28/03/2026
डीटीसी प्रबंधन – दिल्ली सरकार होश में आओ, कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के साथ धोखेबाजी बंद करो !!
इंकलाब जिंदाबाद !!
मजदूर एकता जिंदाबाद !!
23 मार्च, 2026: शहीद भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव के शहादत दिवस पर डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर ने डीटीसी मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में विभिन्न डिपो के चालक और संवाहकों के साथ डिम्ट्स/क्लस्टर के कॉन्ट्रैक्ट संवाहकों ने भी हिस्सा लिया।
डीटीसी जैसे जन-परिवहन के महत्वपूर्ण संस्थान को लगातार डीटीसी प्रबंधन और दिल्ली सरकार निजीकरण की ओर धकेल रहे हैं। मेंटेनेंस-वर्कशॉप का पूरा काम, टाटा और लीलैंड जैसी निजी कंपनियों को पहले ही दिया जा चुका है जिसके कारण निगम को भारी आर्थिक हानि उठानी पड़ी है। अब नई इलेक्ट्रिक बसों में ड्राइविंग का कार्य निजी कंपनी को दिया जा रहा है - जिससे दिल्ली की परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से निजी-कंपनियों के हाथों में चली जाएगी। यह न सिर्फ डीटीसी कर्मचारियों के साथ बल्कि दिल्ली की सारी मेहनतकश-गरीब जनता के साथ धोखाधड़ी है।
पिछले कुछ सालों से दिल्ली सरकार और डीटीसी प्रबंधन की गलत नीतियों के चलते दिल्ली परिवहन निगम के सभी कर्मचारी परेशान हैं। निगम का तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की मांगों पर प्रबंधन बिल्कुल चुप है। दिल्ली सरकार और डीटीसी प्रबंधन ये भूल चुके हैं कि कभी दिल्ली की सड़कों पर दौड़ने वाली ब्लू-लाइन बसों से बढ़ती दुर्घटनाओं के चलते उन्हें बंद करना पड़ा था। 2012 में हुए ‘निर्भया’ हादसे ने भी सरकारी जन-परिवहन व्यवस्था के महत्त्व को सबके सामने लाया था। बढ़ते प्रदूषण और नई आबादी वाले क्षेत्रों को देखते हुए डीटीसी के विस्तार की बहुत ज्यादा ज़रुरत है। परंतु यह बहुत दुखद है कि अब डीटीसी बसों के संचालन को पूर्ण रूप से प्राइवेट ऑपरेटरों के माध्यम से करने की पूरी तैयारी हो चुकी है।
23 मार्च को हुए विरोध प्रदर्शन के माध्यम से डीटीसी प्रबंधन और दिल्ली सरकार के समक्ष हाल ही में कॉन्ट्रैक्ट चालकों के साथ किए जा रहे अन्याय के खिलाफ ज़बरदस्त तरीके से आवाज उठाई गई। बीस साल से भी लम्बे समय से चालक की ड्यूटी करने वाले कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को नंद नगरी में ट्रेनिंग पूरी होने के बावजूद चालक की ड्यूटी नहीं दी जा रही है। इलेक्ट्रिक बसों में थर्ड पार्टी के माध्यम से चालक भर्ती किये जा रहे हैं और डीटीसी प्रबंधन हमें यह बता रहा है कि ड्राइवर ‘सरप्लस’- यानि एक्स्ट्रा हो गए हैं। यह कर्मचारियों के साथ सरासर धोखा नहीं तो क्या है – डीटीसी के पास अब डिम्ट्स की भी बसें हैं, दिल्ली सरकार ने और इलेक्ट्रिक बसों को लाने की बात कही है – फिर चालक ‘सरप्लस’ कैसे हो गए और उन्हें संवाहक बनाने की ज़रुरत क्या है? डीटीसी के तेज़ी से हो रहे निजीकरण को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि आज चालकों के साथ अन्याय हो रहा है, कल संवाहकों की बारी आएगी।
कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की लंबे समय से समान काम समान वेतन और पक्का करने की मांग के ऊपर दिल्ली परिवहन निगम और दिल्ली सरकार दोनों चुप हैं। 23 मार्च के विरोध प्रदर्शन में इन दोनों मांगों को प्रमुखता से डीटीसी प्रबंधन के समक्ष रखा गया। इसके अलावा डिम्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट संवाहकों को डीटीसी में नियुक्ति देने के साथ-साथ, स्टाफ बस पुनः चालू करने, डीटीसी कॉलोनी को खाली करने का नोटिस वापस लेने इत्यादि मांगों पर यूनियन के द्वारा डीटीसी प्रबंधन और दिल्ली सरकार को मांग-पत्र भी सौंपा गया।
