Yamuna Mission

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Yamuna Mission Harit Yamuna Mission Foundation is a voluntary organisation initiated by Mr. We have taken initiative to clean-up Yamuna river at Mathura and Delhi.
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Pradeep Bansal, It acts to protect, conserve & creates awareness about the environment. pradeep.bansal , It acts to protect, conserve & creates awareness about the environment

Harit Yamuna Mission Foundation has been working on various issues related to the environment since 2015. Actions often speak louder than words, so over the times Yamuna Mission has built a strong base of supporters spread across the country. Besides that Harit Yamuna Mission has raised its voice in various climate change issues. To maintain its independence, Harit Yamuna Mission does not accept any donations. Its perspective has broadened to reflect a more holistic understanding of conservation issues facing the country. Yamuna Mission is an initiative dedicated to nature, in which the work of making Yamuna river clean and planting more than 1 crore trees on top of the garbage by using fertile soil on the garbage generated during sanitation is going on, in which the work of Yamuna Mission for the last 6 years is going on. Founder Shri Pradeep Bansal ji has been successful on a large scale, his work will surely give the gift of a clean environment to the coming generation....🙏🏻

यमुना मिशन के समर्थक ग्रुप में जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें https://chat.whatsapp.com/ItDB37RYghB7dDjxwGhROe🌺 🌺 हर हर म...
05/10/2026

यमुना मिशन के समर्थक ग्रुप में जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

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🌺 🌺 हर हर महादेव🌺 🌺

05/10/2026

🌼💛✨🙏🦋🪔🌼

आदरणीय अनन्तराम मिश्र ‘अनन्त’ की १९८३ में प्रकाशित रचना “यमुना” से लिए गए अंश-माँ श्रीयमुना जी (121) मेघ- स्वर जब आतप-ता...
05/10/2026

आदरणीय अनन्तराम मिश्र ‘अनन्त’ की १९८३ में प्रकाशित रचना “यमुना” से लिए गए अंश-
माँ श्रीयमुना जी (121)

मेघ- स्वर जब आतप-तापित धरती को जीवन दान करता ,
जब तीव्र पावन अनुभूति सी दामिनी लहराती,
ऋतुओं की रानी वर्षा का स्वागत करता है,
सावन मधुर अरमानों की पींगें बढ़ाता है।

तब मेरा यौवन भी अँगड़ाई भरने लगता है उन्मत्त हो उठता है,
उमड़ता- गाता है।
तब वह नगरों- ग्रामों में हा हा कार मचा देता है
और मेरे कूलंकषा ( कूलों को कर्षित करनेवाली) नाम को चरितार्थ कर देता है।

श्रीमद्भागवत महापुराण दशम स्कन्ध (पूर्वार्धम्) ३२२वाँ दिनचत्वारिंशोऽध्यायः (अध्याय 40)- श्लोक २१ से २५ तक श्लोक-:नमस्ते ...
05/10/2026

श्रीमद्भागवत महापुराण दशम स्कन्ध (पूर्वार्धम्) ३२२वाँ दिन
चत्वारिंशोऽध्यायः (अध्याय 40)- श्लोक २१ से २५ तक

श्लोक-:
नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः ॥ २१॥
अर्थ-
वैष्णवजनों तथा यदु-वंशियों का पालन-पोषण करने के लिये आपने ही अपने को वासुदेव, संकर्षण, प्रद्दुम्न और अनिरुद्ध-इस चतुर्व्यूह के रूप में प्रकट किया है। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ। ॥ २१॥

श्लोक-:
नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्यदानवमोहिने ।
म्लेच्छप्रायक्षत्रहन्त्रे नमस्ते कल्किरूपिणे ॥ २२॥
अर्थ-
दैत्य और दानवों को मोहित करने के लिये आप शुद्ध अहिंसा-मार्ग के प्रवर्तक बुद्ध का रूप ग्रहण करेंगे। मैं आपको नमस्कार करता हूँ और पृथ्वी के क्षत्रिय जब मलेच्छ प्राय: हो जायँगे तब उनका नाश करने के लिये आप ही कल्कि के रूप में अवतीर्ण होंगे। मैं आपको नमस्कार करता हूँ।॥ २२॥

श्लोक-:
भगवन् जीवलोकोऽयं मोहितस्तव मायया ।
अहंममेत्यसद्ग्राहो भ्राम्यते कर्मवर्त्मसु ॥ २३॥
अर्थ-
भगवन! ये सब-के-सब जीव आपकी माया से मोहित हो रहे हैं और इस मोह के कारण ही ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ इस झूठे दुराग्रह में फँसकर कर्म के मार्गों में भटक रहे हैं। ॥ २३॥

