14/05/2026
ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता की अनंत परंपरा को पुनः स्मरण कराने वाला एक अत्यंत गौरवपूर्ण एवं ऐतिहासिक अवसर —
“शारदा पीठ : सभ्यता, ज्ञान धरोहर” पुस्तक का लोकार्पण समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ।
शारदा पीठ केवल एक मंदिर या तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, दर्शन, अध्यात्म और शिक्षा का वह दिव्य केंद्र रहा है जिसने सदियों तक सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप को ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया। कश्मीर की पावन धरती पर स्थित शारदा पीठ को प्राचीन भारत के महानतम ज्ञान केन्द्रों में गिना जाता है। यह वह स्थान था जहाँ विद्वान, दार्शनिक, शास्त्रार्थकर्ता और साधक दूर-दूर से अध्ययन हेतु आया करते थे।
माँ शारदा, जिन्हें ज्ञान और विद्या की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है, उनके इस पावन पीठ ने भारतीय सभ्यता की उस चेतना को जीवित रखा जिसने “ज्ञान ही मोक्ष का मार्ग है” का संदेश दिया। कहा जाता है कि यहाँ विशाल ग्रंथालय, शास्त्र अध्ययन और वैचारिक विमर्श की अद्भुत परंपरा थी। आदि शंकराचार्य से लेकर अनेक महान विद्वानों का इस पीठ से संबंध भारतीय इतिहास में वर्णित है। शारदा लिपि का विकास भी इसी महान परंपरा से जुड़ा माना जाता है। आज जब विश्व भारतीय ज्ञान प्रणाली और सभ्यता की ओर पुनः आकर्षित हो रहा है, तब “शारदा पीठ : विरासत ज्ञान धरोहर” जैसी पुस्तकें हमारी जड़ों से पुनः जुड़ने का माध्यम बनती हैं। 
इस महत्वपूर्ण ग्रंथ के लेखक
ख्वाजा फारूख रेंजूशाह
एवं
प्रो. गीता सिंह
ने अत्यंत गंभीर शोध, ऐतिहासिक दृष्टि और सांस्कृतिक चेतना के साथ इस विषय को समाज के समक्ष प्रस्तुत किया है।
अंग्रेज़ी पुस्तक के हिंदी अनुवाद को जन-जन तक पहुँचाने में
आरिफ ख़ान भारती,
शिखर सरोहा
और
मो. वसीम अहमद
का योगदान अत्यंत सराहनीय और महत्वपूर्ण रहा। यह केवल अनुवाद नहीं, बल्कि ज्ञान की उस विरासत को व्यापक समाज तक पहुँचाने का सांस्कृतिक प्रयास है।
इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य
डॉ इंद्रेश कुमार जी
की गरिमामयी उपस्थिति एवं विशिष्ट सान्निध्य प्राप्त हुआ। समाज में राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक चेतना और संवाद की भावना को सशक्त करने में उनका दीर्घकालिक योगदान अत्यंत प्रेरणादायी रहा है। 
कार्यक्रम में पूज्य
स्वामी राजराजेश्वराश्रम जी
जी महाराज के आशीर्वचन ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत कर दिया। माँ शारदा की कृपा, भारतीय संस्कृति की निरंतरता और ज्ञान साधना के महत्व पर उनके विचार अत्यंत प्रेरणास्पद रहे।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता
आरिफ मोहम्मद ख़ान जी
ने भारतीय ज्ञान परंपरा, साझा सांस्कृतिक विरासत और शारदा पीठ के ऐतिहासिक महत्व पर अपने विचार रखते हुए यह संदेश दिया कि हमारी सभ्यता का वास्तविक बल उसकी ज्ञान-समृद्धि, सहअस्तित्व और सांस्कृतिक चेतना में निहित है।
यह आयोजन केवल एक पुस्तक विमोचन नहीं था, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, कश्मीर की सांस्कृतिक आत्मा और हमारी सभ्यतागत स्मृतियों के पुनर्जागरण का एक महत्वपूर्ण प्रयास था।
इस सफल आयोजन हेतु उपस्थित सभी विद्वानों, अतिथियों, शोधकर्ताओं, साहित्य प्रेमियों, सहयोगियों, आयोजन समिति तथा पर्दे के पीछे अथक परिश्रम करने वाले प्रत्येक कार्यकर्ता का हृदय से आभार एवं अभिनंदन।
आप सभी की सहभागिता ने इस आयोजन को केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और राष्ट्रचेतना का उत्सव बना दिया।
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