RTI Activist Association Of India

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यह संगठन अपने सदस्यों के आरटीआई से संबंधित सभी प्रकरण को देखने व उसका समाधान करने हेतु प्रशिक्षित व अनुभवी लोगो का मंच है,हम आरटीआई एक्ट को सुदृढ़ एवं सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। आप rti-india.org के जरिये सदस्यता ग्रहण कर पहचान पत्र प्राप्त कर सकते है

01/04/2026
01/04/2026

📢भूमि विवाद, अतिक्रमण एवं किसान हित में त्वरित न्याय हेतु जनहित याचिका के समर्थन में वक्तव्य📢
भूमि से जुड़े विवाद केवल संपत्ति के नहीं, बल्कि अन्नदाता किसानों के अस्तित्व, सम्मान और आजीविका से जुड़े अत्यंत संवेदनशील विषय हैं। वर्तमान परिस्थितियों में यह व्यापक रूप से अनुभव किया जा रहा है कि राजस्व न्यायालयों—नायब तहसीलदार से लेकर मंडलायुक्त स्तर पर निस्तारित होने वाले वादों में अपेक्षित निष्पक्षता, विधिक गहराई एवं त्वरित न्याय का अभाव परिलक्षित होता है। अनेक प्रकरणों में निर्णय प्रक्रिया प्रशासनिक दबावों एवं बाहरी प्रभावों से प्रभावित होने की आशंका भी जनमानस में गहरी होती जा रही है।
यह एक कटु सत्य है कि एक साधारण नागरिक अथवा किसान द्वारा प्रारंभ किया गया वाद, निचली अदालतों से होते हुए उच्च न्यायालय तक पहुँचने में वर्षों नहीं, बल्कि दशकों (लगभग 20-25 वर्ष) का समय ले लेता है। इस विलंब के पीछे प्रशासनिक उदासीनता, बार एसोसिएशन द्वारा बार-बार की जाने वाली अनावश्यक हड़तालें, तथा न्यायिक पदों पर विधिक विशेषज्ञता के अभाव जैसे कारण प्रमुख हैं। परिणामस्वरूप, न्याय की प्रक्रिया स्वयं पीड़ितों के लिए एक दंड बन जाती है।
ऐसी स्थिति में राजस्व संबंधी वादों के निस्तारण हेतु एक स्वतंत्र, सशक्त एवं विधिक रूप से प्रशिक्षित न्यायिक तंत्र की स्थापना समय की मांग है—जहाँ निर्णय केवल वाद की मेरिट, साक्ष्य एवं विधिक सिद्धांतों के आधार पर, बिना किसी राजनीतिक अथवा प्रशासनिक दबाव के पारित किए जाएँ।
इस परिप्रेक्ष्य में दायर की गई जनहित याचिका न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि यह देश के अन्नदाता किसानों, गरीबों एवं वंचित वर्गों के न्याय के अधिकार की एक सशक्त आवाज भी है। यह पहल न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व एवं समयबद्ध निस्तारण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध हो सकती है।
हमारा संगठन इस जनहित याचिका का पूर्ण समर्थन करता है और माननीय सर्वोच्च न्यायालय से यह अपेक्षा करता है कि वह इस विषय की गंभीरता को समझते हुए ऐसे ठोस एवं दूरगामी निर्देश पारित करे, जिससे—
➡️राजस्व वादों का त्वरित एवं गुणवत्तापूर्ण निस्तारण सुनिश्चित हो,
➡️अतिक्रमणकारियों के विरुद्ध कठोर एवं प्रभावी कार्यवाही हो,
तथा किसानों के अधिकारों की विधिक रूप से सुदृढ़ सुरक्षा हो सके।
🔅अब समय केवल विचार का नहीं, बल्कि निर्णायक परिवर्तन का है।🔅
हम सभी नागरिकों, विशेषकर किसान हितैषियों से आह्वान करते हैं कि इस जनहित अभियान से जुड़ें, अपनी आवाज बुलंद करें और इस संदेश को अधिक से अधिक साझा कर जनजागरण का हिस्सा बनें।
“न्याय में विलंब, न्याय से वंचित करना है—और अब यह अन्याय स्वीकार नहीं होगा।”
मनीष राय सिन्टू ✍🏻
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
RTI Activist Association Of India
Samajwadi Party BJP Uttar Pradesh Aazad Samaj Party - Kanshi Ram Suheldev Bhartiya Samaj Party Aaj Tak Dainik Jagran Indian National Congress

