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समिति संवाद दिल्ली प्रांत वंदेमातरम्। मातृभूमि सर्वोपरि। **राष्ट्र सेविका समिति दिल्ली प्रांत आधिकारिक फेस बुक पेज**

11 अक्तूबर/जन्म-दिवसआधुनिक चाणक्य नानाजी देशमुखग्राम कडोली (जिला परभणी, महाराष्ट्र) में 11 अक्तूबर, 1916 (शरद पूर्णिमा) ...
10/10/2026

11 अक्तूबर/जन्म-दिवस

आधुनिक चाणक्य नानाजी देशमुख

ग्राम कडोली (जिला परभणी, महाराष्ट्र) में 11 अक्तूबर, 1916 (शरद पूर्णिमा) को श्रीमती राजाबाई की गोद में जन्मे चंडिकादास अमृतराव (नानाजी) देशमुख ने भारतीय राजनीति पर अमिट छाप छोड़ी।

1967 में उन्होंने विभिन्न विचार और स्वभाव वाले नेताओं को साथ लाकर उ0प्र0 में सत्तारूढ़ कांग्रेस का घमंड तोड़ दिया। इस कारण कांग्रेस वाले उन्हें नाना फड़नवीस कहते थे। छात्र जीवन में निर्धनता के कारण किताबों के लिए वे सब्जी बेचकर पैसे जुटाते थे। 1934 में डा. हेडगेवार द्वारा निर्मित और प्रतिज्ञित स्वयंसेवक नानाजी ने 1940 में उनकी चिता के सम्मुख प्रचारक बनने का निर्णय लेकर घर छोड़ दिया।

उन्हें उत्तर प्रदेश में पहले आगरा और फिर गोरखपुर भेजा गया। उन दिनों संघ की आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। नानाजी जिस धर्मशाला में रहते थे, वहाँ हर तीसरे दिन कमरा बदलना पड़ता था। अन्ततः एक कांग्रेसी नेता ने उन्हें इस शर्त पर स्थायी कमरा दिलाया कि वे उसका खाना बना दिया करेंगे। नानाजी के प्रयासों से तीन साल में गोरखपुर जिले में 250 शाखाएं खुल गयीं। विद्यालयों की पढ़ाई तथा संस्कारहीन वातावरण देखकर उन्होंने गोरखपुर में 1950 में पहला 'सरस्वती शिशु मन्दिर' स्थापित किया। आज तो ‘विद्या भारती’ संस्था के अन्तर्गत ऐसे विद्यालयों की संख्या 50,000 से भी अधिक है।

1947 में रक्षाबन्धन के शुभ अवसर पर लखनऊ में ‘राष्ट्रधर्म प्रकाशन’ की स्थापना हुई, तो नानाजी इसके प्रबन्ध निदेशक बनाये गये। वहां से मासिक राष्ट्रधर्म, साप्ताहिक पा॰चजन्य तथा दैनिक स्वदेश अखबार निकाले गये। 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगने से प्रकाशन संकट में पड़ गया। ऐसे में नानाजी ने छद्म नामों से कई पत्र निकाले।

1952 में जनसंघ की स्थापना होने पर उत्तर प्रदेश में उसका कार्य नानाजी को सौंपा गया। 1957 तक प्रदेश के सभी जिलों में जनसंघ का काम पहुँच गया। 1967 में वे जनसंघ के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बनकर दिल्ली आ गये। दीनदयाल जी की हत्या के बाद 1968 में उन्होंने दिल्ली में 'दीनदयाल शोध संस्थान' की स्थापना की।

विनोबा भावे के 'भूदान यज्ञ' तथा 1974 में इन्दिरा गांधी के कुशासन के विरुद्ध जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हुए आन्दोलन में नानाजी खूब सक्रिय रहे। पटना में जब पुलिस ने जयप्रकाश जी पर लाठी बरसायीं, तो नानाजी ने उन्हें अपनी बांह पर झेल लिया। इससे उनकी बांह टूट गयी; पर जयप्रकाश जी बच गये।

1975 में आपातकाल के विरुद्ध बनी ‘लोक संघर्ष समिति’ के वे पहले महासचिव थे। 1977 के चुनाव में इन्दिरा गांधी हार गयीं और जनता पार्टी की सरकार बनी। नानाजी भी बलरामपुर से सांसद बने। प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई उन्हें मंत्री बनाना चाहते थे; पर नानाजी ने सत्ता के बदले संगठन को महत्व दिया। अतः उन्हें जनता पार्टी का महामन्त्री बनाया गया।

