम” का अभ्यास कर लेता है, दिमाग बाद में उसे समझाता है।

आग की गर्मी, ध्यान का केंद्र, दोहराव, साक्षी लोग, और वह विशेष समय जो रोज़मर्रा से अलग होता है ये सब मिलकर relatives, friends, 2 families और जोड़े के बीच गहरा बंधन बनाते हैं। commitment केवल नैतिक फैसला नहीं है, वह एक प्रशिक्षित शारीरिक अवस्था भी है।

मानव दिमाग को अनिश्चितता बिल्कुल पसंद नहीं है| विवाह अनिश्चितता अनिश्चितता मिटाने की तकनीक हैं। विवाह तब योग बनता है, जब दूसरे की उपस्थिति में मन शांत हो जाए। एक अच्छा जीवनसाथी हमारे लिए जीवित सुरक्षा संकेत बन जाता है।

यह वही है जिसे आप सह-धर्म / सह-योग कहते हैं—
जहाँ दो लोग केवल साथ नहीं रहते, बल्कि एक-दूसरे के नर्वस सिस्टम को स्थिर करते हैं।

आग (अग्नि) क्यों?
आग मन पर तीन शक्तिशाली प्रभाव डालती है:
ध्यान खींचती है – तेज़ रोशनी, गति और हल्का खतरा।
सीमा बनाती है – यह समय साधारण नहीं है, कुछ विशेष हो रहा है। स्मृति में गहराई से बैठती है – उच्च ध्यान और भावना वाले क्षण ज़्यादा मज़बूती से याद रहते हैं। इसीलिए दुनिया भर में पूजा और संस्कारों में आग, पानी, सीमाएँ और गोल आकृतियाँ इस्तेमाल होती हैं। संस्कार व्यक्ति को स्थिर रखते हैंI भारतीय ज्ञान परंपरा में विवाह को क्षणिक भावनाओं से ऊपर रखा गया। इसलिए कथाएँ संघर्ष दिखाती हैं, त्याग दिखाती हैं, तपस्या दिखाती हैं
पर तलाक नहीं।
विवाह कोई अंधविश्वास नहीं है। यह मानव मन, शरीर और समाज को जोड़ने की एक गहरी वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे भारतीय परंपरा ने हजारों साल पहले अनुभव से समझ लिया था।

तलाक (Divorce) एक पाश्चात्य अवधारणा है।
सनातन धर्म में तलाक कोई संस्कार नहीं है, न ही उसके लिए कोई विधि, मंत्र या अनुष्ठान हैं।
भारतीय परंपरा में विवाह एक संस्कार है, और संस्कार जोड़ा जाता है, तोड़ा नहीं जाता।
यहाँ विवाह का उद्देश्य केवल सुख या सुविधा नहीं, बल्कि व्यक्ति का क्रमिक विकास (evolution of consciousness) है। इसी कारण भारतीय पुराणों या महाकाव्यों में डिवोर्स stories नहीं मिलती हैं

पश्चिम में विवाह कानूनी अनुबंध/contract की तरह देखा गया I जबकि सनातन परंपरा में विवाह एक यज्ञ है, एक दीर्घकालिक सह-यात्रा है, और सबसे महत्वपूर्ण अहंकार को गलाने की प्रक्रिया है I जहाँ विकास है, वहाँ भागना नहीं सिखाया जाता।

सनातन दृष्टि यह मानती है कि संघर्ष असफलता नहीं है. मतभेद टूटन नहीं हैं, और कठिन समय exit का संकेत नहीं, बल्कि अगले स्तर पर उठने का अवसर हैI इसीलिए विवाह को योग कहा गया है जहाँ दूसरा व्यक्ति आपकी परीक्षा भी है और आपका गुरु भी।

सनातन धर्म में विवाह संस्कार, साधना और विकास का मार्ग है। जब हम विवाह के आध्यात्मिक महत्व, उसके योग से संबंध और उसके वैज्ञानिक आधार को सही रूप में समझ लेते हैं, तब हमारे भीतर विवाह की संस्था और उसके संस्कारों के प्रति गहरा सम्मान स्वतः उत्पन्न होता है।
यह ज्ञान मेरा नहीं है।
यह गुरुदेव श्री चंद्रमोहन जी महाराज की कृपा और आशीर्वाद का फल है, मेरे पिता आचार्य चंद्रहास शर्मा जी तथा मेरी पूज्य माता सरिता भारद्वाज के संस्कार और मार्गदर्शन का प्रसाद है।