13/03/2026

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13/03/2026

⚖️ SC/ST Act, FIR और न्याय की दुविधा — कानून का सिक्का किस ओर गिरेगा?
अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ यदि कोई व्यक्ति मारपीट करता है या जातिसूचक शब्दों का प्रयोग कर उन्हें अपमानित करता है, तो यह कृत्य Scheduled Castes and Scheduled Tribes (Prevention of Atrocities) Act, 1989 के अंतर्गत गंभीर अपराध माना जाता है।
कानून के अनुसार ऐसी स्थिति में पीड़ित अपने स्थानीय थाने में शिकायत करता है और पुलिस को तत्काल First Information Report (FIR) दर्ज करनी चाहिए। इसके बाद मामले की विवेचना सामान्यतः CO (क्षेत्राधिकारी) स्तर के अधिकारी द्वारा की जाती है, जो जांच के बाद गुण-दोष के आधार पर आरोप पत्र या फाइनल रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करता है।
यदि शिकायत झूठी पाई जाती है तो कानून में शिकायतकर्ता के विरुद्ध भी कार्यवाही की व्यवस्था दी गई है, ताकि कानून का दुरुपयोग न हो।
जब थाना प्राथमिकी दर्ज नहीं करता
कई बार पीड़ित की शिकायत के बावजूद थाना प्राथमिकी दर्ज नहीं करता। ऐसी स्थिति में कानून पीड़ित को निम्न विकल्प देता है—
1️⃣ पुलिस अधीक्षक को डाक द्वारा शिकायत।
2️⃣ वहाँ से भी कार्यवाही न होने पर मजिस्ट्रेट के समक्ष ➡️Criminal Procedure Code Section 156(3) के अंतर्गत आवेदन।
यहीं से एक महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न उत्पन्न होता है—
क्या मजिस्ट्रेट FIR दर्ज करने का आदेश देने के लिए बाध्य है?
न्यायालयों के अलग-अलग दृष्टिकोण
देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों ने इस प्रश्न पर अलग-अलग दृष्टिकोण व्यक्त किए हैं।
Madras High Court (मदुरई बेंच) का मत है कि ऐसे मामलों में प्राथमिकी दर्ज की जानी चाहिए ताकि पीड़ित को न्याय मिल सके।
वहीं Allahabad High Court का मत है कि मजिस्ट्रेट 156(3) में FIR दर्ज कराने के लिए बाध्य नहीं है; वह अपने विवेक से निर्णय ले सकता है।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी उठता है—
क्या मजिस्ट्रेट उसी थाने से प्रारंभिक जांच करा सकता है जिसने पहले ही FIR दर्ज करने से इनकार कर दिया हो?
क्योंकि यदि पीड़ित थाना प्रभारी की कार्यवाही से संतुष्ट होता, तो वह मजिस्ट्रेट के समक्ष 156(3) का सहारा ही क्यों लेता?
यदि मजिस्ट्रेट आवेदन खारिज कर दे तो?
यदि मजिस्ट्रेट पुलिस की रिपोर्ट पर भरोसा करते हुए आवेदन खारिज कर देता है, तो पीड़ित के पास अगला रास्ता होता है—
➡️ High Court of Judicature में याचिका दाखिल करना।
लेकिन यहाँ भी अलग-अलग न्यायालयों के मत होने के कारण विधिक स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं दिखती।
कानून का संतुलन
सच्चाई यह भी है कि SC/ST Act का दुरुपयोग होने की शिकायतें भी समय-समय पर सामने आती रही हैं, जिससे कई निर्दोष लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है।
इस दृष्टि से यह तर्क भी दिया जाता है कि मजिस्ट्रेट को विवेकाधिकार होना चाहिए ताकि झूठी शिकायतों पर अंकुश लगे।
लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण प्रश्न है कि—
यदि वास्तव में किसी अनुसूचित जाति या जनजाति के व्यक्ति के साथ अत्याचार हुआ है और पुलिस प्राथमिकी दर्ज नहीं करती, तो उसे न्याय कैसे मिलेगा?
अंतिम प्रश्न — निर्णय किस ओर?
आज की स्थिति में विभिन्न उच्च न्यायालयों के मतों में विरोधाभास दिखाई देता है। इसलिए इस विषय पर Supreme Court of India का स्पष्ट और अंतिम मार्गदर्शन अत्यंत आवश्यक है, ताकि देशभर में एक समान विधिक व्यवस्था स्थापित हो सके।
कानून की इस दुविधा को एक पंक्ति में यूँ समझा जा सकता है—
“दोनों तरफ ‘सत्य मेव जयते’ लिखा हुआ सिक्का है, बस यह देखना है कि न्याय का सिक्का उछाले जाने पर वह किस ओर गिरता है।”
मनीष राय सिन्टू ✍🏻
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
RTI Activist Association Of India
BJP Uttar Pradesh Aazad Samaj Party - Kanshi Ram Suheldev Bhartiya Samaj Party Samajwadi Party UP Police Aaj Tak Indian National Congress Bahujan Samaj Party Bharatiya Janata Party (BJP)
Ankur Rai RAi Vikalp Kumar Rai