श्लोक-:
अहं चात्माऽऽत्मजागारदारार्थस्वजनादिषु ।
भ्रमामि स्वप्नकल्पेषु मूढः सत्यधिया विभो ॥ २४॥
अर्थ-
मेरे स्वामी! इसी प्रकार मैं भी स्वप्न में दीखने वाले पदार्थों के समान झूठे देह-गेह, पत्नी-पुत्र और धन-स्वजन आदि को सत्य समझकर उन्हीं के मोह में फँस रहा हूँ और भटक रहा हूँ।॥ २४॥

श्लोक-:
अनित्यानात्मदुःखेषु विपर्ययमतिर्ह्यहम् ।
द्वन्द्वारामस्तमोविष्टो न जाने त्वात्मनः प्रियम् ॥ २५॥
अर्थ-
मेरी मूर्खता तो देखिये, प्रभो! मैंने अनित्य वस्तुओं को नित्य, अनात्मा को आत्मा और दुःख को सुख समझ लिया। भला, इस उल्टी बुद्धि की भी कोई सीमा है! इस प्रकार अज्ञानवश सांसारिक सुख-दुःख आदि द्वंदों में ही रम गया और यह बात बिलकुल भूल गया कि आप ही हमारे सच्चे प्यारे हैं।॥ २५॥

शेष अगली पोस्ट में....

05/10/2026

सन्त पथ यमुना मिशन मार्ग, मथुरा।
05/10/2026

सन्त पथ यमुना मिशन मार्ग, मथुरा।

05/10/2026

05-10-2026 की श्रृंगार आरती दर्शन श्री बांके बिहारी जी वृन्दावन 🌹🙏

05/10/2026

⛰️🌿 जब पहाड़ ने बच्चे से बात की… तो प्रकृति का एक खूबसूरत राज़ सामने आया! 💚

एक छोटी-सी कहानी, लेकिन सीख बहुत बड़ी—
🌱 प्रकृति की रक्षा करेंगे, तो हमारा भविष्य सुरक्षित रहेगा।
💧 पानी, पेड़ और पहाड़… हमारी जिंदगी का अनमोल हिस्सा हैं।

👦⛰️ “धरती हमारी है, इसकी देखभाल की जिम्मेदारी भी हमारी है।” ❤️

#बोलतापहाड़ #बच्चोंकीकहानी #हिंदीकहानी #प्रकृति #पेड़बचाओ #पर्यावरण

05/10/2026

पुण्य तीर्थ विश्राम घाट से माँ श्री यमुना जी की मंगला आरती दर्शन

श्रीरामचरित मानस (लंकाकाण्ड)।। अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण संवाद ।।चौपाई :* मैं तव दसन तोरिबे लायक।...
05/10/2026

श्रीरामचरित मानस (लंकाकाण्ड)

।। अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण संवाद ।।

चौपाई :

* मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥
असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥1।।

भावार्थ:-मैं तेरे दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्री रघुनाथजी ने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और (तेरी) लंका को पकड़कर समुद्र में डुबो दूँ॥1॥

* गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥
मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥2॥

भावार्थ:-तेरी लंका गूलर के फल के समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर (अज्ञानवश) निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फल को खाते क्या देर थी? पर उदार (कृपालु) श्री रामचंद्रजी ने वैसी आज्ञा नहीं दी॥2॥

* जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥
बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥3॥

भावार्थ:-अंगद की युक्ति सुनकर रावण मुस्कुराया (और बोला-) अरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ से सीखा? बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियों से मिलकर लबार हो गया है॥3॥

*साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥
समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥4॥

भावार्थ:-(अंगद ने कहा-) अरे बीस भुजा वाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्री रामचंद्रजी के प्रताप को समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके (दृढ़ता के साथ) पैर रोप दिया॥4॥

जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥
सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥5॥

भावार्थ:-(और कहा-) अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्री रामजी लौट जाएँगे, मैं सीताजी को हार गया। रावण ने कहा- हे सब वीरो! सुनो, पैर पकड़कर बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो॥5॥

* इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥
झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥6॥

भावार्थ:-इंद्रजीत (मेघनाद) आदि अनेकों बलवान्‌ योद्धा जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से बहुत से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थान पर जा बैठ जाते हैं॥6॥

* पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥
पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥7॥

भावार्थ:-(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) वे देवताओं के शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं, परन्तु हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! अंगद का चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोह रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकते॥7॥

#श्रीरामचरितमानस

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