मैं तीनों के चरणों में सादर प्रणाम करता हूँ।
जय गुरुदेव।

15/01/2026

"मैं इस कृपा का मूल लेखक हूँ। मैंने कई साल पहले सिद्ध-योग के फेसबुक पेज https://www.facebook.com/siddhayoga पर इस घटना के बारे में लिखा था। मेरे आदरणीय पिता जी और मुझे प्रभुजी की इस कृपा के बारे में स्वयं लाल जी ने 1990s में ऋषिकेश में बताया था।उन्होंने गहरी समाधि के अपने अनुभव के बारे में बताया और उनके मन में मेरे पिता जी के लिए कई प्रश्न थे, ताकि वे समझ सकें कि उस अनुभव का अर्थ क्या था और उनके लिए आगे का मार्ग क्या है। उन्होंने पापा से पूरी रात रुकने का अनुरोध किया और गंगा किनारे हम दोनों से पूरी रात बात की; वे समाधि और उससे परे का ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे। प्रभुजी की आज्ञा से वे मेरे पिताजी से अपने अंत समय तक for many years मार्गदर्शन प्राप्त किया करते थे। अब लाल बाबा जी नहीं रहे, लेकिन मैं इस कृपा का साक्षी रहा हूँ। वे प्रभुजी से नेपाल में शारीरिक रूप से प्रत्यक्ष मिले थे और उन्होंने उन घटनाओं का वर्णन किया था। मेरे पिताजी आचार्य चंद्रहास शर्मा जी भी 1970 के दशक में एक बार नेपाल में पशुपतिनाथ मंदिर के बाहर प्रभुजी से मिले थे। मैंने इस दिव्य मिलन के बारे में फेसबुक पेज पर लिखा है। लाल जी भाई ने 2000 के दशक में अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया था।" 👇

"एक अन्य शिष्य लाल बाबाजी को एक बार साँप ने काट लिया और उन्हें लगा कि अब वे मरने वाले हैं। इसलिए उन्होंने अपने कमरे के दरवाज़े बंद कर लिए और ध्यान में बैठ गए और एक संस्कृत श्लोक का जाप किया जिसका अर्थ है कि हे प्रभु कृपया मुझे अपनी बाहों में ले लो क्योंकि मैं अब अपना शरीर छोड़ रहा हूँ। इस श्लोक का जाप करते समय उन्होंने अपने सिर पर प्रभुजी का हाथ महसूस किया और उनकी दिव्य कृपा महसूस की जिसने उन्हें अगले 41 दिनों तक बिना भोजन, पानी या यहाँ तक कि आसन बदले गहरी समाधि अवस्था में ले गया। लाल बाबा अभी भी पूरी तरह जीवित हैं और प्रभुजी की कृपा का एक जीवित प्रमाण हैं।"

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15/01/2026
28/12/2025

श्री गुरुदेव जी की कृपा और माता जी के निर्देशानुसार दिनांक 29.12.2025 से 31.12.2025 तक शिविर के कार्यक्रम को निश्चित किया गया है। कार्यक्रम की रूपरेखा निम्नलिखित है।

प्रातः 8:30 से 9:15 आसन

15 मिनट का अल्पविराम

9:30 आरती
10:00 से 10:30 अल्पाहार
10:30 से 01:00 गीता पाठ व सत्संग

01:00 से 3:00 भोजनप्रसाद एवं विश्राम
3:00 से 4:00 तक संकीर्तन
4:00 से 4:30 आरती।

To join the meeting on Google Meet, click this link:
https://meet.google.com/dnm-ihha-mus

Or open Meet and enter this code: dnm-ihha-mus

Dec 29 2025 - Dec 31 2025 ; 8:30 am to 4:30 pm Indian Time

Question: श्रीमद्भगवद्गीता जी में वर्णशंकर संतान का जिक्र महात्मा अर्जुन जी कर रहे है, उसकी व्याख्या पर प्रकाश डालने की ...
21/12/2025

Question: श्रीमद्भगवद्गीता जी में वर्णशंकर संतान का जिक्र महात्मा अर्जुन जी कर रहे है, उसकी व्याख्या पर प्रकाश डालने की कृपा करे।

Answer: सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च |
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रिया: || 42||
https://www.holy-bhagavad-gita.org/chapter/1/verse/42/hi/

ऑनलाइन उपलब्ध स्पष्टीकरण अधिकतर गलत हैं क्योंकि writer लोग धर्म के गूढ़ अर्थों, राजनीति, ब्रिटिश गुलामी, राष्ट्रीय सुरक्षा और अपनी जाति के भीतर रहने के आर्थिक लाभों से पूरी तरह अवगत नहीं थे।

caste ≠ varna/Jaati/kula
हमें वर्ण (Varna), जाति (Jaati), कुल (Kula), जाति व्यवस्था (Caste), और धर्म (Dharma) के बीच अंतर को समझना होगा।
भारत की अर्थव्यवस्था वर्ण (Varna), जाति (Jaati) और कुल (Kula) की व्यवस्था के कारण ही विश्व में सर्वश्रेष्ठ थी।"