एक सत्य की ऐसी लड़ाई,जो जीत के लिए नहीं,स्वाभिमान को बचाने के लिए लड़नी पड़ी।वह क्षण कितना पीड़ादायक था,जब कलम को उसी व्...
03/03/2026

एक सत्य की ऐसी लड़ाई,
जो जीत के लिए नहीं,
स्वाभिमान को बचाने के लिए लड़नी पड़ी।
वह क्षण कितना पीड़ादायक था,
जब कलम को उसी व्यक्ति के विरुद्ध चलाना पड़ा
जिससे कभी संबंध आत्मा से जुड़े थे।
जिसे बचाने के लिए
मैंने बार-बार अपनी कलम रोक ली,
स्मृतियों को थामे रहा,
संदेश भिजवाता रहा —
"बस अपनी भूल स्वीकार कर लो,
एक क्षमा ही सब कुछ संभाल लेगी।"
परन्तु असत्य के अहंकार ने
संबंधों की पुकार नहीं सुनी।
गरीब और असहाय को सताकर
जो राजनीति फलती रही,
उसी ने मेरे अपने को भी भ्रमित कर दिया।
वह मित्र,
जो एक पुकार पर भाई बनकर खड़ा हो जाता था,
उसी के हाथों से
एक बेबस का आशियाना उजाड़ने का प्रयास हुआ।
जब उस असहाय की चीखें
मेरे अंतरमन से टकराईं,
तब हृदय करुणा से कांप उठा।
और तभी स्मरण हुआ —
श्रीकृष्ण के वे उपदेश,
जो उन्होंने अर्जुन को
महाभारत के रणक्षेत्र में दिए थे।
जब धर्म और संबंध आमने-सामने खड़े हों,
तब मौन रहना भी अधर्म होता है।
और फिर…
अर्जुन की भाँति
कंपते हृदय से ही सही,
पर दृढ़ संकल्प के साथ
मुझे भी अपनों पर
कलम नामक शस्त्र उठाना पड़ा।
यह युद्ध किसी व्यक्ति से नहीं,
असत्य से है।
यह आक्रोश नहीं,
करुणा से जन्मा प्रतिकार है।
और यदि इस संघर्ष में
संबंधों की आहुति देनी पड़े,
तो भी आत्मा की शांति के लिए
यह मूल्य स्वीकार है।

मनीष राय सिन्टू
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
RTI Activist Association Of India
DM Azamgarh Ravindra Kumar IAS

संगठन के साथियों आप कलम की ताकत को कभी कम मत आँकिए।यह सिर्फ शब्द नहीं लिखती, इतिहास गढ़ती है।तलवार की धार शरीर को घायल क...
28/02/2026

