Mahadev Shivshakti Sewa Trust:MSST

Mahadev Shivshakti Sewa Trust:MSST The MAHADEV SHIVSHAKTI SEWA TRUST a Trust is a grass root level social welfare organization working directly with the rural poor ....

The MAHADEV SHIVSHAKTI SEWA TRUST a Trust is a grass root level social welfare organization working directly with the rural poor, facilitating the utilization of their skills and knowledge to develop sustainable solutions to poverty. It also initiates efforts in various interconnected socio-economic fields such as education, livelihoods, natural resources, health, women empowerment, and social jus

tice. The focus is in on 'convenience, reliability, continuity and flexible range of services for the poor people in our society.

जय शिवशक्ति ,,,  का जाप करने से सभी अमंगलकारी भावनाओ का नाश होता है।  मनुष्य की सोची हुई बातें ही तरंग बनकर सभी दिशाओं म...
12/07/2026

जय शिवशक्ति ,,, का जाप करने से सभी अमंगलकारी भावनाओ का नाश होता है। मनुष्य की सोची हुई बातें ही तरंग बनकर सभी दिशाओं में कंपन करते हैं और जिस प्रकार का सोच ज्यादा तरंग उत्पन्न करेगा वैसे ही प्रकृति अपना रूप लेगा। अर्थात सकारात्मक ऊर्जा या नकारात्मक ऊर्जा दोनों सजीवता धारण किए सभी जीवों के उनके द्वारा किए जा रहे कार्य या उनकी सोची हुई मानसिक स्थिति का परिणाम है । वातावरण में अगर गूँज किसी मंत्र या किसी शक्ति के प्रति एक विश्वास के कारण उसके नाम का जाप, उसको भोजन देने, दीप जलाने, उसके प्रति आदर का भव्य समर्पण करने से निश्चित ही ऊर्जा उत्पन्न होगी। ताली बजाना, घंटा या शंख इसकी ध्वनि सारे नकारात्मक आवाज को खत्म करने के लिए बनाए गए है।
इसलिए Mahadev Shivshakti Sewa Trust:MSST महादेव शिवशक्ति सेवा ट्रस्ट ने वेद शिक्षा के माध्यम से सभी जीवों को सकारात्मक वातावरण देने के लिए इन सभी सकारात्मक तरीक़ों का व्यवहार कराता है। मंत्र सीखने - सिखाने के क्रम में ही बहुत सारी ऊर्जा का संचार हो जाता है। अमृत मंथन है मंत्र का जप और अमृत कुंड है यज्ञ । इनके प्रभाव से उत्पन्न होता है शुद्ध विचार।

मानव जन्म सभी के कल्याण हेतु जीभ की उत्पत्ति के साथ हुआ है। बाकि सभी जीव मनुष्य के निमित्त हुए है तो मनुष्यता जीभ से उपयोग करके ईश्वर की आराधना बोल कर, गा कर ध्वनि माध्यम से ऊर्जा उत्पन्न करने में है।

हर हर महादेव
महादेव शिवशक्ति सेवा ट्रस्ट की टीम

क्या कभी आपने सोचा है कि जब मृत्यु का अचूक पाश किसी के गले में पड़ चुका हो, और यमराज स्वयं उसके प्राण हरने के लिए सामने ...
11/07/2026

क्या कभी आपने सोचा है कि जब मृत्यु का अचूक पाश किसी के गले में पड़ चुका हो, और यमराज स्वयं उसके प्राण हरने के लिए सामने खड़े हों, तब भी क्या उस अटल प्रारब्ध को बदला जा सकता है? सनातन इतिहास में एक ऐसी कथा दर्ज है जो यह सिद्ध करती है कि जब प्रारब्ध का प्रचंड वेग जीवन को समाप्त करने आता है, तो वर्तमान का अटूट पुरुषार्थ और भक्ति उस काल के पहिए को भी पीछे धकेल देती है। आइए, शास्त्रों के पन्नों से मार्कण्‍डेय पुराण की उस परम प्रामाणिक गाथा को समझते हैं, जो कर्म के इस दूसरे हिस्से को पूरी तरह जीवंत कर देती है।

