Ak Abbasi 313

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-Abbasi Caliphates
-Children's education
-Government job preparation
- Girls and girls wedding ceremony
- Institute for children in states
-History of Abbasid and others
-Social and political awareness
-Every possible effort to uplift the society

दारुल उलूम देवबंद उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद कस्बे में स्थित एक प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थान (मदरसा) है। य...
31/05/2026

दारुल उलूम देवबंद उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद कस्बे में स्थित एक प्रमुख इस्लामी शिक्षण संस्थान (मदरसा) है। यह न केवल भारत बल्कि विश्व भर में इस्लामी शिक्षा के सबसे महत्वपूर्ण केंद्रों में से एक माना जाता है।

स्थापना: इसकी स्थापना 31 मई 1866 (15 मुहर्रम 1283 हिजरी) को हुई थी।
संस्थापक: इसके संस्थापकों में मौलाना मुहम्मद कासिम नानौतवी, हाजी सय्यद मुहम्मद आबिद और मौलाना फजलुर्रहमान उस्मानी जैसे प्रमुख विद्वान शामिल थे।

बगदाद का वो अब्बासी साम्राज्य का सुल्तान क्रूरता का अंत, न्याय की शुरुआत: अल-मुक्ताफी बिलाह                             ...
31/05/2026

बगदाद का वो अब्बासी साम्राज्य का सुल्तान क्रूरता का अंत, न्याय की शुरुआत: अल-मुक्ताफी बिलाह

अब्बासी खिलाफत (Abbasid Caliphate) के 17वें खलीफा अल-मुक्ताफी बिलाह (al-Muktafi bi'llah) थे। उन्होंने 902 ईस्वी से 908 ई...
31/05/2026

अब्बासी खिलाफत (Abbasid Caliphate) के 17वें खलीफा अल-मुक्ताफी बिलाह (al-Muktafi bi'llah) थे। उन्होंने 902 ईस्वी से 908 ईस्वी तक शासन किया। वे 16वें खलीफा अल-मुअतदीद के सबसे बड़े बेटे थे। अपने पिता की तरह, उन्होंने भी अब्बासी साम्राज्य की खोई हुई ताकत और क्षेत्रों को वापस पाने में बड़ी सफलता हासिल की।

महत्वपूर्ण उपलब्धियां और इतिहास
1. मिस्र और सीरिया पर दोबारा नियंत्रण (तुलुनी वंश का अंत)
अल-मुक्ताफी के शासनकाल की सबसे बड़ी सैन्य सफलता मिस्र (Egypt) और सीरिया (Syria) को वापस अब्बासी नियंत्रण में लाना था। वहां शासन कर रहे 'तुलुनी राजवंश' (Tulunids) को हराकर उन्होंने इन महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर सीधे बगदाद का शासन स्थापित किया, जो पिछले कई दशकों से स्वतंत्र रूप से चल रहे थे।

2. कार्मेटियन विद्रोहियों (Qarmatians) का दमन
उस दौर में रेगिस्तानी इलाकों और सीरिया की सीमाओं पर 'कार्मेटियन' नाम के एक कट्टरपंथी और हिंसक समूह का आतंक बढ़ रहा था, जो हज यात्रियों और शहरों पर हमले करते थे। अल-मुक्ताफी ने अपनी सेनाएं भेजकर इस विद्रोह का कड़ाई से दमन किया और साम्राज्य की आंतरिक सुरक्षा को मजबूत किया।

3. लोकप्रिय और उदार शासक
अपने पिता अल-मुअतदीद के विपरीत (जो बहुत सख्त और यातनाएं देने के लिए जाने जाते थे), अल-मुक्ताफी का स्वभाव काफी नरम और उदार था। खलीफा बनते ही उन्होंने अपने पिता द्वारा बनाए गए गुप्त तहखानों और जेलों को बंद करवा दिया, जहां राजनीतिक बंदियों को रखा जाता था। उन्होंने ज़ब्त की गई कई संपत्तियां उनके असली मालिकों को वापस लौटा दीं, जिससे वे जनता में बेहद लोकप्रिय हो गए।

