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15/04/2026

कहते हैं एक बार पेरिस के एक कैफ़े में एक महिला ने चर्चित चित्रकार पाब्लो पिकासो को देखा और उनसे एक नैपकिन पर छोटा सा स्केच बनाने का अनुरोध किया। पिकासो ने कुछ ही सेकंड में एक अद्भुत चित्र बनाया और महिला से उसकी बड़ी कीमत माँगी। महिला हैरान रह गई और कहा “पर आपने इसे बनाने में सिर्फ 30 सेकंड ही तो लिए!” पिकासो ने मुस्कुराकर कहा—“इसे 30 सेकंड में बनाने के काबिल होने के लिए मुझे 30 वर्ष लगे हैं।”

काव्यपीडिया की यह 6 वर्षों की यात्रा भी उस ‘एक नैपकिन स्केच’ जैसी ही सरल दिख सकती है, लेकिन इसके पीछे हर दिन की वह मेहनत, रिसर्च और समर्पण है जिसने आज हमें 5 लाख साहित्यप्रेमियों और पाठकों का एक सम्पूर्ण परिवार बनाया है।

इतिहास गवाह है कि बड़े बदलाव आंकड़ों और संख्या से नहीं, बल्कि एक छोटे से विचार और निस्वार्थ कर्म से शुरू होते हैं। जैसे प्रेमचंद ने प्रेस चलाकर साहित्य को जनमानस तक पहुँचाया, हमने डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपना माध्यम बनाया। आज जब हम 2 करोड़ की मासिक सोशल मीडिया रीच और 5 लाख साहित्यप्रेमियों के परिवार को देखते हैं, तो यह केवल एक आँकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की उस साझी साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत की जीत लगती है जिसे हम और हमारे जैसे कई डिजिटल साहित्यिक संस्थाएं सहेजने की कोशिश कर रहे हैं।

इस साहित्यिक यात्रा में हमसे कई गलतियाँ भी हुईं, परंतु हर गलती ने हमें कुछ नया सिखाया और निरंतर आगे बढ़ने का साहस दिया। आलोचनाएं कल भी होती थीं, आज भी होती हैं, और हम उन्हें सहर्ष स्वीकार करते हैं। सच तो यह है कि आलोचनाएँ वहीं होती हैं जहाँ कुछ नया रचा जा रहा हो, जहाँ कुछ निर्मित हो रहा हो। जहाँ गहरा अनुराग होता है, वहाँ आलोचना का होना भी अनिवार्य है। प्रेम और समीक्षा, दोनों ही केवल उन्हीं के हिस्से आते हैं जो कर्मपथ पर गतिशील हैं। अतः, इस सफर में उन सभी मित्रों का विशेष आभार, जिन्होंने न केवल हमें प्रेम दिया, बल्कि हमारी कमियों से अवगत कराकर हमें और बेहतर बनने का साहस भी दिया।

हम उन तमाम साथियों का हृदय से धन्यवाद करते हैं जिन्होंने इस यात्रा के इन छह स्वर्णिम वर्षों में अपना अटूट समर्पण और सहयोग दिया। पाठकों का, आलोचकों का और प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हर उस व्यक्ति का आभार, जिसने काव्यपीडिया को एक परिवार बनाया।

काव्यम् अमृतम्!

अंशुमन आर्यव
संस्थापक
काव्यपीडिया परिवार

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