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13/02/2026

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मुक़द्दस मक़ामात पर प्रदर्शन ज़ाती खुन्नस में बर्दाश्त नहीं: छोटे-बड़े इमामबाड़ों में राजनीति पर सख़्त एतराज़ Dm Cm से रो...
07/02/2026

मुक़द्दस मक़ामात पर प्रदर्शन ज़ाती खुन्नस में बर्दाश्त नहीं: छोटे-बड़े इमामबाड़ों में राजनीति पर सख़्त एतराज़ Dm Cm से रोकने की मांग

सेव वक़्फ़ इंडिया डेस्क

लखनऊ।छोटे इमामबाड़े, बड़े इमामबाड़े और शहर के तमाम मुक़द्दस व ऐतिहासिक स्थलों पर किसी भी प्रकार के राजनीतिक, संगठनात्मक या किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ प्रदर्शन को लेकर कड़ा एतराज़ सामने आया है। साफ़ शब्दों में कहा गया है कि इन मुक़द्दस मक़ामात पर केवल मजलिस, मातम, महफ़िल और दीनी सेमिनार जैसे धार्मिक व रूहानी कार्यक्रम ही होने चाहिए, ब्लड डोनेशन कैंप,मेडिकल कैंप ,रोजगार सेमिनार ,इन मुकद्दस मकामात की हिफाज़त और एहतेराम और यहां दुआ मांगने का तरीका बताने वाला कैंप होना चाहिए न कि किसी संगठन का धरना या विरोध प्रदर्शन।

अंजुमनों सामाजिक और वक़्फ़ मामलों से जुड़े संगठनों का कहना है कि जिला प्रशासन को तत्काल ऐसे किसी भी प्रदर्शन पर रोक लगानी चाहिए, क्योंकि इमामबाड़े आस्था, इतिहास और तहज़ीब के केंद्र हैं, न कि सियासी मंच।

इस पूरे मामले में सेव वक़्फ़ इंडिया ने सख़्त रुख़ अपनाते हुए जिलाधिकारी लखनऊ और हुसैनाबाद ट्रस्ट से औपचारिक मांग की है कि इमामबाड़ों और मुक़द्दस स्थलों में किसी भी तरह के जाती खुन्नस वाले प्रदर्शन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाई जाए।

सेव वक़्फ़ इंडिया का कहना है कि इन स्थलों पर देश-विदेश से, अलग-अलग ज़िलों से हज़ारों ज़ायरीन और सैलानी आते हैं, विशेषकर रविवार को। ऐसे में विरोध प्रदर्शन न सिर्फ़ इन मुक़द्दस जगहों की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं, बल्कि शहर की सांस्कृतिक छवि को भी नुक़सान पहुंचाते हैं।

संगठन ने सवाल उठाया है कि जिस संगठन के नाम पर प्रदर्शन की बात की जा रही है, वह हैदरी टास्क फोर्स आख़िर है क्या?
– उसका रजिस्ट्रेशन कहां है?
– वह किस क़ानूनी हैसियत से काम कर रहा है?
– और किस अधिकार से वह इमामबाड़ों को प्रदर्शन स्थल बना रहा है?

सेव वक़्फ़ इंडिया ने स्पष्ट किया कि अगर कहीं भी घपला, भ्रष्टाचार या वक़्फ़ संपत्तियों में अनियमितता है, तो उसकी जांच ज़रूरी है, लेकिन उसके लिए सही और क़ानूनी मंच मौजूद हैं —
मुख्यमंत्री कार्यालय, जिलाधिकारी कार्यालय, विधानसभा या हज़रतगंज स्थित गांधी प्रतिमा जैसे सार्वजनिक स्थल।

संगठन ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि हवा में नाम कमाने और सस्ती लोकप्रियता के लिए मुक़द्दस स्थलों का इस्तेमाल किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। प्रदर्शन करने वालों को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए और अगर उनके पास भ्रष्टाचार के सबूत हैं, तो उन्हें सार्वजनिक रूप से और क़ानूनी तरीके से पेश करें।

बयान में साफ़ कहा गया कि
“क़ानून और क़ौम से ऊपर कोई नहीं है — चाहे वह मुन्नी आगा हो या चुनने आगा।”
ऐसी किसी भी हरकत के ख़िलाफ़ सख़्त आवाज़ उठाई जाएगी।

