समिति संवाद दिल्ली प्रांत

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समिति संवाद दिल्ली प्रांत वंदेमातरम्। मातृभूमि सर्वोपरि। **राष्ट्र सेविका समिति दिल्ली प्रांत आधिकारिक फेस बुक पेज**
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*🚩--आज का पंचांग--🚩* *अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत  मन्वन्तरे,  अष्टाविंशति-तमे, ...
07/08/2026

*🚩--आज का पंचांग--🚩*

*अद्य श्री ब्रह्मणो, द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे, वैवस्वत मन्वन्तरे, अष्टाविंशति-तमे, युग चतुष्के कलियुगे, कलि प्रथम चरणे सिद्धार्थी* (विक्रमी सम्वत) *पराभव* (शक सम्वत) नाम संवत्सरे

*युगाब्द* 5128
*विक्रमी संवत्* 2083
*शिवशके* 352-53
*शके* 1948
*अयन* दक्षिणायन
*ऋतु* वर्षा
*मास* श्रावण
*पक्ष* कृष्ण
*नक्षत्र* कृतिका, रोहिणी
*योग* वृद्धि, ध्रुव
*करण* गर, वणिज, विष्टि
*तिथि* नवमी
*वार* शुक्रवार
*तदनुसार* 7 अगस्त, 2026

*जन्मदिवस*
1. प्रख्यात कलाकार तथा साहित्यकार अवनीन्द्रनाथ ठाकुर
2. प्रसिद्ध विद्वान वासुदेव शरण अग्रवाल
3. प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक एम. एस. स्वामीनाथ
4. ग्राम्य विकास के पुरोधा सुरेन्द्र सिंह चौहान
5. अन्तिम श्वास तक राष्ट्र धर्म निभाने वाले वरिष्ठ पत्रकार भानू प्रताप शुक्ल
*पुण्यतिथि*
1. लेखक, नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ ठाकुर
2. तमिलनाडु राजनीती के भीष्म पितामह करुणानिधि
*आज का दिन सबके लिए मंगलमय हो* 🌹🙏🕉️🙏🌹

*⛳जय भारत🌞वन्दे मातरम्*⛳*🪂 संस्कृति अपनी एकचिरन्तन*🪂*अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः।**विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश...
07/08/2026

*⛳जय भारत🌞वन्दे मातरम्*⛳
*🪂 संस्कृति अपनी एकचिरन्तन*🪂

*अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः।*
*विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः।।111।।*

*उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुस्वपननाशनः।*
*वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः।।112।।*

(विष्णुसहस्रनामस्तोत्रम्)

*श्रीकृष्ण शरणं मम*
*ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय*
*🌼सुप्रभात जय श्रीराधेकृष्ण 🌼*

भारतीय कला को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त कर उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने वाले महान चित्रकार, मूर्तिकार और लेखक आचार्...
07/08/2026

भारतीय कला को पश्चिमी प्रभाव से मुक्त कर उसे अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने वाले महान चित्रकार, मूर्तिकार और लेखक आचार्य अवनीन्द्रनाथ ठाकुर जी की जयंती पर शत-शत नमन। 🙏✨

उन्होंने 'भारत माता' के अपने कालजयी चित्र से राष्ट्रवाद की एक नई अलख जगाई और भारतीय कला को वैश्विक मंच पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई। उनकी कलाकृतियाँ और साहित्य आज भी हमारे देश की अमूल्य धरोहर हैं।आइए, आज के इस विशेष दिन पर उनकी महान विरासत को याद करें और भारतीय कला व संस्कृति के संरक्षण का संकल्प लें।🎨🖌️

युगद्रष्टा, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। 🙏✨मुख्य संदेश:आज साहित्य जगत के महासूर्य, विश्वकवि औ...
07/08/2026

युगद्रष्टा, गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी की पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। 🙏✨
मुख्य संदेश:आज साहित्य जगत के महासूर्य, विश्वकवि और नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर जी की पुण्यतिथि है।