4. कूटनीति और निर्माण कार्य
उन्होंने बीजान्टिन साम्राज्य (Byzantine Empire) के साथ युद्ध और कूटनीति दोनों का संतुलन बनाए रखा और युद्ध बंदियों की अदला-बदली की। बगदाद में उन्होंने अपने पिता द्वारा शुरू किए गए महल परिसरों के निर्माण को पूरा करवाया और जनहित के कई कार्य किए।

इस्लामी इतिहास में कई ऐसे शासक हुए हैं जिन्होंने अपनी सैन्य शक्ति, प्रशासनिक सुधारों और न्याय के लिए दुनिया भर में ख्यात...
30/05/2026

इस्लामी इतिहास में कई ऐसे शासक हुए हैं जिन्होंने अपनी सैन्य शक्ति, प्रशासनिक सुधारों और न्याय के लिए दुनिया भर में ख्याति प्राप्त की। इतिहास के पन्नों में सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रभावशाली माने जाने वाले 4 मुस्लिम शासकों का विवरण नीचे दिया गया है:

1. सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी (Saladin)
इतिहास में सलाहुद्दीन अय्यूबी को उनके साहस, कूटनीति और उदारता के लिए जाना जाता है।

2. सम्राट अकबर (Akbar the Great)
मुगल बादशाह अकबर को उनकी धार्मिक सहिष्णुता और प्रशासनिक कुशलता के लिए भारत के इतिहास में सबसे लोकप्रिय शासकों में से एक माना जाता है।

3. सुल्तान मेहमेद द्वितीय (Mehmed the Conqueror)
उस्मानी (ऑटोमन) साम्राज्य के सुल्तान मेहमेद द्वितीय को 'फतह' (विजयी) के नाम से जाना जाता है।

4. हारून अल-रशीद (Harun al-Rashid)
अब्बासी खिलाफत के पांचवें खलीफा, हारून अल-रशीद का शासनकाल 'इस्लामी स्वर्ण युग' का चरम माना जाता है।

उपलब्धि: उनके समय में बगदाद विज्ञान, कला, व्यापार और संस्कृति का वैश्विक केंद्र बन गया था। उन्होंने 'बैतुल हिकमा' (हाउस ऑफ विजडम) जैसी संस्थाओं को प्रोत्साहित किया।

इतिहास में मुगल बादशाह औरंगज़ेब का शासनकाल सबसे अधिक विवादित और चर्चा में रहा है। आम तौर पर इतिहास में उनकी छवि केवल मंद...
30/05/2026

इतिहास में मुगल बादशाह औरंगज़ेब का शासनकाल सबसे अधिक विवादित और चर्चा में रहा है। आम तौर पर इतिहास में उनकी छवि केवल मंदिरों को तोड़ने वाले शासक के रूप में दिखाई जाती है, लेकिन ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और कई प्रमुख इतिहासकारों के शोध से यह बात भी सामने आती है कि औरंगज़ेब ने अपने शासनकाल में कई हिंदू मंदिरों और मठों को जमीन (जागीर), नकद दान और सुरक्षा भी प्रदान की थी।

प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर के.एन. पणिक्कर और डॉ. बी.एन. पांडे (जिन्होंने मुगल काल के फरमानों पर गहरा शोध किया) के अनुसार, औरंगज़ेब ने भारत के विभिन्न हिस्सों में हिंदू पुजारियों और मंदिरों को राजकीय संरक्षण दिया था:

वाराणसी (काशी) के मंदिर: बनारस के जंगमबाड़ी मठ को औरंगज़ेब द्वारा जमीन और संरक्षण देने के फरमान आज भी मौजूद हैं। इसके अलावा बनारस के ही बेनी माधव मंदिर के पुजारियों को भी राजकीय मदद के प्रमाण मिलते हैं।

उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर: औरंगज़ेब के शासनकाल के ऐसे आधिकारिक दस्तावेज़ (फरमान) मिले हैं, जो दिखाते हैं कि उन्होंने उज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर के पुजारियों को दीप जलाने और पूजा-अर्चना के लिए घी और अन्य सामग्रियां दान में देने का आदेश जारी किया था।

चित्रकूट का बालाजी मंदिर: बुंदेलखंड के चित्रकूट में स्थित बालाजी मंदिर के लिए औरंगज़ेब ने बड़ी जागीर (जमीन) दान में दी थी और मंदिर के रख-रखाव के लिए नियमित रूप से शाही खजाने से मदद भेजी जाती थी।

गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर: असम के गुवाहाटी में स्थित प्रसिद्ध कामाख्या देवी मंदिर और उमानंद मंदिर को भी औरंगज़ेब की तरफ से भूमि दान (Land Grants) दिए जाने के ऐतिहासिक प्रमाण असम के राजकीय अभिलेखों में दर्ज हैं।

2. गैर-मुस्लिम धार्मिक स्थलों को भूमि और जागीर
इतिहासकार कैथरीन एशर और ऑड्रे ट्रुश्के के शोध के अनुसार, औरंगज़ेब ने न केवल हिंदू मंदिरों बल्कि जैन और सिख धार्मिक स्थलों को भी सहायता दी थी:

शत्रुंजय और जैन मंदिर: औरंगज़ेब ने गुजरात के पालिटाना में स्थित शत्रुंजय जैन मंदिरों को सुरक्षा प्रदान की थी और जैन मुनियों को भूमि दान में दी थी ताकि वे बिना किसी डर के अपनी धार्मिक यात्राएं कर सकें।

गया (बिहार) के मंदिर: बिहार के गया जिले में रहने वाले हिंदू संन्यासियों और पुजारियों को भूमि अनुदान दिए जाने के आधिकारिक मुगल आदेश आज भी रिकॉर्ड में सुरक्षित हैं।

3. बनारस का प्रसिद्ध फरमान (बनारस फरमान - 1659 ईस्वी)
खलीफा या सुल्तान के रूप में अपनी गद्दी संभालने के तुरंत बाद, 10 मार्च 1659 को औरंगज़ेब ने बनारस के स्थानीय अधिकारियों को एक प्रसिद्ध शाही आदेश (फरमान) जारी किया था। इस फरमान में स्पष्ट लिखा था:

"हमारी पवित्र शरीयत के अनुसार, प्राचीन मंदिरों को गिराया नहीं जाना चाहिए... हमारे शाही दरबार से यह आदेश जारी किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति बनारस और उसके आस-पास के हिंदू पुजारियों और ब्राह्मणों को परेशान न करे, न ही उनके काम में बाधा डाले, ताकि वे शांति से हमारे साम्राज्य की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना कर सकें।"

"बुद्धिमत्ता और कठोर न्याय का संतुलन: 16वें अब्बासी खलीफा अल-मुअतदीद बिलाह (al-Mu'tadid bi'llah)                        ...
30/05/2026

"बुद्धिमत्ता और कठोर न्याय का संतुलन: 16वें अब्बासी खलीफा अल-मुअतदीद बिलाह (al-Mu'tadid bi'llah)

अब्बासी सल्तनत का नया दौर  और साम्राज्य को एकजुट करने वाला नायक - 16वें अब्बासी खलीफा अल-मुअतदीद बिलाह (al-Mu'tadid bi'l...
30/05/2026

अब्बासी सल्तनत का नया दौर और साम्राज्य को एकजुट करने वाला नायक - 16वें अब्बासी खलीफा अल-मुअतदीद बिलाह (al-Mu'tadid bi'llah)

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका (Role in Indian Independence)दारुल उलूम देवबंद का भारत की आजादी की लड़ाई में एक बहुत बड़ा ...
30/05/2026