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन और हुसैनाबाद ट्रस्ट इस संवेदनशील मसले पर क्या रुख़ अपनाते हैं और क्या मुक़द्दस स्थलों की गरिमा को बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं या नहीं।

**UMEED पोर्टल पर दो नए मॉड्यूल लॉन्च:औक़ाफ़ को डिलीट करने वाले, अतिक्रमण करने वाले और किराया न देने वाले सरकार के रडार ...
31/01/2026

**UMEED पोर्टल पर दो नए मॉड्यूल लॉन्च:

औक़ाफ़ को डिलीट करने वाले, अतिक्रमण करने वाले और किराया न देने वाले सरकार के रडार पर**

नई दिल्ली। वक्फ संपत्तियों के संरक्षण, पारदर्शिता और जवाबदेही की दिशा में केंद्र सरकार ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाया है। UMEED Portal पर दो अत्यंत महत्वपूर्ण मॉड्यूल—वक्फ संपत्ति लीज़ मॉड्यूल और सर्वेक्षण मॉड्यूल—का शुभारंभ किया गया है। इन मॉड्यूल्स के लागू होते ही उन लोगों पर शिकंजा कसना तय माना जा रहा है जो वर्षों से वक्फ संपत्तियों को डिलीट कराने, उन पर अवैध कब्ज़ा जमाने या किराया न देकर नुकसान पहुँचाने में लगे रहे हैं।

इन दोनों मॉड्यूल्स का उद्घाटन 30 जनवरी 2026 को डॉ. चंद्र शेखर कुमार, सचिव, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय द्वारा किया गया। मंत्रालय का कहना है कि यह पहल वक्फ शासन को न केवल डिजिटल और आधुनिक बनाएगी, बल्कि वर्षों से चली आ रही अव्यवस्थाओं पर भी सीधा प्रहार करेगी।

वक्फ संपत्ति लीज़ मॉड्यूल: अब नहीं चलेगी मनमानी

नए वक्फ संपत्ति लीज़ मॉड्यूल के लागू होने के बाद वक्फ की जमीन, दुकान, मकान, व्यावसायिक परिसर और कृषि भूमि को लीज़ पर देने की प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन और नियमबद्ध हो जाएगी। अब न तो मनमाने तरीके से सस्ती लीज़ दी जा सकेगी और न ही बिना अनुमति के वर्षों तक संपत्तियों पर कब्ज़ा बनाए रखना आसान होगा।

इस मॉड्यूल के तहत:

हर लीज़ का डिजिटल रिकॉर्ड बनेगा

लीज़ अवधि, किराया, किराया बढ़ोतरी और उपयोग की शर्तें स्पष्ट होंगी

किराया न देने वालों की पहचान तुरंत हो सकेगी

पुराने और अवैध लीज़ मामलों की समीक्षा संभव होगी

मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार, इस व्यवस्था से वक्फ की आय में उल्लेखनीय वृद्धि होगी, जिससे शिक्षा, स्वास्थ्य, मदरसा सुधार और गरीबों के कल्याण से जुड़े कार्यों को मजबूती मिलेगी।

सर्वेक्षण मॉड्यूल: औक़ाफ़ की एक-एक इंच जमीन का डिजिटल हिसाब

सर्वेक्षण मॉड्यूल को वक्फ सुधारों की रीढ़ माना जा रहा है। इसके जरिए देशभर की वक्फ संपत्तियों का जियो-टैगिंग आधारित डिजिटल सर्वे किया जाएगा। अब यह साफ़ तौर पर दर्ज होगा कि कौन-सी जमीन, मस्जिद, कब्रिस्तान, दरगाह या इमामबाड़ा वक्फ की है और उसकी वर्तमान स्थिति क्या है।

इस मॉड्यूल की प्रमुख बातें:

हर वक्फ संपत्ति का यूनिक डिजिटल प्रोफाइल

GPS आधारित लोकेशन और मैपिंग

सरकारी व निजी अतिक्रमण की पहचान

राजस्व रिकॉर्ड (खसरा-खतौनी) से मिलान

कोर्ट केस और विवादों का डिजिटल विवरण

विशेषज्ञों का मानना है कि एक बार यह सर्वे पूरा हो जाने के बाद वक्फ संपत्तियों को “गायब” करना या रिकॉर्ड से हटवाना लगभग असंभव हो जाएगा।

