Bhartiya Hindu Shuddhi Sabha - भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा

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Bhartiya Hindu Shuddhi Sabha - भारतीय हिन्दू शुद्धि सभा Bhartiya Hindu Shuddhi Sabha was founded by Swami Shraddhanand Ji on 13th Feb, 1923.

रफीक फिर बने राजकुमारझांसी के रक्सा क्षेत्र निवासी राज कुमार पटेरिया, जिन्होंने 2013 में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवती ...
29/09/2026

रफीक फिर बने राजकुमार

झांसी के रक्सा क्षेत्र निवासी राज कुमार पटेरिया, जिन्होंने 2013 में पश्चिम बंगाल में मुस्लिम युवती अफसरी खातून से निकाह कर इस्लाम अपनाया था, ने शनिवार को सिद्धेश्वर मंदिर में धार्मिक अनुष्ठान के बाद सहपरिवार सनातन धर्म में वापसी कर ली। हिंदू संगठनों की मौजूदगी में हवन-पूजन के बाद राज कुमार का पुराना नाम बहाल हुआ, जबकि उनकी पत्नी का नाम अनीता पटेरिया रखा गया। रिश्तेदारों द्वारा स्वीकार न किए जाने और सामाजिक दिक्कतों के चलते उन्होंने प्रशासन को शपथ पत्र देकर स्वेच्छा से धर्म वापसी की इच्छा जताई थी, जिसकी वैधानिक प्रक्रिया प्रशासनिक स्तर पर पूरी की जा रही है।

*(वर्तमान में शुद्धि ही आपकी आने वाली पुश्तों की रक्षा करने में सक्षम हैं। याद रखें आपके धार्मिक अधिकार तभी तक सुरक्षित हैं, जब तक आप बहुसंख्यक हैं। इसलिए अपने भविष्य की रक्षा के लिए शुद्धि कार्य को तन, मन, धन से सहयोग कीजिए। )
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Now this is going too far. These convert rice bags must be warned strictly, practising Hindu rituals being a Christian i...
29/09/2026

Now this is going too far. These convert rice bags must be warned strictly, practising Hindu rituals being a Christian is disrespectful and Burning a diya with a Christian symbol, this should be treated as an insult to Sanatan Dharma. Govt should make a rule. You can't have it both ways: either follow Hinduism or convert. Don't get the benefits of both, the culture you grew up in and the free ration and free stuff that comes after converting. Choose whether you'll follow the dharma your ancestors fought for to prevail, or convert for a bag of rice. But don't light our diya as a prop while mocking the faith it represents.
This should be amounting to blasphemy .

विचारणीय पंजाब में 12 साल पहले केवल 5 सिख पादरी जानकारी में थे. आज पंजाब के 12000 गांवों में65000 रजिस्टर्ड सिख पादरी है...
24/09/2026

विचारणीय
पंजाब में 12 साल पहले केवल 5 सिख पादरी जानकारी में थे.
आज पंजाब के 12000 गांवों में
65000 रजिस्टर्ड सिख पादरी हैं
300000 सिख कन्वर्ट होकर ईसाई बन चुके हैं।
कौन कह सकता था कि पग के लिये सर देने वाली महान सिक्ख कौम का कोई गुरु का सिक्ख,ईसाई भी बन सकता है!

हिंदू संन्यासी के भेष में ईसाई मिशनरी❓28 जुलाई, 1952 को प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका TIME ने एक लेख प्रकाशित की थी।‎‎लेख ...
19/09/2026

