प्राकृतिक संपदा

प्राकृतिक संपदा प्राकृतिक संपदा वे संसाधन हैं जो प्रकृति से प्राप्त होते हैं और मानव जीवन के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

प्रभा देवी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, और ना इन्हें अपनी जन्मतिथि मालूम है; लेकिन भविष्य की पीढ़ियों के लिए पेड़ महत्वपूर्ण हैं,...
26/08/2025

प्रभा देवी पढ़ी-लिखी नहीं हैं, और ना इन्हें अपनी जन्मतिथि मालूम है; लेकिन भविष्य की पीढ़ियों के लिए पेड़ महत्वपूर्ण हैं, यह उनसे बेहतर कोई नहीं जानता। 76 साल की उम्र में प्रभा देवी ने उत्तराखंड के अपने गाँव में अकेले ही एक पूरा जंगल खड़ा कर दिया।

उनके इस जंगल में विभिन्न प्रजातियों के 500 से ज़्यादा पेड़, जैसे ओक, रोडोडेंड्रोन (एक प्रकार की सदाबहार झाड़ी जिसके फूल बड़े होते हैं), दालचीनी, सोप नट (रीठा) वगैरह शामिल हैं। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के पालशत गाँव की रहने वाली प्रभा ने सालों पहले इस अभियान की शुरुआत की थी, और अपनी पूरी ज़िंदगी पेड़ लगाने के लिए समर्पित कर दी।

"मेरे परिवार के पास ज़मीन का एक छोटा टुकड़ा था जिसे ऐसे ही छोड़ दिया गया था, उस पर खेती नहीं होती थी। मैंने उस ज़मीन पर और अपने घर के आसपास पेड़ लगाना शुरू कर दिया। अब, यह घने जंगल में बदल गया है, और मेरा लक्ष्य बंजर भूमि पर ज़्यादा से ज़्यादा पेड़ लगाना है।” - प्रभा देवी

प्रभा देवी की 16 साल की कम उम्र में ही शादी हो गई थी और उन्हें कोई शिक्षा भी नहीं मिली। आज भले ही वह शिक्षित न हों, लेकिन पेड़ों की देखभाल करने के तरीके पर उनके पास अथाह ज्ञान है। वृक्षारोपण के सभी तरीकों को खुद से सीखकर, वह इलाके की परिस्थितियों के हिसाब से पेड़ लगाती हैं और पेड़ के विकास के लिए क्या करना है, सब जानती हैं।

उनके प्रयासों के चलते प्रभा देवी को "Friend of Trees" के नाम से जाना जाता है।

उनके बच्चे आज बड़े शहरों में रहते हैं, लेकिन वह गाँव को छोड़कर जाने के लिए तैयार नहीं हैं और अपने तरीके से पर्यावरण को बचाने में लगी हैं।

26/08/2025
23/08/2025

तीन औषधियों का ये मिश्रण इन 18 असाध्य रोगों का काल है., बुढ़ापे में भी रहेगी जवानी ...।।,,,।।।

बार बार रोगी उपचार हेतु एलोपैथिक चिकित्सक के पास जाता है. एलोपैथिक उपचार करवाने पर भी जब उसे स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं दिखता, वह आयुर्वेदिक उपचार की ओर मुडता है।आयुर्वेदिक उपचार करवाने के उपरांत रोगी को रोग ठीक होने का भान होता है।

तब वह यह विचार करने लगता है, कि अच्छा होता यदि मैं आरंभ से ही आयुर्वेदिक उपचार करवाता।

इसलिए ऐसा ना हो तथा हानिकारक दुष्प्रभावों से बचने के लिए, रोग के आरंभ में ही आयुर्वेदिक उपचार करवाना आवश्यक है।


इन 3 औषधियों की बहुत उपयोगी दवा बनाने के लिए आवश्यक सामग्री :

250 ग्राम मैथीदाना

100 ग्राम अजवाईन

50 ग्राम काली जीरी (ज्यादा जानकारी के लिए नीचे देखे)

तैयार करने का तरीका :

उपरोक्त तीनो चीजों को साफ-सुथरा करके हल्का-हल्का सेंकना(ज्यादा सेंकना नहीं) तीनों को अच्छी तरह मिक्स करके मिक्सर में पावडर बनाकर कांच की शीशी या बरनी में भर लेवें।

