08/08/2026
वीरांगना तीलू रौतेली
उत्तराखंड की वीर नारी
तीलू रौतेली गढ़वाल की प्रसिद्ध वीरांगना और लोकनायिका हैं, जिन्हें उत्तराखंड में साहस, वीरता, स्वाभिमान और नारी शक्ति की प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनके जीवन की अधिकांश जानकारी लोककथाओं, लोकगीतों और बाद के ऐतिहासिक लेखन से प्राप्त होती है, इसलिए उनके जीवन की कुछ तिथियों और घटनाओं को लेकर अलग-अलग मत मिलते हैं।
प्रचलित विवरणों के अनुसार तीलू रौतेली का संबंध चौंदकोट क्षेत्र, गढ़वाल से था। उनके पिता को भूपू/भूप सिंह गोरला रावत के नाम से बताया जाता है। लोकपरंपरा के अनुसार उनके पिता और भाइयों के युद्ध में मारे जाने के बाद तीलू ने कम उम्र में ही गढ़वाल की रक्षा के लिए संघर्ष का मार्ग अपनाया।
कहा जाता है कि उन्होंने अपनी सहेलियों बेल्लु और देवली तथा अन्य सैनिकों के साथ मिलकर कत्यूरियों के विरुद्ध युद्ध किया। उनके साथ उनकी प्रिय घोड़ी बिंदुली का भी लोककथाओं में विशेष उल्लेख मिलता है। उनके संघर्ष से जुड़े प्रमुख स्थानों में खैरागढ़, उमटागढ़ी, सल्ड महादेव, कालिंका खाल और सराईखेत का उल्लेख मिलता है।
उनके विवाह के संबंध में प्रचलित कथा के अनुसार उनका संबंध भुप्पा सिंह नेगी से बताया जाता है। उनके वैवाहिक जीवन और युद्धों से संबंधित अनेक विवरण लोकपरंपरा पर आधारित हैं, इसलिए उन्हें प्रमाणित ऐतिहासिक तथ्य मानते समय सावधानी आवश्यक है।
तीलू रौतेली के जीवन का अंतिम प्रसंग भी लोककथाओं में वर्णित है। प्रचलित मान्यता के अनुसार नयार नदी के निकट उन्हें धोखे से हमला कर वीरगति दी गई। उनकी वीरता की स्मृति आज भी उत्तराखंड के लोकगीतों और लोकसंस्कृति में जीवित है।
आज तीलू रौतेली उत्तराखंड की अस्मिता, स्वाभिमान, साहस, नेतृत्व और नारी शक्ति की प्रेरणा हैं। उनके नाम पर उत्तराखंड में तीलू रौतेली पुरस्कार भी प्रदान किया जाता है, जिसके माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया जाता है।
तीलू रौतेली केवल एक नाम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की अस्मिता, स्वाभिमान और नारी शक्ति की प्रेरणा हैं।