हिंदू संन्यासी के भेष में ईसाई मिशनरी❓28 जुलाई, 1952 को प्रतिष्ठित अंग्रेजी पत्रिका TIME ने एक लेख प्रकाशित की थी।
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‎लेख की शुरुआत भारत के मद्रास राज्य (आज के तमिलनाडु) के सेलम जिले की एक पहाड़ी पर बने साधारण से भवन से होती है।
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‎वहाँ 35 संन्यासी एक साथ रहते थे, प्रार्थना करते थे और तपस्वी जीवन बिताते थे। वे खुरदरे सूती कपड़ों से बने चमकीले भगवा वस्त्र पहनते थे। भोजन में केवल चावल, दाल और टैपिओका खाते थे। प्रार्थना के समय जमीन पर पालथी मारकर बैठते थे। उनके पैरों में जूते-चप्पल भी नहीं होते थे, क्योंकि भारतीय परंपरा में पवित्र स्थानों पर जूते पहनकर प्रवेश करना उचित नहीं माना जाता।
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‎पहली नज़र में कोई भी उन्हें हिंदू संन्यासी समझ बैठता।
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‎लेकिन वे न तो हिंदू थे और न ही बौद्ध।
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‎वे रोमन कैथोलिक भिक्षु थे।
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‎यह था सिलुवैगिरि (पवित्र क्रॉस पर्वत) का बेनेडिक्टाइन मठ, और उसके प्रमुख थे 43 वर्षीय डॉम फिलिप कैपनप्लाकल।
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‎फिलिप स्वयं ऐसे परिवार से आते थे जो सदियों से ईसाई था। एक पादरी होने के नाते वे भारत में ईसाई धर्म की धीमी प्रगति को लेकर चिंतित रहते थे।

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‎उनकी दृष्टि में इसका सबसे बड़ा कारण यह था कि मिशनरी भारतीयों के सामने केवल ईसाई मत के साथ यूरोपीय संस्कृति भी प्रस्तुत करते थे।
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‎फिलिप ने अपने जीवन के शुरुआती छह वर्ष बेल्जियम और इटली में बिताए थे। वहीं उन्हें यह समझने का अवसर मिला कि ईसाई धर्म और यूरोपीय संस्कृति दो अलग-अलग चीज़ें हैं।
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‎भारत लौटने के बाद उन्होंने हिंदू संस्कृति और दर्शन का गहन अध्ययन शुरू किया।
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‎जितना अधिक उन्होंने अध्ययन किया, उतना ही उन्हें लगा कि हिंदू संस्कृति के कई तत्व ईसाई आस्था के विरोध में नहीं हैं।
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‎धीरे-धीरे वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि चर्च की मिशनरी गतिविधियों की एक बड़ी कमजोरी यह है कि वह ईसाइयत को समझाने के लिए प्लेटो और अरस्तू जैसे यूनानी दार्शनिकों की अवधारणाओं का सहारा लेती है।
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‎लेकिन भारत के सामान्य लोगों के लिए, जिनकी बौद्धिक परंपरा पश्चिमी दर्शन पर आधारित नहीं थी, ऐसी भाषा अक्सर दूर की और अर्थहीन लगती थी।
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उन्होंने एक नई रणनीति पर विचार करना शुरु किया।‎फिलिप ने सोचना शुरू किया कि यदि ईसाइयत भारत में गहराई से जड़ें जमाना चाहता है, तो उसे भारतीय भाषा, भारतीय प्रतीकों और भारतीय जीवनशैली के माध्यम से व्यक्त होना होगा।
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‎इसी सोच ने उन्हें एक नए रास्ते पर ला खड़ा किया।
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‎उन्होंने कार्मेलाइट संप्रदाय छोड़कर कैथोलिक चर्च के सबसे पुराने मठवासी संगठन—बेनेडिक्टाइन ऑर्डर—को चुना। उनका विश्वास था कि सामूहिक श्रम, शिक्षा और उपदेश की उसकी परंपरा भारत में ईसाई मत की नई समझ विकसित करने के लिए सबसे उपयुक्त है।
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‎पाँच वर्ष पहले उन्होंने सेलम में मठ की स्थापना का कार्य शुरू किया। इसके बाद वे दो वर्षों के लिए यूरोप गए, जहाँ उन्होंने बेनेडिक्टाइन प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1952 में, दो बेल्जियन सहयोगियों की सहायता से, यह मठ पूर्ण रूप से कार्यरत बेनेडिक्टाइन संस्थान बन गया।
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‎हालाँकि फिलिप का विचार बिल्कुल नया नहीं था।
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‎TIME ने अपने लेख में याद दिलाया कि लगभग 300 वर्ष पहले, 1606 में, इटली के जेसुइट मिशनरी रॉबर्ट डी नोबिली ने भी दक्षिण भारत में भगवा वस्त्र धारण किए थे और हिंदू संन्यासी की तरह जीवन बिताया था। उन्होंने उच्च जाति के हिंदुओं के बीच अनेक धर्मांतरण भी किए थे, हालांकि इसके लिए उन्हें चर्च के भीतर आलोचना का सामना करना पड़ा था।
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‎फिलिप स्वयं भी भारतीयकृत ईसाई धर्म की इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहे थे।
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‎मठ में ईसाइयों को अपनी स्थानीय परंपराएँ बनाए रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। उदाहरण के लिए, ईसाई दुल्हनों को विवाह के समय पश्चिमी शैली की अंगूठी पहनाने के बजाय हिंदू रीति की तरह गले में धागा बाँधने की अनुमति दी जाती थी।
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‎TIME ने एक स्थानीय हिंदू के शब्द भी उद्धृत किए।
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‎उसने कहा—
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‎"ये हमारे जैसे संन्यासी अधिक लगते हैं। शायद इनके धर्म में भी कुछ बात है।"
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‎यही वह प्रतिक्रिया थी जिसे सुनकर डॉम फिलिप प्रसन्न होते थे।
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‎क्योंकि उनके लिए यह केवल वस्त्र बदलने का प्रयोग नहीं था।
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‎वे भारतीयों को यह समझाना चाहते थे कि ईसाई बनने के लिए जीवन शैली बदलने की जरूरत है
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‎ स्रोत: TIME Magazine, Religion: Benedict's Sanyasis (28 July 1952).
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शान्ति काली जी महाराज बलिदान दिवस 27 अगस्त पर-शान्ति काली जी महाराज का जन्म पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा के सुब्रुम जिले ...
27/08/2026