औषधि को सेवन करने का तरीका,,,,,

रात्रि को सोते समय एक चम्मच पावडर एक गिलास पूरा कुन-कुना पानी (हल्का गर्म) के साथ लेना है। गरम पानी के साथ ही लेना अत्यंत आवश्यक है लेने के बाद कुछ भी खाना पीना नहीं है। यह चूर्ण सभी उम्र के व्यक्ति ले सकतें है।

चूर्ण रोज-रोज लेने से शरीर के कोने-कोने में जमा पडी गंदगी (कचरा) मल और पेशाब द्वारा बाहर निकल जाएगी । पूरा फायदा तो 80-90 दिन में महसूस करेगें, जब फालतू चरबी गल जाएगी, नया शुद्ध खून का संचार होगा। चमड़ी की झुर्रियाॅ अपने आप दूर हो जाएगी। शरीर तेजस्वी, स्फूर्तिवाला व सुंदर बन जायेगा ।

इन 18 रोगों में फायदेमंद है,,,,

गठिया दूर होगा और गठिया जैसा जिद्दी रोग दूर हो जायेगा।

हड्डियाँ मजबूत होगी।

आँखों रौशनी बढ़ेगी।

बालों का विकास होगा।

पुरानी कब्जियत से हमेशा के लिए मुक्ति।

शरीर में खुन दौड़ने लगेगा।

कफ से मुक्ति।

हृदय की कार्य क्षमता बढ़ेगी।

थकान नहीं रहेगी, घोड़े की तहर दौड़ते जाएगें।

स्मरण शक्ति बढ़ेगी।

स्त्री का शरीर शादी के बाद बेडोल की जगह सुंदर बनेगा।

कान का बहरापन दूर होगा।

भूतकाल में जो एलाॅपेथी दवा का साईड इफेक्ट से मुक्त होगें।

खून में सफाई और शुद्धता बढ़ेगी।

शरीर की सभी खून की नलिकाएं शुद्ध हो जाएगी।

दांत मजबूत बनेगा, इनेमल जींवत रहेगा।

शारीरिक कमजोरी दूर तो मर्दाना ताक़त बढ़ेगी।

डायबिटिज काबू में रहेगी, डायबिटीज की जो दवा लेते है वह चालू रखना है। इस चूर्ण का असर दो माह लेने के बाद से दिखने लगेगा।

जिंदगी निरोग,आनंददायक, चिंता रहित स्फूर्ति दायक और आयुष्यवर्धक बनेगी। जीवन जीने योग्य बनेगा।

कृपया ध्यान दे :

कुछ लोग कलौंजी को काली जीरी समझ रहे है जो कि गलत है काली जीरी अलग होती है जो आपको पंसारी या आयुर्वेद की दुकान से मिल जाएगी, यह स्वाद में हल्की कड़वी होती है, नीचे जो फोटो है वो कालीजीरी (Purple Fleabane) का है, जिसका नाम अलग-अलग भाषाओं में कुछ इस तरह से है।

हिन्दी कालीजीरी, करजीरा।

संस्कृत अरण्यजीरक, कटुजीरक, बृहस्पाती।

मराठी कडूकारेलें, कडूजीरें।

गुजराती कडबुंजीरू, कालीजीरी।

बंगाली बनजीरा।

अंग्रेजी पर्पल फ्लीबेन

कालीजीरी -

कालीजीरी को आयुर्वेद में सोमराजि, सोमराज, वनजीरक, तिक्तजीरक, अरण्यजीरक, कृष्णफल आदि नाम से जानते हैं। हिंदी भाषा में इसे कालीजीरी, बाकची और बंगाल में सोमराजी कहते हैं।

कालीजीरी किसी भी तरह के जीरे से अलग है। इंग्लिश में इसे पर्पल फ़्लीबेन कहते हैं पर यह कलोंजी Nigella sativa से बिल्कुल भिन्न है। कलोंजी को भी इंग्लिश में ब्लैक क्यूमिन ही कहते है। इसी प्रकार बाकची, या सोमराजी एक और पौधे के बीज को, सोरेला कोरीलिफ़ोलिया (Psoralea corylifolia) को कहते है।

आयुर्वेद के बहुत से विशेषज्ञ सोरेला कोरीलिफ़ोलिया को ही बावची या सोमराजी मानते हैं पर बंगाल में कालीजीरी को सोमराजी नाम से जानते और प्रयोग करते हैं।