1978 में नानाजी ने सक्रिय राजनीति छोड़कर ‘दीनदयाल शोध संस्थान’ के माध्यम से गोंडा, नागपुर, बीड़ और अमदाबाद में ग्राम विकास के कार्य किये। 1991 में उन्होंने चित्रकूट में देश का पहला 'ग्रामोदय विश्वविद्यालय' स्थापित कर आसपास के 500 गांवों का जन भागीदारी द्वारा सर्वांगीण विकास किया। इसी प्रकार मराठवाड़ा, बिहार आदि में भी कई गांवों का पुननिर्माण किया। 1999 में वे राज्यसभा में मनोनीत किये गये। इस दौरान मिली सांसद निधि का उपयोग उन्होंने इन सेवा प्रकल्पों के लिए ही किया।

‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित नानाजी ने 27 फरवरी, 2010 को अपनी कर्मभूमि चित्रकूट में अंतिम सांस ली। उन्होंने अपने 81 वें जन्मदिन पर देहदान का संकल्प पत्र भर दिया था। अतः देहांत के बाद उनका शरीर चिकित्सा विज्ञान के छात्रों के शोध हेतु दिल्ली के आयुर्विज्ञान संस्थान को दे दिया गया।
राष्ट्र के प्रति उनकी सेवाओं का सम्मान करते हुए भारत सरकार ने 25 जनवरी, 2019 को उन्हें मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ देने की घोषणा की।

#नानाजी_देशमुख
#आधुनिकचाणक्य

✨ प्रथमं शैलपुत्री च... ✨वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥भावार्थ: मनचाहे...
10/10/2026

✨ प्रथमं शैलपुत्री च... ✨
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
भावार्थ: मनचाहे फल की प्राप्ति के लिए मैं मस्तक पर आधा चन्द्रमा धारण करने वाली, वृष (बैल) पर सवारी करने वाली, हाथ में त्रिशूल धारण करने वाली और यशस्विनी माँ शैलपुत्री की वंदना करता/करती हूँ।
नवरात्रि के प्रथम पावन दिन (घटस्थापना) पर नवदुर्गा के प्रथम स्वरूप माँ शैलपुत्री की उपासना से आप सभी के जीवन में स्थिरता, सुख, समृद्धि और उत्तम स्वास्थ्य की प्राप्ति हो। माता रानी आपके सभी कष्टों का निवारण करें।
जय माता दी! 🙏 सुप्रभातम एवं शुभ नवरात्रि! 🌸

अग्निर् वृत्राणि जंघनाद्। #सामवेद  #अमृतवचन
10/10/2026

अग्निर् वृत्राणि जंघनाद्।
#सामवेद
#अमृतवचन

🎶 **पद्मभूषण ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धासुमन।** 🙏🌹अपनी मखमली आवाज़, हृदयों को छू लेने वाली...
09/10/2026

🎶 **पद्मभूषण ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धासुमन।** 🙏🌹

अपनी मखमली आवाज़, हृदयों को छू लेने वाली ग़ज़लों और भावपूर्ण गायकी से करोड़ों दिलों में जगह बनाने वाले जगजीत सिंह जी भारतीय संगीत जगत की अमूल्य धरोहर हैं।

उनकी ग़ज़लों में प्रेम, विरह, संवेदना और जीवन के अनगिनत एहसास आज भी जीवंत हैं। उनकी आवाज़ का जादू समय की सीमाओं से परे है और सदैव संगीतप्रेमियों के हृदय में गूँजता रहेगा।

**आपकी आवाज़ अमर है, आपकी ग़ज़लें अमर हैं!** 🌹

भावभीनी श्रद्धांजलि! 🙏
#जगजीतसिंह #ग़ज़लसम्राट #पुण्यतिथि #भारतीयसंगीत #विनम्रश्रद्धांजलि

10 अक्तूबर/जन्म-दिवसकर्मयोगी ब्रिगेडियर पोगुला गणेशम्  कई लोग सरकारी सेवा से अवकाश को सक्रिय जीवन की समाप्ति मान लेते है...
09/10/2026