स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका (Role in Indian Independence)
दारुल उलूम देवबंद का भारत की आजादी की लड़ाई में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी योगदान रहा है:
अंग्रेजों का विरोध: इस संस्थान के विद्वान शुरू से ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ थे।
रेशमी रूमाल आंदोलन (Silk Letter Movement): दारुल उलूम के प्रमुख विद्वान मौलाना महमूद हसन (जिन्हें 'शेखुल हिंद' कहा जाता है) ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियारबंद क्रांति के लिए यह गुप्त आंदोलन चलाया था।
विभाजन का विरोध: देवबंद के अधिकांश बड़े विद्वानों ने 1947 में भारत के विभाजन (Partition) और 'टू-नेशन थ्योरी' का खुलकर विरोध किया था और अखंड भारत का समर्थन किया था।

दारुल उलूम देवबंद (Darul Uloom Deoband) भारत और पूरी दुनिया में इस्लामी शिक्षा (Islamic Education) का एक बहुत ही बड़ा और...
29/05/2026

दारुल उलूम देवबंद (Darul Uloom Deoband) भारत और पूरी दुनिया में इस्लामी शिक्षा (Islamic Education) का एक बहुत ही बड़ा और ऐतिहासिक केंद्र है। यह उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के एक छोटे से कस्बे देवबंद में स्थित है। मिस्र (Egypt) की मशहूर अल-अजहर यूनिवर्सिटी के बाद इसे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा इस्लामी मदरसा माना जाता है।

1. स्थापना और इतिहास (Foundation & History)स्थापना कब हुई: इसकी नींव ब्रिटिश काल के दौरान 30 मई 1866 को रखी गई थी। संस्थापक कौन थे: इसकी शुरुआत प्रमुख इस्लामी विद्वानों मौलाना मोहम्मद कासिम नानौतवी, हाजी आबिद हुसैन, और मौलाना रशीद अहमद गंगोही आदि ने मिलकर की थी।शुरुआत कैसे हुई: इसकी शुरुआत बहुत ही छोटे स्तर पर देवबंद की 'छत्ता मस्जिद' में एक अनार के पेड़ के नीचे सिर्फ एक उस्ताद (टीचर) और एक शागिर्द (छात्र) से हुई थी।

स्थापना का मुख्य उद्देश्य: 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नाकामी और मुगल साम्राज्य के अंत के बाद, भारत में मुस्लिम संस्कृति और पारंपरिक इस्लामी शिक्षा को बचाए रखना इसका मुख्य लक्ष्य था।

2. देवबंदी आंदोलन क्या है? (The Deobandi Movement)इस मदरसे से जिस विचारधारा की शुरुआत हुई, उसे "देवबंदी आंदोलन" या "देवबंदी विचारधारा" कहा जाता है। यह सुन्नी इस्लाम के हनफी संप्रदाय (स्कूल ऑफ थॉट) से ताल्लुक रखता है। इस विचारधारा में कुरान, हदीस (पैगंबर मोहम्मद के कथन) और शरिया (इस्लामी कानून) के सख्त और शुद्ध पालन पर जोर दिया जाता है। आज भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान और यहां तक कि ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका में भी इस विचारधारा को मानने वाले करोड़ों लोग हैं।

3. स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका (Role in Indian Independence)दारुल उलूम देवबंद का भारत की आजादी की लड़ाई में एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी योगदान रहा है:अंग्रेजों का विरोध: इस संस्थान के विद्वान शुरू से ही ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ थे। रेशमी रूमाल आंदोलन (Silk Letter Movement): दारुल उलूम के प्रमुख विद्वान मौलाना महमूद हसन (जिन्हें 'शेखुल हिंद' कहा जाता है) ने अंग्रेजों के खिलाफ हथियारबंद क्रांति के लिए यह गुप्त आंदोलन चलाया था।विभाजन का विरोध: देवबंद के अधिकांश बड़े विद्वानों ने 1947 में भारत के विभाजन (Partition) और 'टू-नेशन थ्योरी' का खुलकर विरोध किया था और अखंड भारत का समर्थन किया था।

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