कालीजीरी स्वाद में कड़वा और तेज गंद्ध वाला होता है, इसलिए इसे किसी भी तरह के भोजन बनाने में प्रयोग नहीं किया जाता। इसको केवल एक दवा की तरह ही प्रयोग किया जाता है। लैटिन में इसका नाम, सेंट्राथरम ऐनथेलमिंटिकम या वरनोनिया ऐनथेलमिंटिकम है।

इसके वैज्ञानिक नाम में 'ऐनथेलमिंटिकम' इसके प्रमुख आयुर्वेदिक प्रयोग को बताता है। ऐनथेलमिंटिकम का मतलब है, शरीर से परजीवियों को नष्ट करने वाला। आयुर्वेद में इसे कृमिनाशक की तरह प्रयोग किया जाता है।

इसका सेवन और बाह्य प्रयोग चर्म रोगों के इलाज, जैसे की श्वित्र (leukoderma) सफ़ेद दाग, खुजली, एक्जिमा, आदि। इसे सांप या बिच्छु के काटे पर भी लगाते हैं। कालीजीरी का क्षुप, पूरे देश में परती जमीन पर पाया जाता है। इसके पत्ते शल्याकृति किनारेदार होते हैं। बारिश के मौसम के बाद इसमें मंजरी निकलती है। जिसमे काले बीज आते है।

काली जीरी आकार में छोटी और स्वाद में तेज, तीखी होती है। इसका फल कडुवा होता है। यह पौष्टिक एवं उष्ण वीर्य होता है। यह कफ, वात को नष्ट करती है और मन व मस्तिष्क को उत्तेजित करती है। इसके प्रयोग से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं और खून साफ होता है। त्वचा की खुजली और उल्टी में भी इसका प्रयोग लाभप्रद होता है।

यह त्वचा के रोगों को दूर करता है, पेशाब को लाता है एवं गर्भाशय को साफ व स्वस्थ बनाता है। यह सफेद दाग (कुष्ठ) को दूर करने वाली, घाव और बुखार को नष्ट करने वाली होती है। सांप या अन्य विषैले जीव के डंक लगने पर भी इसका प्रयोग लाभकारी होता है।

कालीजीरी के 13 फायदे :

यह कृमिनाशक और विरेचक है।

यह गर्म तासीर के कारण श्वास, कफ रोगों को दूर करती है।

मूत्रल होने के कारण यह मूत्राशय, की दिक्कतों और ब्लड प्रेशर को कम करती है।

यह हिचकी को दूर करती है।

यह एंटीसेप्टिक है चमड़ी की बिमारियों जैसे की खुजली, सूजन, घाव, सफ़ेद रोग, आदि सभी में बाह्य रूप से लगाई जाती है।

जंतुघ्न होने के कारण शरीर के सभी प्रकार के परजीवियों को दूर करती है।

काली जीरी को चमड़ी के रोगों में नीम के काढ़े के साथ मालिश या खादिर के काढ़े के आंतरिक प्रयोग के साथ करना चाहिए।

भयंकर चमड़ी रोगों में, काली जीरी + काले तिल बराबर की मात्रा में लेकर, पीस कर 4 ग्राम की मात्रा में सुबह, एक्सरसाइज की बाद पसीना आना पर लेना चाहिए। ऐसा साल भर करना चाहिए।

श्वेत कुष्ठ जिसे सफ़ेद दागभी कहते है, उसमे चार भाग काले जीरी और एक भाग हरताल को गोमूत्र में पीसकर प्रभावित स्थान पर लगाना चाहिए। इसी को काले तिलों के साथ खाने को भी कहा गया है। (भैषज्य रत्नावली)

पाइल्स या बवासीर में, 5 ग्राम कालाजीरालेकर उसमे से आधा भून कर और आधा कच्चा पीसकर, पाउडर बनाकर तीन हस्से कर के दिन में तीन बार खाने से दोनों तरह की बवासीर खूनी और बादी में लाभ होता है।

पेट के कीड़ों में इसके तीन ग्राम पाउडर को अरंडी के तेल के साथ लेना चाहिए।

खुजली में, सोमराजी + कासमर्द + पंवाड़ के बीज + हल्दी + दारुहल्दी + सेंधा नमक को बराबर मात्रा में मिलकर, कांजी में पीसकर लेप लगाने से कंडू, कच्छु (खुजली) आदि दूर होते हैं।

कुष्ठ में, कालीजीरी + वायविडंग + सेंधानमक + सरसों + करंज + हल्दी को गोमूत्र में पीस कर लगना चाहिए।