10 अक्तूबर/जन्म-दिवस

कर्मयोगी ब्रिगेडियर पोगुला गणेशम्

कई लोग सरकारी सेवा से अवकाश को सक्रिय जीवन की समाप्ति मान लेते हैं; पर कुछ उसे नये क्षेत्र में जाने का एक अवसर मानते हैं। ये लोग प्रायः कुछ ऐसा कर दिखाते हैं, जो समाज के लिए लाभकारी और दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है। ब्रिगेडियर पोगुला गणेशम् ऐसे ही एक व्यक्ति हैं।
उनका जन्म दस नवम्बर, 1949 को मद्रास रियासत के भूमपल्ली गांव में हुआ था। अब यह तेलंगाना में है। उस्मानिया वि.वि. से इंजीनियर बनकर उन्होंने दिल्ली वि.वि. से एम.बी.ए. की डिग्री प्राप्त की। उन दिनों बंगलादेश मुक्ति का संग्राम चल रहा था। इससे प्रेरित होकर वे फौज में भरती हो गये और फिर 35 साल वहीं कार्यरत रहे। बख्तरबंद लड़ाकू वाहनों के वे विशेषज्ञ थे। वे कई बार कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियानों में शामिल हुए। करगिल युद्ध के बाद उन्होंने सेना के लिए ‘विंडी’ नामक वाहन विकसित किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय पेटेंट प्राप्त हुआ। यह भारतीय सेना को प्राप्त पहला पेटेंट था। इसे 2004 की गणतंत्र दिवस परेड में भी प्रदर्शित किया गया। 2005 में गणतंत्र दिवस पर उन्हें ‘विशिष्ट सेवा मेडल’ से सम्मानित किया गया।
31 अक्तूबर, 2005 को उन्होंने अवकाश लिया; पर उनका मन युवा था। अतः कुछ मित्रों के साथ 20 नवम्बर, 2005 को ‘पल्ले सृजना’ नामक संस्था बनाई और गांवों, बस्तियों और निर्धन वर्ग के बीच रचनात्मक कौशल तलाशने लगे। तीन साल उन्होंने डायनेमिक्स लिमिटेड हैदराबाद में निदेशक पद पर काम किया; पर 60 साल का होते ही सब छोड़कर पूरी तरह समाजसेवा में जुट गये। यद्यपि यह आसान नहीं था। कई लोग समझते थे कि वे राजनीति में आना चाहते हैं। कई लोगों ने निरुत्साहित भी किया; पर उनकी पत्नी अरुणा ने उनका साथ दिया। इस प्रकार एक नयी यात्रा शुरू हो गयी।
उन्होंने संस्था के नाम से ही द्वैमासिक तेलुगु पत्रिका भी शुरू की, जिसका काम उनकी पत्नी देखती हैं। इसमें उन प्रयोगों की चर्चा होती है, जिसे गांव में कम शिक्षित लोग, बुजुर्ग या महिलाएं अपने कौशल या परंपरा से कर रहे हैं। उन्होंने जिस पहले प्रयोग को प्रचारित किया, वह साड़ी बुनाई की एक छोटी मशीन थी, जिसे चिंताकिंडी मल्लेशम् ने अपनी मां को कष्ट से बचाने के लिए बनाया था। 2007 में राष्ट्रपति महोदय ने मल्लेशम् को इसके लिए सम्मानित किया। इससे संस्था का नाम और काम बढ़ गया।
अब तक संस्था 300 नये आविष्कारों को प्रस्तुत कर चुकी है। 2,000 ऐसे प्रयोगों को अभिलेखित भी किया है। वे आंध्र और तेलंगाना के 1,200 गांवों में 4,000 कि.मी. पदयात्रा कर लगभग एक लाख छात्रों को संबोधित कर चुके हैं। 3,000 स्वयंसेवी उनके साथ काम कर रहे हैं। हर तीसरे महीने वे ‘चिन्ना शोधयात्रा’ करते हैं। ऐसी यात्राओं में उन्होंने जो नवविज्ञानी खोजे हैं, उनमें से 13 ‘राष्ट्रपति पुरस्कार’ तथा दो ‘पद्म श्री’ प्राप्त कर चुके हैं। उनके नाम 26 पेटेंट भी हैं। कई उत्पाद बाजार में आ गये हैं।
उन्होंने सिंकदराबाद के अपने घर में इन आविष्कारों के नमूने भी रखे हैं। वे इन नवविज्ञानियों और उनके उत्पादों को प्रदर्शिनी और प्रतियोगिताओं में ले जाते हैं। कोरोना काल में भी वे वेबनार के माध्यम से काम करते रहे। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की राज्य सैनिक सलाहकार बोर्ड के सदस्य के नाते वे पूर्व सैनिकों के कल्याण में भी सक्रिय हैं। उनके नवाचार अब तक 10 करोड़ रु. से अधिक का कारोबार कर चुके हैं, जिससे हजारों लोगों को रोजगार मिला है और लाखों परिवारों के जीवन में नयी आशा की किरण उत्पन्न हुई है।
सैन्य जीवन को वे पहला और इसे दूसरा जीवन कहते हैं। उनके दोनों जीवन सफल ही नहीं सार्थक भी हैं।