जाति व्यवस्था (Caste system) को अंग्रेजों ने भारत को विभाजित करने के लिए बनाया था ताकि हम कभी एकजुट न हो सकें। इस पर बहुत शोध उपलब्ध है।

जाति-आधारित आरक्षण (Reservation) कांग्रेस द्वारा वोट पाने के लिए बनाया गया था। धर्म केवल एक है, जो ब्रह्मांड के नियमों के साथ align होता है।

धर्म (Dharma). जो धारण करे”—व्यक्ति/समाज/जीवन-व्यवस्था को स्थिर, संतुलित, नैतिक रखे। Religion is not dharma. They are two different things.

कुल (Kula). सिर्फ़ “परिवार” नहीं—बल्कि वंश/कुटुम्ब-समूह + उसकी परंपराएँ + संस्कार-प्रणाली + स्मृति-श्रृंखला। अर्जुन का डर: = कुलधर्म नष्ट

जाति (Jaati) = समुदाय/समूह-आधारित पहचान . कास्ट” नहीं)
वर्ण (Varna) = समाज-व्यवस्था में भूमिका/कर्तव्य-आधारित वर्गीकरण

कास्ट (Caste) = अंग्रेज़ी का शब्द है. NOT जाती/वर्ण/समूह. अक्सर हिंदू समाज को “शर्मिंदा करने के हथियार” की तरह प्रयोग होता है।

कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः…
अर्थ: जब कुल टूटता है, उसकी दीर्घ-परंपराएँ/मर्यादाएँ नष्ट होती हैं; और फिर अधर्म पूरे कुल में फैलता है।

अधर्माभिभवात्… प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः…
अधर्म बढ़े तो “कुलस्त्रियाँ” असुरक्षित
अर्जुन का संकेत सामाजिक ताने-बाने के टूटने पर है
सुरक्षा, आश्रय, अनुशासन, संरक्षक-ढांचे गिरते हैं, तो परिवार-व्यवस्था हिलती है।

तब “वर्णसङ्कर” जन्म लेता है
1.41 में: स्त्रीषु दुष्टासु… जायते वर्णसङ्करः
वर्णशंकर = ऐसी संतान/पीढ़ी जिसका पालन-पोषण, संस्कार-प्रणाली, जिम्मेदारी-शिक्षा टूट चुकी हो,
जिससे जाती-धर्म और कुल-धर्म (समुदाय/कुल की स्थायी व्यवस्थाएँ) ध्वस्त हो जाती हैं।
समाज व्यवस्था-विहीन, संस्कार-विहीन, दिशा-विहीन हो जाते हैं। यह सब “नरक” की स्थिति लाता है (अर्थात सामाजिक पतन/दुःख), और पीढ़ीगत स्मृति-बंधन (श्राद्ध/पिंड-उदक जैसी परंपराएँ) भी टूट जाती हैं—जिससे “पितर” गिरते हैं (वंश-स्मृति की डोर कटती है)।

“वर्णशंकर” को केवल इंटर-कास्ट विवाह वाली सतही बहस में बाँधना, अर्जुन की बात को छोटा कर देता है।
अर्जुन का मूल भय यह है: युद्ध सिर्फ़ शरीर नहीं मारता; वह ‘संस्कार की सप्लाई’ तोड़ देता है।
और जब यह चेन टूटती है, तो पीढ़ियाँ पहचान (कुल), समुदाय-सहयोग (जाती), भूमिका/कर्तव्य-बोध (वर्ण), और जीवन-धारण करने वाला ढांचा (धर्म)—इन सबमें भ्रमित हो जाती हैं।
आज के शब्दों में= family as institution collapse, identity + duty confusion

अक्सर “वर्णशंकर” को केवल जातीय मिश्रण के रूप में समझ लिया जाता है,
लेकिन अर्जुन की पीड़ा इससे कहीं अधिक गहरी है। वर्ण यहाँ जन्म नहीं, बल्कि स्वभाव (गुण), कर्तव्य (कर्म), जीवन-मूल्य (धर्म), का संकेत है।

वर्णशंकर संतान
= ऐसी पीढ़ी जो न अपने मूल्यों को जानती है, न अपने कर्तव्यों को, न समाज के प्रति उत्तरदायित्व को
यह धर्म-स्मृति के टूटने का संकट है।