शान्ति काली जी महाराज
बलिदान दिवस 27 अगस्त पर-
शान्ति काली जी महाराज का जन्म पूर्वोत्तर भारत के त्रिपुरा के सुब्रुम जिले में हुआ, इन्होंने त्रिपुरा में मिशनरियों के ईसाई बनाने के नंगे नाच को स्वीकार करने से इंकार कर दिया . त्रिपुरा में फाल्गुन मास 1979 में शांति काली आश्रम की स्थापना की । यहाँ इन्होने सनातन धर्म से दूर हो रहे जनमानस और जनजातीय इलाकों में गरीब लोगों के लिए विद्यालय ,अस्पताल खुलवाए । इन्होंने गरीब लोगों की भरपूर मदद की ताकि जनजातीय लोग ईसाई मिशनरी के चंगुल में ना फंसे।
27 अगस्त 2000 को स्वामी जी अपने आश्रम में अपने कुछ अनुयायियों के साथ बैठे थे . वहां धर्म आदि के प्रचार और प्रसार की चर्चा चल ही रही थी कि अचानक ही उन पर मिशनरी समर्थित NLFT के आतंकियों ने हमला कर दिया . स्वामी जी का शरीर गोलियों से बिंध गया. रात 8 बजे इन पर निकट से गोलियां चलाई गई. इन्हें तत्काल होस्पिटल लेजाया गया. जहाँ रात 11 बजे इन्होने अंतिम सांस ली.
इन्हें क्यों मारा गया--
क्योंकि ये मिशनरियों के उस विष वृक्ष की जड़ खोदने में लगे हुए थे जो पूर्वोत्तर भारतीयों को उनकी संस्कृति से काटने की कोशिश कर रहा है. मिशनरी और कौमनष्ट लम्बे समय से यह बता रहे हैं कि त्रिपुरा भारत का हिस्सा नहीं है. ये उन गरीब हिन्दू वनवासियों की सहायता कर रहे थे जो मिशनरी के लिए कच्चा माल हैं. बस यही बात मिशनरियों को चुभ गई.
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वैर केवल व्यक्ति से नहीं उनके कार्यों से भी था-
ईसाई आतंकी जिनका सम्बन्ध NLFT से था यहीं नहीं रूके. उनकी हत्या के 4 महीने बाद 4 दिसम्बर 2000 को शान्ति काली आश्रम ( चाचू बाजार निकट सिद्धाई पुलिस स्टेशन) में घुस गए. इस तरह NLFT ने 11 आश्रम, स्कूल और अनाथालय बंद करवाए.
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मिडिया इस तरह की जानकारी को दबा जाता है. क्योंकि इन महान पुण्यात्माओ का कोई वोट बैंक नहीं होता इस लिए कोई सरकार कोई संस्था इनके लिए कदम नहीं उठाती. ध्यान रखिए यदि हम चुप रहे तो कल हमारी भी बारी आएगी.