सरकार के रडार पर अतिक्रमणकारी और किराया डिफॉल्टर

इन दोनों मॉड्यूल्स के लागू होते ही एक सख्त संदेश साफ़ तौर पर सामने आ गया है—
औक़ाफ़ को डिलीट कराने वाले, वक्फ जमीन पर कब्ज़ा जमाने वाले और किराया न देने वाले अब सरकार के रडार पर हैं।

मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार:

अवैध कब्ज़ों की सूची तैयार की जाएगी

किराया बकाया रखने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी

नियम विरुद्ध लीज़ देने वाले अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जाएगी

यह पहली बार है जब वक्फ प्रशासन को इतने मजबूत डिजिटल औज़ार दिए गए हैं, जिनसे भ्रष्टाचार और मिलीभगत पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।

पारदर्शिता, जवाबदेही और डिजिटल इंडिया की ओर मजबूत कदम

UMEED पोर्टल के ये नए मॉड्यूल डिजिटल इंडिया की भावना के अनुरूप हैं। इससे न केवल वक्फ बोर्डों की कार्यप्रणाली पारदर्शी बनेगी, बल्कि आम जनता और समाज के हितधारकों का भरोसा भी मजबूत होगा।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय का स्पष्ट कहना है कि वक्फ संपत्तियाँ किसी व्यक्ति या समूह की निजी जागीर नहीं, बल्कि समाज की अमानत हैं। उनकी सुरक्षा और सही उपयोग सरकार की प्राथमिकता है।

UMEED पोर्टल पर वक्फ संपत्ति लीज़ मॉड्यूल और सर्वेक्षण मॉड्यूल का शुभारंभ वक्फ सुधारों के इतिहास में एक मील का पत्थर माना जा रहा है। यह पहल जहां ईमानदार प्रबंधन को बढ़ावा देगी, वहीं वर्षों से वक्फ संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने वालों के लिए खतरे की घंटी साबित होगी।

अब साफ़ है
औक़ाफ़ पर हाथ साफ़ करने वालों के दिन पूरे होने वाले हैं।

कब्रिस्तान बचाओ—क्योंकि यहाँ हमारी पहचान सोई हैकब्रिस्तान कोई वीरान ज़मीन नहीं—यह हमारी यादों की अमानत, हमारे बुज़ुर्गों...
30/01/2026

कब्रिस्तान बचाओ—क्योंकि यहाँ हमारी पहचान सोई है

कब्रिस्तान कोई वीरान ज़मीन नहीं—
यह हमारी यादों की अमानत, हमारे बुज़ुर्गों की ख़ामोश गवाही और आने वाली नस्लों के लिए इबरत की किताब है।
जो क़ौम अपनी क़ब्रों की हिफ़ाज़त नहीं करती, वक़्त एक दिन उसकी पहचान भी मिटा देता है।

आज ज़रूरत है कि हम सिर्फ़ अफ़सोस न करें, अमल करें—

कब्रिस्तान बचाओ, हरा-भरा बनाओ।
सूखी मिट्टी पर पेड़ लगें, साया बने, परिंदे लौटें।
क़ब्रों पर फूल हों—इज़्ज़त की निशानी, मोहब्बत की खुशबू।
क़ुरआन की तिलावत का इंतज़ाम हो—ताकि फ़िज़ा में सुकून उतरे, रूहें राहत पाएँ।
रात के लिए रोशनी हो—अंधेरे में भी अदब क़ायम रहे।

सबसे अहम—
कब्रिस्तान की ज़मीन को भू-माफ़ियाओं से बचाया जाए।
यह सिर्फ़ ज़मीन नहीं, यह वक़्फ़ है—अल्लाह की राह की अमानत।
इस पर नज़र रखना, इसकी हिफ़ाज़त करना—आपका फ़रज़ है, जनाब।
आज अगर हम चुप रहे, तो कल हमारी क़ब्रें भी असुरक्षित होंगी।