यह कथा है ऋषि मृकण्डु और उनकी पत्नी मरुद्वती की, जिन्हें कोई संतान नहीं थी। घोर तपस्या के बाद भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और एक कठिन विकल्प रखा। महादेव ने कहा कि तुम्हें या तो एक दीर्घायु पुत्र मिल सकता है जो अत्यंत मूर्ख और सदाचारी नहीं होगा, या फिर एक ऐसा परम ज्ञानी, सर्वगुण संपन्न पुत्र मिल सकता है जिसकी आयु केवल 16 वर्ष होगी। ऋषि दंपत्ति ने अल्पायु लेकिन गुणी पुत्र को चुना, जिसका नाम रखा गया मार्कंडेय। मार्कंडेय बचपन से ही अद्भुत मेधावी और भगवान शिव के अनन्य भक्त थे। समय पंख लगाकर उड़ गया और वह घड़ी आ गई जब मार्कंडेय अपने जीवन के 16वें वर्ष के अंतिम दिन में प्रवेश कर गए। माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल था, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार उस बालक की मृत्यु का प्रारब्ध शत-प्रतिशत निश्चित था, जिसे ब्रह्मा की लिखावट भी नहीं बदल सकती थी।
लेकिन बालक मार्कंडेय ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने इसे केवल भाग्य का खेल मानकर घुटने टेकने से इनकार कर दिया। वे समुद्र तट पर गए और मिट्टी से एक शिवलिंग बनाकर साक्षात महादेव की घोर आराधना में लीन हो गए। उन्होंने ठीक उसी समय महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और उसका निरंतर जाप करने लगे। जब नियत समय पर साक्षात यमराज अपने भयानक भैंसे पर सवार होकर उनके प्राण हरने आए, तो मार्कंडेय ने डरने के बजाय दौड़कर शिवलिंग को अपनी बाहों में कसकर पकड़ लिया। यमराज ने जैसे ही काल का पाश फेंका, वह पाश बालक के साथ-साथ साक्षात शिवलिंग पर भी जा गिरा।

बस फिर क्या था, ब्रह्मांडीय न्याय की सीमा का उल्लंघन होते ही स्वयं देवाधिदेव महादेव उस शिवलिंग से प्रकट हो गए। काल के भी काल, महाकाल ने अत्यंत क्रोध में आकर यमराज के सीने पर लात मारी और बालक मार्कंडेय को अमरता का वरदान दे दिया। जो प्रारब्ध पत्थर की लकीर माना जा रहा था, जो मृत्यु टल नहीं सकती थी, वह भगवान शिव की कृपा और एक बालक के प्रचंड पुरुषार्थ व भक्ति के सामने तिनके की तरह बह गई। यमराज को भी वहां से खाली हाथ लौटना पड़ा और मार्कंडेय अष्ट-चिरंजीवियों में शामिल होकर आज भी अमर माने जाते हैं।

यह प्रामाणिक इतिहास हमें चीख-चीखकर यह सिखाता है कि प्रारब्ध चाहे कितना भी क्रूर और अटल क्यों न दिख रहा हो, वह अंतिम सत्य नहीं है। योगवसिष्ठ में महर्षि वसिष्ठ भगवान श्री राम से कहते हैं कि पुरुषार्थेन सर्वं हि प्राप्यते जगतीतले। यानी इस जगत में पुरुषार्थ के बल पर सब कुछ हासिल किया जा सकता है। पूर्व जन्म का कर्म यदि आज हमारे सामने एक दीवार बनकर खड़ा है, तो इस जन्म का प्रचंड पुरुषार्थ उस दीवार को ढहाने वाला हथौड़ा है। सोचिए, यदि कर्म का चक्र इतना ही कठोर होता कि उसे बदला ही न जा सके, तो फिर महर्षि वाल्मीकि एक डाकू से ब्रह्मर्षि कैसे बनते? और अंगुलिमाल जैसा क्रूर हत्यारा भगवान बुद्ध की शरण में आकर परम शांति को कैसे प्राप्त होता?