कार्यक्रम के दौरान यूनियन के द्वारा निम्नलिखित मांगों के साथ मांग-पत्र सौंपा गया –
1. डीटीसी के कॉन्ट्रैक्ट चालकों की नंदनगरी में इलेक्ट्रिक व्हीकल के सम्बन्ध में हुई ट्रेनिंग के बावजूद, डीटीसी उन्हें इलेक्ट्रिक बसों में चालक के रूप में ड्यूटी नहीं दे रही। इसके विपरीत डीटीसी प्रबंधन द्वारा कॉन्ट्रैक्ट चालकों को अब संवाहक की ट्रेनिंग देने की बात कही जा रही है। अतः इलेक्ट्रिक बसों के संचालन में आउटसोर्स/बाहर से चालक लाना बंद किया जाए और डीटीसी के अनुभवी चालकों से ही इलेक्ट्रिक बस में चालक की ड्यूटी ली जाए।
2. डीटीसी के निजीकरण पर रोक लगाई जाए। डीटीसी प्रबंधन, प्राइवेट कंपनियों के ऊपर सरकारी पैसा बहाना बंद करे। डीटीसी की अपनी बसों की संख्या कम से कम 11,000 की जाए।
3. सभी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को पक्का किया जाए और समान काम का समान वेतन लागू हो। लम्बे समय से कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों की इन दो मांगों को यूनियन द्वारा उठाया जाता रहा है – परन्तु डीटीसी प्रबंधन ने हमेशा कोई न कोई बहाना बनाकर इन मांगों को मानने से इनकार किया है। यह सरासर गलत है। अतः डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर डीटीसी प्रबंधन और दिल्ली सरकार को जल्द से जल्द कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को पक्का करने और पक्का होने तक समान काम समान वेतन देने की मांग करती है।
4. डिम्ट्स के संवाहकों की जगह डीटीसी के चालकों को संवाहक बनाना सरासर गलत है। एक कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी की जगह दूसरे कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को काम पर रखना कानून के हिसाब से भी ठीक नहीं है। अतः हम ये मांग करते हैं कि किसी भी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी की नौकरी नहीं छीनी जाए और डिम्ट्स के सभी कॉन्ट्रैक्ट संवाहकों को डीटीसी में नियुक्ति दी जाए।
5. टर्मिनेट किये हुए कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को बिना किसी इन्क्वायरी के काम से निकाला जा रहा है। ज़्यादातर कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों द्वारा दिए जा रहे स्पष्टीकरण को ‘असंतोषजनक’ बताकर सीधे खारिज कर दिया जा रहा है। यह न सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के अधिकारों का हनन है बल्कि गैरकानूनी भी है। अतः किसी भी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को बिना निष्पक्ष इन्क्वायरी का मौका दिए किसी प्रकार की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए।
6. सभी सेवानिवृत कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को ग्रेच्युटी का भुगतान सुनिश्चित किया जाए।
7. स्टाफ बसों के सम्बन्ध में भी प्रबंधन द्वारा दिए गए आश्वासन के बावजूद स्टाफ बसों को चालू नहीं किया गया है। अतः स्टाफ बसों को जल्द से जल्द पुनः चलाया जाए। डीटीसी में सफाई का काम करने वाले कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को पूरी दिहाड़ी का भी भुगतान नहीं किया जा रहा – सफाई कर्मचारियों को पूरे वेतन का भुगतान किया जाए।
8. डीटीसी कॉलोनी को खाली करने का नोटिस वापस लिया जाए। कर्मचारियों से उनके आवास के अधिकार को छीनना बंद किया जाए।