क़ब्रिस्तान से रिश्ता सिर्फ़ कभी-कभार की फ़ातिहा तक सीमित न रहे।
रोज़ जाइए—अगर रोज़ मुमकिन न हो, तो हर जुमेरात या जुमा को ज़रूर।
अपने बुज़ुर्गों की क़ब्रों पर खड़े होकर दुआ कीजिए, दिल को नरम कीजिए,
और याद रखिए—यह मुलाक़ात हमें बेहतर इंसान बनाती है।

जो वहाँ नहीं जा सकते—
वे भी खाली हाथ नहीं हैं।
सूरह-ए-फ़ातिहा ज़रूर पढ़िए।
दुआ दूरी नहीं देखती, नियत देखती है।

यह वक़्त है तामीर का—
पेड़ लगाने का, सफ़ाई का, रोशनी का, निगरानी का।
यह वक़्त है हिफ़ाज़त का—क़ानून, समाज और ज़िम्मेदारी—तीनों के साथ।

कब्रिस्तान बचेंगे तो
हमारी तहज़ीब बचेगी,
हमारी पहचान बचेगी,
और हमारी नस्लों को यह पैग़ाम मिलेगा—
कि हमने अपने बुज़ुर्गों की अमानत को सिर-आँखों पर रखा।

सेव वक़्फ़ इंडिया
— वक़्फ़ की हिफ़ाज़त, क़ब्रिस्तान की सियासत नहीं, इबादत है।

शैतान किस तरह अल्लाह के नेक बंदों को हलाकान करता है,अगर ज़ुल्म, साज़िश और तबाही को देखना है — तो आइए ईरानA Special Inves...
22/01/2026

शैतान किस तरह अल्लाह के नेक बंदों को हलाकान करता है,अगर ज़ुल्म, साज़िश और तबाही को देखना है — तो आइए ईरान
A Special Investigation Exposing the Human, Economic and Moral Cost of US–Israel Oppression on the Iranian People

तेहरान से तहलका टुडे की विशेष रिपोर्ट

अगर किसी को यह समझना हो कि शैतानी ताक़तें किस तरह एक क़ौम को अंदर से तोड़ने, डराने और तबाह करने की साज़िश रचती हैं, तो उसे नक़्शे पर कहीं और देखने की ज़रूरत नहीं —

👉 ईरान खुद एक खुली किताब है।

एक ऐसा मुल्क, जिस पर अमेरिका और इज़राइल ने सीधे जंग के बजाय “हाइब्रिड वॉर” थोपी —
जहाँ पाबंदियाँ हथियार बनीं,
दंगे रणनीति बने,
और आम लोग निशाना।

आग सिर्फ़ सड़कों पर नहीं, घरों में जलाई गई

ईरानी अधिकारियों द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हालिया वर्षों में ईरान में जो कुछ हुआ, वह कोई सामान्य विरोध नहीं था।

यह एक सुनियोजित तबाही थी।

3,117 लोगों की मौत
2,427 नागरिक और सुरक्षा बल शहीद
690 आतंकवादी मारे गए

हर मौत के पीछे एक सवाल है —
❓ किसके फायदे के लिए?

जब मदद के साधन ही जला दिए गए

इस कथित “जन आंदोलन” में:

305 एंबुलेंस और बसें जलाई गईं
24 पेट्रोल पंप तबाह किए गए

यानी ज़ख़्मी तड़पते रहें, शहर ठहर जाए —
यही रणनीति थी।

रोज़ी-रोटी और अर्थव्यवस्था पर हमला
700 दुकानें
750 बैंक
600 एटीएम
800 निजी कारें

यह सिर्फ़ तोड़फोड़ नहीं थी,
👉 यह आम इंसान की कमर तोड़ने की कोशिश थी।

राज्य व्यवस्था को गिराने की कोशिश
414 सरकारी इमारतें
749 पुलिस स्टेशन
120 बसीज केंद्र

स्पष्ट है —
यह विरोध नहीं, बल्कि राज्य को अस्थिर करने की परियोजना थी।

जब मस्जिदें भी नहीं बख़्शी गईं

सबसे ज़्यादा झकझोरने वाला सच:

350 मस्जिदें
200 स्कूल
15 पुस्तकालय
2 आर्मेनियन चर्च

सवाल उठता है:

❓अगर यह आज़ादी की लड़ाई थी, तो इबादतगाहें क्यों जलाई गईं?
❓अगर यह इंसाफ़ था, तो बच्चों के स्कूल क्यों जलाए गए?