‎श्री कन्हैयालाल मन्घनदास तलरेजा ‎आपका जन्म 10 अगस्त 1936 वर्त्तमान पाकिस्तान (अखण्ड-भारत) के सिन्ध प्रान्त के, सक्खर जि...
10/08/2026

‎श्री कन्हैयालाल मन्घनदास तलरेजा
‎आपका जन्म 10 अगस्त 1936 वर्त्तमान पाकिस्तान (अखण्ड-भारत) के सिन्ध प्रान्त के, सक्खर जिले के, हयात पिताफी (शादानी नगर) में हुआ था |
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‎विभाजन के बाद भी आप सिन्ध में ही 17 वर्ष रहे थे | अङ्ग्रेज़ी साहित्य में 1962 में सिन्ध यूनिवर्सिटी से MA प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया |
‎सिन्ध में ही रह कर आपने हिन्दुओं के अधिकार के लिए साहसपूर्ण संघर्ष किया लेकिन 1964 में आप भारत आ गए और श्री चाँदीभाई हिम्मतमल मनसुखानि कॉलेज - उल्लहासनगर (मुम्बई) में अंग्रेजी के प्राध्यापक के रूप में सेवाएँ दीं | निवृत्ति के बाद आप दिल्ली रहने लगे | एक विद्वान् ही नहीं एक शिक्षाविद् होने के साथ आप अच्छे लेखक, वक्ता, पत्रकार, सिद्ध-भाषाविद् (8 भाषाओं के ज्ञाता), इतिहासविद्, राजनेता और समाजसेवी भी थे | आप का अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, उर्दू, अरबी, पर्शियन, सिन्धी और पंजाबी भाषा पर अधिकार था |
‎
‎श्री तलरेजा जी वेद, उपनिषद्, कुरआन, बाइबल, गुरु-ग्रन्थ-साहिब के अच्छे ज्ञाता थे | चार पत्रिकाओं के सम्पादक थे - (1) दीप-सन्देश (2) राष्ट्रीय चेतना (3) Awake and Arise(4) राष्ट्रीय संगठन | वर्ष 2007 में आप शिकागो और न्यूयार्क में वेद की उद्दात्त शिक्षाओं पर व्याख्यान देने गए थे | श्री तलरेजा जी का निधन 27 अप्रैल 2021 के दिन हुआ था |
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‎ पवित्र वेद और पवित्र बाइबिल
‎ मूल्य ₹300 (डाक खर्च सहित)