संगठन के साथियों आप कलम की ताकत को कभी कम मत आँकिए।
यह सिर्फ शब्द नहीं लिखती, इतिहास गढ़ती है।
तलवार की धार शरीर को घायल करती है,
पर कलम की मार विचारों को झकझोर देती है।
तलवार डर पैदा करती है,
कलम जागरूकता पैदा करती है।
जहाँ तलवार की जीत क्षणिक होती है,
वहीं कलम की विजय शाश्वत होती है।
विश्व इतिहास इस बात का साक्षी है कि अनेक क्रांतियाँ तलवार से नहीं, विचारों से जीती गईं।
महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा की शक्ति को शब्दों के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाया।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने अपने लेखन और संविधान निर्माण से समाज की दिशा बदल दी।
कलम अन्याय के विरुद्ध आवाज़ है,
सत्य का आईना है,
और परिवर्तन का सबसे बड़ा हथियार है।
जब कोई लेखक लिखता है,
तो वह केवल स्याही नहीं बहाता,
वह समाज की सोच को आकार देता है।
आज के दौर में सोशल मीडिया भी एक डिजिटल कलम है—
जिससे लिखा गया एक सत्य हजारों लोगों को प्रेरित कर सकता है।
इसलिए याद रखिए—
तलवार से सत्ता जीती जा सकती है,
लेकिन दिल और दिमाग पर राज केवल कलम ही करती है।

आप भी कमेंट बॉक्स में “कलम की ताकत” पर अपने विचारों को लिखे।

मनीष राय सिन्टू
संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष
RTI Activist Association Of India
ी_ताकत #शब्दों_की_क्रांति #विचारों_की_शक्ति

सार्वजनिक सूचना को गोपनीय नही बताया जा सकता।
06/02/2026

सार्वजनिक सूचना को गोपनीय नही बताया जा सकता।

यदि इस संगठन के सदस्यों द्वारा ई-मेल के माध्यम से भेजे गए किसी भी शिकायती प्रार्थना पत्र को नज़रअंदाज़ किया गया, तो यह स...
16/01/2026

यदि इस संगठन के सदस्यों द्वारा ई-मेल के माध्यम से भेजे गए किसी भी शिकायती प्रार्थना पत्र को नज़रअंदाज़ किया गया, तो यह स्पष्ट समझ लिया जाए कि हम अधिकारों की लड़ाई को बेहद बारीकी से लड़ने वाले लोग हैं।
यहाँ कार्यवाही भी होगी और जवाबदेही भी तय की जाएगी।
यदि किसी स्तर पर ई-मेल हटाने या अनदेखी करने की भूल की गई, तो आईटी एक्ट की धारा 44(क) को भी स्मरण रखा जाए।
लोकतंत्र में नौकरशाही को उसके दायित्वों का बोध कैसे कराया जाता है—यह इस संगठन का हर प्रशिक्षित सदस्य भली-भाँति जानता है।
👉 यह चेतावनी नहीं, संवैधानिक अधिकारों का उद्घोष है।
👉 यह आग्रह नहीं, जवाबदेही की माँग है।
संगठन सजग है, संगठित है और हर स्तर पर तैयार है।

⚖️🔥 न्याय पर हमला, कानून का अपमान – लालगंज बार पदाधिकारियों की दबंगई जारी! 🔥⚖️तहसील लालगंज (आज़मगढ़) की दी बार एसोसिएशन ...
28/09/2025

⚖️🔥 न्याय पर हमला, कानून का अपमान – लालगंज बार पदाधिकारियों की दबंगई जारी! 🔥⚖️

तहसील लालगंज (आज़मगढ़) की दी बार एसोसिएशन व तहसील बार एसोसिएशन खुलेआम मा० उच्चतम न्यायालय और मा० उच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर रही हैं।

📌 विधिक व्यवस्था क्या कहती है?