कालीजीरी के सेवन की मात्रा :

इसको 1-3 ग्राम की मात्रा में लें। इससे अधिक मात्रा प्रयोग न करें।

आवश्यक सावधानियाँ :

कृमिनाशक की तरह प्रयोग करते समय किसी विरेचक का प्रयोग करना चाहिए।

कालीजीरी के प्रयोग में सावधानियां

यह बहुत उष्ण-उग्र दवा है।

गर्भावस्था में इसे प्रयोग न करें।

यह वमनकारक है।

अधिक मात्रा में इसका सेवन आँतों को नुकसान पहुंचाता है।

यदि इसके प्रयोग के बाद साइड इफ़ेक्ट हों तो गाय का दूध / ताजे आंवले का रस / आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए।।।।।।

गर कोई आसपास आयुर्वेदिक का जानकर हो तो उसके मार्गदर्शन में इस्तेमाल करिए आपको सौ प्रतिशत लाभ मिलेगा,,,

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Wishing you a happy independence day as we celebrate our nation's freedom amidst nature's beauty.
15/08/2025

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 #कचरी/ककड़ी हेल्दी रहने के लिए आज हम आपको एक ऐसी सब्जी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे राजस्थानी और गुजराती डिशेज मे...
07/08/2025

#कचरी/ककड़ी

हेल्दी रहने के लिए आज हम आपको एक ऐसी सब्जी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे राजस्थानी और गुजराती डिशेज में मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

जी हां, हम कचरी के बारे में बात कर रहे हैं। इसे आप सब्‍जी और मसाले के रूप में इस्‍तेमाल कर सकते है। साथ ही, आप कचरी से कई तरह की डिशेज भी बना सकते हैं। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इसके कई स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी हैं।

विभिन्न नाम-

वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार कचरी का पौधा 'कुकुरबिटेसी’ कुल के अन्तर्गत आता है। संस्कृत में कचरी को चित्रकला, मृगाक्षी, चिभट इत्यादि नामों से सम्बोधित किया जाता है। हिन्दी में भी इसके आँचलिकता के आधार पर विविध नाम हो जाते हैं जैसे-काचर, कचरिया, सेंधा, पेंहटा, गुराड़ी, ककड़ी। मारवाड़ी में कचरी को काचरी तथा सेंध कहा जाता है। पंजाबी में चिम्भड़, मराठी में टकमके, रौंदणी, चिभूड़ बंगला में बनगोमुक, कुन्दुरुकी फुटी नामों से कचरी को जाना जाता है। अंग्रेजी भाषा में इसे ककुम्बर, प्युबेसेन्ट तथा लेटिन में क्युक्युमिस-प्युबेसेन्ट कहा जाता है। चूँकि कचरी को गोपालक (ग्वाले) बहुत खाया करते हैं, इसलिए कचरी का एक अन्य नाम ‘गोपाल कर्कटी’ भी है।

आयुर्वेदिक के अनुसार-

कचरी में अनेक औषधीय गुण होते हैं। आयुर्वेदीय शास्त्रों ने इसे कर्कटी वर्ग की वनौषधि माना है। आयुर्वेदीय ग्रंथों के अनुसार कचरी की बेल खीरे जैसी होती है, किन्तु उससे लम्बाई में कुछ छोटी होती है। इसके पत्ते छोटे तथा चार इंच तक लम्बे तथा छह इंच तक चौड़े, नरम तथा कोमल होते हैं। आकार में बिलकुल ककड़ी के पत्तों जैसे ही होते हैं। कचरी की बेल में छोटे-छोटे पीले रंग के खूबसूरत फूल लगते हैं। भाद्रपद मास में छोटे-छोटे लम्बे-गोल फल लगने लगते हैं। यही फल कचरी कहलाते हैं। कचरी को आयुर्वेद में मृगाक्षी कहा जाता है और काचरी बिगड़े हुए जुकाम, पित्‍त, कफ, कब्‍ज, परमेह सहित कई रोगों में बेहतरीन दवा मानी गई है। प्रसिद्ध आयुर्वेदीय ग्रंथ ‘राज-निघंटु’ में कचरी का वर्णन करते हुए बताया गया है कि यह एवं तिक्तरंस वाली, विपाक में अम्ल वातनाशक पित्तकारक तथा पुराने बिगड़े हुए जुकाम को कम करने वाली दीपन तथा उत्तम रुचिकारक है।