उन्होंने अपनी कालजयी रचनाओं, सुरीले संगीत और महान विचारों से न केवल भारतीय संस्कृति को समृद्ध किया, बल्कि पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ाया।

"हम स्वतंत्रता के मुक्त गगन में तभी सांस ले सकते हैं, जब हमारे मन में भय न हो और हमारा मस्तक ऊंचा हो।" - गुरुदेवआइए, आज के दिन उनके इस महान विचार को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें और उनकी अमर धरोहर को याद करें।

7 अगस्त/जन्म-दिवसग्राम्य विकास के पुरोधा सुरेन्द्र सिंह चौहान गांव का विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं हो सकता। इसके लि...
07/08/2026

7 अगस्त/जन्म-दिवस
ग्राम्य विकास के पुरोधा सुरेन्द्र सिंह चौहान

गांव का विकास केवल सरकारी योजनाओं से नहीं हो सकता। इसके लिए तो ग्रामवासियों की सुप्त शक्ति को जगाना होगा। म.प्र. के नरसिंहपुर जिले में स्थित मोहद ग्राम के निवासी श्री सुरेन्द्र सिंह चौहान ने इस विचार को व्यवहार रूप में परिणत कर अपने गांव को आदर्श बनाकर दिखाया।

‘भैयाजी’ के नाम से प्रसिद्ध श्री सुरेन्द्र सिंह का जन्म सात अगस्त, 1933 को ग्राम मोहद में हुआ था। 1950 से 54 तक जबलपुर में पढ़ते समय वे संघ के स्वयंसेवक बने। इसके बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी में स्वर्ण पदक लेकर एम.ए. किया। वे आठ वर्ष तक एक डिग्री काॅलिज में प्राध्यापक भी रहे; पर उनके मन में अपने गांव के विकास की ललक थी। अतः नौकरी छोड़कर वे गांव आ गये और खेतीबाड़ी में लग गये।

संघ की शाखा के प्रति अत्यधिक श्रद्धा होने के कारण उन्होंने गांव की शाखा को ही ग्राम्य विकास का माध्यम बनाया। अंग्रेजी के विद्वान होने पर भी वे व्यवहार में हिन्दी और संस्कृत का ही प्रयोग करते थे। उनके प्रयास से गांव के सब लोग संस्कृत सीख गये। उनका लेख मोती जैसा सुंदर था। संघ में उन्होंने अपने गांव और जिले के कार्यवाह से लेकर महाकौशल प्रांत के सहकार्यवाह और फिर अखिल भारतीय सह सेवाप्रमुख तक की जिम्मेदारी निभाई।

मधुर वाणी और हंसमुख स्वभाव के धनी सुरेन्द्र जी की गांव में बहुत विशाल पुश्तैनी खेती थी। उसमें सभी जाति-वर्ग के लोग काम करते थे। वे उन्हें अपने परिवार का सदस्य मानकर उनके दुख-सुख में शामिल होते थे। छुआछूत और ऊंच-नीच आदि से वे मीलों दूर थे। वे कई वर्ष तक गांव के निर्विवाद सरपंच रहे। समाजसेवी अन्ना हजारे की प्रेरणा से संघ ने भी ग्राम्य विकास का काम हाथ में लिया तथा हर जिले में एक गांव को आदर्श बनाने की योजना बनाई; पर इससे बहुत पूर्व सुरेन्द्र जी स्वप्रेरणा से यह काम कर रहे थे।

उनके गांव में कन्याएं रक्षाबंधन पर पेड़ों को राखी बांधती थीं। इससे हजारों पेड़ बच गये। फ्लश के शौचालय बनने से खुले में शौच जाना बंद हुआ। पर्यावरण शुद्धि के लिए घर में, सड़क के किनारे तथा गांव की फालतू भूमि पर फलदार वृक्ष लगवाये। बच्चे के जन्म पर पेड़ लगाने की प्रथा प्रारम्भ हुई।