‎इसी पुस्तक का English Edition भी उपलब्ध है.
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‎Holy Vedas and Holy Bible
‎MRP ₹250 (Including Postage)
‎
‎Whatsapp on 094855 99275 to buy.
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09/08/2026
ईसाई मत पोल खोल मित्रों। मैं अंजनी कुमार सिंह हूँ। मैं सोनभद्र, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। आर्यसमाज पेज के माध्यम से अप...
24/07/2026

ईसाई मत पोल खोल
मित्रों। मैं अंजनी कुमार सिंह हूँ। मैं सोनभद्र, उत्तर प्रदेश का निवासी हूँ। आर्यसमाज पेज के माध्यम से अपनी आपबीती सुनना चाहता हूँ।
दोस्तों मैं अपने साथ घटित एक घटना को आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ। शायद यह घटना आपके साथ भी घटी हो---
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ये घटना जुलाई 2016 की है।
मेरा छोटा भाई malaria PF बुखार से पीड़ित था। मैंने रेनुकूट के hindalco hospital, gov. hospital के साथ कई हॉस्पिटल में भर्ती कराया लेकिन सब ने हाथ खड़े कर दिए।
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अंत मे हम रॉबर्ट्सगंज(सोनभद्र) के "JIVAN JYOTI CHRISTIAN HOSPITAL" गये। जहाँ उसे हमनें एमरजेंसी वार्ड में भर्ती कराया।
उस समय मैं ये देख कर हैरान रह गया कि एमरजेंसी वार्ड के कमरों में वो भोंपू लगे हुए थे जो कि सामान्यतया रेलवे स्टेशनों पर अनाउंसमेंट के लिए उपयोग किया जाता है। भोंपू से तेज आवाज में कोई गाना बजाया जा रहा था जो कि शायद बाइबिल से संबंधित था।
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सामने से एक नर्स आ रही थी।उससे मेरी बहस हो गयी।
मैं-"आप इस भोंपू को बंद क्यों नहीं करती"
नर्स- क्यों बंद करें आपको क्या परेशानी है।
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मैं-"मैं पहली बार ऐसा हॉस्पिटल देख रहा हूँ इमरजंसी वार्ड में रेलवे का लाउडस्पीकर लगा है इससे मरीजों को परेशानी होती है"
इस बात पर काफी बहस हुई अंत में डॉक्टर आये और कहा ये दो मिनट बाद बंद हो जाएगा।
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फिर जब मेरे भाई की तबियत ज्यादा खराब हो गयी। और वो बुखार से छटपटाने लगा।
(तब वे अपनी औकात पर आ गए और अपना conversion card खेला। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं था कि ये कितनी तकलीफ में हैं।)
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तभी एक काली सी औरत हमारे पास आयी और बोली--
"मैं आपके बेटे के लिये परमेश्वर(जीसस) से प्रार्थना करूँ।"
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हमने रुआंसे हुए हामी भर दी। और वो प्रार्थना करने लगी।
"हे परमेश्वर अमित बहुत बीमार है उसका भाई और माँ आपकी शरण में आये हैं उसके भाई को ठीक कर दे परमेश्वर"
तभी एक नर्स आयी और बड़ी चालाकी से fevastin(paracitamol) का इंजेक्शन दे दिया।
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(मैं उनका कारनामा ध्यान से देख और समझ रहा था लेकिन कुछ कहा नहीं)
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नर्स-"मैंने आपके बेटे के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की है अब वो जल्दी ही ठीक हो जाएगा। आप केवल परमेश्वर(जीसस) पर विश्वास कीजिये।
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फिर मेरी माँ ने कहा,"हम तो सभी भगवान को एक ही मानते है बस उनके रूप अलग अलग हैं। हैम मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा सब में विश्वास करते हैं"
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इस बात पर वो भड़क गई और बोली--
"इतने सारे भगवान पर विश्वास मत कीजिये ऐसे कोई भी बचाने को नहीं आएगा। केवल परमेश्वर(जीसस) पर भरोसा कीजिये।"
लेकिन मेरी मां ने वापस अपनी बात दोहराई।
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इस पर खीझ कर वो कहने लगी--
"आपको सभी पर विश्वास आपको ही मुबारक हो और एक कुतर्क भी दिया।"
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मैंने अब इसकी ढोल बजाने की सोंची
और कहा--
"मैं उस ईश्वर में विश्वास रखता हूँ जो कि निराकार है सृष्टि की रचना करने वाला है,सबको एक समान समझता है,सबका भला चाहता है,आपके परमेश्वर की तरह नहीं जो............???"
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मैं इसके आगे बोलता उससे पहले ही वो वहाँ से बड़बड़ाते हुए भाग गई। और फिर दिखाई नहीं दी"
फिर हम अपने भाई को वहाँ से डिस्चार्ज कराके BHU वाराणसी ले गए।
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तो आप लोग अब समझ सकते हैं कि किस तरह से ये मिशनरी वाले लोगों को बेवकूफ बना कर धर्म परिवर्तन करते हैं, (PARACETAMOLखिला कर)
वैसे ये लोग धर्म परिवर्तन का काम एक वर्ग विशेष के साथ ही करते हैं लेकिन हमारी तकलीफ देखकर वे हम पर भी हाथ आजमाने चले आये।
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ऐसे लोगों पर ध्यान दें और उनको मुँहतोड़ जवाब दे।