1️⃣ सुप्रीम कोर्ट – हरीश उप्पल बनाम भारत संघ (2003)
👉 अधिवक्ताओं को हड़ताल या कार्य से विरत रहने का कोई अधिकार नहीं।
👉 ऐसा करना न्याय की अवमानना है।

2️⃣ इलाहाबाद हाईकोर्ट – रे बनाम जिला बार एसोसिएशन प्रयागराज (Contempt Petition No. 12/2024)
👉 स्पष्ट आदेश: शोक प्रस्ताव केवल 3:30 बजे के बाद ही होगा।
👉 पर लालगंज बार सुबह ही प्रस्ताव पास कर न्याय को ठप कर देता है।

3️⃣ इलाहाबाद हाईकोर्ट – जनहित याचिका संख्या 2002/2025 (अंकुश राय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य)
👉 मा० न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर ने 13.08.2025 को नोटिस जारी किया।
👉 25.08.2025 को लालगंज बार के सचिवों ने अदालत के समक्ष बिना शर्त क्षमा याचना की।
👉 उपरोक्त के क्रम में मा० उच्चन्यायालय ने आदेश जारी कर कहा गया कि—
“दोनों बार एसोसिएशन न्यायिक कार्य में सहयोग करें और किसी प्रकार की बाधा न डालें।”
👉 लेकिन आदेश की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं।

4️⃣ फैज़ाबाद हाईकोर्ट बेंच
👉 बार हड़तालों को अवैध और असंवैधानिक करार दे चुकी है।
👉 इसे न्यायिक व्यवस्था पर सीधा हमला बताया गया है।

❌ सवाल यह है –
जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट तीन-तीन बार आदेश दे चुके हैं,
फिर भी लालगंज बार क्यों संविधान और न्यायपालिका से ऊपर बनने पर तुली है❓

💔 परिणाम –
➡️ पिछले 9 महीनों में 109 दिन न्यायालय ठप।
➡️ किसानों के वाद सालों से लंबित।
➡️ गरीब जनता न्याय से वंचित।
➡️ अनुच्छेद 21 (न्याय का अधिकार) का खुला हनन।

✊ अब यह केवल किसानों की लड़ाई नहीं है…
यह न्यायिक व्यवस्था बनाम विधिक अराजकता की जंग है।
अगर आज आवाज़ न उठी तो कल हर न्यायालय गैर-जिम्मेदार पदाधिकारियों की जागीर बन जाएगा।

📢 हमारी माँग –
⚖️ दोषी बार पदाधिकारियों पर अवमानना की कठोर कार्रवाई हो।
⚖️ शासनादेशों के अनुपालन से न्यायिक कार्य सुनिश्चित हो।
⚖️ किसानों को अनुच्छेद 19 के तहत शांतिपूर्ण विरोध की अनुमति दी जाए।

🙏 साथियों,
अब वक्त आ गया है—
लालगंज से प्रयागराज, प्रयागराज से फैज़ाबाद,
और फैज़ाबाद से दिल्ली तक…
न्याय की गूंज थमनी नहीं चाहिए!

DM Azamgarh BJP Uttar Pradesh Samajwadi Party Aazad Samaj Party - Kanshi Ram Bahujan Samaj Party Suheldev Bhartiya Samaj Party All India Trinamool Congress Aam Aadmi Party ABP News Aaj Tak UP Police Communist Party of India Indian National Congress

देखना है किसानों के हक व अधिकार के लिए कौन सी पार्टी सदन में आवाज उठाती है।

बाकी लोकतंत्र में जनता मालिक है हम अपनी बात जनहित याचिका व अवमानना याचिका दाखिल करके इस गंभीर मुद्दे को मा० उच्च न्यायालय के संज्ञान तक ले जायेंगे।

🚨 भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जीत❗राजेपुर शौचालय घोटाले में ग्राम प्रधान निलंबित✊🏻 🔺न्याय की आवाज़ बनी जनशक्ति, हाईकोर्ट...
30/07/2025

🚨 भ्रष्टाचार के खिलाफ एक बड़ी जीत❗
राजेपुर शौचालय घोटाले में ग्राम प्रधान निलंबित✊🏻 🔺न्याय की आवाज़ बनी जनशक्ति, हाईकोर्ट के हस्तक्षेप पर टूटी अफसरशाही की चुप्पी🔺