अर्जुन की असली चिंता - लड़ाई से लोग मरेंगे , इस युद्ध से संस्थाएँ मर जाएँगी—परिवार, परंपरा, संस्कार, स्मृति। जब परिवारों के संरक्षक नष्ट होते हैं,
तो रीतियाँ, अनुशासन, और मूल्य भी नष्ट हो जाते हैं।
स्त्रियों का असुरक्षित होना सामाजिक सुरक्षा का टूट जाना है।
पितरों का पतन यह पीढ़ियों के बीच स्मृति-संबंध टूटने का संकेत है। जब नई पीढ़ी यह नहीं जानती कि हम कौन हैं, कहाँ से आए हैं, और किसलिए हैं तो समाज जड़ों से उखड़ जाता है
जब समाज कर्म, गुण और धर्म के संतुलन को खो देता है,
तब पीढ़ियाँ जन्म तो लेती हैं पर दिशा के बिना।

सनातनियों को, योगियों को गर्भोपनिषद का अध्ययन करना चाहिए ताकि वे जान सकें कि योगी, वीर और बुद्धिमान संतानें कैसे उत्पन्न की जाती हैं। लोग आज इस बारे में बात नहीं करते, लेकिन हमारे प्राचीन ऋषियों को यह ज्ञान था। उन्होंने यह ज्ञान अपने शिष्यों को इसलिए दिया ताकि वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए मजबूत वर्ण, जाति, कुल और धर्म का निर्माण जारी रख सकें।
ज्ञान के अभाव में 'तमस' बढ़ता है, जिससे समाज की शक्ति क्षीण होती है।
विदेशी आक्रमणों ने हमें इसलिए गुलाम बनाया क्योंकि हमने इस ज्ञान को खो दिया और हम तमोगुणी बन गए।

मातृतः पितृत आत्मतः सात्म्यतो रसतः सत्त्वतः।
इत्येतेभ्यो भावेभ्यः समुदितेभ्यो गर्भः सम्भवति॥

Charaka Samhita Sharira Sthana Chapter 4, verse 4
यही कारण है कि संस्कार और सही व्यक्ति से विवाह करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। ध्यान (Meditation) में भी व्यक्ति को अपनी वंश परंपरा (lineage tradition) और वर्ण के ऋषियों एवं योगियों के दर्शन प्राप्त हो सकते हैं। यह बात मुझे मेरे पिता आचार्य चंद्रहास शर्मा जी ने बताई थी।

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19/12/2025

प्रश्न और उत्तर का महत्व

कृपया आपस में प्रश्न पूछिए और एक-दूसरे से सीखिए। प्रश्न और उत्तर का संबंध ज्ञान की नींव है। प्रश्न जिज्ञासा को जन्म देते हैं, सोच को गहराई प्रदान करते हैं और नए दृष्टिकोण खोलते हैं, जबकि उत्तर समझ को स्पष्ट करते हैं और सीखने की दिशा दिखाते हैं। सही प्रश्न व्यक्ति को सतही जानकारी से आगे ले जाकर सत्य की खोज की ओर प्रेरित करते हैं, और सार्थक उत्तर अनुभव, विवेक तथा बुद्धि को समृद्ध करते हैं। शिक्षा, संवाद और जीवन तीनों में प्रश्न और उत्तर विकास, नई सोच और आत्मबोध के सशक्त साधन हैं।

भारतीय परंपरा कहती है—
आत्मनं विद्धि — स्वयं को जानो
और जानना बिना प्रश्न के संभव नहीं।

भारतीय परंपरा मूलतः प्रश्न-उत्तर की परंपरा है। हमारे सभी शास्त्र और उपनिषद प्रश्न से ही प्रारंभ होते हैं। श्रीमद्भगवद्गीता स्वयं एक प्रश्न-उत्तर संवाद है। प्रश्न से ही ब्रह्मविद्या का आरंभ है। प्रश्न उपनिषद तो पूरा का पूरा प्रश्नों पर ही आधारित है—छह शिष्यों के छह प्रश्न और गुरु पिप्पलाद के उत्तर। यहाँ स्पष्ट है कि ज्ञान का द्वार प्रश्न से ही खुलता है। यदि प्रश्न करना अधर्म होता, तो गीता का जन्म ही न होता।

अन्य अनेक धार्मिक परंपराओं में प्रश्न करने की अनुमति नहीं दी जाती; वहाँ प्रश्न करना निषिद्ध माना जाता है और अंधविश्वास की अपेक्षा की जाती है।
भारतीय ज्ञान-परंपरा में प्रश्न को कभी भी पाप, अपराध या ईशनिंदा नहीं माना गया।
यहाँ प्रश्न श्रद्धा का शत्रु नहीं, बल्कि श्रद्धा का शुद्धिकरण है।
जो प्रश्न करता है, वही जानने की पात्रता रखता है।
जो बिना प्रश्न किए मान लेता है, वह ज्ञान नहीं—केवल विश्वास ढोता है।
ईश्वर सत्य से भयभीत नहीं होता,
और सत्य प्रश्नों से कभी अपवित्र नहीं होता।
इसलिए—
प्रश्न पूछना ईशनिंदा नहीं है।
प्रश्न न पूछना ही अज्ञान की पूजा है।

