08/05/2026
सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी का हाल भेड़ और चरवाहा जैसा है। संविधान बचाने, आरक्षण, शिक्षा आदि से आंदोलन शुरू होता है। इससे जाति पीछे लग जाए तो पार्टी बना लो और फिर बड़ी पार्टियों से सौदेबाजी करो। उप्र और बिहार में दर्जनों ऐसी जातियां हैं, जिनकी पार्टी बन गई हैं। पहले सवर्णों को खूब खरी-खोटी सुनाते हैं और उससे जाति गोलबंद हो जाती है। शुरू में अकेले चुनाव लड़ते हैं और वोट काटते हैं, उससे बाज़ार में भाव लगने लगता है। बीजेपी इनके पास पहुंचती है और चुनावी समझौता करती है। कुछ सीटें, पैसा और प्रचार तंत्र देकर जितवा देती है। पहले नेता MLA, MP और मंत्री बन जाते हैं। जैसी सौदेबाजी और जाति की संख्या हो, उसके अनुसार कुछ और सीटों पर बीजेपी लड़वा देती है और साधन और कैंडिडेट भी प्रदान करती है। जब जाति के नेता सत्ता का मजा चख लेते हैं, तब अगले चुनाव में पत्नी, बेटे, बहू, दामाद, समधी के लिए जाति की ताक़त का इस्तेमाल करते हैं। कल बिहार मंत्रिमंडल के विस्तार में ऐसा दिख गया।
हज़ारों वर्ष से जाति का कीड़ा दिमाग़ में पीढ़ी दर पीढ़ी घुसा चला आया है। भागीदारी आंदोलन से बीजेपी को खूब लाभ मिला रहा है । जाति को ख़ुद के नेता में बुराई नहीं दिखती और दूर से देखकर ख़ुश है कि उसकी जाति का आदमी मंत्री, MP, MLA, मेयर या जनप्रतिनिधि बना हुआ है। जब जाति की पार्टी नहीं थीं, तो बीजेपी या किसी बड़े दल को सौदेबाजी करना मुश्किल था और पूरी जाति, अर्थात लाखों-करोड़ों लोगों, से संवाद करना पड़ता था। सैकड़ों-हज़ारों को कुछ देना-लेना पड़ता था और अब तो एक को साधने से पूरी जाति सध जा रही है। भेड़ों को बस करने के बजाय चरवाहे को पकड़ने का सौदा टिकाऊ, अल्प संसाधन और कम प्रयास वाला है। इससे सत्ता और वोट मिल जाएं, तो इससे अच्छा क्या हो सकता है?
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