#ब्रिगेडियर_पोगुला_गणेशम्

10 अक्तूबर/जन्म-दिवसपूर्वोत्तर के भगीरथ वसंतराव भट्टबंगाल में संघ के कार्य को दृढ़ आधार देने वाले श्री वसंतराव भट्ट का ज...
09/10/2026

10 अक्तूबर/जन्म-दिवस
पूर्वोत्तर के भगीरथ वसंतराव भट्ट

बंगाल में संघ के कार्य को दृढ़ आधार देने वाले श्री वसंतराव भट्ट का जन्म 10 अक्तूबर, 1926 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर नगर में हुआ था। वसंतराव पर उनके पिता श्री विनायक राव भट्ट की छत्रछाया लम्बे समय नहीं रही। अतः बड़े भाई ने ही पिता के समान इनका पालन-पोषण किया।

विद्यालयी शिक्षा ग्वालियर में पूर्ण कर वसंतराव ने नागपुर विश्वविद्यालय से मराठी भाषा में विशेषज्ञता के साथ एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। फिर कुछ समय उन्होंने नौकरी भी की। वे बचपन से ही संघ की शाखा में जाते थे। नागपुर में वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की प्रेरणा से 1947 में उन्होंने प्रचारक बनने का निर्णय लिया और नौकरी को सदा के लिए राम-राम कह दिया।

प्रारम्भ में उन्हें महाकौशल तथा फिर जबलपुर विभाग का काम दिया गया। उनके प्रचारक बनने के अगले ही वर्ष संघ पर प्रतिबंध लग गया; पर वे श्री एकनाथ रानाडे के स्नेेहिल मार्गदर्शन में बिना विचलित हुए काम करते रहे।

1956 में उन्हें बंगाल के हुगली विभाग का काम दिया गया। उन्होंने शीघ्र ही बंगला सीख ली तथा वहां के रीति-रिवाजों से समरस होकर ‘वसंत दा’ हो गये। एकनाथ जी ने उन्हें कुछ लोगों से मिलवा दिया था; पर आगे का मार्ग अब उन्हें ही बनाना था। कार्यालय न होने के कारण वे रात में रेलवे स्टेशन पर सोते थे। 1958 में उन्हें प्रांत प्रचारक श्री अमलकुमार बसु का सहयोगी तथा 1960 में बंगाल के प्रांत प्रचारक की जिम्मेदारी दी गयी।

बंगाल में उन दिनों संघ का काम मुख्यतः नगर के व्यापारी वर्ग में था। वसंत दा ने वामपंथ प्रभावित होने पर भी गांवों में सघन प्रवास किया। 1975 में आपातकाल लगने पर वे भूमिगत होकर काम करते रहे और पुलिस की पकड़ में नहीं आये। इस दौरान बंगाल में 3,000 लोगों ने जेल-यात्रा की।

आपातकाल के बाद अन्य अनेक संगठनों की तरह ‘वनवासी कल्याण आश्रम’ के काम को भी देश भर में फैलाने का निर्णय हुआ। अतः 1977 में वसंत दा को सम्पूर्ण पूर्वोत्तर भारत का काम दिया गया। 1980 में उन्हें अ.भा. सह संगठन मंत्री तथा फिर अ.भा.संगठन मंत्री की जिम्मेदारी दी गयी।

वनवासी कल्याण आश्रम के काम की दृष्टि से वसंत दा को पूर्वोत्तर के काम का भगीरथ कहा जाता था। क्योंकि उन्होंने वहां शून्य से काम प्रारम्भ कर अगले 25 वर्ष में उसे प्रभावी स्थिति में पहुंचा दिया। कोलकाता में उन्होंने ‘कल्याण भवन’ बनवाया, जो पूर्वोत्तर की गतिविधियों का केन्द्र बना है।

