26/01/2026
UGC विनियम 2026: समता के नाम पर विश्वविद्यालयों का पुनर्गठन या पहचान की राजनीति?
भारतीय विश्वविद्यालय केवल पढ़ाई के केंद्र नहीं होते, वे संवाद, असहमति, बौद्धिक स्वतंत्रता और समान नागरिकता की प्रयोगशालाएँ होते हैं। लेकिन हाल में प्रस्तावित UGC विनियम 2026 क्या वास्तव में उच्च शिक्षा में समता और समावेशन को मज़बूत करेगा, या फिर वह संस्थानों को पहचान-आधारित ढाँचों में बाँट देगा?
नई नीति का दावा है कि वह भेदभाव मिटाएगी। लेकिन सवाल यह है — क्या व्यक्ति को एक स्वतंत्र नागरिक की तरह देखने के बजाय पहले धर्म, जाति, लिंग, नस्ल और दिव्यांगता जैसी श्रेणियों में बाँटना वास्तव में समता की दिशा है?
प्रसिद्ध लेखक प्रो. आनन्द पाटील अपने इस विचारोत्तेजक लेख में बताते हैं कि कैसे ‘समता’ के नाम पर बना यह ढाँचा विश्वविद्यालयों को संवाद के केंद्र से निगरानी तंत्र में बदल सकता है। लेख यह भी प्रश्न उठाता है कि कहीं अकादमिक स्वतंत्रता, वैचारिक असहमति और मुक्त विमर्श शिकायत-संस्कृति और आत्म-सेंसरशिप में तो नहीं बदल रहे।
इस विश्लेषण में आप पढ़ेंगे:
👉 पहचान-आधारित व्यवस्था विश्वविद्यालयों की आत्मा को कैसे प्रभावित कर सकती है।
👉 क्यों ‘समान नागरिकता’ की जगह ‘श्रेणी पहचान’ को प्राथमिकता दी जा रही है।
👉 UGC विनियम अकादमिक स्वतंत्रता के लिए क्या चुनौतियाँ खड़ी करते हैं।
👉 क्या उच्च शिक्षा संस्थान धीरे-धीरे निगरानी और नियंत्रण के केंद्र बनते जा रहे हैं।
👉 समाज और विश्वविद्यालयों के भविष्य पर इसके दूरगामी प्रभाव।
समता का अर्थ विभाजन नहीं, संवाद है। क्या आप मानते हैं कि नई नीति इस भावना को मज़बूत करती है या कमजोर?
✍ प्रो. आनन्द पाटील
(केन्द्रीय विश्वविद्यालयीन व्यवस्था में कई निर्णायक प्रशासनिक पदों पर कार्यरत रहे हैं)
पूरा लेख पढ़ने के लिए लिंक हमने नीचे कमेंट में दिया है 👇
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