22/01/2026
शैतान किस तरह अल्लाह के नेक बंदों को हलाकान करता है,अगर ज़ुल्म, साज़िश और तबाही को देखना है — तो आइए ईरान
A Special Investigation Exposing the Human, Economic and Moral Cost of US–Israel Oppression on the Iranian People
तेहरान से तहलका टुडे की विशेष रिपोर्ट
अगर किसी को यह समझना हो कि शैतानी ताक़तें किस तरह एक क़ौम को अंदर से तोड़ने, डराने और तबाह करने की साज़िश रचती हैं, तो उसे नक़्शे पर कहीं और देखने की ज़रूरत नहीं —
👉 ईरान खुद एक खुली किताब है।
एक ऐसा मुल्क, जिस पर अमेरिका और इज़राइल ने सीधे जंग के बजाय “हाइब्रिड वॉर” थोपी —
जहाँ पाबंदियाँ हथियार बनीं,
दंगे रणनीति बने,
और आम लोग निशाना।
आग सिर्फ़ सड़कों पर नहीं, घरों में जलाई गई
ईरानी अधिकारियों द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि हालिया वर्षों में ईरान में जो कुछ हुआ, वह कोई सामान्य विरोध नहीं था।
यह एक सुनियोजित तबाही थी।
3,117 लोगों की मौत
2,427 नागरिक और सुरक्षा बल शहीद
690 आतंकवादी मारे गए
हर मौत के पीछे एक सवाल है —
❓ किसके फायदे के लिए?
जब मदद के साधन ही जला दिए गए
इस कथित “जन आंदोलन” में:
305 एंबुलेंस और बसें जलाई गईं
24 पेट्रोल पंप तबाह किए गए
यानी ज़ख़्मी तड़पते रहें, शहर ठहर जाए —
यही रणनीति थी।
रोज़ी-रोटी और अर्थव्यवस्था पर हमला
700 दुकानें
750 बैंक
600 एटीएम
800 निजी कारें
यह सिर्फ़ तोड़फोड़ नहीं थी,
👉 यह आम इंसान की कमर तोड़ने की कोशिश थी।
राज्य व्यवस्था को गिराने की कोशिश
414 सरकारी इमारतें
749 पुलिस स्टेशन
120 बसीज केंद्र
स्पष्ट है —
यह विरोध नहीं, बल्कि राज्य को अस्थिर करने की परियोजना थी।
जब मस्जिदें भी नहीं बख़्शी गईं
सबसे ज़्यादा झकझोरने वाला सच:
350 मस्जिदें
200 स्कूल
15 पुस्तकालय
2 आर्मेनियन चर्च
सवाल उठता है:
❓अगर यह आज़ादी की लड़ाई थी, तो इबादतगाहें क्यों जलाई गईं?
❓अगर यह इंसाफ़ था, तो बच्चों के स्कूल क्यों जलाए गए?
ईरान का आरोप है कि यह सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को तोड़ने की कोशिश थी —
ताकि क़ौम को उसकी जड़ों से काट दिया जाए।
अमेरिका-इज़राइल मॉडल: पहले पाबंदी, फिर बग़ावत
ईरान का दावा है कि:
पहले आर्थिक प्रतिबंध लगाए गए
फिर महँगाई और बेरोज़गारी बढ़ी
फिर सोशल मीडिया के ज़रिए आग भड़काई गई
और आख़िर में हिंसा को “जनक्रांति” कहा गया
यही मॉडल पहले:
इराक
सीरिया
लीबिया
यमन
में आज़माया गया।
मानवाधिकार का दोहरा चेहरा
जो अमेरिका और इज़राइल दुनिया को मानवाधिकार का पाठ पढ़ाते हैं,
उन्हीं के नाम पर:
मस्जिदें जलीं
बच्चे डर में जिए
परिवार उजड़ गए
👉 यही है वह शैतानी राजनीति,
जिसे ईरान “ज़ुल्म के ख़िलाफ़ संघर्ष” कहता है।
तहलका टुडे का सवाल
क्या किसी मुल्क को झुकाने के लिए
उसके लोगों को भुखमरी, हिंसा और डर में धकेल देना जायज़ है?
और अगर नहीं —
तो फिर ईरान में जो हुआ, वह क्या था?
ईरान की कहानी सिर्फ़ ईरान की नहीं है।
यह हर उस क़ौम की कहानी है जो शैतानी ताक़तों के सामने झुकने से इनकार करती है।
और शायद इसी लिए —
अल्लाह के नेक बंदे हमेशा निशाने पर रहते हैं।
📌 स्रोत: IRIB / PressTV
तेहरान से तहलका टुडे की विशेष रिपोर्ट