हर घर में तुलसी, फुलवाड़ी एवं गाय, बाहरी दीवार पर ॐ तथा स्वस्तिक के चिन्ह, गोबर गैस के संयंत्र एवं निर्धूम चूल्हे, हर गली में कूड़ेदान, रासायनिक खाद एवं कीटनाशक रहित जैविक खेती आदि प्रयोगों से भी लाभ हुआ। हर इंच भूमि को सिंचित किया गया। विद्यालय में प्रेरक वाक्य लिखवाये गये। अध्यापकों के नियमित आने से छात्र अनुशासित हुए और शिक्षा का स्तर सुधर गया। घरेलू विवाद गांव में ही निबटाये जाने लगे। 53 प्रकार के ग्राम आधारित लघु उद्योग भी खोले गये। उनके गांव में कोई धूम्रपान या नशा नहीं करता था।

ग्राम विकास की सरकारी योजना का अर्थ केवल आर्थिक विकास ही होता है; पर सुरेन्द्र जी ने इससे आगे नैतिकता, संस्कार तथा ‘गांव एक परिवार’ जैसे विचारों पर काम किया। उनके गांव को देखने दूर-दूर से लोग आते थे। इन अनुभवों का लाभ सबको मिले, इसके लिए उन्हें संघ में अखिल भारतीय सह सेवाप्रमुख बनाया गया। उन्होंने किरण, उदय तथा प्रभात ग्राम नामक तीन श्रेणी बनाकर ‘ग्राम्य विकास’ को सामाजिक अध्ययन का विषय बना दिया।

विख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख ने चित्रकूट में ‘ग्रामोदय विश्वविद्यालय’ की स्थापना की थी। उन्होंने सुरेन्द्र जी के सफल प्रयोग तथा ग्राम्य विकास के प्रति उनका समर्पण देखकर उन्हें इस वि.वि. का उपकुलपति बनाया। सुरेन्द्र जी ने चार वर्ष तक इस जिम्मेदारी को निभाया। आदर्श ग्राम, स्वावलम्बी ग्राम तथा आदर्श हिन्दू परिवार के अनेक नये प्रयोगों के सूत्रधार श्री सुरेन्द्र सिंह चौहान का एक फरवरी, 2013 को अपने गांव मोहद में ही निधन हुआ।

(संदर्भ : पांचजन्य/आर्गनाइजर/वनस्वर..आदि)
#सुरेन्द्र_सिंह_चौहान #भैयाजी_मोहद

7 अगस्त/जयंती अंतिम सांस तक राष्ट्र-धर्म निभाया :  भानुप्रताप शुक्लराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और वरिष्ठ पत्रकार ...
06/08/2026

7 अगस्त/जयंती
अंतिम सांस तक राष्ट्र-धर्म निभाया : भानुप्रताप शुक्ल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक और वरिष्ठ पत्रकार श्री भानुप्रताप शुक्ल का जन्म सात अगस्त, 1935 को ग्राम राजपुर बैरिहवाँ, जिला बस्ती( उ.प्र.) में हुआ था। वे अपने पिता पण्डित अभयनारायण शुक्ल की एकमात्र सन्तान थे। उनके जन्म के 12 दिन बाद ही उनकी जन्मदात्री माँ का देहान्त हो गया। इस कारण उनका लालन-पालन अपने नाना पण्डित जगदम्बा प्रसाद तिवारी के घर सुल्तानपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ।

भानु जी की प्रारम्भिक शिक्षा गाँव की पाठशाला में पण्डित राम अभिलाष मिश्र के कठोर अनुशासन में पूरी हुई। 1951 में वे संघ के सम्पर्क में आये और 1955 में वे प्रचारक बन गये। भानु जी मेधावी छात्र थे। साहित्य के बीज उनके मन में सुप्तावस्था में पड़े थे। अतः उन्होंने छुटपुट कहानियाँ, लेख आदि लिखने प्रारम्भ कर दिये। यत्र-तत्र उनके प्रकाशन से उनका उत्साह बढ़ने लगा।