Dealing with evangelical Christians the Hindu wayAbout six months ago there was a knock on my door and I opened it to fi...
21/07/2026

Dealing with evangelical Christians the Hindu way
About six months ago there was a knock on my door and I opened it to find two evangelical Christians there.
I knew they were evangelicals because they had that fake friendly smile on their faces, which all evangelicals have when they are trying to convert someone.
This was the third time that month that evangelists had come knocking on my door and disturbing me so I decided to teach them a lesson.
Good morning’ they said. ‘Good morning’ I replied.
‘Have you heard about the Lord Jesus Christ’? they asked.
‘I know something about him but I am a Hindu and I’m not really interested in knowing more’ I said. But like all evangelists, they took no notice of my wishes and proceeded to talk about their beliefs.
So I said, ‘I don’t think you are qualified to speak to me about Jesus’. They looked very astonished and asked, ‘Why not’? ‘Because’, I said, ‘you have no faith’. ‘Our faith in Jesus is as strong as a rock’ they insisted. ‘I don’t think it is’ I said with a smile.
'Please open your Bible and read the Gospel of Mark, chapter 16, verse 16, 17 and 18′ I said and while they flicked through their Bibles I went quickly inside and came out again.
One of them found the passage and I asked him to read it out loud.
It said, ‘He who believes and is baptized will be saved but he who does not believe shall be condemned. And these signs will follow those who believe in my name. They shall cast out devils, they shall speak in tongues, they will handle snakes and if they drink poison it will not hurt them and they will lay hands on the sick and they will recover’.
When he finished I said, ‘In that passage Jesus says that if you have real faith you will be able to drink poison and not die’.
I took a bottle of liquid detergent from behind my back, held it up and said, ‘Here is some poison. Demonstrate to me the strength of your faith and I will listen to anything you have to say about Jesus’.
You should have seen the looks on their faces!
They didn’t know what to say.
'What’s the problem’? I asked. ‘Is your faith not strong enough’?
They hesitated for a few moments and then one of them replied, ‘The Bible also says that we must not test God’.
‘I’m not testing God’, I said, ‘I’m testing you.
You love to witness for Jesus and now is your big opportunity’.
Finally one of then said, ‘We will go and speak to our pastor about this matter and come back and see you.
‘I’ll be waiting for you’ I said as they scurried away. Of course they never came back again.
Here is a bit of advice.
Keep a copy of this Bible reference - Gospel of Mark,
chapter 16,
verses 16, 17 and 18′
- and a bottle of detergent ready and every time the evangelists come to your door to harass ...
Do give them this test.

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