मस्तिष्क का विकास प्रश्न पूछने से होता है
मानव मस्तिष्क तर्क, निर्णय , नैतिक विवेक , सत्य–असत्य के भेद के लिए उत्तरदायी है।

जब हम प्रश्न पूछते हैं, Prefrontal Cortex - यह भाग सक्रिय होता है। न्यूरॉन्स के बीच नए कनेक्शन बनते हैं।

जब हम बिना प्रश्न किए मान लेते हैं, यह भाग निष्क्रिय हो जाता है।

जहाँ प्रश्न निषिद्ध होते हैं, वहाँ मस्तिष्क का भय केंद्र—प्रमुख हो जाता है। भय आधारित विश्वास:
तर्क को दबाता है

आज्ञाकारिता बढ़ाता है
मानसिक निर्भरता पैदा करता है
विज्ञान कहता है—सत्य प्रश्नों से डरता नहीं, वह उनसे और स्पष्ट होता है।
इसलिए प्रश्न पूछना मानव होने का वैज्ञानिक प्रमाण है।

तुलसीदास स्पष्ट कहते हैं:

बिनु सत्संग विवेक न होई
— उत्तरकांड
विवेक प्रश्न से आता है, भय से नहीं।

हमारी प्राचीन योग परंपरा का उद्देश्य मन को खोलना है—हमें सभी प्रकार के बंधनों, विश्वासों, कर्मों, भ्रांतियों और अज्ञान से मुक्त करना है। गायत्री मंत्र भी इसी का संकेत करता है।
यहाँ “धियो यो नः प्रचोदयात्” का अर्थ है—
“वह दिव्य प्रकाश हमारी बुद्धि को प्रेरित करे।”
यह अंधविश्वास नहीं, बुद्धि के जागरण की प्रार्थना है।

पतंजलि योगसूत्र कहता है:

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः
— योगसूत्र 1.2

योग का उद्देश्य मानसिक वृत्तियों का निरोध है—अंध मान्यताओं को पकड़ना नहीं।

अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः
— योगसूत्र 2.3

अविद्या (अज्ञान) ही मूल बंधन है।
योग का मार्ग अज्ञान को तोड़ता है, न कि उसे पवित्र घोषित करता है।

हम अत्यंत सौभाग्यशाली हैं कि हम योग के मार्ग पर चल रहे हैं और एक दुर्लभ योग परंपरा से जुड़े हैं, जो असंख्य साधनाओं के पश्चात ही प्राप्त होती है।

दुर्लभं त्रयमेवै तद्
देवअनुग्रहहेतुकम्
— विवेकचूड़ामणि

(मानव जन्म, मुक्ति की इच्छा और सद्गुरु—तीनों दुर्लभ हैं)
इसलिए योग परंपरा को अनुग्रह कहा गया है, अधिकार नहीं।

प्रश्न = विद्रोह नहीं, विवेक

गुरु = उत्तर देने वाला नहीं, बुद्धि जगाने वाला

योग = विश्वास थोपना नहीं, बंधनों से मुक्ति

शास्त्र = आदेश नहीं, संवाद

प्रणाम और जय गुरुदेव।

19/12/2025

प्रश्न: मैंने कही पढ़ा कि मंत्र जाप और प्राणायाम से हमारे संचित कर्म नष्ट होते है. क्या ये सत्य हैँ और कितना?

उत्तर: मंत्र और प्राण = चेतना का शोधन

भारतीय दर्शन में कर्म केवल बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि चित्त में संचित संस्कार है।
पतंजलि योगसूत्र

“तज्जपस्तदर्थभावनम्।”
— योगसूत्र 1.28

ईश्वरप्रणिधान से युक्त मंत्र-जप और उसके अर्थ-चिंतन से
अंतराय नष्ट होते हैं।

अगला सूत्र निर्णायक है:

“ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च।”
— योगसूत्र 1.29

इससे चेतना भीतर की ओर प्रवाहित होती है
और अंतराय (कर्मजन्य बाधाएँ) नष्ट हो जाती हैं।
हठयोगप्रदीपिका

“प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत्।”
— हठयोगप्रदीपिका 2.16

प्राणायाम से सभी रोग नष्ट होते हैं।

यहाँ रोग केवल शारीरिक नहीं—
आचार्यों के अनुसार यह आध्यात्मिक रोग (अविद्या, राग, द्वेष, भय) भी हैं—जो कर्मों की जड़ हैं।
“चलनं चित्तस्य प्राणः।”
— हठयोगप्रदीपिका 2.2