प्रचारक जीवन में वे कम ही स्थानों पर रहे। उन दिनों संघ की ओर से अनेक हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा था। इनका केन्द्र लखनऊ था। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन प्रान्त प्रचारक भाऊराव देवरस और सहप्रान्त प्रचारक दीनदयाल उपाध्याय इनकी देखरेख करते थे। इन दोनों ने भानु जी की लेखन प्रतिभा को पहचाना और उन्हें लखनऊ बुला लिया। यहाँ उनका सम्पर्क सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’, सुमित्रानन्दन पन्त, महादेवी वर्मा, भगवतीचरण वर्मा, अमृतलाल नागर एवं श्रीनारायण चतुर्वेदी जैसे साहित्यकारों से हुआ।

लखनऊ आकर भानु जी ने पण्डित अम्बिका प्रसाद वाजपेयी के सान्निध्य में पत्रकारिता के सूत्र सीखे। धीरे-धीरे उनका आत्मविश्वास बढ़ता गया और वे राष्ट्रधर्म (मासिक) और फिर तरुण भारत (दैनिक) के सम्पादक बनाये गये। 1975 में आपातकाल लगने पर पांचजन्य (साप्ताहिक) को लखनऊ से दिल्ली ले जाया गया। इसके साथ भानु जी भी दिल्ली आ गये और फिर अन्त तक दिल्ली ही उनकी गतिविधियों का केन्द्र रहा।

आपातकाल में भूमिगत रहकर उन्होंने इन्दिरा गान्धी की तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष किया। आगे चलकर वे पांचजन्य के सम्पादक बने। इस नाते उनका परिचय देश-विदेश के पत्रकारों से हुआ। उन्होंने भारत से बाहर अनेक देशों की यात्राएँ भी कीं। 1990 के श्रीराम मन्दिर आन्दोलन में वे पूरी तरह सक्रिय रहे। 31 अक्तूबर और दो नवम्बर, 1990 को हुए हत्याकाण्ड के वे प्रत्यक्षदर्शी थे और इसकी जानकारी पांचजन्य के माध्यम से उन्होंने पूरे देश को दी।

1994 में पांचजन्य से अलग होकर वे स्वतन्त्र रूप से देश के अनेक पत्रों में लिखने लगे। ‘राष्ट्रचिन्तन’ नामक उनका साप्ताहिक स्तम्भ बहुत लोकप्रिय हुआ। उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं तथा अनेकों का सम्पादन किया। इनमें राष्ट्र जीवन की दिशा, सावरकर विचार दर्शन, अड़तीस कहानियाँ, आँखिन देखी कानन सुनी..आदि प्रमुख हैं। उन्होंने राष्ट्र, ईमानवाले जैसी अनेक वैचारिक पुस्तकों की लम्बी भूमिकाएँ भी लिखीं।

कलम के सिपाही भानु जी ने अपने शरीर की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। कैंसर जैसे गम्भीर रोग से पीड़ित होने पर भी उन्होंने लेखन का क्रम नहीं तोड़ा। 17 अगस्त, 2006 को दिल्ली के एक अस्पताल में उन्होंने अन्तिम साँस ली। उनके देहान्त से तीन दिन पहले तक उनका साप्ताहिक स्तम्भ ‘राष्ट्रचिन्तन’ देश के अनेक पत्रों में विधिवत प्रकाशित हुआ था।
#भानु_प्रताप_शुक्ल #राष्ट्र_चिंतन_दिवस

7 अगस्त/जन्म-दिवसहरित क्रांति के पुरोधा डा. स्वामीनाथनभारत में एक समय अपनी जनसंख्या का पेट भरने के लिए पर्याप्त अन्न पैद...
06/08/2026

7 अगस्त/जन्म-दिवस
हरित क्रांति के पुरोधा डा. स्वामीनाथन

भारत में एक समय अपनी जनसंख्या का पेट भरने के लिए पर्याप्त अन्न पैदा नहीं होता था। इसे चुनौती के रूप में स्वीकार करने वाले कृषि विज्ञानी डा. मनकोम्बु संबासिवन स्वामीनाथन का जन्म सात अगस्त, 1925 को तमिलनाडु के कुंभकोणम में हुआ था। उन्होंने उन्नत आनुवांशिक गेहूं और चावल के बीजों से भारत को इस भयावह स्थिति से उबारा।