बंगाल में मछली बहुत खाई जाती है; पर वसंत दा निरामिष थे। जिन लोगों को यह पता था, वहां तो व्यवस्था हो जाती थी; पर बाकी जगह वे ‘माछेर झोल’ में से मछली निकाल कर उसकी तरी से चावल खा लेते थे। अति प्रातः जागरण, दो समय की पूजा और व्यायाम के प्रति वे अत्यधिक आग्रही थे। अंतिम दिनों में बिस्तर पर रहते हुए भी वे हाथ-पैर हिला लेते थे।

क्रोध और अहंभाव से मुक्त वसंत दा की आवश्यकताएं बहुत कम थीं। बंगाल में चटाई की सामग्री से थैले बनते हैं। ऐसे एक थैले में उनके कपड़े तथा दूसरे में साहित्य रहता था। अर्थाभाव के कारण मीलों पैदल चलना उनके लिए सामान्य बात थी। सारी रात रेल या बस में खड़े हुए यात्रा करने पर भी, बिना विश्राम किये वे अगले दिन के निर्धारित कार्यक्रम मुस्कुराते हुए पूरे करते थे।

वृद्धावस्था में वे कोलकाता के संघ कार्यालय (केशव भवन) पर रहते हुए वहां आने वालों से संघ तथा वनवासी कल्याण आश्रम के काम के बारे में पूछताछ करते रहते थे। 87 वर्ष की आयु में 26 अप्रैल, 2013 को प्रातः पांच बजे कोलकाता के संघ कार्यालय पर ही वसंत दा का निधन हुआ।

#वसन्तराव_भट्ट

#पूर्वोत्तर_के_भगीरथ

रामविलास शर्मा (10 अक्टूबर 1912 - 30 मई 2000) एक प्रगतिशील साहित्यिक आलोचक , भाषाविद् , कवि और विचारक थे। उनका जन्म उत्त...
09/10/2026

रामविलास शर्मा (10 अक्टूबर 1912 - 30 मई 2000) एक प्रगतिशील साहित्यिक आलोचक , भाषाविद् , कवि और विचारक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के ऊंचगांव सानी मेहुआ था। लगभग पाँच दशकों के अपने करियर में, शर्मा ने 50 से ज़्यादा किताबें लिखीं।

डॉ॰ रामविलास शर्मा के साहित्यिक जीवन का आरंभ 1934 से होता है जब वह सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के संपर्क में आये। इसी वर्ष उन्होंने अपना प्रथम आलोचनात्मक लेख 'निरालाजी की कविता' लिखा जो चर्चित पत्रिका 'चाँद' में प्रकाशित हुआ। इसके बाद वे निरंतर सृजन की ओर उन्मुख रहे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ॰ रामविलास शर्मा ही एक ऐसे आलोचक के रूप में स्थापित होते हैं, जो भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं। उनकी आलोचना प्रक्रिया में केवल साहित्य ही नहीं होता, बल्कि वे समाज, अर्थ, राजनीति, इतिहास को एक साथ लेकर साहित्य का मूल्यांकन करते हैं। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल को जाँचने के लिए नहीं किया है, बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह होती है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है।

शर्मा का लेखन बहुआयामी है। मुख्य रूप से साहित्य के आलोचक होते हुए भी उन्होंने भाषाविज्ञान, इतिहास तथा समाज एवं संस्कृति के सन्दर्भों में सुविस्तीर्ण लेखन किया है। उनकी पूर्व प्रकाशित कुछ पुस्तकें संशोधित-परिवर्धित रूप में भिन्न नामों से प्रकाशित हुईं।

रामविलास शर्मा जी वर्ष 1986-87 में हिन्दी अकादमी के प्रथम सर्वोच्च सम्मान शलाका सम्मान से सम्मानित साहित्यकार हैं। इसके अतिरिक्त 1991 में इन्हें प्रथम व्यास सम्मान से भी सम्मानित किया गया।

आज स्वर्गीय रामविलास शर्मा जी की जयंती पर सादर नमन।

#रामविलास_शर्मा

#रामविलास_शर्मा_जयंती

मालगुडी के सृजनकर्ता: आर.के. नारायण10 अक्तूबर 1906 को मद्रास (अब चेन्नई) के एक सामान्य से घर में जन्मे आर.के. नारायण आगे...
09/10/2026

