श्रृंगी-ऋषि वेद विज्ञान प्रतिष्ठान न्यास

  • Home
  • India
  • Delhi
  • श्रृंगी-ऋषि वेद विज्ञान प्रतिष्ठान न्यास

श्रृंगी-ऋषि वेद विज्ञान प्रतिष्ठान न्यास शृंगी ऋषि वेद विज्ञान प्रतिष्ठान न्य?

इस काल में श्वासन की मुद्रा में स्थित होने पर उनके प्रवचन स्वत: ही प्रारंभ हो जाते थे|जो कुछ भी उन दिव्य प्रवचनों में दिव्य आत्माओं के माध्यम से कहा गया है, उससे हम स्वत:ही जुड़ जाते हैं या जुड़ने की सतत कोशिश करते हैं| यदि हम दिव्य आत्माओं के जीवन और प्रवचनों के दिव्य ज्ञान से जुड़ जाएँ, तो निश्चित ही हम अपने उस उद्देश्य से जुड़ जायेंगे जो उद्देश्य मोक्ष से लेकर मोक्ष तक की यात्रा का होता है|

20/12/2024

परमपिता परमात्मा एक ऐसी अमूल्य चेतना है जिस चेतना में यह जगत क्रियाशील हो रहा है। यदि वह चेतना नहीं रहेगी संसार में तो प्राणी मात्र इस संसार में गतिमान न हो सकेगा। क्योंकि वह देव गति देने वाला है। गति मान है। सर्वज्ञ देव प्रकृति के कण-कण में ओत-प्रोत है।

Address

Pocket-1 Sector-6 Rohini
Delhi
110085

Opening Hours

Monday 9am - 5pm
Tuesday 9am - 5pm
Wednesday 9am - 5pm
Thursday 9am - 5pm
Friday 9am - 5pm
Saturday 9am - 5pm

Telephone

+917011699199

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when श्रृंगी-ऋषि वेद विज्ञान प्रतिष्ठान न्यास posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Organization

Send a message to श्रृंगी-ऋषि वेद विज्ञान प्रतिष्ठान न्यास:

Share

Our Story

ईश्वरीय सृष्टि का अद्भुत चमत्कार

एक पुरातन ऋषि का दिव्य जन्म

परमपिता परमात्मा की विचित्रता से युक्त, अद्भुत और विलक्षण सृष्टि का उद्घाटन पूज्यपाद गुरुदेव शृङ्गी ऋषि कृष्णदत्त जी महाराज के प्रवचनों से हुआ। वह ईश्वर का एक अलौकिक और दिव्य प्रकटीकरण है और सृष्टि के इतिहास की एक मात्र, विलक्षण अद्भुत घटना भी। जब १४ सितम्बर सन् १९४२ को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के, ग्राम खुर्रमपुर, सलेमाबाद में एक विशेष बालक ने जन्म लिया। बालक जन्म से ही एक विलक्षणता से युक्त था और विलक्षणता यह कि जब भी यह बालक सीधा, शवासन की मुद्रा में, कुछ अन्तराल लेट जाता या लिटा दिया जाता, तो बालक की गर्दन दायें-बायें हिलने लगती, लगभग १५ मिनट वेद मन्त्रोच्चारण होता और उसके उपरान्त सृष्टि के आदि काल से वर्तमान काल तक के विभिन्न कालों के स्वयं और विभिन्न ऋषि-मुनियों के चिन्तन और घटनाओं पर आधारित ४५ मिनट तक एक दिव्य प्रवचन होता। बाल्यावस्था होने के कारण, प्रारम्भ में आवाज अस्पष्ट होती और जैसे-जैसे आयु बढ़ने लगी, वैसे-वैसे ही आवाज और विषय दोनों स्पष्ट होने लगे।