1943 में बंगाल के भीषण अकाल मेें लाखों लोग मारे गये। युवा स्वामीनाथन के मन पर इससे चोट लगी और उन्होंने कृषि वैज्ञानिक बनने की ठान ली। यद्यपि 1950 में उनका चयन पुलिस सेवा में हो गया था; पर उन्होंने नीदरलैंड तथा कैम्ब्रिज में शोध को प्राथमिकता दी। 1965 के युद्ध में अमरीका का हाथ पाकिस्तान के साथ था। तब वहां से हमें पी.एल.480 गेहूं आता था। उसे अमरीका में जानवर खाते थे; पर हमारे पास कोई विकल्प नहीं था। ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देशवासियों से सोमवार की रात को भोजन छोड़ने का आग्रह किया था; पर समस्या का स्थायी समाधान तो अधिक उपज ही था। डा. स्वामीनाथन इसी पर काम करने लगे।

1960 में उन्होंने नोबेल विजेता कृषि विज्ञानी नार्मन बोरलाॅग को उन्नत प्रजाति के मैक्सिकन गेहूं के बीज भेजने का आग्रह किया। 1963 में बोरलाग ने भारत में कुछ क्षेत्रों का अध्ययन किया और 100 कि.ग्रा. बीज भेजे। इनका पंतनगर, लुधियाना, कानपुर, पूसा और फिर दिल्ली के पास जौंती गांव में परीक्षण हुआ, जिसके अच्छे परिणाम मिले। इसके बाद डा. स्वामीनाथन ने बौनी प्रजातियों पर काम शुरू किया। इससे कम समय में उपज होने लगी तथा किसान दो की बजाय तीन फसल लेने लगे। इसे ही ‘हरित क्रांति’ कहा गया। यद्यपि इसमें रासायनिक खादों का अत्यधिक प्रयोग हुआ तथा तीन फसल के कारण जलस्तर गिरने लगा। अतः कई लोगों ने इसकी आलोचना भी की। इसके कई विपरीत परिणाम अब सर्वत्र दिखाई भी दे रहे हैं।

अब डा. स्वामीनाथन ने मैक्सिको के बौने गेहूं को जापानी गेहूं से मिलाकर मिश्रित बीज बनाया। फिर इसमें भारत की परिस्थिति के अनुसार बदलाव किये। इससे 1968 में गेहूं का उत्पादन 50 लाख टन बढ़ गया। इसके बाद इनका व्यापक प्रयोग होने से भारत भुखमरी से निकल गया। अतः भारत ने 1971 में अमरीका से पी.एल.480 समझौता समाप्त कर दिया। ऐसे प्रयोग उन्होंने चावल पर भी किये। इसी का परिणाम है कि अन्न आयात कर पेट भरने वाला भारत आज दुनिया को गेहूं और चावल निर्यात करता है। इससे जहां किसानों की आय बढ़ी, वहां भारत की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित हुई।

इस उपलब्धि पर देश-विदेश में डा. स्वामीनाथन को अनेक उपाधियां और सम्मान मिले। इनमें 84 मानद डाॅक्टरेट हैं। भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ सम्मान दिया और 2007 में राज्यसभा में भेजा। 2004 में बने ‘राष्ट्रीय किसान आयोग’ के द्वारा उन्होंने किसानों की आवाज बुलंद की। उन्होंने कहा कि किसान को लागत से डेढ़ गुना दाम मिलना चाहिए। क्योंकि खेती पूरा परिवार मिलकर करता है। उसमें परिश्रम के साथ मौसम संबंधी खतरे भी हैं। महिला किसानों के लिए उन्होंने क्रेडिट कार्ड लागू करवाया। यद्यपि उनकी अधिकांश सिफारिशें लागू नहीं हुईं; पर हर जगह उनकी चर्चा जरूर होती है।