मालगुडी के सृजनकर्ता: आर.के. नारायण
10 अक्तूबर 1906 को मद्रास (अब चेन्नई) के एक सामान्य से घर में जन्मे आर.के. नारायण आगे चलकर भारतीय साहित्य को एक कालजयी दुनिया देने वाले लेखक बने - मालगुडी की दुनिया। भारतीय अंग्रेज़ी साहित्य में उनका नाम उस लेखक के रूप में दर्ज है जिसने भारत के आम जीवन को असाधारण सादगी और गहराई से शब्दों में ढाला।

उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता थी उनकी सहजता। न कहीं बनावट, न दिखावा - बस जीवन का सरल, सच्चा चित्रण। उनके पात्र वही थे जिन्हें हम अपने आसपास देखते हैं: दुकानदार, विद्यार्थी, शिक्षक, पुजारी, और साधारण सपने देखने वाले लोग। लेकिन उनकी कहानियों में वही साधारण जीवन असाधारण बन जाता था।

आर.के. नारायण का पूरा नाम रसिपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायणस्वामी था। उनका जन्म एक तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ। पिता आर.के. कृष्णस्वामी अय्यर स्कूल के हेडमास्टर थे और माँ गृहिणी। बचपन में नारायण अपने नाना-नानी के पास रहे, जहाँ उनकी दादी की कहानियाँ सुन-सुनकर उनमें कथा कहने की रुचि पैदा हुई। उन्होंने कभी विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा पहली बार में पास नहीं की, लेकिन असफलता के उन दिनों में वे अंग्रेज़ी साहित्य की दुनिया में खो गए। चार्ल्स डिकेन्स, थॉमस हार्डी और पी.जी. वोडहाउस के लेखन ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। बाद में उन्होंने मैसूर के महाराजा कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली और कुछ समय अध्यापन करने के बाद पूर्णकालिक लेखक बनने का निश्चय किया।

1935 में उनका पहला उपन्यास स्वामी एंड फ्रेंड्स प्रकाशित हुआ, जिसने पाठकों को स्वामीनाथन नामक एक शरारती स्कूली बच्चे और काल्पनिक नगर मालगुडी से परिचित कराया। यही नगर आगे चलकर भारतीय साहित्य की पहचान बन गया। इस पुस्तक के प्रकाशन में ब्रिटिश लेखक ग्राहम ग्रीन का बड़ा योगदान था, जिन्होंने नारायण की प्रतिभा को पहचान कर प्रकाशक से इसे प्रकाशित करवाया। यह दोस्ती नारायण के पूरे जीवन में एक गहरी साहित्यिक प्रेरणा का स्रोत बनी रही।

इसके बाद द बैचलर ऑफ आर्ट्स, द इंग्लिश टीचर और द फाइनेंशियल एक्सपर्ट जैसी कृतियों ने उन्हें भारत के प्रमुख लेखकों की श्रेणी में ला खड़ा किया। 1958 में प्रकाशित द गाइड ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई और इसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला। इस उपन्यास पर बनी हिंदी फिल्म भी अत्यधिक सफल रही और आज तक भारतीय सिनेमा की क्लासिक कही जाती है।

नारायण की कहानियों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि उन्होंने भारत को किसी भव्य दृष्टि से नहीं, बल्कि आम आदमी के अनुभवों से चित्रित किया। उन्होंने वही लिखा जो हमारे आसपास था - एक शिक्षक की चिंताएँ, एक दुकानदार की उम्मीदें, एक विद्यार्थी की जिज्ञासा। मालगुडी डेज़ की कहानियाँ पढ़ते हुए लगता है जैसे वह किसी परिचित शहर की गलियों और दुकानों का ही चित्रण हो। उनकी रचनाओं में वही जीवन धड़कता है जो भारत की मिट्टी में बसता है - साधारण लोगों के संघर्ष, उनकी छोटी खुशियाँ और जीवन के नैतिक द्वंद्व।

आर.के. नारायण ने अपने लंबे साहित्यिक जीवन में तीस से अधिक पुस्तकें लिखीं। 1964 में उन्हें पद्म भूषण और 2000 में मरणोपरांत पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। 1968 में उन्हें रैमॉन मैग्सेसे पुरस्कार भी मिला। उनकी पुस्तकों का अनुवाद कई भाषाओं में हुआ और वे भारतीय अंग्रेज़ी लेखन के वैश्विक चेहरे बने। 1941 में उन्होंने अपनी प्रकाशन संस्था इंडियन थॉट पब्लिकेशन्स की स्थापना की, ताकि उनके लेखन तक पाठकों की पहुँच सीधे हो सके।