यहाँ एक अद्भुत रहस्य खुलता है जिसे कर्म की रसायन कला कहा जा सकता है। जब हम ईश्वर की अनन्य शरणागति में जाते हैं, जब हमारा क्रियमाण कर्म (वर्तमान का कर्म) पूरी तरह से सेवा, सुमिरन और सत्कर्म में बदल जाता है, तो हमारे भीतर एक प्रचंड आध्यात्मिक ऊर्जा का जन्म होता है।
ब्रह्मसंहिता में स्वयं ब्रह्मा जी घोषणा करते हैं कि

यस्त्विन्द्रगोपमथवेन्द्रमहो स्वकर्म-बन्धानुरूप-फलभाजनमातनोति। कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्तिभाजां।

इसका गहरा अर्थ यह है कि एक छोटे से कीड़े से लेकर स्वर्ग के राजा इंद्र तक, हर कोई अपने कर्मों के बंधन में बंधकर फल भोगता है, लेकिन जो भगवान की भक्ति में लीन हो जाता है, ईश्वर उसके संचित पाप कर्मों को भस्म कर देते हैं।

यही कारण है कि जब गहरी चोट आनी होती है, तो भक्ति और सत्कर्म उसे पूरी तरह टालते नहीं, बल्कि उसका स्वरूप बदल देते हैं। इसे शास्त्रों की भाषा में सूली का कांटा बनना कहते हैं। जिस व्यक्ति के भाग्य में कर्म के कठोर नियम के अनुसार मृत्यु तुल्य कष्ट या कोई भीषण दुर्घटना लिखी हो, ईश्वर की असीम अनुकंपा और उसके आज के पुण्यों के कारण वह संकट केवल एक छोटी सी खरोंच या पैर में चुभे एक मामूली कांटे में तब्दील हो जाता है। प्रारब्ध अपना हिसाब भी पूरा कर लेता है और कर्ता के प्राण भी बच जाते हैं। क्या यह ब्रह्मांडीय न्याय व्यवस्था की सबसे बड़ी दयालुता नहीं है?

इसलिए, यदि आज आप किसी शारीरिक, मानसिक या भावनात्मक गहरी चोट से गुजर रहे हैं, तो यह मत समझिए कि आप असहाय हैं। यह मत मानिए कि इसे रोका नहीं जा सकता था। जो घट गया, वह अतीत का ऋण था जो चुकता हो गया। लेकिन जो अब घटने वाला है, उसकी चाबी पूरी तरह से आपके हाथ में है। आपका हर एक अच्छा विचार, हर एक प्रार्थना, किसी भूखे को दिया गया अन्न का दाना और ईश्वर के प्रति आपका अटूट विश्वास आपके आने वाले कल के प्रारब्ध को नए सिरे से लिख रहा है। आप अपने भाग्य के मूक दर्शक नहीं, बल्कि उसके जीवंत लेखक हैं।

जब संकट के बादल घने हों, तो भाग्य को कोसने के बजाय अपने पुरुषार्थ को जगाइए और उस परम सत्ता के चरणों में सर्वस्व सौंप दीजिए। याद रखिए, कमान से छूटा तीर भले ही वापस न आए, लेकिन अगर सामने ढाल बनकर साक्षात नारायण खड़े हों, तो ब्रह्मांड का बड़े से बड़ा अस्त्र भी तिनका बन जाता है। अपने आज को इतना पवित्र और शक्तिशाली बना दीजिए कि आने वाला कल आपके सामने नतमस्तक हो जाए।

प्रारब्ध अगर अतीत की कटीली झाड़ी है, तो पुरुषार्थ और भक्ति उस पर खिलने वाला दिव्य गुलाब है।

जय शिवशक्ति
महादेव शिवशक्ति सेवा ट्रस्ट
जन सेवा * जन चेतना * जन कल्याण*

महादेव शिवशक्ति सेवा ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा रक्तदान महादान की एक कोशिश जय शिवशक्ति
08/04/2026

महादेव शिवशक्ति सेवा ट्रस्ट के सदस्यों द्वारा रक्तदान महादान की एक कोशिश

जय शिवशक्ति

हर हर महादेव
09/02/2026

हर हर महादेव

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