डा. स्वामीनाथन ने अनेक प्रशासनिक पदों पर भी रहे। उन्होंने कृषि संबंधी नवाचार, शिक्षण और अनुसंधान पर विशेष जोर दिया। अतः देश में कई कृषि विश्वविद्यालय खोले गये। आज भारत सरकार मोटे अनाज पर जोर दे रही थी। यह सुझाव उन्होंने पहले ही दिया था। वे किसान और विज्ञान के बीच में सेतु थे। ऐसे महान कृषि वैज्ञानिक का 28 सितम्बर, 2023 को चेन्नई में निधन हुआ। देश का हर नागरिक उनका ऋणी है।
(29.9.23 के अखबार)

7 अगस्त/जन्म-दिवसपुरातत्ववेत्ता :डा. वासुदेवशरण अग्रवालऐतिहासिक मान्यताओं को पुष्ट एवं प्रमाणित करने में पुरातत्व का बहु...
06/08/2026

7 अगस्त/जन्म-दिवस

पुरातत्ववेत्ता :डा. वासुदेवशरण अग्रवाल

ऐतिहासिक मान्यताओं को पुष्ट एवं प्रमाणित करने में पुरातत्व का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। सात अगस्त, 1904 को ग्राम खेड़ा (जिला हापुड़, उ.प्र) में जन्मे डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही एक मनीषी थे, जिन्होंने अपने शोध से भारतीय इतिहास की अनेक मान्यताओं को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया।

वासुदेव शरण जी ने 1925 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से कक्षा 12 की परीक्षा प्रथम श्रेणी में तथा राजकीय विद्यालय से संस्कृत की परीक्षा उत्तीर्ण की। उनकी प्रतिभा देखकर उनकी प्रथम श्रेणी की बी.ए की डिग्री पर मालवीय जी ने स्वयं हस्ताक्षर किये। इसके बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम.ए. तथा कानून की उपाधियाँ प्राप्त कीं। इस काल में उन्हें प्रसिद्ध इतिहासज्ञ डा. राधाकुमुद मुखर्जी का अत्यन्त स्नेह मिला।

कुछ समय उन्होंने वकालत तथा घरेलू व्यापार भी किया; पर अन्ततः डा. मुखर्जी के आग्रह पर वे मथुरा संग्रहालय से जुड़ गये। वासुदेव जी ने रुचि लेकर उसे व्यवस्थित किया। इसके बाद उन्हें लखनऊ प्रान्तीय संग्रहालय भेजा गया, जो अपनी अव्यवस्था के कारण मुर्दा अजायबघर कहलाता था।

1941 में उन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय ने पाणिनी पर शोध के लिए पी-एच.डी की उपाधि दी। 1946 में भारतीय पुरातत्व विभाग के प्रमुख डाक्टर मार्टिमर व्हीलर ने मध्य एशिया से प्राप्त सामग्री का संग्रहालय दिल्ली में बनाया और उसकी जिम्मेदारी डाक्टर वासुदेव शरण जी को दी। 1947 के बाद दिल्ली में राष्ट्रीय पुरातत्व संग्रहालय स्थापित कर इसका काम भी उन्हें ही सौंपा गया। उन्होंने कुछ ही समय बाद दिल्ली में एक सफल प्रदर्शिनी का आयोजन किया। इससे उनकी प्रसिद्धि देश ही नहीं, तो विदेशों तक फैल गयी।

पर दिल्ली में डा. व्हीलर तथा उनके उत्तराधिकारी डा. चक्रवर्ती से उनके मतभेद हो गये और 1951 में वे राजकीय सेवा छोड़कर काशी विश्वविद्यालय के नवस्थापित पुरातत्व विभाग में आ गये। यहाँ उन्होंने ‘कालिज ऑफ़ इंडोलोजी’ स्थापित किया। यहीं रहते हुए उन्होंने हिन्दी तथा अंग्रेजी में लगभग 50 ग्रन्थों की रचना की।