जहाँ प्राण चलता है, वहाँ चित्त चलता है।
जब प्राण शुद्ध होता है, चित्त शुद्ध होता है।
और चित्त की शुद्धि = संस्कारों का क्षय।

मुण्डकोपनिषद्

“भिद्यते हृदयग्रन्थिः
छिद्यन्ते सर्वसंशयाः
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि
तस्मिन्दृष्टे परावरे।”
— मुण्डक उपनिषद् 2.2.8

जब ब्रह्म का साक्षात्कार होता है,
हृदय की गाँठ टूट जाती है,
सारे संशय कट जाते हैं
और संचित कर्म नष्ट हो जाते हैं।

महत्वपूर्ण:
यहाँ कहा गया है कि पूर्ण कर्म-नाश ज्ञान से होता है,
पर साधना (मंत्र-जप, प्राणायाम) उस ज्ञान की भूमि तैयार करती है।

नारद भक्ति सूत्र

“तस्मिन्नेव कर्माणि क्षीयन्ते।”
— नारद भक्ति सूत्र 60

ईश्वर-प्रेम में स्थित होने पर कर्म क्षीण हो जाते हैं।

मंत्र-जप जब यांत्रिक न होकर
भाव, श्रद्धा और समर्पण से किया जाता है,
तो वह भक्ति-योग बन जाता है—जो कर्मों को जलाता है।

भगवद्गीता

“यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।”
— गीता 4.37

जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को भस्म कर देती है,
वैसे ही ज्ञान की अग्नि सभी कर्मों को भस्म कर देती है।
मंत्र और प्राणायाम =
ज्ञान-अग्नि को प्रज्वलित करने की प्रक्रिया।

अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न: कितने कर्म नष्ट होते हैं?

शास्त्र तीन प्रकार के कर्म बताते हैं:

संचित कर्म – पूर्व जन्मों का भंडार

प्रारब्ध कर्म – जो इस जन्म में फलित हो रहे हैं

आगामी कर्म – वर्तमान में बन रहे कर्म

शास्त्रीय निष्कर्ष:
साधना का स्तर कर्मों पर प्रभाव
सामान्य मंत्र-जप आगामी कर्म शुद्ध
नियमित प्राणायाम संचित कर्मों का आंशिक क्षय
गहन साधना + विवेक अधिकांश संचित कर्म दग्ध
आत्मज्ञान संचित कर्म पूर्णतः नष्ट
प्रारब्ध केवल भोग से क्षीण

सार = मंत्र और प्राणायाम कर्मों को धोते नहीं—उन्हें पकने से पहले ही जला देते हैं।
हाँ, मंत्र-जप और प्राणायाम से कर्म नष्ट होते हैं

मुख्यतः संचित और आगामी कर्म

प्रारब्ध कर्म पूरी तरह नहीं—उसका अनुभव शेष रहता है

पूर्ण कर्म-नाश = ज्ञान + साधना + वैराग्य

प्रश्न: यहां संचित कर्म से तात्पर्य केवल पाप कर्मों से है न कि पुण्य कर्मों से?

उत्तर: शास्त्रों में “संचित कर्म” का अर्थ केवल पाप नहीं, बल्कि पुण्य और पाप—दोनों का संचित भंडार है। विवेकचूडामणि (शंकराचार्य)

“अनन्तकोटि जन्मार्जितं कर्म संचितम्”

अर्थ:

अनंत जन्मों में अर्जित कर्मों का ढेर—
यहाँ पुण्य–पाप का कोई भेद नहीं किया गया।

शास्त्र कर्म को नैतिक नहीं, बंधनकारी मानते हैं।

पुण्य भी बंधन है
भगवद्गीता

“त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।” (2.45)

वेद भी त्रिगुणों के क्षेत्र में हैं;
अर्जुन, इन गुणों से परे जाओ।

पुण्य = सत्त्वगुण
और सत्त्व भी बंधन है—भले ही स्वर्ण जंजीर हो।
कठोपनिषद्

“उभे ह्येते पुण्यपापे विधूय…” (2.1.2)

ज्ञानी पुण्य और पाप—दोनों को झाड़ देता है
और ब्रह्म को प्राप्त होता है।

यहाँ कोई भ्रम नहीं छोड़ा गया—
मोक्ष के लिए दोनों का क्षय आवश्यक है।
पुण्य भी कर्म बनता है क्योंकि—

पुण्य भी कर्ता से किया गया है

पुण्य भी फल की अपेक्षा रखता है

पुण्य भी भोग मांगता है (स्वर्ग, सुख, सम्मान)
बृहदारण्यक उपनिषद्

“यथाकर्म यथाश्रुतं” (4.4.5)

जैसा कर्म, वैसा फल—
चाहे वह पुण्य हो या पाप।

फल का बंधन ही संसार है।
साधना “पुण्य को पाप” नहीं बनाती

साधना दोनों को पारदर्शी कर देती है
योगसूत्र

“कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनः” (4.7)

