National Confederation of Dalit & Adivasi Organisations

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National Confederation of Dalit & Adivasi Organisations National Confederation of Dalit & Adivasi Organisations (NACDAOR) is the Apex Body of organisations led by the Scheduled Castes,Tribes & Excluded.

Founded in December 2001, National Confederation of Dalit-Adivasi Organisations (NACDAOR) is a national platform committed to an inclusive, progressive, secular, democratic and non-sectarian society. It believes in equality, social justice and equal dignity of the socially marginalised. Led by people from mostly Dalit-Adivasi background, NACDAOR works for minorities, through innovative programs, e

nabling strategies, community based interventions in systematically evolved synergies of various stakeholders working towards the goal of social, economic, cultural and political empowerment of Dalits and others. While firmly believing that Dalits, Adivasis, the Scheduled Castes and the Scheduled Tribes are the most vulnerable, excluded and disadvantaged in India, it emphasizes that the emancipatory efforts of these historically marginalized sections can only be successful if they themselves lead the movement. NACDAOR provides the platform of handholding, undertakes research in areas such as atrocity issues, economy and livelihood issues, health and nutrition, water, sanitation, so forth and attempts at creating a direct link with the community at large across 25 states of the country.

सफाई कर्मचारी सुबह घर से निकलते हैं, और शाम को उनके लौटने की कोई गारंटी नहीं होती।यह ईरान और अमेरिका के बीच जंग की बात न...
28/04/2026

सफाई कर्मचारी सुबह घर से निकलते हैं, और शाम को उनके लौटने की कोई गारंटी नहीं होती।

यह ईरान और अमेरिका के बीच जंग की बात नहीं है। यह हमारे देश के उन लाखों दलित सफाई कर्मचारियों के काम की परिस्थितियों की हकीकत है, जो कॉर्पोरेट बिल्डिंगों, हाउसिंग सोसाइटी और हमारे शहरों नालियों, सेप्टिक टैंकों और सीवरों के भीतर उतरकर उस गंदगी को साफ करते हैं, जिसे समाज पैदा करता है — और उसे साफ़ करवाने के लिए दलित समाज के लोगों को बाध्य करता है।
जयपुर के सीतापुरा औद्योगिक क्षेत्र में एक जूलरी फैक्ट्री के सेप्टिक टैंक में सोने-चाँदी के कण निकालने के लिए उतारे गए चार मज़दूरों की जहरीली गैस से मौत हो गई। मज़दूर टैंक में उतरने से डर रहे थे, लेकिन कंपनी प्रबंधन ने उन्हें अतिरिक्त पैसों का लालच देकर मजबूर किया। फरवरी 2025 में दिल्ली के नरेला में दो सफाई कर्मचारियों की मौत हुई — एक निजी ठेकेदार द्वारा नियुक्त ये मज़दूर किसी भी सुरक्षा उपकरण के बिना जहरीले गड्ढे में उतारे गए थे। इसके कुछ दिन बाद कोलकाता के बांटला क्षेत्र में तीन और कर्मचारी — फरज़ेम शेख, हाशी शेख और सुमन सरदार — एक नाले की सफाई के दौरान मैनहोल में बह गए।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 2017 से अब तक 620 से अधिक सफाई कर्मचारियों की मौत हुई — जिनमें से 539 परिवारों को पूरा मुआवजा मिला, लेकिन 52 परिवारों को एक भी पैसा नहीं मिला। जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे महानगरों में मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक सीवर सफाई पर पूर्ण प्रतिबंध का आदेश दिया। लेकिन इस आदेश के बावजूद फरवरी से मई 2025 के बीच कम से कम 20 और मौतें दर्ज हुईं।
विश्व कार्यस्थल पर सुरक्षा और स्वास्थ्य दिवस के अवसर पर नेशनल कॉन्फेडरेशन ऑफ़ दलित एंड आदिवासी ओर्गानाइजेशंस (नैकडोर) मांग करता है:
1. सफाई कर्मचारियों के काम करने के खतरों का तकनीकी हल किया जाए।
2. सफाई कर्मचारियों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने के लिए उनकी नियमित अन्तराल पर स्वास्थ्य जाँच का प्रावधान हो।
3. जो भी ठेकेदार, उनके नियोक्ता या नगर निगम के अधिकारी उन्हें बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर, सेप्टिक टैंक, नालियों या सड़कों पर सफाई के काम के लिए बाध्य करे, उनके खिलाफ ऍफ़.आई.आर. दर्ज कर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया जाए;
4. दुर्घटनावश मौत की स्थिति में उनके परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।
5. राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग को सफाई कर्मचारियों के मसलों को और अपने संवैधानिक उद्देश्यों की पूर्ति के प्रति जवाबदेह बनाया जाए।

दलित और समुदायों में टीकाकरण की कमी कोई व्यक्तिगत चुनाव या अज्ञानता का परिणाम नहीं है — यह जाति-व्यवस्था द्वारा उत्पन्न ...
27/04/2026