इनमें भारतीय कला, हर्षचरित: एक सांस्कृतिक अध्ययन, मेघदूत: एक सांस्कृतिक अध्ययन, कादम्बरी: एक सांस्कृतिक अध्ययन, जायसी पद्मावत संजीवनी व्याख्या, कीर्तिलता संजीवनी व्याख्या, गीता नवनीत, उपनिषद नवनीत तथा अंग्रेजी में शिव महादेव: दि ग्रेट ग१ड, स्टडीज इन इंडियन आर्ट.. आदि प्रमुख हैं।

डा. वासुदेवशरण अग्रवाल की मान्यता थी कि भारतीय संस्कृति ग्राम्य जीवन में रची-बसी लोक संस्कृति है। अतः उन्होंने जनपदीय संस्कृति, लोकभाषा, मुहावरे आदि पर शोध के लिए छात्रों को प्रेरित किया। इससे हजारों लोकोक्तियाँ तथा गाँवों में प्रचलित अर्थ गम्भीर वाक्यों का संरक्षण तथा पुनरुद्धार हुआ। उनके काशी आने से रायकृष्ण दास के ‘भारत कला भवन’ का भी विकास हुआ।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के वंशज डा. मोतीचन्द्र तथा डा. वासुदेव शरण के संयुक्त प्रयास से इतिहास, कला तथा संस्कृति सम्बन्धी अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हुए। उनकी प्रेरणा से ही डा. मोतीचन्द्र ने ‘काशी का इतिहास’ जैसा महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा। वासुदेव जी मधुमेह से पीड़ित होने के बावजूद अध्ययन, अध्यापन, शोध और निर्देशन में लगे रहते थे। इसी रोग के कारण 27 जुलाई को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के अस्पताल में उनका निधन हुआ।

#वासुदेवशरण_अग्रवाल #पुरातत्ववेत्ता

धागे-धागे में बसी है हमारी संस्कृति और पहचान! 🇮🇳✨हर एक सूत में मेहनत, हर एक रंग में परंपरा और हर एक डिज़ाइन में भारत की ...
06/08/2026

धागे-धागे में बसी है हमारी संस्कृति और पहचान! 🇮🇳✨हर एक सूत में मेहनत, हर एक रंग में परंपरा और हर एक डिज़ाइन में भारत की आत्मा को संजोने वाले हमारे हथकरघा बुनकरों को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस की बहुत-बहुत बधाई।

कपड़ा सिर्फ परिधान नहीं, बल्कि हमारे शिल्पकारों की अटूट साधना और कला का प्रमाण है। आज के दिन आइए संकल्प लें कि हम भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपनाएंगे और आत्मनिर्भर भारत के इस सुंदर सपने को मजबूत करेंगे।🛍️ आज ही अपने पसंदीदा हथकरघा वस्त्र पहनें और गर्व से अपनी तस्वीरें साझा करें!

चिकित्सा जगत के महानायक को नमन 🙏भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के पूर्व महानिदेशक और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस...
06/08/2026

चिकित्सा जगत के महानायक को नमन 🙏भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के पूर्व महानिदेशक और अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के पूर्व निदेशक, पद्म भूषण व पद्म श्री से सम्मानित प्रो. वुलिमिरि रामालिंगस्वामी (V. Ramalingaswami) जी की जयंती पर उन्हें सादर नमन।

स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में उनका योगदान अतुलनीय है:कुपोषण पर ऐतिहासिक शोध: उन्होंने भारत में प्रोटीन-ऊर्जा कुपोषण (PEM) के कारणों और निवारण पर अभूतपूर्व काम किया।
घेंघा रोग (Goiter) का उन्मूलन: देश में आयोडीन युक्त नमक की अनिवार्यता और घेंघा रोग नियंत्रण कार्यक्रम की नींव रखने में उनकी मुख्य भूमिका रही।

संस्थानों का निर्माण: उन्होंने देश में चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के स्तर को वैश्विक ऊंचाइयों पर पहुँचाया।आज उनके विचार और शोध चिकित्सा जगत के शोधकर्ताओं और डॉक्टरों के लिए एक महान प्रेरणा हैं। राष्ट्र निर्माण और जन-स्वास्थ्य में उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।🇮🇳

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