योगी का कर्म
न शुक्ल (पुण्य) होता है
न कृष्ण (पाप)।

यह है कर्मातीत अवस्था।
तो क्या पुण्य नष्ट करना चाहिए?
नहीं, नष्ट नहीं—
उत्क्रमित (transcend, go beyond) करना चाहिए।

शास्त्र इसे कहते हैं:

“पुण्य-पापातीत अवस्था”
पुण्य सीढ़ी है,
लेकिन उस पर बैठना नहीं—
उससे आगे तरना है।
साधना का क्रम (शास्त्रसम्मत)

पहले – पाप क्षय (चित्त शुद्धि)

फिर – पुण्य सूक्ष्मीकरण

अंत में – कर्तृत्व का विसर्जन
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।” (18.66)

धर्म (पुण्य सहित) को भी त्यागो—
केवल सत्य में स्थित हो जाओ।
सार एक वाक्य में

पाप लोहे की बेड़ी है,
पुण्य सोने की—
पर मुक्ति दोनों से परे है।
मोक्ष पुण्य का पुरस्कार नहीं,
बल्कि कर्म से मुक्ति है।
ॐ – कर्मबीज जलाता है

गायत्री – कर्म-निर्माण की बुद्धि शुद्ध करती है

महामृत्युंजय – भारी संचित कर्म शांत करता है

राम/नारायण नाम – भावनात्मक कर्म गलाता है

नाड़ीशोधन – आगामी कर्म

कपालभाति / भस्त्रिका – संचित कर्म

कुम्भक – कर्म का मूल

कर्म श्वास से बनता है,
और श्वास थमते ही कर्म की लेखनी गिर जाती है।
गुरुमंत्र केवल पाप कर्म नहीं—बल्कि कर्म के बीज, कर्तृत्व-भाव और अविद्या को जलाता है।
यानी वह कर्म के फल से पहले, कर्म बनने की जड़ पर प्रहार करता है।
“गुरुरेव परं ब्रह्म, गुरुरेव परं तपः।”

गुरु ही ब्रह्म हैं, गुरु ही तप हैं।

इसलिए गुरुमंत्र = तप + ज्ञान + कृपा का संगम
योगसूत्र

“क्लेशमूलः कर्माशयो…” (2.12)

कर्मों की जड़ क्लेश हैं
(अविद्या, अहंकार, राग, द्वेष, भय)

गुरुमंत्र क्लेश-मूल पर काम करता है
इसलिए वह कर्म को उगने से पहले जला देता है।
गवद्गीता

“अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।” (3.27)

अहंकार से मोहित व्यक्ति
स्वयं को कर्ता मानता है।

गुरुमंत्र का वास्तविक कार्य:
“मैं करता हूँ” — इस भ्रम को गलाना।

जब कर्ता मिटता है,
तो पुण्य और पाप—दोनों रुक जाते हैं।
संचित कर्म (पुण्य + पाप)
कठोपनिषद्

“उभे ह्येते पुण्यपापे विधूय…”

ज्ञानी पुण्य और पाप—दोनों को झाड़ देता है।

गुरुमंत्र धीरे-धीरे
संचित पुण्य और पाप—दोनों को पारदर्शी करता है,
बंधनहीन करता है।
आगामी कर्म (Future Karma)

गुरुमंत्र से चित्त की प्रतिक्रिया-शक्ति घटती है।
प्रतिक्रिया नहीं → नया कर्म नहीं।

योगसूत्र

“कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनः।” (4.7)

योगी का कर्म
न पुण्य होता है, न पाप।
क्या गुरुमंत्र प्रारब्ध कर्म जलाता है?

पूरी तरह नहीं
लेकिन उसकी तीव्रता और पीड़ा को बहुत कम कर देता है।

अद्वैत परंपरा (शंकराचार्य)

प्रारब्ध का भोग होता है,
पर ज्ञानी उससे बंधता नहीं।

गुरुमंत्र से:

दुख घटना बनता है, पहचान नहीं

अनुभव होता है, आघात नहीं
गुरुमंत्र का सबसे गूढ़ प्रभाव

गुरुमंत्र कर्म को नहीं—
कर्म करने वाले को गलाता है।

और यही शास्त्रों में
सच्चा कर्म-दहन कहा गया है।
पाप = काँटा

पुण्य = फूल

गुरुमंत्र = वह दृष्टि
जिससे काँटा और फूल—दोनों हाथ से छूट जाते हैं
जहाँ गुरु का मंत्र जपता है,
वहाँ कर्म हिसाब नहीं माँगते—
क्योंकि कर्ता ही अनुपस्थित होता है।

प्रश्न: मेने यहां जो ऊपर लिखा गया है कि संचित कर्म नष्ट होते है उस संदर्भ में बताया है।पुण्य कर्म नष्ट नहीं होते पाप कर्मों के फल में कमी होगी अगर कोई साधक अपनी साधना बढ़।ता रहेगा । अगर किसके के पाप कर्मों के अनुसार किसकी मृत्यु तुल्य।कष्ट है ओर वह साधना।करता जा रहा है तो निश्चित ही वह कष्ट हल्की हो जाएगी और वह बच जाएगा?