दलित और समुदायों में टीकाकरण की कमी कोई व्यक्तिगत चुनाव या अज्ञानता का परिणाम नहीं है — यह जाति-व्यवस्था द्वारा उत्पन्न संरचनात्मक असमानता का प्रतिबिंब है। जब तक स्वास्थ्य नीतियाँ जाति को एक सामाजिक निर्धारक के रूप में स्वीकार नहीं करतीं और दलित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होती, तब तक “सबके लिए स्वास्थ्य” का नारा ही रहेगा।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने शिक्षा और स्वास्थ्य को दलित मुक्ति के अनिवार्य आयाम माने थे। उनके इस दृष्टिकोण के आलोक में नैकडोर टीकाकरण को केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का प्रश्न मानता है।
राष्ट्रीय शिशु टीकाकरण सप्ताह पर नैकडोर की माँग है:
1. दलित बस्तियों में विशेष टीकाकरण शिविर लगाए जाएँ।
2. दलित समुदाय के स्वास्थ्यकर्मी नियुक्त किए जाएँ।
3. जाति-आधारित स्वास्थ्य डेटा सार्वजनिक किया जाए।
4. स्वास्थ्यकर्मियों को जाति-संवेदनशीलता प्रशिक्षण दिया जाए।
नैकडोर के नीतिगत सुझाव है:
1. जाति-वर्गीकृत स्वास्थ्य डेटा का संग्रह और प्रकाशन अनिवार्य किया जाए।
2. दलित बस्तियों में मोबाइल टीकाकरण दल भेजे जाएँ।
3. ASHA कार्यकर्ताओं की जवाबदेही सुनिश्चित हो — विशेषकर दलित क्षेत्रों में।
4. दलित सामाजिक संगठनों को टीकाकरण अभियान में सहभागी बनाया जाए।
5. नैकडोर के नेतृत्व में दलित एवं आदिवासी समुदाय-आधारित निगरानी तंत्र स्थापित किया जाए।
दलित स्वास्थ्य, दलितों की मुक्ति का अभिन्न अंग है।
-अशोक भारती DalitOnLine

धन्ना भगत: आध्यात्मिक साहस और सामाजिक क्रांति के वाहकभक्ति आंदोलन के इतिहास में धन्ना भगत एक ऐसा नाम है जो सामाजिक क्रां...
27/04/2026

धन्ना भगत: आध्यात्मिक साहस और सामाजिक क्रांति के वाहक
भक्ति आंदोलन के इतिहास में धन्ना भगत एक ऐसा नाम है जो सामाजिक क्रांति और आध्यात्मिक साहस का प्रतीक है। पंद्रहवीं शताब्दी में राजस्थान की धरती पर जन्मे धन्ना जाट किसान थे — एक ऐसी जाति जो सवर्ण ब्राह्मणवादी व्यवस्था में हाशिये पर थी। उनकी भक्ति ने न केवल ईश्वर को, बल्कि सामाजिक विषमता को भी चुनौती दी।
धन्ना भगत की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भक्ति को उस सरल, देहाती जीवन से जोड़ा जो दलित और वंचित वर्ग जीते हैं। गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित उनके पद इस बात के साक्षी हैं कि ईश्वर की प्राप्ति के लिए न कुलीन जन्म चाहिए, न संस्कृत का ज्ञान — केवल निश्चल प्रेम और सच्ची लगन पर्याप्त है। यह संदेश दलित जनमानस के लिए एक प्रकार की मुक्तिवाणी था।
रविदास, कबीर और नामदेव की तरह धन्ना ने भी यह सिद्ध किया कि भगवान किसी जाति विशेष की बपौती नहीं है। उनकी रचनाओं में “अन्न” और “खेती” का जो रूपक है, वह निम्न वर्ग के श्रमजीवी जीवन की गरिमा को प्रतिष्ठित करता है। यह प्रतीकात्मकता आज भी दलित विमर्श में प्रासंगिक है।
डॉ. आंबेडकर ने भक्ति आंदोलन की सीमाओं को भी रेखांकित किया था — कि यह आंदोलन जातिव्यवस्था को जड़ से नहीं उखाड़ सका। फिर भी धन्ना जैसे संतों का योगदान यह है कि उन्होंने दलित और पिछड़े वर्गों में आत्मसम्मान का बीज बोया, यह साहस दिया कि वे भी ईश्वर के समक्ष समान हैं।
आज जब हम दलित सांस्कृतिक विरासत की बात करते हैं, तो धन्ना भगत उस परंपरा के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ हैं जो ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देते हुए मानवीय गरिमा की स्थापना के रास्ते पर चलने का सुझाव देते हैं।

नैकडोर   और पीयूसीएल ( ) दिल्ली द्वारा रजनी तिलक की स्मृति में सालाना पुरस्कार की स्थापना। पहला पुरस्कार दिल्ली के प्रेस...
07/03/2026

नैकडोर और पीयूसीएल ( ) दिल्ली द्वारा रजनी तिलक की स्मृति में सालाना पुरस्कार की स्थापना।
पहला पुरस्कार दिल्ली के प्रेस क्लब में आगामी 4 अप्रैल को दिया जाएगा।
नैकडोर आपको इस कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए सादर आमंत्रित करता है।
Rajnitilak Tilak Ashok Bharti Ashok Bharti ICDR INTERNATIONAL Fight Inequality Alliance-INDIA Subash Mani Singh Sumedha Bodh

04/03/2026
27/02/2026

यूनिसेफ के इंडिया ऑफिस के निमंत्रण पर नैकडोर ने यूनिसेफ के लिए एक वर्कशॉप आयोजित की। उसी की कुछ झलकियां हैं आपके लिए। 🌹🙏🏽

आपको 77 वें गणतंत्र दिवस की नैकडोर ki ओर से कोटि कोटि बधाई।
26/01/2026

आपको 77 वें गणतंत्र दिवस की नैकडोर ki ओर से कोटि कोटि बधाई।

आज राष्ट्रीय वोटर्स दिवस है।अपने वोट का बचाव करें। SIR में अपना वोट सुरक्षित करें।
25/01/2026

आज राष्ट्रीय वोटर्स दिवस है।
अपने वोट का बचाव करें। SIR में अपना वोट सुरक्षित करें।

25/01/2026

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