06/08/2026
छः साल पहले जब पहली बार बाबा से मिला था, तब वो सिर्फ़ एक हाथ रिक्शा चलाने वाले बुज़ुर्ग नहीं थे। वो मेहनत की एक ऐसी मिसाल थे, जिन्होंने पूरी ज़िन्दगी किसी इंसान का नहीं, बल्कि अपने रिक्शे का सहारा लेकर काट दी।
उनका परिवार भी वही था, उनका साथी भी वही था
उनकी रोज़ी भी वही था और उनकी पूरी दुनिया भी वही थी।
फिर एक दिन वो रिक्शा चोरी हो गया।
जिसने सिर्फ़ उनका रोज़गार नहीं छीना, बल्कि उनकी पूरी दुनिया उनसे छीन ली।
उस दिन बाबा को रोते देखा था…
और आज भी वो दृश्य भूल नहीं पाया।
तब मैंने मन ही मन एक वादा किया था कि बाबा को फिर से उनका सहारा वापस दिलाऊँगा।
भगवान ने साथ दिया, आप सबका प्यार मिला और वो वादा भी पूरा हो गया।
लेकिन उस दिन एक वादा अधूरा रह गया था…
एक एंड्रॉयड फ़ोन देने का, उससे उनको अकेलापन महसूस नहीं होता था, यूट्यूब पर पुरानी फ़िल्में देख लेते थे, गाने सुन लेते थे और मुझसे वीडियो कॉल पर बात भी कर लेते थे।
जो उस समय किसी कारण से पूरा नहीं कर पाया था।
शायद कुछ वादों का भी अपना एक समय होता है।
इस बार जब जयपुर आया, तो सबसे पहले बाबा से मिलने गया, उन्हें देखा तो वही पुरानी मुस्कान…
वही अपनापन…
वही सादगी…
बस उम्र थोड़ी और बढ़ गई है।
मैंने उनके हाथ में एंड्रॉयड फ़ोन रखा।
हमने साथ बैठकर बातें कीं।
पुरानी यादें ताज़ा कीं।
फ़ोन चलाना भी थोड़ा-थोड़ा सिखाया।
और फिर एक तस्वीर खिंचवाई…
शायद ये तस्वीर सिर्फ़ दो लोगों की नहीं है।
ये तस्वीर छः साल से निभाए जा रहे भरोसे की है।
आज भी जब बाबा से मिलता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे अपने किसी बहुत क़रीबी इंसान से मिल रहा हूँ।
और जब वापस लौटता हूँ तो दिल में हमेशा एक अजीब-सी कमी रह जाती है…
जैसे कुछ अपना वहीं पीछे छूट गया हो।
लोग अक्सर पूछते हैं कि सेवा करने से क्या मिलता है?
अगर कभी इसका जवाब देना पड़ा…
तो शायद मैं यही तस्वीर दिखा दूँगा।
क्योंकि कुछ मुस्कुराहटों की कोई कीमत नहीं होती…
कुछ रिश्तों का कोई नाम नहीं होता…
और कुछ दुआएँ ऐसी होती हैं जो सीधे दिल से निकलकर ऊपर तक पहुँच जाती हैं।
दुआ कीजिए…
बाबा हमेशा ऐसे ही मुस्कुराते रहें।