30/05/2026
भारत में पत्रकारिता के 246 साल पूरे हुए हैं। जबकि हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्ष आज 30 मई, 2026 को पूरे हो रहे हैं। यह व्यापक फलक की यात्रा है, परंतु सबसे न्यारी। इसमें सुख-सुविधाएँ भले ही दिवा स्वप्न रहीं, लेकिन दायित्व बोध का परम संतोष संभव है। क्योंकि इसमें संकल्प है। संघर्ष है। समर्पण है। ध्येय-निष्ठा है। लगन है। त्याग है। मुश्किलों और मुसीबतों को न्योता है। नीति पथ पर अडिग रहने के पुरस्कार भी हैं - प्रताड़ना, जेल, जब्ती, जुर्माना, छापे, हत्या तक। इन 200 वर्षों में से 125 वर्ष का कालखण्ड उपर्युक्त अनुभवों का समुच्चय है। दावा यह नहीं है कि सभी पत्र और संपादक सेनानी थे। परंतु उनकी संख्या कम भी नहीं रही है। यही कारण है कि 1826 से 1947 तक की अवधि को मिशनरी पत्रकारिता का युग माना जाता है। यह केवल हिन्दी पत्रकारिता की बात नहीं है, बल्कि समूची भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता इसी अनुभव से गुजरी है। यह धारणा भी सही नहीं है कि मिशनरी पत्रकारिता का तात्पर्य केवल नवजागरण आंदोलन या आजादी की लड़ाई तक सीमित समझा जाए। निस्संदेह नवजागरण आंदोलन जिसके अंतर्गत स्वाधीनता आंदोलन, समाज सुधार, स्वदेशी और स्वावलंबन तथा शिक्षा के दरवाजे सभी के लिए खोलने के महान संकल्प सम्मिलित थे; उनका ऐतिहासिक महत्व है। यह भी ध्यान रखना होगा कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के नए आविष्कारों और नवाचारों को उस युग की पत्रकारिता ने पर्याप्त महत्व दिया। कृषि, विज्ञान, अर्थ और वाणिज्य, कला, साहित्य और संस्कृति, पुरातत्व और इतिहास, वैश्विक परिदृश्य और उथल-पुथल---अर्थात मनुष्य और प्रकृति से संबंधित सभी विषयों का समावेश हिन्दी पत्रकारिता में रहा है।