1934 में नारायण का विवाह राजम से हुआ, जो उनके जीवन का प्रेम थीं। लेकिन कुछ वर्षों बाद ही राजम का निधन हो गया। इस दुख ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया, पर उन्होंने लेखन को ही अपना सहारा बनाया। द इंग्लिश टीचर में उन्होंने इसी व्यक्तिगत पीड़ा को संवेदनशीलता से अभिव्यक्त किया।

1980 के दशक में मालगुडी डेज़ जब टेलीविज़न पर प्रसारित हुआ, तो वह भारतीय दर्शकों के दिलों में बस गया। आज भी मालगुडी भारतीय साहित्य का पर्याय है - एक ऐसी जगह जहाँ जीवन सरल है, लोग सच्चे हैं और कहानियाँ अनंत।

13 मई 2001 को आर.के. नारायण का निधन हुआ। वे 94 वर्ष के थे। पर उनकी कहानियाँ आज भी जीवित हैं - पाठकों के मन में, स्कूलों की किताबों में और भारतीय साहित्य की आत्मा में। उनकी लेखनी हमें यह सिखाती है कि महान साहित्य हमेशा भव्य शब्दों से नहीं, बल्कि जीवन की सादगी से जन्म लेता है। मालगुडी कोई स्थान नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का प्रतीक है - और उसके सृजनकर्ता आर.के. नारायण भारतीय कथा साहित्य के सदा जीवित रहने वाले अध्याय हैं।
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*🚩--आज का पंचांग*🚩*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत  मन्वन्तरे,  अष्टाविंशति-तमे, युग...
09/10/2026

*🚩--आज का पंचांग*🚩

*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे, युग चतुष्के कलियुगे, कलि प्रथम चरणे सिद्धार्थी* (विक्रमी सम्वत) *पराभव* (शक सम्वत) नाम संवत्सरे

*युगाब्द* 5128
*विक्रमी संवत्* 2083
*शिवशके* 352-53
*शके* 1948
*अयन* दक्षिणायन
*ऋतु* शरद
*मास* आश्विन
*पक्ष* कृष्ण
*नक्षत्र* हस्त, चित्रा
*योग* इन्द्र, वैधृति
*करण* चतुष्पाद, नाग,
किंस्तुघ्न
*तिथि* अमावस्या
*वार* शनिवार

*तदनुसार*
10 अक्टूबर 2026
*दिन विशेष*
सर्वपितृमोक्ष अमावस्या, अन्वाधान, महालय समाप्त, पूर्णिमा अमावस्या श्राद्ध, गजच्छाया पर्व
*जन्मदिवस*
1. विख्यात कन्नड़ साहित्यकार के शिवराम कारन्त
2. उपन्यासकार आर. के. नारायण
3. प्रसिद्ध हिन्दी आलोचक डॉ. रामविलास शर्मा
4. प्रसिद्ध हॉकी खिलाड़ी बलबीर सिंह
5. पूर्वोत्तर के भगीरथ बसन्तराव भट्ट
6. कर्मयोगी ब्रिगेडियर पोगुला गणेशम्
*पुण्यतिथि*
पद्मभूषण ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह
*आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो*
🙏🕉️🙏

*⛳जय भारत 🌞 वन्दे मातरम् ⛳**🪂 संस्कृति अपनी एक चिरन्तन 🪂**मुनि मानस पंकज भृंग भजे**रघुवीर महा रनधीर अजे।**तव नाम जपामि न...
09/10/2026

*⛳जय भारत 🌞 वन्दे मातरम् ⛳*
*🪂 संस्कृति अपनी एक चिरन्तन 🪂*

*मुनि मानस पंकज भृंग भजे*
*रघुवीर महा रनधीर अजे।*
*तव नाम जपामि नमामि हरी*
*भव रोग महानद मान अरी।।*

*गुन सील कृपा परमायतनं*
*प्रनमामि निरंतर श्रीरमनम्।*
*रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं*
*महिपाल बिलोकय दीनजनं।।*

*ऊं श्रीरामाय नमः*
*ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय*
*सुप्रभात जय श्रीकृष्ण जय श्रीराम*

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