विकास खण्ड ठेकमा के राजेपुर ग्राम पंचायत में सरकारी धन से निर्मित होने वाले सामुदायिक शौचालय के निर्माण में भारी घोटाले की पुष्टि के बावजूद जब जिम्मेदार अफसर चुप्पी साधे बैठे रहे, तब आरटीआई कार्यकर्ता “मनीष राय” ने न केवल भ्रष्टाचार को उजागर किया, बल्कि उसे अंजाम तक पहुंचाने का हौसला भी दिखाया।

✅ जाँच में वित्तीय अनियमितता की पुष्टि होने के बावजूद फाइल दबाकर कार्रवाई को टालने की कोशिश की गई।
✅ अधिवक्ता विकल्प कुमार राय एवं विवेक चतुर्वेदी ने इस प्रशासनिक लापरवाही को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
✅ हाईकोर्ट ने डीएम आज़मगढ़ को तलब किया और सख्त रुख अपनाया।
✅ अंततः ग्राम प्रधान को निलंबित करने का आदेश जारी हुआ।

यह सिर्फ एक निलंबन नहीं, जनता की एकजुटता, न्यायपालिका की सक्रियता और सच के साथ खड़े रहने वालों की जीत है। यह संदेश है उन सभी भ्रष्ट जनप्रतिनिधियों के लिए, जो सोचते हैं कि जनता कुछ नहीं कर सकती।

🙏 हम RTI Activist Association Of India के सच्चे सिपाही एवं प्रशिक्षित सदस्य बिना डरे सच्चाई को सामने लाने का साहस रखते है।

📢 अब आपकी बारी है❗ भ्रष्टाचार पर चुप मत रहिए। सवाल उठाइए, सच के साथ खड़े रहिए, और ऐसी पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा साझा कर जनता की ताकत को और मज़बूत बनाइए।

✍️ मनीष राय सिन्टू

#भ्रष्टाचार_के_खिलाफ़ #राजेपुर_घोटाला #हाईकोर्ट_सख्त #जनशक्ति #आजमगढ़ ्टिविज़्म #सच्चाई_की_जीत

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30/07/2025

🔺मनरेगा में नाबालिगों की तस्वीर से हाज़िरी! RTI कार्यकर्ता की सख़्त आपत्ति, BDO की भूमिका पर सवाल🔺

➡️महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में भ्रष्टाचार और गाइडलाइन के खुलेआम उल्लंघन का गंभीर मामला उजागर हुआ है। उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष - आरटीआई एक्टिविस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया, श्री मनोज कुमार यादव ने जिलाधिकारी जौनपुर को एक विस्तृत शिकायती प्रार्थना पत्र सौंपते हुए आरोप लगाया है कि रोजगार सेवक और मेट द्वारा NMMS एप्प पर नाबालिग बच्चों की तस्वीरें अपलोड कर गलत तरीके से उपस्थिति दर्ज की जा रही है, जो न केवल योजना के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि बाल अधिकारों का भी खुला हनन है।

सबसे अहम सवाल यह है कि क्या यह सब संबंधित खंड विकास अधिकारी (BDO) की जानकारी के बिना संभव है? या फिर भ्रष्टाचार की यह श्रृंखला उनकी मूक स्वीकृति और मिलीभगत से संचालित हो रही है❓

RTI कार्यकर्ता ने ऐसे लोकसेवकों की नैतिकता और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करते हुए कहा है कि अगर किसी अधिकारी को अपने ही अधीनस्थ कर्मचारियों की गड़बड़ियों की जानकारी नहीं है, या वह जानबूझकर चुप है, तो उसे तत्काल अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

यह मामला न सिर्फ “प्रशासनिक निष्क्रियता” का उदाहरण है, बल्कि मनरेगा जैसी महत्वपूर्ण योजना की साख पर भी बट्टा लगा रहा है।

अब समय आ गया है कि दोषियों पर कठोर कार्रवाई हो और ऐसे अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो। अन्यथा जनविश्वास प्रशासन से पूरी तरह उठ जाएगा।

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