इसमें भूख बढ़ाने वाले गुण होते हैं। कचरी को भोजन में शामिल करने या साइड डिश के रूप में इसे खाने से भूख बढ़ती है। इसके अलावा, कचरी में पाए जाने वाले पोषक तत्व और फाइबर आपके डाइजेस्टिव सिस्‍टम को हेल्‍दी रखते हैं। यह आपको भोजन पचाने में मदद करता है और अपच, गैस, और कब्‍ज की समस्‍याओं को कम करता है।

#त्वचा के लिए फायदेमदं -
कचरी एक टॉनिक, शीतलन एजेंट और एक उत्तेजक के रूप में काम करता है, विशेष रूप से जठरांत्र संबंधी मुद्दों के लिए यह काफी फायदेमंद होती है। लेकिन इसके अलावा, पाउडर का नियमित उपयोग फोड़े, खुजली जैसे मामूली त्वचा के मुद्दों को ठीक करने के लिए किया जाता है।

#भूख को बढ़ाने में मदद -
कुछ लोगों को खाने की इच्‍छा कम करती है और वह जंक-फूड की ओर, तो जाते हैं लेकिन हेल्‍दी खाना खाने को नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे लोगों के लिए कचरी काफी फायदेमंद है। यह आपकी भूख बढ़ाने में मदद करती है। कचरी मारवाड़ी व्यंजनों में भी लोकप्रिय है, इसका अमचूर पाउडर के विकल्प के रूप में इस्‍तेमाल किया जा सकता है।

सावधानी और घरेलू प्रयोग-

पकी कचरी को सीधे ही, बिना सब्जी बनाए ज्यादा खा लेने से मुँह में छाले हो जाते हैं तथा जीभ कट-फट जाती है। कुछ लोगों को इससे बुखार भी आ जाता है। बड़ी कचरी के बीज को माशे की मात्रा में लेकर, चावल के धोवन के साथ पीसकर छानकर उसमें थोड़ा लाल-चन्दन घिसकर मिलाए। पेशाब की कठिनाई वाले रोगों को पिलाने से पेशाब खुलकर आने लगता है। कच्ची कचरी का साग दस्तों में उपयोगी माना जाता है। तम्बाकू का सेवन करने वालों के लिए भी कचरी लाभप्रद है। सुखाई हुई कचरियाँ रुचिकारक, दीपन, दस्तावर तथा भोजन में अरुचि, पेट के कीड़ों, जड़ता इत्यादि के दूर करने वाली होती हैं।

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#कचरी #वृक्षलगाओवृक्षबचाओ

आप को लगेगा अजीब बकवास है, किन्तु यह सत्य है👉🏻पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजॉर्बर है, बरगद 80% और नीम 75 % ।इसके बद...
30/07/2025

आप को लगेगा अजीब बकवास है, किन्तु यह सत्य है👉🏻

पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड का 100% एबजॉर्बर है, बरगद 80% और नीम 75 % ।

इसके बदले लोगों ने विदेशी यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया, जो जमीन को जल विहीन कर देता है...

आज हर जगह यूकेलिप्टस, गुलमोहर और अन्य सजावटी पेड़ो ने ले ली है ।

अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नहीं रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही, और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही ।

हर 500 मीटर की दूरी पर एक पीपल का पेड़ लगायें,
तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त भारत होगा । 🌳

वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए ।

पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है, जिसकी वजह शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं ।

वैसे भी पीपल को वृक्षों का राजा कहते है ।
इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए ।

मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु, सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम, वृक्षराज नमस्तुते।।

अब करने योग्य कार्य ।

इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगाने के लिए समाज में जागरूकता बढ़ायें ।
बाग बगीचे बनाइये, पेड़ पौधे लगाइये, बगीचों को फालतू के खेल का मैदान मत बनाइये.. जैसे मनुष्य को हवा के साथ पानी की जरूरत है, वैसे ही पेड़ पौधों को भी हवा के साथ पानी की जरूरत है ।

बरगद एक लगाइये, पीपल रोपें पाँच।
घर घर नीम लगाइये, यही पुरातन साँच।।

यही पुरातन साँच, आज सब मान रहे हैं।
भाग जाय प्रदूषण सभी अब जान रहे हैं ।।

विश्वताप मिट जाये, होय हर जन मन गदगद।
धरती पर त्रिदेव हैं, नीम पीपल और बरगद।।

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