ईरान का आरोप है कि यह सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को तोड़ने की कोशिश थी —
ताकि क़ौम को उसकी जड़ों से काट दिया जाए।

अमेरिका-इज़राइल मॉडल: पहले पाबंदी, फिर बग़ावत

ईरान का दावा है कि:

पहले आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए
फिर महँगाई और बेरोज़गारी बढ़ी
फिर सोशल मीडिया के ज़रिए आग भड़काई गई
और आख़िर में हिंसा को “जनक्रांति” कहा गया

यही मॉडल पहले:

इराक
सीरिया
लीबिया
यमन

में आज़माया गया।

मानवाधिकार का दोहरा चेहरा

जो अमेरिका और इज़राइल दुनिया को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाते हैं,
उन्हीं के नाम पर:

मस्जिदें जलीं
बच्चे डर में जिए
परिवार उजड़ गए

👉 यही है वह शैतानी राजनीति,
जिसे ईरान “ज़ुल्म के ख़िलाफ़ संघर्ष” कहता है।

तहलका टुडे का सवाल

क्या किसी मुल्क को झुकाने के लिए
उसके लोगों को भुखमरी, हिंसा और डर में धकेल देना जायज़ है?

और अगर नहीं —
तो फिर ईरान में जो हुआ, वह क्या था?

ईरान की कहानी सिर्फ़ ईरान की नहीं है।
यह हर उस क़ौम की कहानी है जो शैतानी ताक़तों के सामने झुकने से इनकार करती है।

और शायद इसी लिए —

अल्लाह के नेक बंदे हमेशा निशाने पर रहते हैं।

📌 स्रोत: IRIB / PressTV

तेहरान से तहलका टुडे की विशेष रिपोर्ट

यह तस्वीर खामोश नहीं है—यह चीख़ रही है,और इंसान से सिर्फ़ एक सवाल कर रही है:कहाँ गया तेरा घमंड? कहाँ गई तेरी ताक़त?ये बि...
22/01/2026

यह तस्वीर खामोश नहीं है—
यह चीख़ रही है,
और इंसान से सिर्फ़ एक सवाल कर रही है:

कहाँ गया तेरा घमंड? कहाँ गई तेरी ताक़त?

ये बिखरी हुई हड्डियाँ कभी एक ज़िंदा इंसान थीं।
इन पसलियों के अंदर कभी ख़्वाहिशें धड़कती थीं।
ये खोपड़ी कभी अना, घमंड, चालाकी और मंसूबों का मरकज़ थी।

आज न नाम है,
न पहचान,
न ओहदा,
न दौलत,
न ताक़त,
न सिफ़ारिश,
न चापलूस,
न रिश्तेदार।

सब यहीं रह गया।

ए इंसान! जिस पर तू इतराता था, वही तुझे छोड़ गया

कब्र में
❌ न मोबाइल जाएगा
❌ न लैपटॉप
❌ न गाड़ी
❌ न बैंक बैलेंस
❌ न शोहरत
❌ न खूबसूरत बीवी
❌ न औलाद का नाम

✔️ सिर्फ़ आमाल जाएंगे।

वक़्त बहुत कम है।
साँसें गिनी-चुनी हैं।
और आख़िरत…
बहुत क़रीब है।

अब सुन! यह बात दिल चीरने वाली है

अल्लाह के नाम पर वक़्फ़ की गई ज़मीनों पर
नाजायज़ क़ब्ज़ा करने वालों,
अवैध निर्माण कराने वालों,
वक़्फ़-ख़ोरों—

अपनी औक़ात पहचान लो।

यह कोई मामूली ज़मीन नहीं,
यह अल्लाह की अमानत है।

इस पर हाथ डालने का मतलब है—
अपने ईमान पर वार करना।

नतीजा यक़ीनन आएगा

दुनिया से बरकत उठ जाएगी

बीमारियाँ गले लग जाएँगी

इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी

अपने भी मुँह मोड़ लेंगे

चापलूस भी काम नहीं आएँगे

और आख़िरत में…
यही हाल होगा
जो इस तस्वीर में दिखाई दे रहा है।

अभी भी वक़्त है… आख़िरी नहीं हुआ

तौबा कर लो।
नमाज़ क़ायम कर लो।
दिल साफ़ कर लो।
जिसका हक़ मारा है, लौटा दो।
अल्लाह की ज़मीन से हाथ खींच लो।