आम आदमी पार्टी के सत्ता में रहने के दौरान दिल्ली सरकार के मौजूदा श्रम मंत्री कपिल मिश्रा और फ़िलहाल उत्तर पूर्वी दिल्ली के सांसद मनोज तिवारी दोनों ही डीटीसी कर्मचारियों के मुद्दों के ऊपर तरह-तरह की बयानबाजी करते थे। आज जब दिल्ली में ट्रिपल-इंजन की सरकार विराजमान है – तो दोनों ही भाजपा नेता डीटीसी कर्मचारियों पूरी तरह से भूल गए हैं। अब जब सरकार में रहते हुए इन नेताओं को कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को पक्का करने का पूरा अधिकार है, तब भाजपा के नेता ऐसे ही गायब हो गए हैं जैसे कभी केजरीवाल और सौरभ भारद्वाज डीटीसी कर्मचारियों को बेवक़ूफ़ बनाकर गायब हो गए थे।
धर्म-संप्रदाय के नाम पर लोगों के बीच ज़हर घोलकर राज करने के अलावा, शायद ही भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र और दिल्ली की सरकारें मजदूरों के बारे में सोचती हैं। बहुत समझाने के बाद भी जो कॉन्ट्रैक्ट और पक्के कर्मचारी इनसे उम्मीद लगाए बैठे हैं, उन्हें समझ लेना होगा कि 29 अत्यंत ज़रूरी श्रम कानूनों को ख़त्म करके 4 मजदूर-विरोधी लेबर कोड लाने वाली भाजपा सरकार कम से कम मजदूर के हित की बात तो नहीं कर सकती है।
इन लेबर कोड कानूनों के आने के बाद ‘फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट’ कानूनी होगा – मतलब की कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी जीवन भर कॉन्ट्रैक्ट प्रथा के चलते गुलामी जैसे हालातों में ड्यूटी करने को मजबूर होंगे। केंद्र सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट लेबर ऐक्ट, मिनिमम वेजेस ऐक्ट, इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट ऐक्ट समेत 29 जरूरी श्रम कानूनों को खत्म करके चार नए कानून लागू करने की घोषणा कर दी है। इन चार नए लेबर कोड कानूनों के लागू होने के बाद कच्चे कर्मचारियों के लिए कोर्ट/ट्रिब्यूनल से राहत मिल पाना और कठिन हो जाएगा। हड़ताल करना और यूनियन बनाना - दोनों ही चीजें कानूनी रूप से मुश्किल हो जाएंगी।
आये दिन कभी बस मार्शल, कभी मोहल्ला क्लीनिक के कर्मचारी तो कभी डिम्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट संवाहकों की छटनी की खबरें आप सभी ने सुनी होगी। डिम्ट्स के कॉन्ट्रैक्ट संवाहक लगातार अवैध छटनी के खिलाफ आवाज़ उठा रहे हैं – इससे पहले मोहल्ला क्लिनिक के कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी और बस मार्शल उठा रहे थे। आनेवाले दिनों में जब नए लेबर कोड क़ानून लागू हो जाएंगे तो ऐसी छटनी की घटनाएं और ज्यादा घटित होने लगेंगी। ऐसे में डीटीसी के सभी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को कमर कस लेने की ज़रुरत है – आने वाला कल काफी मुश्किल होने वाला है परंतु यदि हम एकता बनाकर संघर्ष करेंगे तो निश्चित रूप से हमारी जीत होगी।
पानीपत से लेकर सूरत और सिंगरौली इत्यादि जगहों पर जिस तरह से कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे कर्मचारियों ने 12 घंटे के काम, कम मजदूरी और हर रोज़ होनेवाले शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई है, वो भविष्य के संघर्षों की एक झलक मात्र है। भारी महंगाई और बेरोज़गारी के डर के बीच काम करने वाले कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी निश्चित तौर पर पूरी डीटीसी के अन्दर एक सशक्त आन्दोलन खड़ा करेंगे। कार्यक्रम में आनेवाले सभी डीटीसी और डिम्ट्स कर्मचारियों का धन्यवाद।
- पुरुषोत्तम कुमार ओझा
कार्यकारी अध्यक्ष
डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर
- नरेश कुमार
महासचिव
डीटीसी वर्कर्स यूनिटी सेंटर