28/01/2026
मथुरादास जी, आप खुश हैं कि आप घर जा रहे हैं, पर अपने भाइयों के सामने आपकी खुशी का ये नंगा नाच अच्छा नहीं लगता।
फिर अंत में – मथुरादास, इससे पहले कि मैं तुझे गद्दार करार दे के गोली मार दूँ, चला जा यहाँ से।
लेकिन फिर यही मथुरा दास जंग शुरु होते ही लौट आता है और पूरे फख्र से कहता है कि “खोटा सिक्का हमेशा वापस आ जाता है सर”
“सुबह का भूला शाम को वापस आ जाए, तो उसे भूला नहीं कहते, लगता है तुम घर तक नहीं पहुँचे?”
“नहीं सर, मैं आधे रास्ते से ही वापस आ गया। मैं अपनी बीवी को किसी भी हाल में छोड़ सकता हूँ पर अपनी कंपनी अपने देश को नहीं”
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बचपन में मैं जब भी ये सीन देखता था न तो मथुरा दास के लिए मन में थोड़ा गुस्सा आ जाता था। पर फिर मैं इंतेज़ार करता था कि वो पूरे स्वैग के साथ वापस आयेगा और भैरव सिंह को स्प्रिंग देने के चक्कर में अपनी जान कुर्बान कर देगा।
जाने कितनी बार मैंने बॉर्डर देखी है और न जाने कितनी ही बार मैं मथुरा दास के लिए रोया हूँ।
यूं तो बॉर्डर टू में बहुत से अच्छे सीन हैं, अच्छे किरदार भी हैं। पर मथुरा दास के कोई आसपास भी नहीं है। फ़िल्म राइटिंग सीखने वालों के लिए मथुरा दास का किरदार एक पूरा चैप्टर हो सकता है। ये किरदार शुरु से थोड़ा मतलबी, थोड़ा अड़ियल, तंग करने वाला, अपने नसीब को कोसने वाला (बिल्कुल हमारी तरह) है, उसे घर जाना है, अपनी बीवी का ध्यान रखना है।
लेकिन इन सारे ऐब से बढ़कर है उसका देश के प्रति ईमानदार होना, वो भैरव सिंह को एमएमजी स्प्रिंग देने के लिए अपनी जान दाँव पर लगा देता है। एक फिक्शनल वॉर फ़िल्म में इससे सुंदर कैरेक्टर आर्क बहुत कम ही लिखे गए हैं।
मथुरा दास को जीवंत करने वाले सुदेश बेरी साहब को फेसबुक पर फॉलो करता हूँ। वह बॉर्डर 2 के प्रमोशन में कोई क़सर नहीं छोड़ रहे हैं, जबकि फ़िल्म में उनका सिर्फ एक शॉट है, सिर्फ एक। फिर भी मथुरादास पूरे समर्पण से बॉर्डर के सीक्वल को अपना मानकर अपना फ़र्ज़ निभा रहा है।
सैल्यूट है ऐसे एक्टर को, और सेल्यूट जेपी दत्ता साहब को जिन्होंने इतना सुंदर किरदार लिखा कि वो कभी किरदार लगा ही नहीं।