क्योंकि
कल यही मिट्टी हमें भी ओढ़नी है।

अक़्लमंद वही है…

जो मरने से पहले,
मरने की तैयारी कर ले।

🕊️ अल्लाह हम सबको हिदायत दे—
इससे पहले कि यह तस्वीर
हमारी पहचान बन जाए।

सेव वक़्फ़ इंडिया द्वारा जनहित में वक्फ बचाओ अभियान के लिए प्रकाशित

अल्पसंख्यक विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवालवक्फ ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद भी देरी, सिर्फ एक महीने के लिए खोला गया UMEED ...
14/01/2026

अल्पसंख्यक विभाग की कार्यशैली पर गंभीर सवाल

वक्फ ट्रिब्यूनल के आदेश के बाद भी देरी, सिर्फ एक महीने के लिए खोला गया UMEED पोर्टल

नई दिल्ली। Ministry of Minority Affairs की कार्यप्रणाली को लेकर देशभर में तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। वक्फ मामलों में वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा सत्यापन व सुधार के लिए 6 महीने का समय बढ़ाए जाने के बावजूद, मंत्रालय ने UMEED पोर्टल को एक महीने बाद और वह भी केवल एक महीने (14 जनवरी से 14 फरवरी) के लिए खोला। इसे लेकर वक्फ से जुड़े संगठनों और आम लोगों में भारी नाराज़गी देखी जा रही है।

आलोचकों का कहना है कि यह फैसला “हिटलरशाही” मानसिकता को दर्शाता है, क्योंकि इतने सीमित समय में देशभर की वक्फ संपत्तियों के रिकॉर्ड की पुनः जांच और सुधार कर पाना व्यवहारिक रूप से कठिन है—खासकर तब, जब कई प्रविष्टियों में क्षेत्रफल की बड़ी त्रुटियाँ और दस्तावेज़ी विसंगतियाँ पहले से मौजूद हैं।

“विदेशी एजेंडे पर काम” के आरोप

इस पूरे मामले में कुछ संगठनों और नागरिक समूहों ने अल्पसंख्यक विभाग पर अमेरिका–इज़राइल के निर्देशों पर चलने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए हैं। उनका दावा है कि वक्फ संपत्तियों से जुड़े मामलों में जल्दबाज़ी और सीमित समय-सीमा से समुदाय के हितों को नुकसान पहुँच सकता है।

सेव वक्फ इंडिया ने की शीर्ष स्तर पर शिकायत

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा के लिए सक्रिय संगठन Save Waqf India ने मंत्रालय की इस कार्यशैली पर कड़ा एतराज़ जताया है। संगठन ने भारत के राष्ट्रपति Droupadi Murmu और प्रधानमंत्री Narendra Modi को औपचारिक शिकायत भेजकर मांग की है कि—

UMEED पोर्टल को पर्याप्त अवधि के लिए खोला जाए

वक्फ ट्रिब्यूनल के आदेश की भावना के अनुरूप समय-सीमा तय हो

सुधार प्रक्रिया को पारदर्शी, सहभागी और व्यावहारिक बनाया जाए

सेव वक्फ इंडिया का कहना है कि यदि समय-सीमा यथोचित नहीं बढ़ाई गई, तो गलत प्रविष्टियाँ स्थायी विवादों का रूप ले सकती हैं, जिसका खामियाज़ा वक्फ संस्थाओं और लाभार्थियों को भुगतना पड़ेगा।

मंत्रालय का पक्ष और आगे की राह

मंत्रालय का कहना है कि पोर्टल का सीमित पुनः-खुलना लागू कानून के अनुरूप है और इसका उद्देश्य केवल सत्यापन व सुधार है। हालांकि, जमीनी हकीकत और व्यापक आपत्तियों के बीच अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार समय-सीमा बढ़ाने या प्रक्रिया को और सुगम बनाने पर कोई निर्णय लेती है या नहीं।

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