उत्तर: आपके लिखे हुए कथन में भाव सही है, लेकिन शास्त्रीय दृष्टि से निष्कर्ष आंशिक हैं। साधना से पाप कर्मों की तीव्रता (Intensity) कम होती है।साधना से मृत्यु-तुल्य कष्ट हल्का हो सकता है — यह भी सही है
शास्त्र इसे प्रारब्ध-शमन कहते हैं। महामृत्युंजय जप से
अकाल मृत्यु टलती है और कष्ट शिथिल होता है।

यहाँ “टालना” का अर्थ प्रारब्ध की दिशा बदलना नहीं,
बल्कि उसकी तीव्रता घटाना है।

अब सूक्ष्म लेकिन बहुत महत्वपूर्ण बिंदु:
आपके कथन में पुण्य कर्म नष्ट नहीं होते” — यह कथन पूरी तरह सही नहीं है
शास्त्रों के अनुसार:

पुण्य भी कर्म है

और हर कर्म बंधन है, चाहे वह अच्छा ही क्यों न हो

कठोपनिषद्

“उभे ह्येते पुण्यपापे विधूय…”

ज्ञानी पुण्य और पाप — दोनों को पार कर जाता है।

इसलिए:

साधक के स्तर पर → पुण्य बढ़ता है

ज्ञानी के स्तर पर → पुण्य-पाप दोनों लय हो जाते हैं
संचित कर्म नष्ट नहीं होते” — यह भी अधूरा है

शास्त्र कहते हैं:

साधना से संचित कर्म क्षीण होते हैं

ज्ञान से संचित कर्म नष्ट होते हैं

मुण्डक उपनिषद्

“क्षीयन्ते चास्य कर्माणि…”
यहाँ संचित कर्म के संदर्भ में यह समझना चाहिए कि साधना से पाप कर्मों की तीव्रता और प्रभाव में कमी होती है। साधना से प्रारब्ध कर्म पूरी तरह नष्ट नहीं होते, लेकिन उनके कष्टदायक फल हल्के हो सकते हैं। यदि किसी व्यक्ति के पाप कर्मों के अनुसार मृत्यु-तुल्य कष्ट निर्धारित हो और वह निरंतर साधना करता रहे, तो शास्त्रों के अनुसार उस कष्ट की तीव्रता कम हो सकती है और जीवन की रक्षा भी संभव है।
पुण्य कर्म साधना से नष्ट नहीं होते, बल्कि साधक के स्तर पर वे बढ़ते हैं; परंतु ज्ञान की अवस्था में पुण्य और पाप — दोनों बंधन रूप होने से लय को प्राप्त होते हैं।
एक सरल सूत्र
साधना → पाप हल्के, पुण्य प्रबल

भक्ति → प्रारब्ध शांत

ज्ञान → पुण्य–पाप दोनों समाप्त
साधना कर्म को नहीं मिटाती,
कर्म को सहने की चेतना बदल देती है।
और जब चेतना बदलती है,
तो कर्म का दंश समाप्त हो जाता है।

विज्ञान की भाषा में कर्म =
बार-बार दोहराए गए विचार, भावनाएँ और उनसे बने स्वचालित व्यवहार (habits, Neural conditioning)
यही वह “संस्कार” है जिसे शास्त्र कर्म कहते हैं।
मंत्र और प्राणायाम मस्तिष्क को स्वतंत्र बना देते हैं—
और स्वतंत्र मस्तिष्क पुराने कर्म नहीं दोहराता।
यही विज्ञान की भाषा में
कर्म-क्षय है।

आशा है कि मैंने आपके प्रश्न का उत्तर दे दिया है।
यह एक प्रश्न है, जिसकी खोज मैं स्वयं भी कई वर्षों से करता रहा हूँ। शास्त्रों के अध्ययन, अपने अनुभव, प्रातःस्मरणीय गुरुदेव श्री चन्द्रमोहन जी महाराज के उपदेशों तथा अपने पिता आदरणीय श्री आचार्य चन्द्रहास जी, और मेरी आदरणीय माता श्रीमती सरिता भारद्वाज से प्राप्त ज्ञान के आधार पर यही मेरी समझ बनी है।

जय गुरुदेव।

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